बतकही

बातें कही-अनकही…

विद्रोही-समाजों को नियंत्रित करने हेतु उनकी स्त्रियाँ भावनात्मक रूप से ‘बंधक’

आक्रमणकारी-आर्य जब मध्य-एशिया से चले और हमलावर बनकर रास्ते में पड़नेवाली सभ्यताओं-संस्कृतियों, उनके शहरों-नगरों-गाँवों को रौंदते हुए भारत में घुसे, तो वे अपने साथ आर्य-स्त्रियाँ लेकर नहीं आए थे; उनके साथ केवल गिनी-चुनी स्त्रियाँ ही आई थीं | इसलिए उन्होंने यहाँ आने के बाद ग़ैर-आर्य समाजों और मूल-निवासी समाजों की स्त्रियों पर अपनी नज़रें टिकाई | वैसे भी उनकी क़बीलाई स्त्रियाँ कबीलाई-किस्म की ही थीं; अस्त-व्यस्त, कुछ फूहड़-सी, अपने मवेशियों की लीद और उस लीद की बदबू से सनी हुई…; अर्थात् आकर्षण-रहित | जबकि भारत की शहरी और नगरीय-संस्कृति में पली स्त्रियाँ बेहद आकर्षक थीं, जिनके सामने आर्य-स्त्रियाँ पानी भरती थीं | आर्यों ने ग़ैर-आर्य स्त्रियों और मूल-निवासी स्त्रियों को अपने-अपने घरों में बंधक बनाकर रख तो लिया, लेकिन उन सुसंस्कृत स्त्रियों का प्रेम वे उजड्ड-आर्य नहीं पा सके | भला अपने परिवारों और समाजों के हत्यारों से वे स्त्रियाँ कैसे प्रेम कर सकती थीं? इसलिए वे आर्य-पुरुष उन बंधक-स्त्रियों का प्रेम पाने के लिए अक्सर उनके चरणों में लोटते रहते थे |

इसके अलावा, आर्य-पुरुष यहाँ की ग़ैर-आर्य और मूल-निवासी स्त्रियों के जरिए उनके परिवारों-समाजों को काबू में करने के लिए भी ‘स्त्री-पुरुष-प्रेम’ को हथियार बनाते थे | यही कारण है कि आर्यों के ऋषि-मुनि, राजा और अन्य ताकतवर पुरुष अपने आसपास की ग़ैर-आर्य और मूलनिवासी-लड़कियों को लोभ की नज़र से देखने लगे और उनको हड़पने की ताक़ में रहने लगे | कभी वे अपने क्रूर हमलों में उनको संपत्ति की तरह लूटकर लाते, तो कभी प्रेम का स्वांग करते हुए उनसे विवाह करके ससम्मान उनको अपने रनिवासों में लाने लगे | जबकि कभी-कभी तो वे सचमुच ही उनके प्रेम में पड़कर उनके चरणों में बैठ जाते थे | इसका बहुत बेहतरीन उदाहरण है, महाभारत में वर्णित ‘शांतनु-सत्यवती’ की तथाकथित प्रेम-कहानी |

असल में यह कहानी एक तीर से दो शिकार करने की कहानी अधिक प्रतीत होती है | अर्थात् कुरुवंशी-शासक शांतनु मछुआरा-समाज के नायक की बेटी मत्स्यगंधा पर इतना मुग्ध हुआ कि वह मत्स्यगंधा के पिता की हर शर्त मानने को तैयार हो गया | और दूसरा, कि इस विवाह से कुरुवंश ने मत्स्यगंधा के मछुआरा-समाज को और उनके आसपास उनके संपर्क में रहनेवाले एवं संबंधियों में शामिल कई मूल-निवासी समाजों को भी अपना समर्थक बना लिया; या कम-से-कम वे समाज आर्य-विरोधी नहीं रहे |

ध्यान रहे कि ‘कुरुवंश’ वही ‘भरत-कबीला’ है, जिसने ‘दाशराज्ञ-युद्ध’ में अपने दुश्मन ‘पंचजन- आर्यों’ को हराने और उनके नायक पुरुवंशी राजा पुरुकुत्स को युद्ध में मार गिराने के बाद पुरुकुत्स के ‘पुरु-कबीले’ को अपने में मिला लिया और अपना नया नाम रखा— ‘कुरुवंश’ या ‘कुरुजन’ |

जब पराशर ने मस्त्यगंधा का बलात्कार किया और इस बलात्कार से उसका एक बेटा पैदा हुआ, जिसे ब्राह्मण पराशर को देकर वहाँ से भगा दिया गया; तब उसके बाद बालिका मस्त्यगंधा छोटी-सी उम्र में इतने बड़े दोहरे सदमे (बलात्कार और नवजात-संतान का छिन जाना) से नहीं उबर सकी और नदी के किनारे अक्सर अकेली ही भटकती रहती थी | उधर पूर्व-पत्नी गंगा के चले जाने से शांतनु का भी दिल टूट गया था और उसकी अन्य उप-पत्नियाँ (जो शायद रानियाँ नहीं थीं) उसका दिल नहीं बहला पाती थीं; इसलिए वह भी कभी-कभी अपना अकेलापन दूर करने के लिए गंगा के किनारे आया करता था | इसी बीच शांतनु ने किशोरी मत्स्यगंधा को देखा और धीरे-धीरे उसपर लट्टू हो गया | कुछ दिनों बाद उसने लड़की और उसके पिता के सामने लड़की से विवाह करने का प्रस्ताव रखा |

दूसरी सम्भावना यह भी हो सकती है कि पराशर के कुकृत्य से आहत मत्स्यगंधा के मछुआरा-समाज में आर्यों के ख़िलाफ़ इतनी नफरत भर गई होगी, कि वे बदला लेने के लिए जब-तब आर्यों के इलाक़ों पर हमले करते होंगे और उनको नुकसान पहुँचाते होंगे | हो सकता है कि उनके हमलों का निशाना सबसे अधिक शांतनु के इलाक़े ही बन रहे हों; क्योंकि शायद सबसे अधिक ताकतवर आर्य-क़बीला होने के कारण उसी के राज्य में पराशर जैसे स्त्री-लोभी आर्य-ब्राह्मणों को सबसे अधिक आश्रय और संरक्षण मिलता था | तब शांतनु के ब्राह्मण-पुरोहितों ने उसे उन मूल-निवासियों को काबू में करने के लिए उनसे वैवाहिक-सम्बन्ध स्थापित करने का सुझाव दिया होगा | आख़िर आर्यों के यहाँ ऐसे विवाह तो अक्सर हुआ ही करते थे | तब शांतनु ने मछुआरों और मल्लाहों के नायक के सामने उसकी बेटी मत्स्यगंधा से विवाह करने का प्रस्ताव रखा | जिसे बाद के ब्राह्मण-ग्रंथकारों ने प्रेम-कहानी कहकर प्रचारित किया और आनेवाली पीढ़ियों को भरमाया |

चाहे उपरोक्त वर्णित इन दोनों घटनाओं में से जो भी हुआ हो, लेकिन आर्यों से चिढ़े और खार खाए मछुआरों के नायक ने शांतनु के सामने बेहद कठोर शर्त रख दी, ताकि आर्यों को दंडित करते हुए उनको सबक भी सिखाया जा सके, उन्हें मूल-निवासियों की ताकत और प्रभाव का परिचय भी दिया जा सके और उनके राज्य एवं वंश पर अपनी बेटी के बच्चों के जरिए मूल-निवासी-समाज का अधिकार भी स्थापिया किया जा सके | मत्स्यगंधा के पिता और मछुआरों के नायक ने यह शर्त रखी कि शांतनु का अगला वारिस, अर्थात् हस्तिनापुर का अगला शासक मत्स्यगंधा का बेटा ही होगा, जिसके लिए शांतनु की पूर्व-पत्नी गंगा से उत्पन्न बेटे गंगापुत्र देवव्रत (भीष्म) को राजसिंहासन पर अपना दावा भी छोड़ना होगा और जीवनभर अविवाहित भी रहना होगा, ताकि भीष्म की संतानें मत्स्यगंधा के बच्चों के लिए ख़तरा न बनें |

शांतनु ने यह शर्त मानी या नहीं, अथवा उसने ख़ुद अपने बेटे देवव्रत भीष्म से ऐसी प्रतिज्ञा करने को कहा या उसके बेटे भीष्म ने अपनी मर्जी से प्रतिज्ञा का निर्णय लिया, यह तो पता नहीं; लेकिन भीष्म ने मछुआरा-नायक की दोनों शर्तें मानते हुए उसके सामने प्रतिज्ञा की और वचन दिया कि पिता के बाद वह न तो राजसिंहासन पर बैठेगा और न ही विवाह करेगा | हो सकता है कि आर्यों पर और उनके प्रमुख राजा शांतनु पर मछुआरा-समाज का आतंक और डर इतना अधिक छाया हुआ हो कि उसने ख़ुद अपने हाथों अपने बेटे भीष्म के भविष्य और अधिकारों का गला घोंट दिया हो और बेटे को ऐसी प्रतिज्ञा करने को विवश किया हो; ताकि आर्यों के समाज को मूल-निवासियों के आतंक से बचाया जा सके | जो भी हो, अंततः शांतनु का विवाह मत्स्यगंधा से हो गया और मत्स्यगंधा को नया सनातनी नाम दिया गया— ‘सत्यवती’ |

इस ‘प्रेम-कहानी’ को पाठक किस श्रेणी में रखना चाहेंगे— ‘प्रेम-कहानी’ में या ‘लव-जिहाद’ में अथवा किसी और श्रेणी में; यह तो पाठक ही तय करेंगे | लेकिन इस विवाह से मूल-निवासियों का एक बड़ा हिस्सा आर्यों के विरोधी-गुट से बाहर निकल गया और काफ़ी हद तक आर्यों का प्रतिरोध करने से पीछे हटने लगा; क्योंकि उसकी बेटी उसके दुश्मन आर्यों की रानी बन चुकी थी…

आर्यों ने अपने इस कूटनीतिक तरीके को भारत के अन्य हिस्सों में रहनेवाले मूल-निवासियों पर भी बार-बार प्रयोग किए | परिणामस्वरूप आर्य ‘लव-जिहाद’ के अपने इस तरीक़े से मूल-निवासियों के बड़े हिस्से को साधने और काबू में करने में कामयाब रहे, जिससे उनको भारत में अपने पैर जमाने में बड़ी मदद मिली |

मूल-निवासियों की बस्तियों पर अचानक हमला करके उनका नरसंहार करने और कई अन्य तौर-तरीके अपनाने के साथ-साथ आर्य ‘लव-जिहाद’ के इस तरीके को भी अपनाते हुए धीरे-धीरे मजबूत होते चले गए, वे अधिक-से-अधिक भूभाग पर कब्ज़ा करते चले गए, अपने सम्बन्धी मूल-निवासियों के साधारण-जनों को अपना दास बनाते चले गए | जबकि ऐसे वैवाहिक-रिश्तों से बँधा हुआ मूल-निवासी समाज अन्य कारणों सहित आर्यों के घरों में रह रही अपनी बेटियों के लिए भी धीरे-धीरे आर्यों की ज्यादतियाँ सहता चला गया, उनका गुलाम होता चला गया, खदेड़े जाने पर पीछे भी हटता चला गया…

लव-जिहाद’ का यह तरीका वाकई आर्यों के लिए बेहद कारगर साबित हुआ…

सन्दर्भ

  1. महाभारत
  2. डॉ. भीमराव, हिन्दू धर्म की पहेलियाँ, फॉरवर्ड प्रेस, 803/92, नेहरू प्लेस, नई दिल्ली-110019, संस्करण – जनवरी 2023
  3. भारतीय संस्कृति के स्रोत, भगवतशरण उपाध्याय, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली-55, संस्करण-अक्टूबर 1991
  4. भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, भगवतशरण उपाध्याय, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, (प्रा.) लिमिटेड, नई दिल्ली-55, संस्करण-1978
  5. राहुल सांकृत्यायन, मध्य एशिया का इतिहास (खंड -1), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, प्रथम संस्करण-1956
  6. प्राचीन भारत का इतिहास, संपादक-डी.एन.झा एवं कृष्णमोहन श्रीमाली, हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, संस्करण-1998)
  7. शूद्रों का प्राचीन इतिहास, रामशरण शर्मा, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2009
  8. रोमिला थापर, भारत का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1-बी,नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली, संस्करण- 2001(पेपरबैक)
  9. प्राचीन भारतीय परम्परा और इतिहास, रांगेय राघव, आत्माराम एंड संस, कश्मीरी गेट, दिल्ली-06, प्रथम संस्करण
  10. संगम और संघर्ष, रांगेय राघव, किताब महल, इलाहबाद, प्रथम संस्करण- 1953
  11. प्राचीन भारत में दास-प्रथा (पालि और संस्कृत पुस्तकों के अनुसार), देव राज चानना (अनुवाद- डॉ. शम्भुदत्त शर्मा), हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, 10 केवेलरी लाइन, दिल्ली- 110007, संस्करण- 2009

—डॉ. कनक लता

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