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बातें कही-अनकही…

26 जनवरी 2024 को सम्पूर्ण भारत ने देशभर में हज़ारों-लाखों स्थानों पर अपना 75वाँ गणतंत्र दिवस और इस दिवस की 74वीं वर्षगाँठ मनाई; सबसे अधिक महत्वपूर्ण कि भारत के हज़ारों विद्यालयों ने अपने विद्यार्थियों को इस महान दिवस से पुनः परिचित कराया | देशभर में इस दिवस को 15 अगस्त के ‘स्वाधीनता दिवस’ (अंग्रेज़ों की गुलामी से स्वाधीनता) से भी अधिक संख्या में और अधिक उत्साह से मनाया जाता है | इसका कारण भी है…

15 अगस्त को तो हमें बाहर से आए अंग्रेज़ों से केवल और केवल राजनीतिक-शासनिक-प्रशासनिक आज़ादी ही मिल सकी थी; जो केवल पिछले लगभग दो सौ सालों की गुलामी से ही मुक्ति थी | लेकिन 26 जनवरी को भारत की लगभग 95 फ़ीसदी जनता को उन क्रूर-अमानवीय व्यवस्थाओं से आज़ादी मिली थी, जो उसके जीवन पर पिछले साढ़े तीन हज़ार सालों से कब्ज़ा जमाए बैठी थीं; जिनके कब्ज़े में सम्पूर्ण भारत की समस्त महिलाएँ, दलित, आदिवासी, शूद्र जैसे वंचित-समाज और ग़रीब-सवर्ण थे; जो उन अमानवीय-क्रूर व्यवस्थाओं के नियंत्रण में रहते हुए जीवन जीना ही भूल चुके थे | वे व्यवस्थाएँ देश के अंग्रेज़ों से आज़ाद होने के बाद भी किसी भी हाल में भारत की इन पीड़ित जनता को अपने ऑक्टोपसी-पंजे से आज़ाद करने को तैयार नहीं थीं, बल्कि हर हाल में उनके जीवन पर अपने अवैध कब्ज़े और नियंत्रण को बनाए रखने की जी-तोड़ कोशिशें लगातार कर रही थीं | लेकिन अपने समय के सबसे बड़े विद्वान्, वंचित-समाज और स्त्रियों के महान मुक्तिदाता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान के माध्यम से उन दबंग-प्रवृत्ति वाले सामाजिक-समूहों की कोशिशों को नाकाम कर दिया और सम्पूर्ण समाज के सिर पर एक बार फ़िर से तांडव करने के उनके सपने को चूर-चूर कर दिया…

2024 के 75वें गणतंत्र-दिवस और इसकी 74वीं वर्षगाँठ के अवसर पर विकासनगर (देहरादून, उत्तराखंड) के एक बेहद पुराने उच्च-विद्यालय ‘आशाराम वैदिक इण्टर कॉलेज’ के अध्यक्ष डॉ. नरदेव शर्मा, प्रधानाचार्य श्री अनिल सिंह नेगी और प्रबंधक श्री विनीत शर्मा की ओर से मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने, झंडोत्तोलन करने और बच्चों को संबोधित करने का निमंत्रण मिला | इस विद्यालय के बारे में जो जानकारी मिली है, उसे देखा जाए तो इस विद्यालय का इतिहास बेहद शानदार रहा है | इस विद्यालय की स्थापना आज़ादी के लगभग डेढ़ दशक पहले हुई थी; सन 1931 में | कार्यक्रम में शामिल होने के दौरान प्रधानाचार्य महोदय अनिल सिंह नेगी जी से पता चला कि इस विद्यालय ने देश-विदेश को, ख़ासकर उत्तराखंड को, कई आईएएस अधिकारी, आईपीएस अधिकारी, बैंक अधिकारी, कई नेता सहित अनेक महत्वपूर्ण सरकारी पदों के साथ निजी संस्थानों में भी कार्य कर चुके और कार्यरत अधिकारी भी दिए हैं और अभी भी यह सिलसिला ज़ारी है | इस विद्यालय से निकले हुए कई विद्यार्थी न केवल व्यवसाय की दुनिया में अपना परचम लहरा रहे हैं, बल्कि उससे भी बड़ी बात कि उन व्यवसायों से कमाए हुए पैसों का अच्छा-ख़ासा हिस्सा विभिन्न विद्यालयों में बच्चों की शिक्षा के लिए भी ख़र्च कर रहे हैं; जिसमें यह विद्यालय भी शामिल है | अन्य कई सक्षम व्यक्ति भी इसमें मदद कर रहे हैं |

निश्चित रूप से वह समाज एक जागरूक समाज होता है, जिसके सक्षम लोग बच्चों की शिक्षा को बेहद महत्व देते हैं और अपनी कमाई का हिस्सा उसके लिए ख़र्च करते हैं; वह भी ईमानदारीपूर्वक, न कि केवल दिखावे-भर के लिए | इस विद्यालय की स्थापना भी विकासनगर और डाकपत्थर के कुछ समर्पित लोगों ने की, जिनमें यहाँ के दो प्रसिद्ध व्यवसायी-परिवार शामिल हैं | उनमें से एक है, ‘बारुमल चाय’ के निर्माता और विकासनगर में एक विशाल चाय बागान के मालिक जैन-परिवार; जिसके वर्त्तमान सर्वेसर्वा संजय जैन जी मेरी अभी तक की जानकारी में ट्रस्टी के रूप में दो विद्यालयों (लड़कियों के लिए ‘श्री एच. एस. बी. एम जैन बालिका इण्टर कॉलेज’ और लड़के-लड़कियों दोनों के लिए ‘आशाराम वैदिक इण्टर कॉलेज’) की ज़िम्मेदारी अपने कुछ सहयोगियों की मदद से उठाए हुए हैं | दूसरे हैं, विकासनगर तथा इसके आसपास के क्षेत्रों में चावल एवं खाद्य तेल के बेहद प्रसिद्ध थोक-व्यवसायी गुप्ता-परिवार; यह परिवार भी इन दोनों विद्यालाओं के ट्रस्टियों और आर्थिक सहयोगियों में शामिल है, जिनके एक सदस्य सर्वज्य गुप्ता जी इस कार्यक्रम में उपस्थित थे | ये दोनों सज्जन और इनके परिवार बेहद विनम्र, मृदुभाषी और वंचितों-पीड़ितों की सहायता के लिए हमेशा तैयार रहते हैं; जिनसे हमारा अत्यधिक लगाव और पारिवारिक संपर्क हैं…

इस गणतंत्र दिवस पर ‘आशाराम वैदिक इण्टर कॉलेज’ में उक्त दोनों व्यक्तियों के अलावा और भी कई क्षेत्रों से जुड़े प्रतिष्ठित लोग उपस्थित थे | विद्यालय के प्रधानाचार्य अनिल सिंह नेगी जी इस पहली भेंट और बातचीत के दौरान मुझे बेहद शानदार व्यक्ति प्रतीत हुए | जिनकी सबसे बड़ी विशेषताओं में से उनका लोकतांत्रिक व्यवहार, शांत और स्थिर व्यक्तित्व, थोड़ा-सा हँसमुख स्वभाव, विशेष रूप से बच्चों के प्रति व्यवहार में सहजता मुझे विशेष रूप से पसंद आए | उन्हीं की तरह प्रबंधक महोदय और अध्यक्ष महोदय के आत्मविश्वास से भरे ठोस व्यक्तित्व भी बहुत प्रभावशाली थे; अपने ज्ञान का प्रकाश तो उनके चेहरों पर था ही |

व्यक्ति जब किसी ऊँचे ओहदे पर होता है, तो उसकी ज़िम्मेदारी भी उसी के अनुपात में बढ़ जाती हैं; लेकिन उस ओहदे का नशा भी कई लोगों पर चढ़ जाता है | लेकिन जो व्यक्ति अपने ज्ञान के साथ-साथ व्यक्तिव में भी समुद्र की-सी गहराई समेटे होते हैं, वे समुद्र की ही तरह स्थिर और उदार भी होते हैं, चाहे उनके भीतर कोई भी हलचल चल रही हो | कहते हैं कि किसी संस्थान को जब कोई ऐसा ही समुद्रीय-व्यक्तित्व वाला नेतृत्वकर्ता मिल जाता है, तो वह संस्थान बहुत ही सही दिशा में चल पड़ता है | ऐसे ही नायक किसी भी देश, समाज, संस्थान को बहुत दूर तक प्रगति के रास्ते पर ले जाने में सक्षम भी होते हैं; अन्यथा संस्थान को डूबने या ग़लत दिशा में चले जाने में देर नहीं लगती | अपने ठोस व्यक्तित्वों से इस शिक्षण-संस्थान को आगे ले जाने में इन तीन महानुभावों का कार्य स्पष्ट देखा जा सकता है |

विशेष रूप से प्रधानाचार्य महोदय के उदार व्यक्तित्व का भरपूर असर बच्चों की बेहतरीन प्रस्तुतियों आदि में नज़र आया, सबसे अधिक बच्चों के उन्मुक्त व्यवहार और आत्मविश्वास में | अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करते हुए बच्चे डर की भावना से दूर थे, प्रस्तुतियों के दौरान कहीं कोई ग़लती होने पर उनमें घबराहट या डर नहीं था, कि ग़लती हो गई, तो कहीं बाद में डांट न पड़ जाए | बल्कि परफॉरमेंस के दौरान कोई ग़लती हो जाने पर वे एक-दो क्षण का समय लेकर तत्काल अपने परफॉरमेंस में लौट आते थे | यह अध्यापकों के परिश्रम और बच्चों के प्रति उनके व्यवहार को तो बता ही रहा था, प्रधानाचार्य द्वारा बच्चों को अपने काम के दौरान स्वाभाविक ग़लतियाँ करने की छूट दिए जाने के वातावरण का सृजन करने की बात भी बता रहा था | स्वाभाविक है, जब तक हमारे मन में यह डर बना रहेगा कि फलाँ काम करने पर ग़लती होने की स्थिति में सज़ा मिल सकती है या सबके सामने डांट पड़ सकती है, तब तक हम सजा या सार्वजनिक अपमान से बचने के लिए हम उस काम को करने की कोशिश ही नहीं करेंगे और उससे दूर भागेंगे | बेहतरीन परफॉरमेंस के लिए यह ज़रूरी है कि काम के दौरान ग़लतियाँ होने के डर से मुक्त रहा जाए…

प्रधानाचार्य महोदय के व्यक्तित्व की दूसरी विशेषता जो मुझे पसंद आई, वह था उनका धार्मिक-पूर्वाग्रह और जातीय-जकड़बंदी से काफ़ी हद तक मुक्त होना | कार्यक्रम की समाप्ति के बाद अनौपचारिक बातचीत में मैंने जब यह समझने के लिए कि वे धार्मिक-पूर्वाग्रह और जातीय-जकड़बंदी से सचमुच ही मुक्त हैं या यह मेरा भ्रम है, मैंने उनकी बातों पर विशेष रूप से ग़ौर किए | वे सचमुच ही इन दुराग्रहों से काफ़ी मुक्त हैं | वैसे भी वे अच्छे-ख़ासे विद्वान् व्यक्ति हैं और समाज अपने सुशिक्षित व्यक्तियों से यह आशा तो करता ही है कि वह प्रत्येक दुराग्रह से मुक्त रहे | हालाँकि मुझे बताया गया कि विद्यालय में ‘हनुमानचालीसा’ की पढ़ाई भी शुरू हो गई है और समय-समय पर ‘हवन-यज्ञ’ आदि भी करवाए जाते हैं…

पिछले कुछ सालों से देश में सरकारें लगातार यह कोशिश कर रही हैं कि विद्यालयों में धार्मिक-कार्यक्रम हों, वह भी एक धर्म-विशेष से संबंधित, जैसे हवन-यज्ञ आदि; जिसमें सभी बच्चे शामिल हों और बच्चों को बचपन से धार्मिक-शिक्षा मिले | इसी कारण सरकारी और ग़ैर-सरकारी शिक्षण-संस्थानों को ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने के लिए बाक़ायदा सरकार और शिक्षा-विभाग द्वारा नोटिस भेजी जाती है और कार्यक्रमों की तस्वीरें और वीडियो आदि सरकार एवं विभाग को भेजने का आदेश दिया जाता है | मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में भी बाक़ायदा संस्थान द्वारा धार्मिक-कार्यक्रम आयोजित करते देखे, जिसका गवाह पूरा देश है | मेरी समझ से यह बहुत अधिक चिंता की बात है |

क्योंकि मेरा यह स्पष्ट और दृढ़ विचार ही नहीं विश्वास भी है कि शिक्षण-संस्थानों को किसी भी तरह के धार्मिक कार्यक्रम और इसकी कोशिशों से मुक्त रखा जाना चाहिए | शिक्षण-सस्थानों का कार्य होना चाहिए शिक्षण-संस्थान के भीतर आनेवाले बच्चों/विद्यार्थियों को धर्म, जाति, संप्रदाय आदि से जुड़ी चीजों से मुक्त रखकर अपने विचारों को स्पष्ट करने और समझने का वातावरण देना | यह विद्यार्थियों पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि वे भविष्य में अपने-आप यह तय करें कि धर्म के मामले में उन्हें किस दिशा में जाना है और कितनी मात्रा में धार्मिक होना है और कितनी मात्रा में वैज्ञानिक-तार्किक होना | लेकिन सरकारों के आदेशों के सामने हमारे शिक्षण-संस्थान लगातार कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं और उनकी चपेट में आते चले जा रहे हैं | यह विद्यालय भी इसका अपवाद नहीं है | उसके द्वारा धार्मिक आयोजन उसका अपना निर्णय न होकर सरकारी आदेश का पालन ही अधिक प्रतीत होता है |

लेकिन इतना ज़रूर है कि प्रधानाचार्य महोदय ने अपनी क्षमता भर विशेष प्रयास करते हुए सभी धर्मों और जातियों के बच्चों के बीच धार्मिक-सद्भाव बनाए रखने और जातीय-जकड़बंदियों से दूर रखने की कोशिश की है; साथ ही, धर्म को ही एकमात्र महत्वपूर्ण चीज माननेवालों के दुराग्रहपूर्ण कार्यों से अपने विद्यार्थियों को बचाए रखने की कोशिश भी |

विद्यालय में बच्चों और उनके अध्यापकों-अध्यापिकाओं ने अनेक चीजों से संबंधित नृत्य तैयार किए थे, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण थे विविध राज्यों की संस्कृतियों और उत्तराखंड की संस्कृति को प्रस्तुत करनेवाले नृत्य | बच्चों ने कमाल का काम किया था | नृत्य आधारित उन झलकियों में उत्तराखंड की संस्कृति से जुड़ी ‘महासू देवता’ की पालकी भी थी, जो वास्तव में अपनी संस्कृति से बच्चों को अवगत कराने की एक अच्छी कोशिश थी | लेकिन इसका एक विशेष कारण से यहाँ उल्लेख ज़रूरी है |

मैं जहाँ एक तरफ़ विद्यालय परिसर में यज्ञ और हनुमानचालीसा के पाठ जैसे धार्मिक-आयोजनों के ख़िलाफ़ हूँ, तो दूसरी तरफ़ विद्यालयों द्वारा विविध संस्कृतियों से विद्यार्थियों को रू-ब-रू कराने के लिए ‘महासू देवता की पालकी’ जैसे कार्यक्रमों का समर्थन करती हूँ, जोकि कोई धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि संस्कृति की झाँकी प्रस्तुत करता है | लेकिन ऐसी झाँकियाँ यदि भारत की हर दिशा का प्रतिनिधित्व करती हुई हों, तब बात बने और यदि दुनिया की कुछ और संस्कृतियों को भी इसमें जोड़ लिया जाए, तो बात ही कुछ और हो | उत्तर भारत के विद्यालयों को इसकी बहुत ज़रूरत है कि वे विद्यार्थियों को दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर भारत (आसाम, मेघालय, त्रिपुरा, नागालैंड, मिजोरम, अरुणाचलप्रदेश, मणिपुर), पश्चिमोत्तर भारत (जम्मू, कश्मीर आदि) की विविध संस्कृतियों तथा आदिवासी-संस्कृतियों को भी अपनी झाँकियों, नृत्यों आदि में शामिल करें | ताकि विद्यार्थी यह समझ सकें कि उनका देश कितने रंगों का बना है | हालाँकि इस विद्यालय में इस कमी पर स्वयं अध्यापकों ने ही समय के अभाव को इसका कारण बताया |

 इस विद्यालय के सबसे समृद्ध स्थानों में से एक था उसका पुस्तकालय, जिसकी देखरेख उसके भूतपूर्व लाइब्रेरियन महोदय कर रहे थे, जिनका नाम मुझे अब याद नहीं | वह कई साल पहले वहाँ से रिटायर हो चुके हैं, लेकिन उस लाइब्रेरी से उन्हें इतना लगाव है कि वे उसकी देखरेख स्वयं करते हैं, वह भी अवैतनिक |

इस पूरी अवधि में एक बात मुझे थोड़ी-सी खटकी कि जिस तरह वहां पुरुष-अध्यापक मुखर थे, उसी तरह महिला-अध्यापिकाएँ मुखर दिखाई नहीं दीं; जबकि बच्चों के कार्यक्रमों को केवल तीन दिनों में तैयार करवाने में उनकी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका थी, जैसाकि कार्यक्रम का संचालन करनेवाले उद्घोषक द्वारा बताया जा रहा था | इसका कारण क्या हो सकता है, यह अभी तक समझ नहीं पाई हूँ | हो सकता है कि ‘गणतंत्र-दिवस’ से संबंधित कार्यों के लिए अलग-अलग दायित्वों का बँटवारा इस तरीक़े से हुआ हो, कि उनमें महिला-अध्यापिकाएँ कुछ ऐसी ही भूमिकाओं में रखी गई हों, जिस कारण वे मुखर नज़र नहीं आ रही हों | या कोई अन्य कारण भी हो सकता है, जिसे अभी तक समझने की कोशिश कर रही हूँ…  

अंत में, जिस दिन मुझे यह निमंत्रण मिला, उसी दिन से मैं यह सोच रही हूँ कि क्या ऐसा निमंत्रण कोई विद्यालय तब भी मुझे या किसी भी महिला को देता, यदि डॉ. आंबेडकर द्वारा निर्मित हमारा वर्त्तमान संविधान लागू न हुआ होता, या आंबेडकर ने यह संविधान न बनाया होता; बल्कि उसकी जगह वह मनुस्मृति आधारित’ संविधान बना और लागू हो गया होता, जिसकी मांग ब्राह्मणीय-व्यवस्था को पसंद करनेवाले और आज़ादी के बाद उसे ही लागू करने की माँग करनेवाले कर रहे थे | संविधान निर्माण की प्रक्रिया का जो दस्तावेज़ीकरण हुआ था, उन्हीं दस्तावेज़ों में यह दर्ज है कि संविधान बनने के दौरान किस हद तक कट्टरपंथी/ चरमपंथी/ उग्र विचारधारा वाले दलों/संगठनों ने इसकी माँग की थी कि भारत का संविधान ‘मनुस्मृति’ पर आधारित हो, जिसमें महिलाओं, दलितों, शूद्रों (ओबीसी), आदिवासियों को उनकी गुलामी वाली पुरानी हैसियत में ही रखा जाए और उन्हें न तो कोई अधिकार दिया जाए, न उनको ‘स्वतन्त्र मानव’ का दर्जा दिया जाए | इन्हीं अतिवादी संगठनों ने भारत का राष्ट्रीय झंडा ‘तिरंगे’ को बनाए जाने पर ‘तिरंगे झंडे’ को जलाया था और उसको ख़ारिज करके उसके स्थान पर ‘भगवा’ झंडे’ को भारत का राष्ट्रीय झंडा बनाए जाने की मांग की थी | संविधान की प्रस्तावना भी जब आज़ादी से पहले ही 22 जनवरी 1947 को ‘संविधान निर्माण सभा’ द्वारा पास कर दी गई, तो इन अतिवादी संगठनों को पता चल गया कि भविष्य में बनकर तैयार होनेवाला संविधान भारत की सम्पूर्ण महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, ओबीसी और धार्मिक-अल्पसंख्यकों को दबंग धर्मों-जातियों के के पुरुषों के बराबर स्थापित करनेवाला है; तो उन्होंने इसका विरोध करते हुए और ‘मनुस्मृति’ आधारित संविधान की माँग करते हुए पूरे देश में जगह-जगह डॉ. आंबेडकर का पुतला और तिरंगा झंडा जलाया |

ऐसी ही सैकड़ों अन्य मानवाधिकार-विरोधी माँगें भी उन संगठनों द्वारा की गई थीं, जिनका जिक्र उस दस्तावेज में दर्ज है | इसलिए मेरे मन में बार-बार यह सवाल आ रहा है कि यदि ब्राह्मणीय-व्यवस्था को पसंद करनेवाले और आज़ादी के बाद उसे ही लागू करने की माँग करनेवाले अपनी माँग मनवाने में सफ़ल हो जाते और देशभर में ‘मनुस्मृति आधारित’ संविधान लागू हो जाता; तो भारत की 95 फ़ीसदी आबादी की हालत और हैसियत, जिनमें आधी आबादी महिलाएँ (वर्त्तमान में लगभग 70 करोड़ की आबादी), दलितों, ओबीसी, आदिवासी और धार्मिक-अल्पसंख्यक शामिल हैं, क्या होती…? निश्चित रूप से महिलाएँ उच्च-शिक्षा हासिल करना, अध्यापिका, प्रोफ़ेसर, प्रशासनिक अधिकारी, राजनीतिक नेता आदि पदों पर पहुँचना तो बहुत दूर की बात है, वे शायद ही स्कूल-कॉलेज की सीढ़ियाँ भी नहीं देख पातीं | इसलिए मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि जब तक हमारा यह संविधान है, तब तक हमारा स्वतन्त्र वजूद क़ायम है और हमारा आत्मसम्मानपूर्ण जीवन भी…

— कनक लता

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