बतकही

बातें कही-अनकही…

कविता

एक था अँगूठा

एक था अँगूठा... जो हर रोज़ चुनौती देता था राजपुत्रों की दिव्यता और अद्वितीयता को राजमहलों की एकान्तिक योग्यता को...!!! पुरोहित चौंके, गुरू अचंभित... उस ‘नाक़ाबिल’ अँगूठे से डर गए सभी दिव्यदेहधारी राजगुरु अतिविशिष्ट... सर्वश्रेष्ठ गुरु द्रोणाचार्य भी...! भविष्य की किसी आशंका से...!!! उस ‘जाहिल’ अँगूठे से घबराए सभी राजपुत्र... चिंतित, हैरान औ’ परेशान सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी अर्जुन भी...! राज्य सचेत औ’ सचेष्ट कर्तव्यनिष्ठ, लोक-कल्याणकारी वह रोकने को अनिष्ट कोई भविष्य में गुरु को सौंप कर्तव्य…

कविता

मिट्टी की रोटियाँ

क्या कभी मिट्टी की रोटियाँ खाई हैं ? कैसी लगती हैं वे रोटियाँ स्वाद में ? क्या भूख मिट जाती हैं उनसे ? उन आदिवासियों का दावा तो यही है...! रिसर्च में भी साबित हो गया कि भूख मिटाने में सक्षम हैं वे रोटियाँ मिट्टी वाली सभी आवश्यक पोषक तत्व भी देती हैं शरीर को, ये रोटियाँ यदि रोज़ खाई जाएँ उन्हें...! क्या उन रोटियों को रोज़ खाकर देखी हैं उन शोधकर्ताओं ने ? क्या…

कविता

भूख-एक

वह पूछ रहा था सबसे भीड़ में खड़ा— ‘संसार की सबसे बड़ी समस्या क्या है?’ ‘साम्प्रदायिकता’ एक ने कहा, उभरता हुआ नेता था वह ‘बेरोज़गारी’ दूसरे का स्वर था, हाथ में फ़ाइल थामे एक युवक ‘ग़रीबी’—तीसरा बोला, एक रिक्शाचालक ‘प्रेम’ चौथा भी बोल पड़ा, जो शायद दिल टूटा प्रेमी था तभी भीड़ में से एक अस्फुट-सी आवाज़ आई, बहुत धीमी— ‘भूख !’ सबकी आँखें मुड़ गईं उस आवाज़ की ओर— वह साक्षात् वहाँ एक बालक…

कविता

कस्तूरबा का सवाल

सत्य के जो प्रयोग आपने किए थे, ‘राष्ट्रपिता’ जिसमें शामिल थे आपके कामुक-प्रयोग भी जिसके लिए आपने ली थी सहायता अपनी सेविका स्त्रियों की मैं सहमत नहीं हूँ उनसे ! घृणित हैं वे कामुक-प्रयोग ! और आपका समाज के सामने मुझे ‘बा’ कहना— ‘बा’ अर्थात् ‘माँ’ ! अपनी इस ‘महानता’ को खूब प्रचारित किया आपने और महान बन गए, सबकी नज़रों में ! सबने श्रद्धा से कहा—- ‘बापू’ कितने महान हैं, पत्नी को भी ‘माँ’…

कविता

काली बरफ

रचनाकार— अंजलि डुडेजा 'अभिनव' बहुत बुरा लगता है, जब जंगल जलाए जाते हैं धुंए का वो गुबार बहुत बुरा लगता है। कितने मासूम जंगली जानवर चिड़ियों के घोंसले घोंसलों में नन्हें बच्चे उस आग में जल जाते हैं तब बहुत बुरा लगता है। बहुत बुरा लगता है दावानल जब वह नन्हे पेड़, कोमल पौधे और हरी घास लील जाता है आग का वो सैलाब, छोड़ जाता है अपने पीछे धुंए की गंध जिस में मिली…

कविता

बेटी की पुकार

लेखिका— अंजलि डुडेजा ‘अभिनव’ मां, मैं तो बेटी हूं तेरी, मुझे बचा ले। कोई गलती नहीं मेरी, मुझे बचा ले। मां का नाम है ममता, फिर क्यों है ये विषमता? बेटा तेरे कलेजे का टुकड़ा, मेरे लिए दिल क्यों न उमड़ा? तू क्यों हुई इतनी बेदर्द, मैं तो बेटी हूं तेरी मुझे बचा ले। मुझसे ये घर महक उठेगा, उपवन सारा चहक उठेगा; तेरा सारा काम करूंगी, तुझको मैं आराम भी दूंगी; घर आंगन में…

कविता

अम्बेडकर ने कब कहा था…

मैंने तो कहा था— शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो ! ये तीन मंत्र निचोड़ थे, मेरे जीवन भर के परिश्रम और संघर्षों के जिन्हें मैंने तुमको दिया था अनमोल धरोहर के रूप में ! ताकि तुम भी अधिकार पा सको — अपने मानव होने के | सम्मान और पहचान मिल सकें — तुम्हारी संस्कृति एवं सभ्यता को भी | और तुम भी जी पाओ — एक सम्मानजनक मानव-जीवन...! मैंने कहा था— ‘शिक्षित बनो’... तो…

कविता

कृष्ण और कृष्णा

एक बात सच-सच बताओगे, सखा...? देखो फिर से अपनी मोहक मुस्कान से टाल मत देना... जानती हूँ तुम्हें, और तुम्हारी रहस्यमयी मुस्कान को भी... ...तो मुझे बताओ जरा... कि क्यों कहा था तुमने उस दिन कि मेरी आस्था ही तुम्हारी आत्मा का पोषण करती है...? गढ़ता है मेरा विश्वास, तुम्हारे व्यक्तित्व को...? जबकि मैं तो स्वयं तुम पर आश्रित हूँ, सखे | करती हूँ तुमपर विश्वास... निश्छल... कि मेरी आस्था है तुमपर... अटूट...! हाँ, सखे...!…

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