बतकही

बातें कही-अनकही…

(स्त्रियाँ बेजुबान पशु या निर्जीव वस्तु)

जहाँ भारत के मूल-निवासियों और कई ग़ैर-आर्य संस्कृतियों में स्त्रियों का स्थान या तो ऊँचा था, या कम-से-कम पुरुषों के बराबर, जिस कारण उनके स्वाभिमान और सम्मान का महत्त्व था और उनके अधिकार भी कमोवेश पुरुषों के लगभग बराबर थे | वहीं आर्य-संस्कृति में स्त्रियाँ एक निर्जीव सामान या वस्तु की तरह देखी जाती थीं, अथवा पालतू पशुओं की तरह | इसीलिए आर्य अपनी स्त्रियों के साथ पशुओं और निर्जीव-वस्तुओं के जैसा व्यवहार करते थे—उनको ख़रीदने-बेचने, अपने ऋषियों-राजाओं को उपहार एवं दान-दक्षिणा में देने, जुए में दाँव पर अन्य वस्तुओं की ही तरह लगाने से लेकर उनको जबरन उनके परिवारों से छीनकर या चुराकर ले आने तक | कम-से-कम भारत में आर्यों के आने के बाद तो उनके यहाँ यही सब होता हुआ नज़र आता है |

आर्यों के ऋग्वेद सहित दर्ज़नों संस्कृत-ग्रंथों में ऐसी पचासों कहानियाँ दर्ज़ हैं, जो उनकी इन स्त्री-विरोधी मानसिकता को उजागर करती हैं | आर्यों का पहला महाकाव्य महाभारत भी इसका गवाह है, जिसमें इस तरह की दर्ज़नों कथाएँ दर्ज़ हैं |

असल में आर्य अपने साथ अपनी आर्य-स्त्रियाँ नहीं लाए थे, केवल गिनी-चुनी स्त्रियों को छोड़कर; तब स्वाभाविक रूप से अपनी वंश-वृद्धि और यौन-भूख को मिटाने के लिए यहाँ की स्त्रियों को अपनाना उनकी मज़बूरी थी | इसलिए अपने-अपने घरों में इकठ्ठा की गई उन गैर-आर्य स्त्रियों के साथ उनको कोई ऐसा लगाव भी नहीं था, कि वे उनके साथ आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करते या उनके आत्म-सम्मान को महत्व देते | जब उनका अपने ही समाजों और स्त्रियों के साथ उनका व्यवहार क्रूरतम था, तो भला वे ग़ैर समाजों की स्त्रियों को क्यों छोड़ते? महाभारत में कौरवों-पांडवों के ‘भीष्म पितामह’ द्वारा अम्बा-अम्बिका-अम्बालिका नाम की तीन राजकुमारियों को उनके स्वयंवर-स्थल से उनके पिता और परिवारजनों की आँखों के सामने ही जबरन उठा ले जाना भी ऐसी ही एक कहानी है |

‘दाशराज्ञ-युद्ध’ के बाद से लेकर महाभारत-काल में भी कुरु-वंश सबसे शक्तिशाली आर्य-कबीला होने का अपना रुतबा कायम रखे हुए था | शेष आर्य-कबीले उसके सामने कमज़ोर हैसियत में थे; कुछ तो इतने कमज़ोर, कि वे कुरुओं द्वारा किए गए किसी भी अन्याय का प्रतिरोध करने का साहस तक नहीं कर पाते थे | तत्कालीन वाराणसी (वर्तमान बनारस, उत्तर-प्रदेश) में स्थित उस समय का छोटा-सा राज्य काशी भी एक ऐसा ही कमज़ोर आर्य-राज्य था | हालाँकि इसके शासकों ने कुरुवंश में अपनी कन्याओं के विवाह के माध्यम से अपना रिश्ता उनसे जोड़े रखकर अपनी महत्ता बढ़ाकर रखने की कोशिश की थी | जिसमें शकुंतला-दुष्यंत के बेटे भरत का विवाह काशी की राजकुमारी सुनंदा से हुआ था और वह भरत की पटरानी बनी थी |

लेकिन महाभारत की कथानुसार और बाद के भी ब्राह्मणों के कहे अनुसार भीष्म के समकालीन काशी के राजा ने जब अपनी बहन का विवाह शांतनु के बड़े बेटे देवव्रत-भीष्म से करने का प्रस्ताव शांतनु के सामने रखा और शांतनु ने उसे हल्के में लेकर टाल दिया, तो काशीराज इससे नाराज़ हो गया | इसी कारण उसने जब अपनी तीन बेटियों —अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका— का स्वयंवर रचाया, तो कुरुवंश को उसमें शामिल होने का निमंत्रण नहीं दिया | लेकिन काशीराज की नाराज़गी के कारणों  पर संदेह होता है और संदेह का कारण है ब्राह्मणों द्वारा ही रचित संस्कृत-ग्रंथों में कुछ बातों का उल्लेख |

संस्कृत-ग्रंथों में यह बात कही गई है कि शांतनु-सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य के पौरुष (युद्ध लड़ने और जीतने की शारीरिक-क्षमता और संतान पैदा करने की क्षमता) को लेकर कई अफ़वाहें फ़ैली हुई थीं या शायद किसी कारण से वह विवाह नहीं करना चाहता था | शारीरिक-बल के अभाव में ही शायद वह स्वयं उस स्वयंवर में शामिल राजाओं से प्रतियोगिता में हार जाने के डर से नहीं आया, बल्कि उसकी ओर से भीष्म को आना पड़ा | निःसंदेह भीष्म और सत्यवती को भी इस बात की जानकारी होगी ही | इसके अलावा संतान पैदा करने में उसकी अक्षमता को लेकर भी कई बातें संस्कृत-ग्रंथों में कही गई हैं | शायद इसी कारण उसका नाम ‘विचित्रवीर्य’ रखा गया था | स्वाभाविक है कि यदि यह कारण हो, तो एक पिता कैसे अपनी बेटियों का ऐसे पुरुष से विवाह कर सकता है?

काशी की राजसभा में अनेक आर्य-राजा आमंत्रित थे | अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका अपनी-अपनी वरमाला हाथों में थामे खड़ी थीं | बड़ी बेटी अम्बा उपस्थित राजाओं में से शाल्व-राज को अपना पति चुन चुकी थी और प्रतीक के रूप में अपनी वरमाला उसके गले में डाल चुकी थी | ठीक तभी भीष्म उस राजसभा में अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ आते हैं और काशीराज की तीनों बेटियों को जबरन अपहरण करके ले ले जाते हैं | उपस्थित राजाओं में से केवल राजा शाल्व ही भीष्म के इस कृत्य का पुरज़ोर विरोध करता है, लेकिन भीष्म के सामने वह टिक नहीं पाता और हार जाता है |

राजा शाल्व संभवतः ‘शाल्व’ नामक ही किसी राज्य का शासक था, जिसकी राजधानी भी शायद शौभनगर नामक कोई स्थान रहा होगा | शायद ‘शाल्व-वंश’ के सभी शासकों को ‘शाल्व’ ही कहा गया है | ‘सावित्री-सत्यवान’ की प्रसिद्ध कथा का सत्यवान भी इसी वंश का बताया जाता है | महाभारतकालीन शाल्व का ज़िक्र महाभारत के ‘आदिपर्व’, ‘सभा पर्व’, ‘वन पर्व’ सहित अनेक हिस्सों में आता है |

शाल्व को पराजित करके भीष्म तीनों राजकुमारियों को लेकर हस्तिनापुर पहुँचते हैं और इन तीनों को सत्यवती के सामने खड़ा कर देते हैं | उन तीनों को बताया जाता है कि उनका विवाह विचित्रवीर्य से होगा, तब शाल्व को अपना पति चुन चुकी बड़ी बेटी अम्बा उन्हें बताती है कि वह शाल्व के गले में वरमाला डालकर उसे अपना पति चुन चुकी है | यह सुनकर सत्यवती और भीष्म उसे शाल्व के पास भिजवा देते हैं | लेकिन शाल्व यह कहकर उसे ठुकरा देता है कि जिस वस्तु को किसी और ने छीन लिया हो, वह उस वस्तु को दान, भीख या दया रूप में नहीं लेगा | तात्पर्य कि जिस पुरुष को उस लड़की अम्बा ने अपने पति के रूप में चुन लिया था, उस पुरुस ने भी उस लड़की को एक वस्तु की तरह ही देखा | जबकि यह शाल्व अनेक ग्रंथों में अम्बा का प्रेमी भी बताया गया है | अम्बा कई लोगों से मदद की गुहार लगाती है, लेकिन अंततः सब ओर से ठुकराई जाकर आत्महत्या करने पर मज़बूर हो जाती है |

उधर हस्तिनापुर में उसकी दोनों बहनें अम्बिका और अम्बालिका भी कोई सुखी जीवन नहीं जी रही हैं, बल्कि ‘संतान पैदा करने की एक मशीन’ की तरह इस्तेमाल की जाती हैं | दोनों राजकुमारियों से विवाह के कुछ ही समय बाद विचित्रवीर्य किसी बीमारी से मर जाता है | उस समय तक उसकी कोई संतान भी पैदा नहीं हुई होती है | तब काफ़ी विचार-विमर्श के बाद सत्यवती अपने किशोर उम्र में पराशर द्वारा किए गए बलात्कार से पैदा हुए वेद व्यास को महल में बुलाती है और उसको अपनी दोनों विधवा पुत्रवधुओं (बहुओं) के पास भेजती है, ताकि वह उन पुत्रवधुओं से यौन-सम्बन्ध बनाए और बच्चे पैदा करे |

अंततः वेद व्यास दोनों विधवा रानियों से बच्चे पैदा करता है—अम्बिका से धृतराष्ट्र और अम्बालिका से पांडु; और हाँ, इन दोनों के साथ इनके पिता के घर से ही इनकी देखभाल के लिए साथ आई दासी से विदुर भी | धृतराष्ट्र या तो जन्मांध (जन्म से नेत्रहीन) है, या बाद में किसी बीमारी या दुर्घटनावश अपनी आँखें खो बैठा; पांडु जन्म से ही कुछ बीमार-सा था, जिसके शरीर में खून की कमी के कारण उसका शरीर पीला-सा दिखता था, इसीलिए उसका नाम भी ‘पांडु’ (पीले रंग वाला) पड़ गया | एकमात्र दासीपुत्र विदुर ही शारीरिक-मानसिक रूप से स्वस्थ था, लेकिन दासीपुत्र होने के कारण वह राज्य का उत्तराधिकारी नहीं हो सकता था |

सन्दर्भ

  1. महाभारत
  2. भागवत पुराण

डॉ. कनक लता

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