बतकही

बातें कही-अनकही…

“जिन सवर्ण-महिलाओं के लिए वंचित-समाज की हमारी माता सावित्रीबाई फुले ने सबसे पहले स्कूल शुरू किया, वह भी हमारे लिए स्कूल शुरू करने से पहले; वे ही सवर्ण औरतें आज कैसे उनको नकार सकती हैं? उनको कैसे समझ में नहीं आता कि उनको उनके ही समाज के पुरुष भरमा रहे हैं?…”

“केवल हमारे वंचित-समाज की माँ, बहनें, बेटियाँ ही माता सावित्रीबाई की ऋणी नहीं हैं, बल्कि ब्राह्मण औरतों सहित सभी सवर्ण औरतें भी माता सावित्रीबाई की ऋणी हैं, चाहे वे मानें या नहीं…!”

ये उदगार और ऐसे पचासों उद्गार थे, वंचित-समाजों की महिलाओं के | अवसर था 3 जनवरी 2024 को सावित्रीबाई फुले की जयंती का, जिसका आयोजन ‘भारतीय समाज निर्माण संघ’ (BSNS) द्वारा दिल्ली के विकासपुरी इलाक़े में किया गया था और जिसमें 40-50 व्यक्ति शामिल थे; अधिकांशतः महिलाएँ, क्योंकि आयोजकों के कथनानुसार उन्होंने बहुत सोच-समझकर और जानबूझकर ही पुरुषों से अधिक महिलाओं को वहाँ आमंत्रित किया था, ताकि वे उनको उनके लिए लड़नेवाली सावित्रीबाई फुले से अधिकाधिक रू-ब-रू होने का मौका बना सकें | इसी कारण वहाँ उपस्थित लगभग प्रत्येक व्यक्ति, विशेष रूप से प्रत्येक महिला को मंच पर आकर अपनी बात कहने का मौक़ा दिया गया | और ‘उद्गारों की अभिव्यक्ति’ की इसी प्रक्रिया में कुछ किशोरियों और नवयुवतियों द्वारा लेख की शुरुआत में आई बातें कही गईं…

…जब सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले ने 1848 ई. में लड़कियों के लिए आधुनिक किस्म के विद्यालयों की स्थापना शुरू की और उनमें बच्चियों को पढ़ाना शुरू किया, तो उनके सामने बड़ी चुनौतियों में एक चुनौती महिलाओं को जागरूक करने की थी | महिलाओं का अपने बेहद मामूली मानव-अधिकारों के लिए खड़े होना और आवाज उठाना तो बहुत दूर की बात है, वे तो यह भी नहीं जानती थीं और न समझती थीं कि वे भी .मनुष्य’ की हैसियत रखती हैं और ‘मानव’ होने के नाते उनके भी कुछ ‘मानवी-अधिकार’ हैं | यह मनःस्थिति ब्राह्मण से लेकर शूद्र और दलित समाज की स्त्रियों तक, हिन्दू से लेकर ग़ैर-हिन्दू और मुस्लिम स्त्रियों तक सभी की थी | लेकिन फुले-दम्पति के सालों-साल तक लगातार प्रयासों के बाद धीरे-धीरे इस मनःस्थिति में बदलाव आने लगा और वे समझने लगीं कि वे भी पुरुषों की तरह ‘मनुष्य’ हैं और उनके भी कुछ मूलभूत मानव-अधिकार होने ही चाहिए |

फुले-दम्पति के निधन के लगभग दो-ढाई दशकों बाद महिलाओं को उनके अपने अस्तित्व के प्रति सम्मान-भाव रखने और मानव-अधिकारों के प्रति और अधिक सचेत करने का काम वंचित-समाज के सबसे बड़े मुक्तिदाता डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने किया |

…और यहाँ से शुरू हुई महिलाओं की मुक्ति, सचेतनता एवं जागरूकता की यह यात्रा अनेक पड़ावों, बाधाओं, मुसीबतों, साजिशों, धोखों आदि को पार करते हुए वर्त्तमान तक आ पहुँची है, जहाँ यकीन करना मुश्किल है कि यह वही स्त्री-वर्ग है, जिसके मुँह में जबान नहीं थी और जिनकी जबान को ब्राह्मणों ने हज़ारों साल पहले काटकर फ़ेंक दी थी…

…3 जनवरी 2024 को समस्त भारत की पहली आधुनिक शिक्षिका सावित्रीबाई फुले का केवल जन्मदिन ही नहीं था, बल्कि महिलाओं की मुक्ति के आरम्भ यानि आगाज़ का दिन भी था; यदि शिक्षा को व्यक्ति और समाज की मुक्ति का सबसे बड़ा माध्यम माना जाए तो | क्योंकि इसी दिन सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले ने भारत में लड़कियों के लिए पहला विद्यालय स्थापित किया, हालाँकि वह सवर्ण लड़कियों के लिए था | लेकिन यहीं से शिक्षा की वह मशाल जली, जिसने महिलाओं के रास्ते में छाए हुए घनघोर अँधेरे को मिटाने की पहल शुरू की और उन्हें शिक्षा नामक वह औजार दिया, जिससे अपने जीवन को अंधकारमय बनानेवाले सभी नकारात्मक शक्तियों से लड़ सकीं और जीत सकीं | वंचित-समाज के फुले-दम्पति और उनके ही स्कूल के माध्यम से शिक्षा की दुनिया में क़दम बढ़ाने का सम्पूर्ण स्त्री-समाज में पहला सौभाग्य उन्हीं सवर्ण महिलाओं को मिला, जिनका अधिकांश हिस्सा अपने इन मुक्तिदाताओं को अपना दुश्मन समझता है; केवल उनके वंचित-वर्गीय होने के कारण और अपने सवर्णी-अहंकार में | लेकिन फुले-दम्पति ने वंचित-समाज के बच्चों के लिए भी विद्यालय खोले और वंचित-समाज उनका हमेशा-हमेशा के लिए ऋणी हो गया |

…3 जनवरी 2024 को आयोजित उक्त कार्यक्रम में मुख्यतः महिलाएँ शामिल थीं, जिनमें मंच पर आकर अपने क्रांतिकारी विचारों से चौंकानेवाली और सुखद आश्चर्य से भरनेवाली केवल युवती और प्रौढ़ महिलाएँ ही नहीं थीं, बल्कि किशोरियाँ भी थीं | वे लड़कियाँ मुझे सावित्रीबाई की 11 वर्षीया दलित छात्रा मुक्ताबाई साल्वे की याद दिला रही थीं | मुक्ताबाई साल्वे नाम की यह बालिका सावित्रीबाई की वह छात्रा थी, जिसने अपने एक ही लेख ‘मंग महाराच्या दुखविसाई’; अर्थात् ‘मांग-महारों की व्यथा’ से ब्राह्मण-समाज सहित समस्त सवर्ण-समाज को आनेवाले समय की धमक सुना दी | इस निबंध को उस समय की जानी-मानी पत्रिका ‘ज्ञानोदय’ ने एक विद्रोही निबंध के रूप में 1855 में प्रकाशित किया था, जिसके लिए बालिका मुक्ताबाई को पुरस्कार भी मिला था |

इसलिए उस दिन मंच पर आकर उन छोटी-छोटी लड़कियों ने जो क्रांतिकारी विचार और अपने मन के उद्गार व्यक्त किए, वे कमाल के थे या नहीं, यह तो बाद की बात है, लेकिन उनसे कम-से-कम उन बालिकाओं के मन की थाह तो मिल ही गई और कुछेक अंशों में भविष्य की धमक भी |

युवती और प्रौढ़-महिलाओं के विचार बेहद परिपक्व और आँखें खोलनेवाले थे | अब वंचित-समाज कम-से-कम यह संतोष कर सकता है कि उसकी स्त्रियाँ भी कुछ अधिक तेज गति से वंचित-समाजों के मुक्ति-आंदोलनों के महत्त्व को पहले की तुलना में अधिक अच्छी तरह समझने और उनमें शिरकत करने लगी हैं | ब्राह्मण-वर्ग भी ज़रूर इन सब परिवर्तनों को देख रहा होगा, उनका आकलन कर रहा होगा | लेकिन समय की चाल कभी भी एक पक्षीय नहीं होती, उसने हमेशा से ही यदि ‘विष’ बनाया है तो उसका ‘प्रतिविष’ भी, ‘आग’ बनाई है तो ‘पानी’ भी ‘शक्ति’ बनाई है तो ‘प्रतिशक्ति’ भी…| समस्या केवल इतनी है कि जिसने इसे समझ लिया और इसको अपना लिया वह जीत गया और जो नहीं समझा वह अपनाएगा भी तो कैसे और अंततः वह हार गया | इसलिए अब देखना यह है कि ‘ब्राह्मण-वर्चस्व की पुनर्स्थापना’ और ‘तमाम वंचित-समाजों की मुक्ति’ के इस संघर्ष और रसाकस्सी में किसकी जीत होती है और कौन पराजित होता है…

अब तक तो ब्राह्मण-वर्ग ही हर युग में विजयी होता आया है, बेशक हर युग में सभी वंचित-समाजों (सवर्ण-स्त्रियाँ भी) ने ब्राह्मण-वर्ग के वर्चस्व और तानाशाही को कड़ी टक्कर दी है; लेकिन शातिर ब्राह्मण-वर्ग शिक्षा पर अपने एकान्तिक-वर्चस्व और सत्ता पर अपनी मज़बूत पकड़ के कारण भविष्य को अच्छी तरह देखने-समझने में ख़ूब सक्षम रहा है | और इसी दूरदर्शिता का उपयोग करके वह अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए लगातार साजिशें करने में इतना माहिर रहा है, कि वह हर युग में वंचितों की तमाम चुनौतियों और विद्रोहों को अपने खूनी पंजे से तितर-बितर कर देने में सफ़ल हुआ है | इसलिए वंचित-समाजों को अपनी जागरूकता, सचेतनता, एकजुटता बड़ी तेजी से बढ़ानी होगी… और सबसे बड़ी बात अपने परिवार एवं समाज की धुरी महिलाओं को, एवं परिवार और समाज के भविष्य बच्चों को ब्राह्मणीय-चंगुल में फँसकर उनकी साजिशों का हिस्सा बनने से तेज गति से रोकना होगा | अन्यथा इतिहास दोहराए जाते देर नहीं लगेगी | वंचित-समाजों का भविष्य बहुत हद तक उनकी महिलाओं के हाथों में है…

देखते हैं कि ऊँट किस करवट बैठता है…

— कनक लता

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