बतकही

बातें कही-अनकही…

(असहाय-अकेली स्त्री भोग की वस्तु)

आर्य जब अपनी तलवारों और तीर-धनुष के बल पर रक्तपात करते हुए भारत में घुसे, तो यहाँ पहले से रह रहे निवासियों द्वारा उनका जबर्दस्त विरोध-प्रतिरोध हुआ | हालाँकि आर्यों के शुरूआती हमले इतने अचानक थे और धोखाधड़ी के साथ भी, कि आरम्भ में यहाँ के निवासी संभलने का मौका नहीं पा सके और बड़ी संख्या में उनका नरसंहार हुआ | लेकिन जब उन पूर्व-निवासियों को आर्यों की नीयत समझ में आ गई, तो वे अपने देश की चप्पे-चप्पे भूमि के लिए मर-मिटे | चूँकि आर्य मुट्ठीभर थे और मूल-निवासी उनसे कई गुना अधिक; इसलिए आर्यों ने अपना थोड़ा-बहुत सुरक्षित ठौर बनाने के बाद यहाँ के मूल-निवासियों को काबू में करने के लिए दूसरे तरीके अपनाए | उन्हीं तरीकों में से एक था उनकी स्त्रियों को अकेली पाकर उनपर जबरन बलात्कार; अर्थात् सवर्णों की आज की भाषा में कहें, तो ‘लव-जिहाद’ |

जो मूल-निवासी समाज विदेशी-हमलावर-आर्यों के आक्रमणों और उनके विस्तारवादी तौर-तरीकों का जितना अधिक प्रतिरोध करते थे और उनके खिलाफ ख़ूनी लड़ाई छेड़ते रहते थे, आर्य अपने उन शत्रु मूल-निवासियों से उतना ही अधिक बदला लेने और उनको नीचा दिखाने के लिए उनकी बेटियों को अकेले में दबोचते थे और जबरन यौन-सम्बन्ध बनाते थे | बाद में भी ये आर्यजन ऋषि-मुनि, राजा, अन्य ताकतवर आर्य-पुरुष आदि अपने आसपास की मूलनिवासी-लड़कियों को और भी अधिक लोभ की नज़र से देखने लगे और उनके साथ कभी जबरन, तो कभी प्रेम का स्वांग करते हुए यौन-सम्बन्ध बनाने की ताक में रहने लगे | इसका बेहद ठोस प्रमाण है, ‘महाभारत’ में वर्णित ऋषि पराशर द्वारा मछुआरों के नायक की किशोरी बेटी मत्स्यगंधा से गंगा नदी के बीच धार में धुंध का फायदा उठाकर बलात्कार किए जाने की घटना |

एक दिन मत्स्यगंधा गंगा के तट पर अकेली ही अपनी नाव के साथ मौजूद थी; शायद वह मछलियाँ पकड़ रही होगी या गंगा के पार आने-जानेवाले यात्रियों को नदी पार करा रही होगी; जो कि तब आम बात हुआ करती थी, उस काल में अक्सर मछली पकड़नेवाले लोग ही यात्रियों को नदी पार कराने के लिए नाविक का काम (मल्लाह, केवट) भी किया करते थे | भारत के मूल-निवासी समाजों की स्त्रियाँ भी तब हर कार्य में उतनी ही निपुण हुआ करती थीं, जितने उनके समाज के पुरुष | इसलिए वे छोटी आयु से ही हर कार्य में परिवार का हाथ बँटाती थीं | मत्स्यगंधा भी एक ऐसी ही किशोरी-बालिका थी |

उस दिन संयोगवश उसके पिता और उसके परिवार के अन्य वयस्क स्त्री-पुरुष वहाँ मौजूद नहीं थे, जब ब्राह्मण पराशर वहाँ आया, जिसको गंगा नदी पार करनी थी | बालिका ने पराशर से बहुत कहा कि वह उसके पिता या किसी वयस्क व्यक्ति के आने का इंतजार कर ले, जो उसे सुरक्षित नदी पार करा देंगे | लेकिन बालिका को अकेली पाकर पराशर के भीतर कोई कुलबुलाहट शुरू हो चुकी थी और उसने निश्चित रूप से मन में कोई योजना बनाई होगी | इसलिए उसने जानबूझकर बालिका पर दबाव डाला कि वह उसे तत्काल नदी के उस पार ले चले | पराशर के बहुत कहने पर अंत में बालिका ने उसकी बात मान ली | गंगा नदी के ऊपर धुंध छाई हुई थी, जैसाकि नदियों के बारे में सामान्य घटना है |

जब नौका में पराशर को बिठाकर मत्स्यगंधा नदी के धुंध वाले हिस्से में पहुँची, तो युवा और बलिष्ठ (ताकतवर) पराशर ने उसे अकेली देखकर और धुंध के कारण अपने लिए अनुकूल माहौल पाकर उसे दबोच लिया और छोटी-सी बालिका उसका अधिक प्रतिरोध नहीं कर सकी | अंततः पराशर अपनी शारीरिक ताकत के बल पर उसको सफलतापूर्वक दबोचने और नदी की धुंध का फ़ायदा उठाकर बच्ची से बलात्कार में कामयाब हो गया | दूर-दूर तक फैली नदी के बीच उस बालिका की चीख-पुकार कोई नहीं सुन सका | नदी के पानी का शोर भी बालिका की आवाज को दबाता रहा और ब्राह्मण पराशर अपने घृणित कार्य में कामयाब हो गया |

इस कहानी को बाद में ब्राह्मण-ग्रंथकारों ने प्रेम-कहानी बनाकर जनता को सुनाया और कहा कि मत्स्यगंधा स्वयं ही पराशर से प्रेम करने लगी थी और जब पराशर ने उससे यौन-सम्बन्ध बनाने की याचना की, तो मत्स्यगंधा तुरंत तैयार हो गई और शर्त रखी कि उन्हें यौन-सम्बन्ध बनाते हुए कोई न देख पाए, इसलिए ऋषि ने अपनी दिव्य-ब्राह्मणीय-शक्ति से नाव के चारों ओर धुंध पैदा कर दी |

लेकिन तनिक-सी भी बुद्धि रखनेवाला कोई भी व्यक्ति, खासकर नदियों के चरित्र को जिसने दो-चार दिन भी ठीक से देख-समझ लिया हो, यह आसानी से समझ जाएगा कि नदियों के ऊपर धुंध एकदम स्वाभाविक प्राकृतिक घटना है, किसी व्यक्ति का दिव्य-कार्य नहीं | दूसरे यह, कि यह कैसे माना जा सकता है कि कोई भी बालिका किसी भी अजनबी पुरुष से एक ही मुलाकात में इतना प्रेम कर सकती है कि वह यौन-सम्बन्ध बनाने के लिए ख़ुशी-ख़ुशी राजी हो जाए? और यदि यह मान भी लिया जाए कि वह बालिका पहली ही भेंट में एक अनजान व्यक्ति से इतना प्रेम कर बैठी कि ऋषि द्वारा यौन-सम्बन्ध बनाने की मांग को आसानी से मान गई; तब यह भी सवाल उठता है कि कैसे एक वयस्क पुरुष, जिसकी समझ काफी बेहतर विकसित हो चुकी है, किसी अनजान बालिका के सामने ऐसी इच्छा रख सकता है; वह भी एक ऋषि, जो उस बालिका की जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं था? यह तो सरासर ऐसी ही मानसिकता हुई कि खाओ-पीयो, मौज करो और आगे बढ़ जाओ, या बहती गंगा में हाथ धोओ और चलते बनो | और यदि यह मान लिया जाए कि ऋषि को भी उस बालिका से प्रेम हो गया था, तो प्रश्न यह भी पैदा होता है कि यह कैसा प्रेम था, जो केवल कुछ घंटों के लिए पैदा हुआ और यौन-सम्बन्ध बनाने के तुरंत बाद ख़त्म हो गया? क्योंकि पराशर ने मत्स्यगंधा से विवाह नहीं किया और न उसे अपने साथ ले गया |

खैर, इस बलात्कार के बाद दो घटनाओं में से कोई एक हुई होंगी | या तो लड़की से बलात्कार करने के बाद जब नौका नदी के दूसरे किनारे पर पहुँची, तो मत्स्यगंधा ने उस किनारे मौजूद मूल-निवासी मछुआरों और नाविकों, जो निश्चित रूप से उसके पिता और गाँववालों से परिचित होंगे, के पास भागकर उनको पराशर की सारी करतूत बताई होगी और तब उन मूल-निवासियों ने तत्काल पराशर को पकड़ लिया होगा और मत्स्यगंधा के पिता और गाँववालों के हवाले कर दिया होगा | जब बलात्कार के परिणाम में लड़की के गर्भवती होने की बात कुछ दिनों बाद पता चली होगी, तो बंधक पराशर को छोड़ने को उसका मछुआरा-समाज तब तक तैयार नहीं हुआ होगा, जब तक बच्चे का जन्म न हो जाए | अंत में बच्चे के जन्म के बाद पराशर को वह बच्चा सौंपकर उसे वहाँ से खदेड़ दिया गया होगा |

अथवा दूसरी संभावना यह हो सकती है कि मत्स्यगंधा से बलात्कार के बाद जब नाव किनारे पहुँची, तो मामले की गंभीरता को समझते हुए और अपने ऊपर आनेवाले संकट का अनुमान करके पराशर वहाँ से तुरंत भाग खड़ा हुआ होगा | लड़की रोती-कलपती घर पहुँची होगी और पिता एवं परिवारजनों को सारी बात बताई होगी | कुछ ही दिनों में लड़की के गर्भवती होने की बात भी स्पष्ट हो गई होगी | तब उसके पिता ने दूर-दूर तक फ़ैले अपने अन्य मूल-निवासी समाजों और ग्रामीणों की सहायता से अपराधी पराशर को जगह-जगह तलाश किया होगा | वैसे भी आर्य तो मुट्ठीभर ही थे और उनका प्रभाव क्षेत्र एवं अधिकार-क्षेत्र भी तब तक बहुत छोटा था; दूसरे शब्दों में, आर्यों का कब्ज़ा अभी भी भारत के बहुत ही छोटे-से हिस्से पर ही था और अभी वे बाकी हिस्सों पर कब्ज़ा करने की फ़िराक में लगे हुए थे | शेष भूमि मूल-निवासियों के कब्जे में थी और मूल-निवासियों के समाज और गाँव अधिकतर एक-दूसरे के संपर्क में रहते थे | इसलिए पराशर को ढूँढना और मत्स्यगंधा के गाँववालों के हवाले करना बहुत कठिन नहीं था | बलात्कारी पराशर पकड़ लिया गया और बाँधकर मत्स्यगंधा के गाँव लाया गया | तब तक उसके बच्चे का जन्म भी हो चुका था | उसके बाद बलात्कार से पैदा हुए उस बच्चे को गाँववालों ने पराशर के हवाले किया और उसे वहाँ से मारपीटकर खदेड़ दिया |

बलात्कार से पैदा हुआ और अपने बलात्कारी पिता के आश्रम में पलकर बड़ा हुआ यही बच्चा आगे चलकर ‘वेदव्यास’ कहलाया, ‘कृष्णद्वैम्पायन वेदव्यास’; आर्यों के कथनानुसार जिसने कौरव-पांडव के महाभारत की कथा लिखी | बलात्कार से पैदा हुआ यही बालक आगे चलकर कुरुवंश का उद्धारकर्ता भी बना, जब उसकी जन्मदात्री माँ मत्स्यगंधा और राजा शांतनु का बेटा विचित्रवीर्य निःसंतान मर गया | तब कुरुवंश को आगे बढ़ाने के लिए व्यास ने विचित्रवीर्य की पत्नियों अम्बिका से धृतराष्ट्र, अम्बालिका से पांडु तथा इन दोनों की प्रमुख दासी से विदुर को पैदा किया |

लेकिन नदी की बीच धार में धुंध का फायदा उठाकर अकेली बालिका मत्स्यगंधा पर पराशर के जबरन बलात्कार को किस रूप में देखा जाना चाहिए; प्रेम के रूप में, बलात्कार के रूप में, या ‘लव-जिहाद के रूप में? क्योंकि यह तो सभी जानते हैं कि पराशर ने मत्स्यगंधा से न तो विवाह किया और न ही उसे अपने साथ ले गया | पाठक तय करें…

सन्दर्भ

  1. महाभारत
  2. डॉ. भीमराव, हिन्दू धर्म की पहेलियाँ, फॉरवर्ड प्रेस, 803/92, नेहरू प्लेस, नई दिल्ली-110019, संस्करण – जनवरी 2023
  3. भारतीय संस्कृति के स्रोत, भगवतशरण उपाध्याय, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली-55, संस्करण-अक्टूबर 1991
  4. भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, भगवतशरण उपाध्याय, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, (प्रा.) लिमिटेड, नई दिल्ली-55, संस्करण-1978
  5. प्राचीन भारत का इतिहास, संपादक-डी.एन.झा एवं कृष्णमोहन श्रीमाली, हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, संस्करण-1998)
  6. राहुल सांकृत्यायन, मध्य एशिया का इतिहास (खंड -1), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, प्रथम संस्करण-1956
  7. पुरातत्व निबंधावली, राहुल सांकृत्यायन, इंडियन प्रेस, प्रयाग, प्रथम संस्करण
  8. शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2009
  9. रोमिला थापर, भारत का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1-बी,नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली, संस्करण- 2001(पेपरबैक)
  10. प्राचीन भारतीय परम्परा और इतिहास, रांगेय राघव, आत्माराम एंड संस, कश्मीरी गेट, दिल्ली-06, प्रथम संस्करण
  11. संगम और संघर्ष, रांगेय राघव, किताब महल, इलाहबाद, प्रथम संस्करण- 1953
  12. प्राचीन भारत में दास-प्रथा (पालि और संस्कृत पुस्तकों के अनुसार), देव राज चानना (अनुवाद- डॉ. शम्भुदत्त शर्मा), हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, 10 केवेलरी लाइन, दिल्ली- 110007, संस्करण- 2009
  • कनक लता

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