बतकही

बातें कही-अनकही…

ज़रा हम अपने आस-पास नज़र दौड़ाएं… लोगों को बातें करते हुए ज़रा ध्यान से सुनें… उनकी प्रतिक्रियाएँ देखें, …उनके आग्रह को ज़रा ग़ौर से देखें और समझने की कोशिश करें…

क्या उनकी कटूक्तियों में, उनकी घृणा, उनके क्रोध में कुछ विशिष्टता नज़र आती है, …जब वे समाज के वंचित एवं कमज़ोर वर्गों की शिक्षा के सम्बन्ध में बातें कर रहे होते हैं…? क्या आपने भी ऐसी उक्तियाँ कभी-कभी उनके मुखों से सुनी हैं, जो उनके विचारों एवं भावनाओं की अभिव्यक्ति करते हैं…?——

…‘ये कमीने क्या करेंगे पढ़-लिखकर…?’, ‘पता नहीं सरकार क्यों इन लोगों को पढ़ाने पर माथापच्ची कर रही है…?’, ‘अरे, इन हरामजादों को पढ़ाकर क्या मिलेगा सरकार को…?’, ‘ये कमीने पढ़कर करेंगें क्या…करना तो इनको वही है, जो इनके बाप-दादे करते आए हैं’, ‘यदि ये हरामी पढ़-लिख गए, तो हमारे लिए ही मुसीबत खड़ी करेंगे’, ‘इनका पढ़ना हमारे लिए बहुत हानिकारक होगा, इनको बिल्कुल नहीं पढ़ने देना चाहिए’, ‘चाहे जैसे भी हो इनको पढ़ने से रोकना ही होगा’, ‘यदि ये भी पढ़ने लगेंगे, तो हमारे बच्चों के लिए ख़तरा बनेंगे’, ‘भगवान ने जब ख़ुद ही इनको खोपड़ी में भेजा नहीं दिया, तो ये पढ़कर क्या उखाड़ लेंगे….

…ये लोग किनके बारे में बातें कर रहे होते हैं…? और वे कौन लोग हैं, जिनको इनका पढ़ना ‘ग़ैर-ज़रूरी’, ‘हानिकारक’ और ‘घातक’ लगता है…? उनका पढ़ना इन लोगों को क्यों इतना ‘घातक’, ‘हानिकारक’ और अनावश्यक लगता है…?

…क्या ये प्रश्न कभी आपके मन में भी उठते हैं…? यदि हाँ, तो क्या ये प्रश्न आपके मन को आकुल-व्याकुल नहीं करते हैं…? यदि करते हैं, तो क्या कभी विचार करते हैं, कि वे लोग ऐसा क्यों करते हैं…? अवश्य करते होंगे आप भी, इन प्रश्नों पर चिंतन-मनन…! अवश्य आपका भी मन बेचैन होता होगा, ऐसे लोगों की हिंसक-भाषा से…! आपको भी अवश्य ही चिंता होती होगी अपने एवं समाज के अनिश्चित एवं चिंताजनक भविष्य को लेकर…!

…जब से भारत के वंचित तबकों में शिक्षा के प्रभाव से सामाजिक-राजनीतिक चेतना विकसित होनी शुरू हुई है, तभी से उनके ख़िलाफ़ षड्यंत्रों का नया सिलसिला भी शुरू हुआ है, उनसे शिक्षा से वंचित करने के लिए |

भारत में स्वधीनता-प्राप्ति के पहले से ही दलितों के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता डॉ. भीमराव अम्बेडकर समस्त वंचित तबकों के शोषण से मुक्ति एवं बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए शिक्षा को सबसे अधिक महत्त्व दे रहे थे, जिसके लिए उन्होंने नारा ही दिया— “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो” | शिक्षा के प्रति वंचित वर्गों में उत्साह, ललक एवं इच्छा जगाने के लिए उन्होंने जो प्रयास किए, वे बहुत लाभदायक और परिवर्तनकारी रहे, वंचित-वर्गों में एक सीमा तक चेतना आई और इन तबकों ने शिक्षा के महत्व को समझा, शिक्षा के प्रति वे सचेत होकर उसे अपनाने ही नहीं लगे, बल्कि अपने बच्चों के रूप में अगली पीढ़ी को शिक्षित बनाने के भरसक प्रयास भी करने लगे | इसके अनुकूल एवं सकारात्मक प्रभाव इन वर्गों की सामाजिक, बौद्धिक, वैचारिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्थितियों पर दिखाई देने लगे | ये समाज में अपनी स्थिति के प्रति सचेत होने लगे, ‘वर्चस्ववादी-वर्गों’ से उनकी निरंकुशता एवं अत्याचारों के संबंध में प्रश्न करने लगे, अपने अधिकारों को समझने और उसकी माँग करने लगे, अधिकारों को पाने के लिए संघर्ष करने लगे…

…स्वाधीनता-प्राप्ति के बाद तत्कालीन सरकारों द्वारा भी इस सन्दर्भ में अनेक प्रयास शुरू हुए | इसमें कुछ अधिक मदद तब मिली, जब स्कूली-शिक्षा को सरकारी स्तर पर एकदम निःशुल्क बनाकर सबके लिए सुलभ बनाया गया | सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र को अपने हाथ में और अपने नियंत्रण में रखते हुए उसे सबके लिए उपलब्ध किया, सभी वर्गों के बच्चों को विद्यालय तक ले आने के लिए अनेक प्रयास किए गए | यद्यपि यह भी सत्य है, कि इस प्रयास का लाभ सभी तक नहीं पहुँच सका, बल्कि इसके दायरे में कुल आबादी का एक छोटा-सा हिस्सा ही आ सका— कुछ सरकार की सीमा के कारण, तो कुछ वंचित तबकों की मजबूरियों के कारण, तो कुछ जागरूकता के पर्याप्त अभाव में…

…दरअसल प्रशासनिक एवं राजनैतिक स्तर पर, उच्चतम से लेकर निम्नतम-स्तर तक, प्रत्येक क़दम पर इन ‘वर्चस्ववादी’ शक्तियों का नियंत्रण रहा है, जिससे लड़ना सरकार के लिए भी इतना आसान नहीं था | प्रशासन में चप्पे-चप्पे पर उनकी मौजूदगी के कारण उनका एक सीमा के बाद विरोध किया जाना हानिकारक से अधिक घातक हो सकता था, और उस ‘घातकपन’ को भारत सहित पूरी दुनिया ने इंदिरा गाँधी के विरुद्ध भड़के जन-विद्रोह एवं अंततः उनकी निर्मम हत्या के रूप में देखा, और ख़ूब देखा…| उनके बाद अगले प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की भी हत्या इस ओर बहुत कुछ संकेत करती है…!

इन तमाम षड्यंत्रों के बावजूद, जो थोड़े बहुत प्रयास किए गए और उनमें जो थोड़ी-बहुत सफ़लता मिली, उन थोड़े-से प्रयासों से भी समस्त स्त्रियों सहित सभी वंचित-वगों में एक सीमा तक ही सही, लेकिन एक स्तर की चेतना जागृत हुई और लोग सचेत होने लगे, अपने अधिकारों को समझने लगे, उनकी मांग करने लगे, उनके लिए संघर्ष करने लगे, जो आगे चलकर ‘अन्य पिछड़े वर्गों’ (ओबीसी) एवं कुछ क्षेत्रों में महिलाओं को मिले आरक्षण के रूप में भी देखा जा सकता है |

…और यही वह बिंदु है —अर्थात् समाज की वंचित-जातियों एवं कमज़ोर सामाजिक-समुदायों को लगातार सचेत और सजग करती शिक्षा के विविध रूप एवं स्तर— जिसने हमारे देश की ‘वर्चस्ववादी’ ताक़तों को चिढ़ा दिया | क्योंकि देश में ‘संविधान की सत्ता’ और ‘कानून का शासन’ (रूल ऑफ़ लॉ) स्थापित होने के बाद संविधान एवं कानून ने देश की ‘वर्चस्ववादी ताकतों’ को उनकी सर्वोच्च सत्ता-भूमि से उतार कर एकदम आम-जनता के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया | इससे उनकी ‘श्रेष्ठता’ की भावना, अहंभाव, ‘विशिष्टता’ की भावना, ‘ईश्वरीय’ या ‘ईश्वर-तुल्य’ स्थिति को गहरा धक्का लगा, जिसे वे सहस्त्राब्दियों से अपने सिर पर ढोते आए थे अभी तक…! …और इसीलिए वे तिलमिला उठे…!

…उन्हें यह सोचकर ही तकलीफ़ होने लगी, कि जो समाज और उसके लोग कल तक उनके सामने रिरियाते फिरते थे, जो कल तक उन ‘प्रभुओ’ की दया पर पलते थे, जिनकी हिम्मत कभी उनके सामने आँख उठाकर बात करने की नहीं होती थी, जो उन ‘प्रभुओ’ की इच्छा को भी ‘ईश्वर की इच्छा’, ‘ईश्वर का आदेश’ और अपना ‘भाग्य’ या ‘नियति’ मानकर उनका पालन करने को प्रस्तुत रहते थे; आज वे ही लोग जरा-सा पढ़-लिख जाने पर उनके सामने आँखे उठाने लगे हैं, उनसे सवाल-जवाब करने लगे हैं, अपने अधिकारों की बात करने लगे हैं, उनके आदेश की अवहेलना ही नहीं, बल्कि उसपर सवाल खड़े करने लगे हैं…!!!

भला यह सब उसे क्यों पसंद आता…? उनकी ‘प्रतिक्रिया’ तो ‘स्वाभाविक’ थी…! इस परिस्थिति ने उन ‘प्रभुत्वशाली’ एवं ‘वर्चस्ववादी’ ताकतों को एक नए सिरे से खड़े होने, नवीन ढंग से लामबंद होने, षड्यंत्रों की नई श्रृंखला शुरू करने के लिए प्रतिबद्ध किया, ताकि कल तक उनके पैरों के नीचे रहनेवाले वर्गों और समुदायों को पुनः उनके पैरों के नीचे वापस लाया जा सके…! इसके लिए उन्हें पंगु, मूर्ख, भाग्यवादी बनाना बहुत ज़रूरी था | जिसका उपाय था— गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से उन्हें सर्वथा वंचित कर देना |

दरअसल ‘शिक्षा’ ही वह अस्त्र थी, जो इन वंचित एवं कमज़ोर तबकों को उनकी दयनीय स्थिति के लिए ज़िम्मेदार कारकों एवं उनके द्वारा अपनाए जाने वाले तरीक़ों के बारे में बताती थी, जिसने उन शक्तियों के विरुद्ध एकजुट होकर संघर्ष करने की महत्ता समझाई, सदियों से भयपूर्ण वातावरण में जी रहे उनके दिलों में हिम्मत पैदा की, उन्हें तार्किक ढंग से सोचने की शक्ति दी, तर्क की क्षमता दी, उनके विचारों को धार दी, संघर्ष के रास्ते दिखाए, संघर्ष की तरकीबें समझाई….!

…अतः शिक्षा पर चोट करना और उससे इन वंचित-कमज़ोर वर्गों को सर्वथा वंचित कर देना ज़रूरी था | इसका एक सरल-सा उपाय उस ‘कानून’ में ढूँढ निकाला गया, जिसमें बच्चों को कक्षा 8 तक फ़ेल नहीं करना था, चाहे बच्चे को पढना आये या नहीं | तरीका यह निकाला गया कि स्कूलों में बच्चों को ‘पढ़ाने’ का केवल दिखावा भर करना है और इम्तहान के समय उनको अध्यापकों द्वारा ही नक़ल कराकर पास करते चले जाना है |

‘वर्चस्ववादी’ मानसिकता वाले बुद्धिजीवियों द्वारा बच्चे को बिना पढ़ाए ही पास करते चले जाने के समर्थन में अनेक प्रबल और ‘अकाट्य’ तर्क भी गढ़े गए, जिसमें से सबसे प्रबल तर्क यह था, कि जब बच्चे को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी अध्यापक की है और अध्यापक, बच्चे को पढ़ाने के सन्दर्भ में अपना काम ईमानदारी से नहीं करता है, तब उसका खामियाज़ा फ़ेल होकर बच्चा क्यों भुगते, क्यों बच्चे का साल ख़राब किया जाय…?

यहाँ पर कुछ देर रुककर बहुत गंभीरता से कुछ प्रश्नों पर सोचने की ज़रूरत है…! एक, यदि कोई अध्यापक अपना ‘पढ़ाने का उत्तरदायित्व’ ठीक से नहीं निभाता है, तो उसे ज़िम्मेदार और जवाबदेह बनाने की जरुरत थी, या बच्चे को बिना पढ़ाए उत्तीर्ण किए जाने की…? दो, यदि कोई अध्यापक अपना ‘अध्यापकीय दायित्व’ ठीक से पूरा नहीं करता है, तो इसका दण्ड उसे क्यों नहीं दिया गया, क्यों बच्चे का भविष्य दाँव पर लगाया गया…? तीन, इसकी जांच क्यों नहीं की गई या की जाती है, कि अध्यापक अपना ‘अध्यापकीय दायित्व’ ठीक से किन कारणों से नहीं निभाता या निभा पाता है…? क्या इस डर से इसकी जाँच नहीं की गई या की जाती है, कि कहीं उन ‘सवर्णीय-मानसिकता’ वाले अध्यापकों की कारगुजारियाँ जाँच में सबके सामने खुलकर न आ जाएँ, जो ‘वर्चस्ववादी-प्रभुत्ववादी’ वर्गों के एजेंडे को चुपके-चुपके आगे बढ़ा रहे हैं…? चार, बच्चों के पढ़ने-लिखने में अपनी कक्षा-स्तर तक न्यूनतम उपलब्धि भी प्राप्त न कर पाने के लिए क्यों नहीं शिक्षा विभाग, शिक्षा-मंत्रालय एवं बच्चों के विकास से जुड़े तमाम विभागों और मंत्रालयों को ज़िम्मेदार मानते हुए उनको कठघरे में खड़ा किया जाता है ? क्यों नहीं उनसे जवाब-तलब किया जाता है ? क्यों नहीं इनके अधिकारियों को ही पदावनत किया जाता है ? पाँच, सभी जानते हैं, कि हमारे देश में अध्यापकों से, पढ़ाने का काम करने के अलावा बहुत सारे ‘ग़ैर-अध्यापकीय-कार्य’ भी लिए जाते हैं; मसलन जनगणना, चुनाव, टीकाकरण-अभियान, विभिन्न प्रकार की दूसरी गणनाएँ करवाने में… और भी बहुत कुछ…! क्या इसका असर उनके ‘अध्यापकीय दायित्व-निर्वहन’ पर नहीं पड़ता होगा…? निश्चित रूप से…! इन विभिन्न ग़ैर-अध्यापकीय कार्यों में संलग्न होने के कारण बहुत से अध्यापक, जो अपना अध्यापकीय-कार्य ईमानदारी से करना चाहते हैं, समाज के सभी बच्चों को ईमानदारी से पढ़ाने की कोशिशें करते हैं, लेकिन अतिरिक्त कार्यभार के कारण विद्यालय से बाहर रहते हैं और बच्चों को पढ़ाने का अपना मुख्य काम ठीक से नहीं कर पाते हैं |

उत्तराखंड एवं भारत के कुछ अन्य स्थानों में वहाँ के अध्यापकों से बातचीत करने एवं उनके संपर्क में रहने के दौरान मुझे ऐसे बहुत से अध्यापक मिले, जिनमें अपने काम को लेकर यह विशिष्ट स्थिति अक्सर ही देखने को मिल जाती थी | ऐसे अध्यापकों में अक्सर बहुत अधिक निराशा, झुंझलाहट, छटपटाहट, बेचैनी आप भी महसूस कर सकते हैं…!!! क्या नहीं…???

अब तनिक पड़ताल करते हैं, उक्त नियम की —यानी कक्षा-8 तक सभी बच्चों को पास करते चले जाने की, चाहे वे पढ़ने-लिखने में उस स्तर तक पहुँचे हों या नहीं…! इस सन्दर्भ में हम इस बहस में अभी नहीं जाएँगे, कि यह नियम क्यों लाया गया, सरकार की एवं उस सरकार में सर्वोच्च स्थानों पर बैठे पदाधिकारियों, सचिवों, नेताओं, शिक्षा-अधिकारियों, बुद्धिजीवियों की मंशा पर भी हम अभी यहाँ बात नहीं करेंगे, इस पर बहस फिर कभी….

यहाँ हम इस बिंदु पर बात करेंगें, कि इस नियम के सहारे ‘वर्चस्ववादी-वर्गों’ ने अपने उल्लू कैसे सीधे किए और किस प्रकार समाज के 85% वंचित-वर्गों के भविष्य को नष्ट करने और उन्हें गुमराह करने की साजिशें रचीं…?

…यह तो सभी जानते हैं, कि बच्चों की शिक्षा की पृष्ठभूमि कक्षा एक से लेकर कक्षा आठ के दौरान ही तैयार होती है | बच्चों के जीवन में इन्हीं शुरूआती 8 वर्षों की समयावधि में भाषा एवं गणित, और कुछ आगे (कक्षा 6-8 के दौरान) चलकर सामाजिक-विज्ञान, इतिहास, प्राकृतिक-विज्ञान आदि की शुरूआती समझ विकसित होती है |

इसी 8 वर्ष की समयावधि में उन्हें अक्षर-ज्ञान और पढ़ना-लिखना सीखने के साथ-साथ लिखे हुए को समझने की, उसके आधार पर किसी कच्चे-पक्के निष्कर्ष तक पहुँचने की कवायदें करते हैं | और इस प्रक्रिया में बच्चे तर्क करना सीखते हैं, सवाल उठाना, सवालों के जवाब स्वयं तलाश करना, किसी सवाल के जवाबों के सही-ग़लत की परख करने के लिए उन सभी के विश्लेष्ण करना सीखने लगते हैं |

…और इन सभी बातों का सम्बन्ध बच्चे के भविष्य के व्यावहारिक जीवन से है | इन्हीं शुरूआती 8 वर्षों की शिक्षा में वह किसी चीज, घटना, मुद्दा आदि के सही-ग़लत, उचित-अनुचित, करणीय-अकरणीय पक्षों की पहचान करने, उन्हें जानने की कोशिश करने लगता है | ऐसे बच्चे को भविष्य में आसानी ने ‘अंध-राष्ट्र’, ‘धर्मान्धता’, जातीय-हीनता’, ‘क्षेत्रीयता’, ‘भाषा’ आदि के आधार पर बहुत आसानी से अपने कूट-जाल में नहीं फँसाया जा सकता है | साथ ही, उसका शोषण एवं उसके विरुद्ध षड्यंत्र करना भी उतना आसान नहीं होता है |

इतना ही नहीं, एक शिक्षित व्यक्ति से आसानी से उसकी संपत्ति, उसके जीवन या उसकी किसी चीज को अनैतिक ढंग से छीनने में मुश्किलें खड़ी होंगी | और यह साधन-संपन्न वर्गों के लिए संकट की बात होगी, जिसे यह वर्ग समझता है |

अब इस स्थिति को आज के वर्तमान परिदृश्य के साथ रखकर देखते हैं…

…जबसे ‘शिक्षा के अधिकार’, के अंतर्गत आठवीं कक्षा तक के बच्चों को, न्यूनतम उपलब्धि हासिल न कर पाने के बावजूद, फ़ेल करने के स्थान पर हर हाल में पास करने का ‘खेल’ शुरू हुआ, तबसे एक अलग ही किस्म की स्थिति निर्मित हुई है | हुआ दरअसल यह, कि आठवीं कक्षा तक बच्चे कुछ नहीं सीख पाने के बावजूद पास तो कर दिए गए, किन्तु इससे उनको पढ़ना-लिखना आया नहीं | जब से ऐसा ‘प्रावधान’ किया गया है और ‘वर्चस्ववादी वर्गों’ के अधिकांश अध्यापकों ने इन वंचित-वर्गों के बच्चों को ‘पढ़ाने’ का केवल दिखावा-भर किया है, तबसे इसके परिणाम अनेक रूपों में सामने आ रहे हैं—

एक, इन बच्चों की, कम से कम पूरी की पूरी पिछली दो पीढ़ियों की शुरूआती शिक्षा का पूरा आधार ही ख़राब हो चुका है…| इसके परिणाम क्या हुए…? इन वंचित-वर्गों के बच्चों के एकदम शुरूआती विद्यार्थी-जीवन के सबसे महत्वपूर्ण एवं क़ीमती 8 साल बर्बाद हो रहे हैं और अधिकांश बच्चे कुछ भी नहीं सीख पाए और लगभग निरक्षर ही रह गए, शिक्षित होना तो दूर की बात है |

दूसरे, विद्यार्थी-जीवन के शुरूआती 8 साल बर्बाद हो जाने पर इन बच्चों का आगे का भविष्य स्वतः ही नष्ट हो चुका होता है और अभी भी हो रहा है |

तीसरे, इन 8 सालों के दौरान ‘सवर्णीय-मानसिकता’ वाले अधिकांश अध्यापकों द्वारा इन बच्चों के साथ जो अमानवीय एवं अपमानजनक दुर्व्यवहार किए जाते हैं, वह उनके मनोबल को तोड़ने के लिए पर्याप्त होता है | इन वर्षों के दौरान उनके आत्म-विश्वास की जो धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं, वह उनके जीवन-आधार को नष्ट करने के लिए काफ़ी है | उन्हें बात-बात पर कोसते और पीटते हुए, गालियाँ और अपमानजनक शब्द कहते हुए, उनके आत्म-सम्मान एवं आत्म-विश्वास को जिस हद तक हर रोज़ कुचला जाता है, उसके कारण क्या वे बच्चे अपने विद्यालय से निकलने के बाद पढ़ाई की दुनिया में दोबारा या आगे प्रवेश करने की हिम्मत, रूचि और इच्छा बनाए रख पाते होंगे…? निश्चय ही नहीं…!

चौथे, बिना पढ़े ही कक्षा 8 पार करने, लेकिन इस दौरान पढ़ना-लिखना ठीक से नहीं सीख पाने के कारण बच्चा दसवीं की परीक्षा पास करने के लायक ही नहीं रह पाता है | जिसे अक्षर-ज्ञान ही नहीं, वह दसवीं के प्रश्नों को क्या हल करेगा…? और यह तो भारत का वर्तमान ‘तथ्य’ और ‘सत्य’ है, कि सम्मानजनक सरकारी नौकरियों की शुरुआत अभी तक प्रायः कक्षा 10 की न्यूनतम योग्यता के साथ होती है | अब इस दौरान जब बच्चे की न्यूनतम आयु 13-14 साल के आस-पास हो चुकी होती है, वह दोबारा अक्षर-ज्ञान कब सीखेगा, और कब आगे जाकर 10 वीं का इम्तहान देने के लायक बनेगा ? क्या तब तक वह नौकरी के लिए अधिकतम आयु की सीमा तक नहीं पहुँच चुका होगा…?

इस प्रकार, सम्मानजनक सरकारी नौकरियों की दौड़ में वंचित-वर्गों के ऐसे अधिकांश बच्चों को पहले दरवाजें पर ही रोक दिया जाता है और अभी भी यह प्रक्रिया जारी है |

पाँच, एक सवाल और… कि पास करने की बात आठवीं तक ही क्यों हो रही है…? तो ज़रा कभी समाचार-पत्रों या अन्य माध्यमों द्वारा नौकरियों के लिए निकलने वाले विज्ञापनों को ग़ौर से देखने की ज़रूरत है…! जब वहाँ ‘सफ़ाईकर्मी’ (सफ़ाईकर्मियों पर निगरानी रख्नेवल अधिकारी नहीं, बल्कि सरकारी संस्थानों के टॉयलेट की सफ़ाई करने वाला, फ़र्स पर झाडू-पोछा करने वाला, सड़क बुहारने वाला आदि) की नौकरी के लिए आवेदन माँगे जाते हैं, उस समय बहुत ध्यान से देखिएगा उस विज्ञापन को… एक ‘सफ़ाईकर्मी’ के लिए न्यूनतम योग्यता क्या माँगी जाती है…? आपको वहीँ पर इस प्रश्न का उत्तर मिलने लगेगा…!

साथ में आप उस विज्ञापन के एक-एक शब्द को जब बहुत ध्यान से पढ़ेंगे, तो लिखा हुआ मिलेगा—‘केवल अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित’…! और सोचिएगा, कि ऐसा क्यों…? क्यों यहाँ इस काम के लिए शत-प्रतिशत ‘आरक्षण’ केवल अनुसूचित-जातियों को दिया गया है, क्यों यहाँ भी 50.5% सीटें ‘सामान्य वर्गों’ के लिए नहीं रखी गईं हैं…? सोचिएगा ज़रूर…!!!

…और अब बच्चों को बिना पढ़े या बिना उनको पढ़ाए पास करते चले जाने की सीमा बढ़ाकर 10 वीं कक्षा तक की जाने की क़वायदें चल रही हैं, तो यह भी देखना होगा, कि कहीं सरकारी महकमों में सम्मानजनक नौकरियों की शुरुआत एवं उनमें भर्ती के लिए न्यूनतम योग्यता को 10वीं पास से आगे बढ़ाकर 12 वीं पास तो नहीं कर दिया गया है…? अर्थात् अब सरकारी नौकरियों की बदलती स्थिति भी देखनी होगी…|

छः, और क्या 8 सालों तक प्रत्येक दिन अपमान, तिरस्कार, भर्त्सना, दुत्कार सुनने और उसके बाद भी कुछ भी सीख न पानेवाले 13-14 साल की उम्र तक पहुँच चुके बच्चे के पास इतनी हिम्मत, इतना आत्म-विश्वास और इतनी इच्छा-शक्ति शेष बच पाती होगी, कि वह अब कक्षा 1 से पुनः पढ़ाई की शुरुआत करे…? 8 सालों तक लगातार जिस बच्चे को हर रोज़ यह ‘बताया’ जाता रहा है, कि ‘वह पढने के लायक ही नहीं है’, ‘उसमें पढ़ने-लिखने की, सोचने-समझने की क्षमता ही नहीं है’, उसकी खोपड़ी में भेजा ही नहीं है’, तो क्या वह अब इस बात पर विश्वास करने की स्थिति में बच पाया होगा, कि वह मान सके, कि वह भी एक सामान्य व्यक्ति है, उसमें भी पढने-लिखने की पूरी क्षमता है…? निश्चय ही नहीं…!!! …तो क्या बच्चों का यही आत्म-विश्वास तोड़कर उन्हें एकदम दयनीय हालत में पहुँचाकर छोड़ देना, बेबस हालत में लाकर खड़ा कर देना ही उन ‘ब्राह्मणवादी-वर्चस्ववादी’ ताकतों की अभिलाषा और कोशिश थी…???

सात, और यदि बच्चे में एवं उसके अभिभावकों के मन के किसी कोने में पढ़ने की इच्छा-शक्ति शेष बची होगी भी, तो बच्चे को कहाँ और किस विद्यालय में किस अध्यापक के पास पुनः भेजा जाएगा…?

आठ, इन वंचित-वर्गों में से कोई अनपढ़ व्यक्ति, जिसके आत्म-विश्वास को स्कूलों में पहले ही कुचल दिया गया है, यदि नौकरी एवं रोज़गार के अभाव में अपना स्वतंत्र काम या कोई छोटा-मोटा कारोबार शुरू करने की सोचे भी, तो उसका रास्ता भी बंद कर दिया गया है, उसकी निरक्षरता को बनाए रखने के माध्यम से…! …और ग़रीबी के कारण पैसों के लिए उसे बैंकों से लोन लेने की भी ज़रूरत होगी | अव्वल तो यह, कि वह निरक्षर होने के कारण और जानकारी के अभाव में इसके लिए जल्दी साहस नहीं करेगा | …और यदि उसने साहस किया भी, तो अनपढ़ होने के कारण बैंकों के सभी नियम-क़ायदे वह ठीक से समझ नहीं पायेगा, जिसका लाभ बैंक एवं उसमें कार्यरत अधिकतर ‘वर्चस्ववादी-समाज’ के लोग एवं बिचौलिए या दलाल उठाएँगे और उसे भ्रम में रखकर धोखे से उससे मनमाना अनैतिक लाभ प्राप्त करके उसे ठेंगा दिखा देंगे और वह बेचारा निरक्षर होने के कारण कुछ समझ ही नहीं पाएगा | ऐसे में उसकी स्थिति या दुर्गति देखकर उसके ही अपने वंचित-समाज के अन्य अनपढ़ लोग अपना व्यवसाय भी शुरू करने की बात मन से निकाल देंगे | …क्या यह एक और जीत नहीं है…’वर्चस्ववादी’ समाज की…???

नौ, ‘ब्राह्मणवादी’ ताक़तों की इस प्रकार की सोच एवं द्विज-समाज के शिक्षकों के व्यवहार के दुष्परिणाम इन वर्गों के बच्चों को जिन रूपों में भुगतने पड़े हैं, उससे उनकी पूरी की पूरी पीढ़ी अशिक्षित ही नहीं रह गई, बल्कि शिक्षा के नाम पर छलावा और विद्यालयों में नित्य नए-नए तरीक़ों से अपमान एवं तिरस्कार ने उनके रहे-सहे मनोबल, आत्म-विश्वास और आशा को भी बुरी तरह से तहस-नहस कर दिया है | उनको दिग्भ्रमित करके पुनः धर्म, जाति, संप्रदाय, क्षेत्र, भाषा के भँवर-जाल में उलझाया जा चुका है | साथ ही, स्कूल में अधिकांश समय बिताने के कारण वे कोई काम भी ठीक से नहीं सीख पाए, इसलिए वे आर्थिक रूप से और भी अधिक अपंग बना दिए गए हैं |

इस कारण अब उनको कुछ भी उल्टा-सीधा समझाकर अपना उल्लू सीधा करना ‘वर्चस्ववादी-ब्राह्मणीय-सोच वाले’ वर्गों के लिए बहुत सरल हो जाता है, और इस प्रकार अशिक्षित-वंचित वर्गों के व्यक्ति कुछ भी समझ न पाने के कारण सदैव उनके वश में रहने की ओर पुनः अग्रसर हो चुके हैं ! …बेबस …लाचार …दिग्भ्रमित …पराश्रित …!

…और… यही है ‘वर्चस्ववादी-सवर्णीय-मानसिकता की जीत…!

सवाल है, कि इस जटिल षड्यंत्र से उन ‘वर्चस्ववादी’ वर्गों को क्या हासिल हुआ…?

एक, वंचित-वर्गों के बच्चों को कक्षा 9 में ही रोक दिए जाने के कारण और इस प्रकार दसवीं तक न पहुँच पाने के कारण ‘सवर्ण-वर्गों’ के बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों में सभी प्रकार के कॉम्पीटिशन न्यूनतम हो जाते हैं | जहाँ पहले 15% ‘सशक्त-समाज’ या ‘सामान्य-वर्ग’ के लोगों के लिए 50.5% सरकारी नौकरियाँ एवं कॉलेजों-विश्वविद्यालयों में सीटें रहती थीं, वहीँ स्कूली शिक्षा की सीढियाँ भी पार न कर सकने के कारण वंचित-वर्गों के अधिकांश बच्चों को कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों की चौखट तक पहुँचने की नौबत ही ख़त्म हो जाने से अब इन 15% ‘सामान्य-वर्ग’ यानी ‘वर्चस्ववादी-समाज’ के लिए 50.5% से अधिक हिस्सेदारी प्राप्त करने का रास्ता साफ़ हो चुका है, जो तेज़ी से 100% की प्राप्ति की ओर अग्रसर है | यदि नौकरी के सरकारी आंकड़ों को वास्तविक दस्तावेज़ों के माध्यम से देखा जाय, तो हालात अपने आप स्पष्ट हो जाएँगे, जहाँ वंचित-वर्गों के भीतर ‘योग्य कैंडिडेट के अभाव में’ वे सीट ‘सामान्य वर्ग’ को दे दी जाती हैं…| क्या आप इस दूरगामी षड्यंत्र को समझ पा रहे हैं…?

दो, जो बच्चा 10 वीं का इम्तहान ही पास न कर पा रहा हो, वह हायर एजुकेशन के लिए कॉलेजों या विश्वविद्यालयों में दाखिले किस प्रकार लेगा…? फ़िर चाहे वह शिक्षा का कोई भी क्षेत्र हो | क्या यही कारण नहीं है, कि देश में वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर, शासक आदि की जमात में 85% आबादी की हिस्सेदारी नगण्य है…? क्या आप जानते हैं, कि वर्तमान समय में भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों में सचिवों (जो आईएएस अधिकारी होते हैं) में लगभग 95% सचिव केवल और केवल ‘सवर्ण-समाज’ से हैं, और सिर्फ 5% ही वंचित तबकों से हैं…? क्या कभी आपके मन में यह सवाल नहीं उठता कि ‘ईश्वर’ ने क्या सारी योग्यता, सारी बुद्धि केवल 100 में से 3-4 लोगों को ही दी है और शेष लोग बुद्धिहीन और मूर्ख पैदा हुए हैं…??? कभी फ़ुर्सत में इस पर सोचिएगा ज़रूर…! क्या जाने आप भी उसी श्रेणी में रखे गए हों…? बुद्धिहीन और मूर्ख की श्रेणी में…?

तीन, देश के साधनों-संसाधनों के उपभोग में भी इस नीति ने ‘ब्राह्मणीय सोच वाले’ लोगों को भरपूर लाभ पहुँचाई | एक तो, बचपन से ही अपने पढ़े-लिखे एवं चतुर अभिभावकों द्वारा संस्कार-रूप में प्रत्यक्षतः-परोक्षतः प्रशिक्षित किए जाने के कारण, तो दूसरे अपने अभिभावकों को रोज़-रोज़ चालाकीपूर्ण व्यवहार करते देख उनके बच्चे सीखने और समझने लगते हैं कि दूसरों के प्रति चालाकियाँ कैसे की जाती हैं, अपना उल्लू कैसे सीधा किया जाता है, कमज़ोर वर्गों को अपने अधीन और अपने ऊपर आश्रित  कैसे रखा जा सकता है | साथ ही, वह बचपन से ही सीखने लगता है, कि अपने जैसे दूसरे चालबाजों से अपना बचाव कैसे किया जाता है, उनकी चालाकियों का मुंहतोड़ जवाब कैसे दिया जाता है…! इससे वे वंचित-वर्गों की तुलना में कम धोखा खाते हैं, कम असफ़ल होते हैं, बचपन से मिली सीख के कारण विषम परिस्थितियों से जल्दी उबरना जानते हैं, आत्म-विश्वास भरपूर होने के कारण उनकी हिम्मत जल्दी नहीं टूटती है |

…एक कहानी अक्सर हम सुनते-सुनाते हैं… जिसमें दो बच्चों (जिसमें से एक वंचित या कमज़ोर तबके का बच्चा होता है और दूसरा शक्तिशाली और ‘स्वामी-वर्ग’ का) को एक घटना सुनाई जाती है… जिसमें किसी बड़े प्रभावशाली एवं धनी व्यक्ति के दरबान की अपनी ड्यूटी के समय आँख लग जाती है | आँख लगने की स्थिति में वह सपने में अपने मालिक को दुर्घटना-ग्रस्त होते हुए देखता है और तुरंत आँख खुलने पर उसी समय कहीं बाहर जा रहे मालिक को अपने सपने की बात बताकर रोक लेता है | कुछ ही समय बाद पता चलता है, कि उसका मालिक जिससे (ट्रेन या हवाई-जहाज़ जैसा कोई सार्वजनिक संसाधन) यात्रा करने वाला था, वह दुर्घटना-ग्रस्त हो गया है | अब दोनों बच्चों से पूछा जाता है, कि ‘बताओ बच्चो, अब वह मालिक अपने उस नौकर के साथ क्या व्यवहार करेगा…?’ कमज़ोर तबके का बच्चा तपाक से कहता है, कि ‘मालिक अपने उस नौकर को ईनाम देगा, क्योंकि उसने उसकी जान बचाई’, लेकिन ‘स्वामी-वर्ग’ का बच्चा जवाब देता है, ‘नहीं, उस नौकर का मालिक उस नौकर को ईनाम देकर नौकरी से निकाल देगा, ईनाम इसलिए कि उसने मालिक की जान बचाई, लेकिन वह अपनी ड्यूटी के समय सो गया था, इसलिए मालिक को चाहिए कि वह उसे नौकरी से निकाल दे, ऐसा नौकर अपने मालिक के प्रति वफ़ादार नहीं हो सकता…!’

अर्थात् ‘वर्चस्ववादी-वर्ग’ के बच्चे बचपन से ही कमज़ोरों पर शासन करना, उनपर अपना नियंत्रण एवं आधिपत्य बनाए रखना, उनसे मनमाना काम निकालना…वगैरह का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं अपने अभिभावकों, अपने परिवार एवं अपने समाज द्वारा …| जबकि वंचित-वर्गों के बच्चों को समाज के साथ-साथ स्कूलों में भी स्वामिभक्त रहना, आज्ञाकारी बनना, वफ़ादार रहना, मालिकों के अधिकार एवं संपत्ति के प्रति कोई दुर्भावना न रखना ही सिखाया जाता है… और वास्तविक शिक्षा से दूर तो रखा ही जाता है…| 

इस प्रकार, पिछली एक सदी के दौरान इन वंचित जातियों एवं समुदायों ने सदियों के उत्पीड़न से अपनी मुक्ति के लिए जो जी-तोड़ कोशिशें करके केवल कुछ क़दम का फ़ासला तय किया था, सिर्फ़ इस एक नियम के सहारे उनके सारे किए-कराए पर पानी फेरा जा चुका है | सदियों से ही बेबस, लाचार, पराश्रित, वंचित जातियाँ पुनः पूर्व-स्थिति में पहुँचाएँ जाने को अभिशप्त हो चुकी हैं… सिर्फ़ इस एक नियम के माध्यम से …!

ऐसे सैकड़ों नियमों का यदि पोस्टमार्टम किया जाय, तो क्या आप अनुमान लगा सकते हैं, उन ‘वर्चस्ववादी’ शक्तियों एवं उनके षड्यंत्रों की भयावहता और क्रूरता की कितनी परतें खुलेंगी, जो समाज की 92.5% (सवर्ण-स्त्रियों सहित) को अपने पैरों के नीचे पुनः वापस लाने को प्रतिबद्ध दिखती हैं…???    

  • डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

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6 thoughts on “शिक्षा का अधिकार, वंचित वर्ग और पास-फेल का खेल

  1. कनक मैडम आप अपने इस प्रयास में पूर्णसफल हो रही हैं इस समाज को जगाने में और जन मानस को झकझोरने में आप सक्षम रहें ऐसी परमेश्वर से प्रार्थना है।

  2. बहुत सही कहा है आपने। समाज के आगे नहीं बढ़ पाने के यही सारे कारण हैं। जब तक हम अपनी सोच को नहीं बदलते, समाज को भी नहीं बदल सकते

  3. आपके लेख न सिर्फ रूढ़िवादी और सवर्ण मानसिकता वाले समाज पर कटाक्ष हैं, बल्कि शिक्षा जगत की उन तमाम छिपी और दृश्य घटनाओं पर ध्यान आकर्षित करते हैं जो एक शिक्षक को स्वयं के आंकलन में बहुत सहायक हैं। समाज के बदलने से पूर्व एक शिक्षक की मानसिकता का बदलना बेहद जरूरी है।

    1. जी पंकज जी, समाज के इस पक्ष पर भी बात करना जरुरी है …

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