बतकही

बातें कही-अनकही…

क्या आप भी भविष्य की आहट कुछ वैसे ही सुन रहे हैं, जैसे कई लोगों को सुनाई दे रही है? उस आहट में कौन-सी ख़ास बात है? क्या भविष्य एक बार फिर से कोई अनजानी-सी कहानी लिखने की भूमिका बना रहा है, जिसमें भारत की मूल-निवासी वंचित-जातियां, ठीक अपने जुझारू-पूर्वजों की तरह एक बार फिर से सजग-सचेत होकर अपने और अपनी आनेवाली पीढ़ियों के लिए कोई निर्णायक लड़ाई लड़ने की खातिर मुस्तैद होकर कमर कस रही है?…

…बीते साल के 24-25 दिसंबर (2023) को दिल्ली में निर्णायक संघर्षों के लिए कमर कसने वाले ऐसे ही जन-समाजों के एक छोटे-से समूह को अपनी आँखों से देखने-समझने की और उनके दिलों में जलती ज्वाला की साक्षी बनी | अवसर था ‘भारतीय समाज निर्माण संघ’ (BSNS) के 9वें वार्षिक अधिवेशन में दो दिवसीय कार्यक्रम का; जिसमें अनेक ज्वलंत मुद्दों पर बातें हुईं | इसमें शामिल बच्चों से लेकर बुजुर्गो तक, पुरुषों से लेकर महिलाओं तक, सुशिक्षितों से लेकर निरक्षरों तक के दिलों में सुलगती आग और अपने अस्तित्व, आत्मसम्मान, अधिकारों से लेकर अपने दुःखद इतिहास, उस इतिहास में अपने संघर्षशील पूर्वजों की कोशिशों और संविधान के प्रति अपनी आस्था और प्रेम तक की झलक बहुत साफ़-साफ़ दिखाई दी |

हालाँकि वंचित-समाज अब तेजी से जाग रहा है और अपने बच्चों की अनिवार्य शिक्षा के प्रति सचेत भी हो रहा है, वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता और सजगता भी बीते एक दशक में जितनी तेजी से उनमें उभरी है, वह भी बहुत कमाल की है; लेकिन जो सबसे बड़ी समस्या अब भी वंचित-पीड़ित समाजों के सामने है, वह है एकजुटता की | डॉ. आंबेडकर ने जो तीन नारे दिए थे—‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’; उनमें से पहले और तीसरे नारे को तो ये समाज बहुत अच्छी तरह से आत्मसात करने लगे हैं | लेकिन किसी भी समाज की जो सबसे बड़ी ताकत होती है, वह है एकजुटता; अर्थात् हर हाल में उस समाज के सभी हिस्सों का परस्पर संगठित रहना और किसी भी हाल में अपने को बिखरने नहीं देना | वही एकजुटता अभी तक वंचित-समाज हासिल नहीं कर सके हैं |

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इस दिशा में वंचित-समाज कोई कोशिश ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि अब बड़ी तेजी से इस दिशा में भी ये आगे बढ़ने के प्रयास कर रहे हैं | इसकी कोशिश दो रूपों में दिखाई देने लगी है | एक तो वे अपने उन राजनीतिक नेताओं को खारिज करते जा रहे हैं, जो खाते तो हैं अपने मूल-समाज की कमाई, लेकिन तलवे चाटते हैं ब्राह्मणीय-मानसिकता वाले सवर्णों, ख़ासकर ब्राह्मणों के | वस्तुतः इन्हीं नेताओं के कन्धों पर वंचित-जनता को संगठित करने और उसका नेतृत्व करते हुए उसे सही दिशा में ले जाने की ज़िम्मेदारी थी | लेकिन जो नेता स्वयं ही भटके हुए हों, भला वे अपने पीछे-पीछे आते जन-समाज को सही रास्ते पर कैसे ले जा सकते हैं? वंचित-समाजों के वोट और नोट से चुनाव जीतकर ये वंचित-वर्गीय नेता कुर्सी पाते ही ब्राह्मणीय-मानसिकता वाले सवर्णों के पिछलग्गू बन जाते हैं और अपने-आप को बड़ी बेशर्मी से और निःसंकोच भाव से ‘हनुमान’ कहते हुए हनुमान की ही तरह सवर्णों के चरणों में बैठ उनके दास बन जाते हैं— “राम रसायन तुम्हरे पासा, सदा रहो रघुपति के दासा |”  

पिछले कुछ दशकों से यही हो रहा है | वंचितों के अधिकांश नेता सवर्णों के लिए हनुमान बनकर उनके इशारे पर नाचते हुए अपने ही समाज को दुःखों-तकलीफ़ों की आग में झोंक रहे हैं; जैसे हनुमान ने एक रावण से बदला लेने के लिए लंका से सभी नागरिकों के घरों में आग लगा दी थी | बदले में सवर्ण-समाज उनके सामने सुविधाओं और छोटी-मोटी कुर्सियों के कुछ टुकड़े फ़ेंक देता है और वे उतने ही में ‘धन्य-धन्य’ हो जाते हैं | इन दास-मनोवृत्ति वाले वंचित-नेताओं को केवल अपनी राजनीतिक गद्दी की चिंता है और अपने मूल-समाज के सुख-दुःख से कोई मतलब ही नहीं है |

लेकिन पिछले एक दशक के दौरान इन दास-मनोवृत्ति वाले वंचित-नेताओं की चमचागिरी में बड़ी तेज़ी से उछाल को देखते हुए वंचित-समाज उतनी ही तेज़ी से इनकी सच्चाइयों को समझने और उन नेताओं को नकारने लगा है | हालाँकि इससे वह उतनी ही मात्रा में नेतृत्वविहीन भी हुआ है | लेकिन अच्छी बात यह है कि ‘मेरिट’ के नाम पर हर जगह दुत्कारा जाने वाला वंचित-वर्गीय शिक्षित-वर्ग भी अब उतनी ही तेज़ी से सजग-सचेत हो रहा है और आगे आकर अपने समाज को रास्ता दिखाने की ओर भी अग्रसर हो रहा है, अपने समाज को एकजुट करने की कोशिश भी कर रहा है | और यही दूसरी विशेषता है |

…उस सम्मलेन में युवा के साथ-साथ किशोर उम्र की लड़कियों को भी सावित्रीबाई फुले, ज्योतिराव फुले, पेरियार, साहूजी महाराज जैसे अपने भूले-बिसरे संघर्षशील योद्धाओं के बारे में बातें करते और सवर्णों द्वारा जानबूझकर दबाकर रखी गई जानकारियों को भी मंच से साझा करते देख उपरोक्त बातें समझी जा सकती हैं | शायद भविष्य ऐसी ही गतिविधियों से आनेवाले परिवर्तनगामी हालातों के संकेत दे रहा है ! शायद अब वह समय भी देखने को मिले, जब वंचित-समाज संगठित और एकजुट होकर अपने सबसे बड़े महानायक डॉ. भीमराव आंबेडकर के तीनों नारों को अपने जीवन में ठीक से आत्मसात करता हुआ नज़र आने लगे | देखते हैं कि भविष्य में क्या है…

—कनक लता

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