बतकही

बातें कही-अनकही…

शोध/समीक्षा

‘बंधुआ मजदूर’ बनते शिक्षक और बर्बाद होती शिक्षा

भारत में सरकारी-विद्यालयों का शिक्षक-समाज हमारे देश एवं राज्य सरकारों के लिए आसानी से उपलब्ध ‘बंधुआ मजदूरों’ का ऐसा सुलभ कोष है, जिसका प्रयोग कभी भी, कहीं भी, किसी भी रूप में किसी भी कार्य में किया जा सकता है | टीकाकरण, पल्स-पोलियो अभियान, चुनाव, जनगणना, जानवरों की गणना, दूसरी विभिन्न तरह की अनेक गणनाएँ, मतदाता जागरूकता अभियान....और भी न जाने कितने तरह के कार्य...| इसलिए भारत के सरकारी-स्कूलों का शिक्षक-समाज अपने विद्यालयों में यदा-कदा…

शोध/समीक्षा

सम्पूर्णानन्द जुयाल : शिक्षा-जगत में नई इबारत लिखने की कोशिश में

दुष्यंत कुमार की एक कविता ‘ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो’ की बड़ी मशहूर पंक्ति है ‘कैसे आकाश में सुराख़ हो नहीं सकता, एक पत्थर तबियत से तो उछालो यारो’ ! इस बात को एक अर्थ में सच कर दिखाया है सम्पूर्णानन्द जुयाल ने, जो राजकीय प्राथमिक विद्यालय, ल्वाली (पौड़ी, उत्तराखंड) के सहायक अध्यापक हैं ! इनके संबंध में इसी स्थान पर पहले भी कई लेख प्रकाशित हो चुके हैं, ‘सम्पूर्णानन्द जुयाल…

शोध/समीक्षा

स्कूलों में कार्यक्रमों की रेल और धीरे-धीरे ग़ायब होती शिक्षा

लॉकडाउन के बाद से खुले विद्यालयों में बहुत सारी बातें बहुत ख़ास दिखाई देती हैं— उनमें से एक बहुत विशिष्ट बात है, जो इस लेख का विषय है, वह है सभी विद्यालयों में अनेकानेक प्रतियोगिताओं (चित्रकला, लेख, निबंध, खेल, शब्दावली और दर्ज़नों ऐसी ही प्रतियोगिताएँ) एवं सांस्कृतिक-कार्यक्रमों की बाढ़ और बड़े से लेकर छोटे स्थानीय छुटभैये नेताओं/नेत्रियों की जयंतियों की रेलमपेल; और उन सबकी आवश्यक रिपोर्ट सहित डिजिटल साक्ष्य भी बनाकर शिक्षा-विभागों को भेजने की…

शोध/समीक्षा

सरकारी विद्यालयों की पाठ्य-पुस्तकें एवं पाठ्यक्रम

पिछले दो दशकों से लेकर वर्तमान तक हमारे देश में सरकार एवं शिक्षा-मंत्रालयों द्वारा संचालित विभागों ने सरकारी-विद्यालयों में बच्चों के पढ़ने-लिखने के लिए जो पुस्तकें निर्मित की हैं, उनको देखना काफ़ी दिलचस्प है | कुछ निजी महँगे विद्यालयों द्वारा अपने यहाँ इन पुस्तकों को तो शामिल ही नहीं किया जाता है | और जहाँ ये शामिल हैं, तो वहाँ भी गौण रूप में; और मुख्य रूप से वहाँ कुछ अन्य पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं,…

शोध/समीक्षा

नवाचारों की भीड़ में क़िताबों से बढ़ती दूरियाँ

‘नवाचार’ एक ऐसा ज़रिया हैं, जिनके माध्यम से विद्यालयों में आसानी से एवं रोचक तरीक़ों से बच्चों को बहुत सारी चीजें हँसते-खेलते पढ़ाया जा सकता है | यही कारण है कि भारत ही नहीं दुनिया के सभी देश, जो ख़ुशनुमा माहौल में बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की वक़ालत करते हैं एवं उसके लिए कोशिश करते है, इन नवाचारों को बहुत महत्त्व देते हैं | लेकिन एक बात यहाँ बहुत ध्यान से समझने की है... वह…

शोध/समीक्षा

जी हाँ, आपके नाम में बहुत कुछ रखा है !

हिंदी उपन्यासकार भगवान सिंह ने अपने उपन्यास ‘अपने-अपने राम’ में एक पात्र के हवाले से लिखा है—“वसिष्ठ के लिए शूद्र मनुष्य होते ही नहीं | उनका कोई सम्मान नहीं होता | अपमान से उन्हें पीड़ा नहीं होती | उनके लिए गर्हित से गर्हित शब्द और संबोधन प्रयोग में लाये जा सकते है | नहीं संबोधन ही नहीं उन्हें अपना नाम तक ऐसा रखने का अधिकार नहीं जो घृणित न हो | शूद्र का नाम जुगुप्सित…

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