बतकही

बातें कही-अनकही…

कथा

डर के आगे क्या है ….

-- “मैं जानता हूँ, कि वे लोग मुझे जल्दी ही मार देंगें !” उस बारह-चौदह वर्षीय किशोर की आवाज़ में जितना भय था, उतनी ही पीड़ा भी, जो अभी दस मिनट पहले ही चलती बस में दौड़ता हुआ चढ़ा था | उसकी आवाज़ भय के कारण लगभग काँप रही थी | उसकी बात सुनकर मैं स्तब्ध रह गयी | ड्राइवर और कंडक्टर ने किशोर को दया भरी नज़रों से देखा | बाक़ी यात्री बच्चे के…

कविता

एक था अँगूठा

एक था अँगूठा... जो हर रोज़ चुनौती देता था राजपुत्रों की दिव्यता और अद्वितीयता को राजमहलों की एकान्तिक योग्यता को...!!! पुरोहित चौंके, गुरू अचंभित... उस ‘नाक़ाबिल’ अँगूठे से डर गए सभी दिव्यदेहधारी राजगुरु अतिविशिष्ट... सर्वश्रेष्ठ गुरु द्रोणाचार्य भी...! भविष्य की किसी आशंका से...!!! उस ‘जाहिल’ अँगूठे से घबराए सभी राजपुत्र... चिंतित, हैरान औ’ परेशान सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी अर्जुन भी...! राज्य सचेत औ’ सचेष्ट कर्तव्यनिष्ठ, लोक-कल्याणकारी वह रोकने को अनिष्ट कोई भविष्य में गुरु को सौंप कर्तव्य…

कथेतर

‘दगड़्या देश के भविष्य का एक आइना यह भी हैं !

यूरोप के स्वच्छन्दतावादी (रोमांटिक) कवियों में शामिल एक बड़े प्रसिद्द कवि विलियम वर्ड्सवर्थ ने लिखा है, ‘Child is the Father of Man’ | यह अतिशयोक्ति नहीं होगी, यदि इसी पंक्ति को ध्यान में रखते हुए यह कहा जाए कि हम अपने मन और मस्तिष्क को थोड़ा ‘बड़ेपन’ से मुक्त या उन्मुक्त रखकर देख-समझ पाएँ, तो बच्चों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं | या इसी बात को यदि यूँ कहा जाए कि बच्चे भी…

शोध/समीक्षा

‘बंधुआ मजदूर’ बनते शिक्षक और बर्बाद होती शिक्षा

भारत में सरकारी-विद्यालयों का शिक्षक-समाज हमारे देश एवं राज्य सरकारों के लिए आसानी से उपलब्ध ‘बंधुआ मजदूरों’ का ऐसा सुलभ कोष है, जिसका प्रयोग कभी भी, कहीं भी, किसी भी रूप में किसी भी कार्य में किया जा सकता है | टीकाकरण, पल्स-पोलियो अभियान, चुनाव, जनगणना, जानवरों की गणना, दूसरी विभिन्न तरह की अनेक गणनाएँ, मतदाता जागरूकता अभियान....और भी न जाने कितने तरह के कार्य...| इसलिए भारत के सरकारी-स्कूलों का शिक्षक-समाज अपने विद्यालयों में यदा-कदा…

आलोचना

शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रमों की बाढ़ में बहकर दूर होती शिक्षा

सरकारी विद्यालयों में एक बहुत ख़ास बात देखी जा सकती है; वहाँ पिछले दो दशकों से नवाचारों एवं शैक्षणिक-गतिविधियों से संबंधित शिक्षकों की विविध प्रकार की ट्रेनिंग की बाढ़-सी आई हुई है, जिससे न केवल अधिकांश शिक्षक असहज होते रहे हैं, बल्कि कंफ्यूज और असहमत भी हो रहे हैं | इसमें वे शिक्षक भी शामिल हैं, जो पूरी ईमानदारी से अपने शिक्षकीय कर्तव्यों का पालन करते हैं, बिना अपने विद्यार्थियों से किसी भी तरह का…

शोध/समीक्षा

सम्पूर्णानन्द जुयाल : शिक्षा-जगत में नई इबारत लिखने की कोशिश में

दुष्यंत कुमार की एक कविता ‘ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो’ की बड़ी मशहूर पंक्ति है ‘कैसे आकाश में सुराख़ हो नहीं सकता, एक पत्थर तबियत से तो उछालो यारो’ ! इस बात को एक अर्थ में सच कर दिखाया है सम्पूर्णानन्द जुयाल ने, जो राजकीय प्राथमिक विद्यालय, ल्वाली (पौड़ी, उत्तराखंड) के सहायक अध्यापक हैं ! इनके संबंध में इसी स्थान पर पहले भी कई लेख प्रकाशित हो चुके हैं, ‘सम्पूर्णानन्द जुयाल…

कथेतर

प्रमोद कुमार : सद्भावनापूर्ण सहयोग और सामंजस्य का नाम है

शिक्षा-जगत में ही नहीं किसी भी कार्यक्षेत्र में वहाँ के सहकर्मियों का आपसी सम्बन्ध यदि परस्पर सहयोग, सामंजस्य, समर्थन और सौहार्दपूर्ण हों, तो उसके नतीजे अलग ही होते हैं | जबकि यही सम्बन्ध यदि आपसी प्रतिद्वंद्विता, ईर्ष्या, षड्यंत्रों और एक-दूसरे को नीचा दिखाने एवं एक-दूसरे के काम को बाधित करने की प्रवृत्ति वाले हों, तो उसके नतीजे बेहद ही नकारात्मक होते हैं; सहकर्मियों के लिए भी, कार्यों की गुणवत्ता के संबंध में भी और कार्यस्थल…

शोध/समीक्षा

स्कूलों में कार्यक्रमों की रेल और धीरे-धीरे ग़ायब होती शिक्षा

लॉकडाउन के बाद से खुले विद्यालयों में बहुत सारी बातें बहुत ख़ास दिखाई देती हैं— उनमें से एक बहुत विशिष्ट बात है, जो इस लेख का विषय है, वह है सभी विद्यालयों में अनेकानेक प्रतियोगिताओं (चित्रकला, लेख, निबंध, खेल, शब्दावली और दर्ज़नों ऐसी ही प्रतियोगिताएँ) एवं सांस्कृतिक-कार्यक्रमों की बाढ़ और बड़े से लेकर छोटे स्थानीय छुटभैये नेताओं/नेत्रियों की जयंतियों की रेलमपेल; और उन सबकी आवश्यक रिपोर्ट सहित डिजिटल साक्ष्य भी बनाकर शिक्षा-विभागों को भेजने की…

शोध/समीक्षा

सरकारी विद्यालयों की पाठ्य-पुस्तकें एवं पाठ्यक्रम

पिछले दो दशकों से लेकर वर्तमान तक हमारे देश में सरकार एवं शिक्षा-मंत्रालयों द्वारा संचालित विभागों ने सरकारी-विद्यालयों में बच्चों के पढ़ने-लिखने के लिए जो पुस्तकें निर्मित की हैं, उनको देखना काफ़ी दिलचस्प है | कुछ निजी महँगे विद्यालयों द्वारा अपने यहाँ इन पुस्तकों को तो शामिल ही नहीं किया जाता है | और जहाँ ये शामिल हैं, तो वहाँ भी गौण रूप में; और मुख्य रूप से वहाँ कुछ अन्य पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं,…

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