बतकही

बातें कही-अनकही…

(शत्रु को नीचा दिखाने हेतु स्त्री एक माध्यम)

पिछले लेख में यह देखा गया कि किस तरह भरत-कबीले के राजपुरोहित-पद पर वशिष्ठ की नियुक्ति का विरोध करने और बदले में ‘दाशराज्ञ-युद्ध’ छेड़ने के लिए ज़िम्मेदार विश्वामित्र को घेरने और मारने के लिए वशिष्ठ-दुष्यंत ने मेनका नाम की एक देव-वेश्या (अप्सरा) का प्रयोग किया था; लेकिन वे अपनी उस योजना में सफ़ल नहीं हुए | तब उन्होंने विश्वामित्र की बेटी, जो अप्सरा मेनका से ही जन्मी थी और जिसे छोड़कर वह चली गई थी, को विश्वामित्र से बदला लेने का माध्यम बनाया; जो शत्रु को नीचा दिखाने के लिए उसकी स्त्रियों को माध्यम बनाए जाने का ठोस उदाहरण है |

मेनका ने विश्वामित्र से जन्मी अपनी बेटी को कण्व-ऋषि के आश्रम के नजदीक छोड़ा था, जिसके चारों ओर मोर थे | ऋषि कण्व ने शिशु को अपनी कन्या की तरह अपने आश्रम में ले जाकर पाला और नाम दिया—शकुंतला; क्योंकि उसकी रक्षा मोरों (शकुन) ने की थी | दुष्यंत-वशिष्ठ को भी मेनका से विश्वामित्र की एक बेटी के जन्म की बात किसी तरह मालूम हो गई, जो ऋषि कण्व के आश्रम में पल रही थी | तब उन्होंने एक नई चाल सोची होगी | राजा ने कण्व ऋषि को भरपूर दान-दक्षिणा देकर उससे नजदीकी बढ़ाई और उसके आश्रम में आने-जाने लगा; ताकि लड़की के बड़ी होने पर नजर रख सके |

लड़की के किशोर-उम्र में प्रवेश के साथ ही दुष्यंत-वशिष्ठ ने अगला पासा फेंका; किशोरी-शकुंतला को प्रेमजाल में फाँसने का | इसके लिए राजा ने वह समय चुना, जब ऋषि कण्व आश्रम में नहीं थे, बल्कि कई दिनों के लिए कहीं बाहर गए थे | दुष्यंत यही सही समय जानकर ऋषि से मिलने के बहाने आश्रम में पहुँचता है, जहाँ वह जानबूझकर शकुंतला पर अपने प्रेम का जादू चलाता है | अपने ही समाज के आर्य-पुरुषों की लड़ाइयों और छल-प्रपंचों से अनजान किशोरी-शकुंतला भावनाओं में बहकर उसकी ओर आकर्षित हो जाती है | उस नादान-किशोरी शकुंतला की मासूम कोमल-भावनाओं से भरतवंशी-दुष्यंत एकांत में खेलने लगता है | अपने प्रेम की सच्चाई का भरोसा दिलाने के लिए वह प्रेम के प्रतीक के रूप में उसको अपनी एक अँगूठी भी देता है | अबोध बालिका शकुंतला उसपर विश्वास कर लेती है और उसके झांसे में आ जाती है | आश्रम में रहकर दुष्यंत उससे कई दिनों तक यौन-संबंध बनाता है और जब वह गर्भवती हो जाती है, तो वह अपनी योजना को पूर्ण हुआ जानकर वहाँ से अपनी राजधानी लौट जाता है; जिसके लिए वह कण्व ऋषि के वापस आने में विलम्ब होने और स्वयं राजधानी से दूर रहने पर राजकार्य में बाधा पड़ने का बहाना बनाता है और बाद में आश्रम आकर ऋषि के दर्शन करने की बात कहता है |

जब कण्व वापस आश्रम आते हैं, तो उन्हें शकुंतला की गर्भावस्था का पता चलता है, तो वे उसे अपने कुछ शिष्यों के साथ दुष्यंत के पास भेजते हैं | यहाँ यह भी संभव है कि कण्व ऋषि भी दुष्यंत-वशिष्ठ के इस षड्यंत्र में शामिल हों और उन दोनों की योजना के ही अनुसार जानबूझकर कई दिनों के लिए आश्रम से बाहर चले गए हों, ताकि दुष्यंत को शकुंतला को अपने प्रेमजाल में फाँसने का पूरा-पूरा मौक़ा मिल सके | इसीलिए जिस शकुंतला को कण्व ने अपनी संतान की तरह पालने का दावा किया था, उसी शकुंतला के साथ वे दुष्यंत के दरबार में उसके अधिकारों की मांग करने के लिए नहीं गए | क्योंकि यदि वे भी दुष्यंत की कूट-योजना में शामिल थे, तो उन्हें पता ही होगा कि दुष्यंत क्या करने वाला है, अर्थात् शकुंतला का तिरस्कार | और यदि कण्व की झूठी-प्रार्थना पर भी दुष्यंत किसी भी तरह शकुंतला को नहीं अपनाता, तो निश्चित रूप से यह सीधे-सीधे कण्व ऋषि का भी तिरस्कार और अवहेलना होती | तब ऋषि कण्व का आर्यों-अनार्यों के बीच क्या सम्मान और रुतबा बचता? इसलिए ज्यादा अच्छा यही था कि शकुंतला के साथ आश्रम के किसी साधारण व्यक्ति को ही भेजा जाए | इससे साँप भी मर जाता और लाठी भी नहीं टूटती; दुष्यंत-वशिष्ठ का बदला भी पूरा हो जाता और कण्व की सामाजिक-प्रतिष्ठा को आँच भी नहीं आती |

अब जो भी हुआ हो, लेकिन दुष्यंत अपने दरबार में शकुंतला को पहचानने से इंकार कर देता है | शकुंतला के बहुत अनुनय-विनय करने और दुष्यंत द्वारा उसे दी गई राजसी-अँगूठी दिखाने पर भी दुष्यंत उसे धर्मपत्नी के पद पर स्वीकार नहीं करता; क्योंकि उसका उद्देश्य ही था बेटी के जरिए उसके पिता विश्वामित्र को नीचा दिखाना और समाज में अपमानित करना |

आज के इस वैज्ञानिक-तार्किक युग में यह कैसे यकीन किया जा सकता है कि राजा कुछ ही दिनों, सप्ताहों या महीने पहले जिस लड़की से प्रेम करता था, उसी लड़की को और उसे दी हुई अपनी ही अँगूठी को न पहचान सके? यह तो तभी हो सकता है, जब राजा आए दिन नई-नई लड़कियों से प्रेम करता हो और उनसे यौन-संबंध बनाने के लिए उनको मूर्ख बनाकर अपने विश्वास में लेने की खातिर अपनी अँगूठी उन सभी को बाँटता फिरता हो | ऐसी ही स्थिति में राजा को यह याद नहीं रह सकता था कि उसने किस लड़की को किस स्थान पर और किस दिन अपनी अँगूठी दी थी और उससे प्रेम किया था | केवल ऐसी ही स्थिति में शकुंतला को दी गई अपनी ही अँगूठी को दुष्यंत नहीं पहचान सकता था, केवल इसी स्थिति में उसका भूल जाना स्वाभाविक लग सकता है | लेकिन दुष्यंत-शकुंतला-प्रेमकथा में ऐसा कोई विवरण नहीं मिलता कि दुष्यंत ने हर दिन नई-नई लड़कियों को अँगूठियाँ दी और उनसे प्रेम किया | इसलिए यही अधिक विश्वसनीय लगता है कि दुष्यंत ने जानबूझकर वशिष्ठ के साथ मिलकर साजिश के तहत अनुभवहीन नादान-किशोरी शकुंतला की भावनाओं का फायदा उठाकर उसके पिता से बदला लेने की नीयत से अपनी दी गई अँगूठी न पहचानने का नाटक किया |

कण्व के शिष्य भी रोती हुई बालिका शकुंतला को उसी हाल में वहीं छोड़कर चले जाते हैं | डरी-सहमी, घबराई, रोती हुई बालिका गर्भ का भार ढोती हुई दर-दर अकेली भटकती है | अवश्य उसके पिता को इस सम्पूर्ण छल का पता चल गया होगा और वह स्वयं को गुप्त रखते हुए अपने शिष्यों की सहायता से अपनी बेटी को सबकी आँखों से बचाकर जंगल में मछली पकड़नेवाले मूलनिवासी-आदिवासियों की बस्ती के समीप ले गया होगा और वहीं उसके सुरक्षित रहने और उचित देखभाल एवं पालन-पोषण की व्यवस्था की होगी | जब शकुंतला को बेटा पैदा हुआ, तो विश्वामित्र ने दुष्यंत-वशिष्ठ की बाजी पलटने की रणनीति बनाई | उसने अपनी बेटी को कहा कि वह अपने नवजात बेटे का नाम ‘भरत’ रखे, क्योंकि यही दुष्यंत के कबीले का नाम था | असल में उस समय यह परम्परा थी कि लोग अपने बच्चों के नाम अपने कबीले, कुल, राज्य, परिवार, माता-पिता आदि के नाम पर रखते थे; जैसे गांगेय (गंगापुत्र भीष्म), कौन्तेय (कुंती के बेटे), पांडव (पांडु के बेटे), राधेय (राधा का बेटा कर्ण), द्रौपदी (राजा द्रुपद की बेटी), गांधारी (गांधार राज्य की राजकुमारी), कौरव (कुरुवंश के लोग), भारत (भरत-कुल के पांडुपुत्र अर्जुन का नाम) आदि |

पिता-पुत्री विश्वामित्र और शकुंतला को विश्वास था कि बेटे का नाम ‘भरत’ रखने से जब-जब बालक को ‘भरत’ कहकर पुकारा जाता, तब-तब आसपास मौजूद समाज और लोगों के मन में कभी तो यह संदेह पैदा होता कि हो-न-हो यह बालक ‘भरत-कबीले’ के किसी पुरुष का है | कभी तो आर्यों का भी जन-समाज यह मानने लगता कि दुष्यंत एक लम्पट पुरुष है, जिससे आर्य-प्रजा की बेटियाँ भी सुरक्षित नहीं हैं | और कभी तो राजा दुष्यंत तक ये ख़बरें पहुँचती ही | और जब यह बात बार-बार दुष्यंत तक पहुंचती, तो निश्चित रूप से इसका उसपर अत्यधिक मानसिक और सामाजिक दबाव पड़ता ही | क्या इसी वजह से दुष्यंत आर्य-जनों के बीच अपना और अपने कुल/कबीले का सम्मान बचाने के लिए, और साथ ही आर्य-अनार्य प्रजा में अपने डर और दबदबे को कायम रखने के लिए भी, शकुंतला और भरत को स्वीकार करने को विवश नहीं हुआ होगा…?

अंततः पिता-पुत्री विश्वामित्र-शकुंतला द्वारा बेटे का नाम ‘भरत’ रखने की रणनीति कामयाब हुई | राजा दुष्यंत विवश हुआ | शकुंतला ‘भरत-कबीले’ (नया नाम ‘कुरु-वंश) की रानी बनी और उसका बेटा भरत अपने पिता दुष्यंत और उसके ‘भरत’ या ‘कुरु’ कबीले’ का अगला राजा बना | आगे चलकर इसी भरत के छोटे-से राज्य को ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ में ‘भारत’ कहा गया |

इस तरह दुष्यंत-वशिष्ठ की षड्यंत्र भरी सारी बाजी विश्वामित्र ने अपनी बेटी की सहायता से पलट दी | लेकिन यह वास्तविक घटना आर्यों द्वारा भारत में ‘लव-जिहाद’ का प्रपंच फैलाने का बेहद ठोस, उत्कृष्ट और प्रामाणिक दस्तावेज बनकर उनके ही सर्वाधिक सम्मानित ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ के 7वें मंडल में और अन्य कई संस्कृत-ग्रंथों में दर्ज हो गई |

सन्दर्भ

  1. भगवतशरण उपाध्याय, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1978
  2. भारतीय संस्कृति के स्रोत, भगवतशरण उपाध्याय, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1991
  3. डी.एन.झा, प्राचीन भारत : एक रुपरेखा, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 2000
  4. ऋग्वेद
  5. ऐतरेय ब्राह्मण
  6. महाभारत
  7. शिव पुराण
  8. विष्णु पुराण
  9. हरिवंश
  10. वाल्मीकि रामायण

—कनक लता

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