बतकही

बातें कही-अनकही…

भारत में काफी समय से यह प्रचारित किया जाता रहा है कि यहाँ मुसलमानों ने हिन्दुओं को नीचा दिखाने और अपमानित करने के लिए ‘लव-जिहाद’ को अपना एक कारगर हथियार बनाया | लेकिन सच्चाई कुछ और ही है | हालाँकि भारत में सबसे पहले किस व्यक्ति ने अपने दुश्मनों या प्रतिद्वंद्वियों को हराने, नीचा दिखाने और समाज में अपमानित करने के लिए ‘स्त्री-पुरुष-प्रेम’ को अपना हथियार बनाया होगा, यह तो पता नहीं; लेकिन भारत-भूमि पर प्रामाणिक रूप से सबसे पहले यह काम करते हुए आर्य जातियाँ ही दिखाई देती हैं; वह भी आज से 3,500 साल से भी पहले से, अर्थात् ईसा से 1500 साल पहले से, जब आर्यों के कबीले आक्रमणकारी के रूप में यहाँ आ रहे थे…

जब आर्यों के कबीलों ने लड़ते-झगड़ते हुए एशिया के विविध स्थानों (उत्तर-एशिया, पश्चिम-एशिया, मध्य-एशिया आदि) से भारत का रुख किया; तो वे एक साथ किसी समुद्री सुनामी की तरह यहाँ नहीं आए, बल्कि लहरों की तरह आए; एक-दूसरे से अलग-अलग, अलग-अलग समय में, अलग-अलग जत्थों या समूहों में, अपने-अपने कबीले के साथ— जैसे कारवाँ चलते हैं | असल में आर्यों का समाज पचासों कबीलों में बँटा था, जिसे वे ‘जन’ कहते थे | हर कबीले में सवर्णों की चारों जातियाँ रहती थीं; जिसमें ऊपर के तीन तो आर्य ही थे, जबकि आर्य अपने रास्ते में पड़नेवाली संस्कृतियों-समाजों से संघर्षों के दौरान उनके जिन लोगों को बंधक बना लेते थे, उनको वे अपनी वर्णव्यवस्था में चौथी जाति ‘शूद्र’ में रख देते थे, जिनका काम ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करना था | भारत पहुँचने पर यहाँ के भी पराजित और बंदी लोगों को आर्यों ने इसी श्रेणी में रखा |

भारत में भी वे अपने-अपने कबीले यानी ‘जन’ के साथ ही आए | भारत पहुँचने के पहले तो उनके आपसी लड़ाई-झगड़े होते ही थे, जिससे ऊबकर, थककर और पराजित होकर भी बहुत सारे कबीलों ने अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित ठौर की तलाश में भारत का रुख किया | लेकिन भारत आकर भी उनकी आपसी लड़ाइयाँ ख़त्म नहीं हुईं | क्योंकि हर आर्य-कबीले को बेहतर भूभाग और अधिक संसाधन की कामना थी, सभी को एक-दूसरे के पशुधन और दास हड़पने, छीनने या चुराने थे | इसलिए उनके झगड़ों के प्रमुख कारणों में ये ही कारण थे— अर्थात् अधिक-से-अधिक बेहतर, सपाट, साफ़-सुथरी और रहने के लिए अनुकूल भूभागों पर कब्ज़ा करना; एक-दूसरे के पशुओं और दासों को छीनना, अन्य संसाधनों आदि पर कब्ज़ा करना | वे नदियों के पानी पर कब्जे के लिए भी आपस में लड़ते थे |

इसके अलावा भी उनकी लड़ाइयों के कई और दिलचस्प कारण होते थे | जिनमें से एक महत्वपूर्ण कारण था, अपने कबीले में विभिन्न परिवारों का पुरोहित और कबीले के राजा का ‘राजपुरोहित’ पद पाने के लिए ब्राह्मणों और क्षत्रियों का आपसी संघर्ष | इस झगड़े की शुरुआत कब हुई, यह तो पता नहीं, लेकिन भारत में आर्यों के आने के साथ ही ये दोनों जातियाँ ‘पुरोहित’ पद के लिए लड़ती-झगड़ती दिखाई देने लगीं |

इन तमाम तरह की लड़ाइयों को जीतने के लिए वे कई तरीके अपनाते थे | उन्हीं में से एक तरीका था, स्त्री-पुरुष-प्रेम को जरिया बनाना; आर्यों, यानी वर्त्तमान सवर्णों की आधुनिक-भाषा में कहें, तो ‘लव-जिहाद’ | असल में कई ताकतवर पुरुष (जैसे राजा, पुरोहित) अपने दुश्मनों की बेटियों, बहनों, पत्नियों, माँओं आदि को —खासकर अविवाहित बहनें और बेटियाँ आदि— अपने प्रेम के झाँसे में फँसा लेते थे और उनसे यौन-सम्बन्ध बनाते थे | जब महिला गर्भवती हो जाती थी, तब वे उसे छोड़कर चले जाते थे | अंत में महिला को अपनी संतानों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी अकेले ही उठानी पड़ती थी | लेकिन प्रेमी-पुरुष द्वारा ऐसा करने का एक और उद्देश्य होता होता था, उसका प्रेमी अपनी प्रेमिका स्त्री को चरित्रहीन और उसकी संतान को समाज के सामने ‘अवैध’ या ‘नाजायज़’ घोषित करने और उसको तमाम अधिकारों से वंचित करने की कोशिश करता था | इसका उदाहरण दुष्यंत-शकुंतला का सम्बन्ध है |

कभी-कभी आर्य-पुरुष अपने शत्रुओं की बहन-बेटियों को उनके परिवारों की नज़र से बचाकर या उनके सामने से ही अपने साथ भगाकर या जबरन उठाकर ले जाते थे; ताकि लड़की के परिवारवालों को नीचा दिखा सकें और परोक्ष रूप से यह साबित कर सकें कि लड़की-पक्ष उस पुरुष के सामने कितना कमजोर और बेबस है | जैसे कृष्ण द्वारा अपने शत्रु जरासंध के अधीनस्थ राजा भीष्मक की बेटी और रुक्मी की बहन रुक्मिणी को भगा या उठा ले जाना | आगे चलकर आर्यों की इस परिपाटी को राजपूतों ने भी अपनाया; जैसे पृथ्वीराज अपने सगी मौसी के बेटे और अपने मौसेरे भाई जयचंद की बेटी संयोगिता को भगा ले गया, जो उसकी भतीजी अर्थात् बेटी जैसी थी |

इसके अलावा आर्यों के हजारों-लाखों ऋषि-मुनियों, राजाओं और सामान्य आर्य-पुरुषों ने भी भारत के मूल-निवासियों की बहन-बेटियों से और कभी-कभी तो छोटी-छोटी बछ्सियों से भी बलात्कार किए; कभी उनके परिजनों से छुपकर, तो कभी उनका सामूहिक नरसंहार करने के दौरान; जिसकी परम्परा का निर्वाह आज भी आर्य और उनके पालतू ‘राजपूत’ और ‘ओबीसी’ किसी दंगे के दौरान, या दलितों-आदिवासियों के दमन के दौरान करते हैं | प्राचीनकाल में जब आर्यों के संघर्ष यहाँ के मूलनिवासियों से हो रहे थे, तब यह चरम पर था | आर्य अपने शत्रु मूल-निवासियों से बदला लेने और उनको नीचा दिखाने के लिए उनकी बेटियों को अकेले में दबोचते थे और जबरन यौन-सम्बन्ध बनाते थे | जैसे ऋषि पराशर ने मछुआरों के नायक की किशोरी बेटी मत्स्यगंधा से गंगा नदी के बीच धार में धुंध का फायदा उठाकर बलात्कार किया | बाद में ये ऋषि-मुनि अपने आसपास की मूल-निवासी लड़कियों को लोभ की नज़र से भी देखने लगे और उनके साथ कभी जबरन, तो कभी प्रेम का स्वांग करते हुए यौन-सम्बन्ध बनाने लगे; जैसे शांतनु-सत्यवती कथा |

कुल मिलाकर ऐसे हज़ारों उदाहरण भारतीय इतिहास में दर्ज हैं, वह भी आर्यों द्वारा रचित उनके अपने ही संस्कृत-ग्रंथों में, जिनको आर्यों ने बड़ी चतुराई से प्रेम-कहानियाँ कहकर अपनी और वंचितों की आनेवाली पीढ़ियों को सुनाने के लिए अपने ग्रंथों में लिखा |

इसके अलावा आर्य-पुरुषों की यौन-भूख मादा-पशुओं और मादा-वन्यजीवों को भी मिटानी पड़ती थी, जिसका एकदम स्पष्ट वर्णन उनके संस्कृत-ग्रंथों में किया गया है | तात्पर्य यह कि ऋग्वेद सहित अनेक संस्कृत-ग्रंथों में बताया गया है कि आर्य-पुरुष को किन बीमारियों के इलाज के लिए हिरनी, घोड़ी, कुतिया, गाय आदि जैसे मादा जानवरों में से किसके साथ कब यौन-सम्बन्ध बनाना चाहिए | इन संस्कृत-ग्रंथों में ऐसे सैकड़ों उदाहरण दर्ज हैं, जिनमें कोई ऋषि या राजा किसी मादा-जानवर के साथ यौन-सम्बन्ध बनाता हुआ देखा जा सकता है | लेकिन चूँकि सभ्यताओं के विकास के साथ-साथ ऐसे कुकृत्यों के लिए समाज में स्वीकार्यता कम होने लगी और समाज के अच्छे-खासे हिस्से ने इनका विरोध शुरू किया, तब संस्कृत-ग्रंथकारों ने अपने पूर्वज-आर्यों की इज़्ज़त बचाने के लिए यह कहानी बनानी शुरू कर दी कि वे मादा-जानवर असल में कोई जानवर नहीं बल्कि उन ऋषियों और राजाओं की पत्नियाँ थीं, जिन्होंने सहवास के लिए जानवर का रूप धारण किया था | जैसे ऋषि किंडम/किंदम द्वारा एक हिरनी से यौन-सम्बन्ध बनाना; इसी यौन-सम्बन्ध के दौरान पांडु ने उस हिरनी को तीर मार दिया था, जो झाड़ियों में छुपकर हिरनी के साथ यौन-क्रिया करते ऋषि किंडम को भी लग गई, जिसके बारे में यह कथा कही जाती है कि ऋषि और उनकी पत्नी हिरन-हिरनी बनकर सहवास कर रहे थे |

इस लेख की श्रृंखला में आनेवाले लेखों में कुछ ऐसी ही तथाकथित प्रेम-कहानियाँ आगे आएँगी, जो आर्यों द्वारा भारत में ‘लव-जिहाद’ का खेल खेले जाने की कहानी बताएँगी | जिसमें अपने शत्रुओं को फाँसने के लिए अपनी स्त्रियों को कभी एक चारे की तरह इस्तेमाल किया गया, कभी शत्रुओं को नीचा दिखाने के लिए उनकी लड़कियों का अपहरण किया गया या जबरन उठा लिया गया, कभी उन्हें बंधक बनाया गया, तो कभी उनको अपने लिए भोग की वस्तु की तरह देखा गया, तो कभी शक्तिशाली ताकतों से अपना संबंध जोड़कर अपनी ताक़त बढ़ाई गई तो कभी शत्रु के विरोध को कम करने के लिए उनकी लड़कियों से शादी की गई | इसलिए संस्कृत-ग्रंथों में आई ये प्रेम-कहानियाँ असल में प्रेम-कहानियाँ न होकर आधुनिक आर्यों (सवर्ण) की भाषा में ‘लव-जिहाद’ थीं…

सन्दर्भ-ग्रन्थ

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  2. भारतीय संस्कृति के स्रोत, भगवतशरण उपाध्याय, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली-55, संस्करण-अक्टूबर 1991
  3. भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, भगवतशरण उपाध्याय, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, (प्रा.) लिमिटेड, नई दिल्ली-55, संस्करण-1978
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  8. रोमिला थापर, भारत का इतिहास, राजकमल प्रकाशन, 1-बी,नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली, संस्करण- 2001(पेपरबैक)
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  10. संगम और संघर्ष, रांगेय राघव, किताब महल, इलाहबाद, प्रथम संस्करण- 1953
  11. प्राचीन भारत में दास-प्रथा (पालि और संस्कृत पुस्तकों के अनुसार), देव राज चानना (अनुवाद- डॉ. शम्भुदत्त शर्मा), हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, 10 केवेलरी लाइन, दिल्ली- 110007, संस्करण- 2009
  12. ऋग्वेद
  13. ऐतरेय ब्राह्मण
  14. महाभारत
  15. शिव पुराण
  16. विष्णु पुराण
  17. हरिवंश पुराण
  18. वाल्मीकि रामायण …..क्रमशः

—कनक लता

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