बतकही

बातें कही-अनकही…

(शत्रु को फाँसने हेतु स्त्री एक चारा)

पिछले लेख में यह देखा गया कि किस तरह अनेक कारणों से आर्यों के कबीले आपस में ही लड़ते-झगड़ते रहते थे | यहाँ आर्यों के इसी झगड़े की पृष्ठभूमि में ‘विश्वामित्र-मेनका’ की कहानी को एक नए तरीके से देखने की कोशिश होगी, जिसमें दुश्मन को फाँसने के लिए स्त्री को एक ‘चारे’ की तरह प्रयोग किए जाते देखा जा सकता है; जिस तरह शिकारी किसी जंगली जानवर को फाँसने के लिए बकरी आदि जानवर का या मछुआरा मछली को फाँसने के लिए चारा का प्रयोग करता है…

आर्यों के आपसी-संघर्षों का एक कारण था, पुरोहित-पद; अर्थात् अपने कबीले में विविध परिवारों का पुरोहित और कबीले के राजा का ‘राजपुरोहित’ का पद पाने के लिए ब्राह्मणों और क्षत्रियों का आपसी संघर्ष | हालाँकि इसकी शुरुआत कब से हुई, यह तो पता नहीं; लेकिन इतिहासकार मानते हैं कि इस संघर्ष की शुरुआत आर्यों के भारत पहुँचने से पहले ही पश्चिम-एशिया और मध्य एशिया में उनके रहने के दौरान ही हो चुकी हो | भारत पहुँचने के बाद ‘पुरोहित’ पद के लिए ब्राह्मण-क्षत्रिय-संघर्ष अपने चरम पर पहुँचते दिखाई देने लगे, जिसका ठोस गवाह है आर्यों का प्रथम ग्रन्थ ‘ऋग्वेद’ |

दरअसल ‘पुरोहित’ के पद पर ब्राह्मण अब केवल अपना एकाधिकार समझने लगा था और वह ‘ब्राह्मण’ को छोड़कर किसी भी अन्य जाति को इसपर नहीं बैठने देना चाहता था | लेकिन क्षत्रिय कहता था कि यदि क्षत्रिय-वर्ग का कोई आर्य ‘पुरोहित-पद’ पर बैठने की अपनी योग्यता साबित कर दे, तो उसे बैठने का अधिकार है | ऋग्वैदिक-काल से लेकर महाभारत-काल के बहुत बाद तक ‘पुरोहित-पद’ पर अपनी-अपनी दावेदारी स्थापित करने के लिए ब्राह्मणों-क्षत्रियों का यह संघर्ष निरंतर चलता रहा |

इसी ब्राह्मण-क्षत्रिय-संघर्ष के अपने चरम पर पहुँचने का बेहद ठोस प्रामाणिक नजारा हमें भरत-कबीले की दस राजाओं के साथ हुई लड़ाई में देखने को मिलता है, जिसका वर्णन ऋग्वेद के 7वें मंडल में ‘दाशराज्ञ युद्ध’ के नाम से हुआ है | ईसा से 1500 साल पहले भारत आनेवाले आर्यों के कबीलों में सर्वाधिक ताकतवर कबीले थे— भरत, पुरु, यदु, अनु, तुर्वस, द्रुह्यु | इनमें से भरत-कबीले का राजा था सुदास, जिसका राजपुरोहित पहले विश्वामित्र था | विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय था | जबकि उसी कबीले का ब्राह्मण वशिष्ठ ‘राजपुरोहित-पद’ पर खुद बैठना चाहता था, इसलिए उसने राजा सुदास को अपने कुटिल तर्कों से अपने धर्मजाल के फंदे में ऐसा उलझाया कि राजा को अंत में स्वीकार करना पड़ा कि उसके ‘राजपुरोहित-पद’ के लिए वशिष्ठ ही अधिक उपयुक्त है | और राजा सुदास ने ‘भूल-सुधार’ करते हुए विश्वामित्र को ‘राजपुरोहित’ के पद से हटाकर वशिष्ठ को उसपर बिठा दिया |

विश्वामित्र के लिए यह बेहद अपमानजनक था, लेकिन वह राजा की शक्ति के सामने क्या कर सकता था? तत्काल तो वह खून का घूँट पीकर रह गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी | उसने भरत-कबीले और उसके राजा सुदास तथा उसके नए राजपुरोहित वशिष्ठ से बदला लेने के लिए उनके खिलाफ ‘दस राजाओं’ को उकसाया | उन दस राजाओं में पाँच आर्य-कबीले और उनके राजा शामिल थे, जिनको ऋग्वेद ने ‘पंचजन’ कहकर उल्लेख किया है; ये कबीले थे— पुरु, यदु (कृष्ण का वंश), अनु, तुर्वस, द्रुह्यु | शेष पाँच गैर-आर्य कबीले थे, यानी शायद यहाँ के मूल-निवासी या आर्यों के अलावा भारत आनेवाले कोई अन्य कबीले | ये कबीले अलग-अलग कारणों से पहले से ही राजा सुदास और वशिष्ठ से चिढ़े हुए थे, जिसका एक प्रमुख कारण परुष्णी/रावी नदी (वर्त्तमान पाकिस्तान में स्थित पंजाब में) के जल पर सभी का अपना-अपना अधिकार जमाने की कोशिश और उसका उचित बँटवारा न हो पाना भी था | इन दस राजाओं का नायक था पुरुकुत्स, जो पुरु-कबीले का राजा था |

इन्हीं दस कबीलों का युद्ध उसी परुष्णी/रावी नदी के किनारे भरत-कबीले के राजा सुदास से हुआ, जिसे ऋग्वेद में ‘दाशराज्ञ-युद्ध’ कहा गया है | इस युद्ध में राजा सुदास ने अपने विरोधी दस-राजाओं के उस समूह को हरा दिया और इसमें उनका नायक राजा पुरुकुत्स (पुरु-कबीला) मारा गया | उसके पुरु-कबीले को भरत-कबीले में मिला दिया गया | यही दोनों कबीले आगे चलकर ‘कुरु’ कहलाए, जिसके वंशज थे कौरव-पांडव |

युद्ध के ही दौरान वशिष्ठ के कहने पर सुदास अपने विरोधी विश्वामित्र को भी मार देना चाहता था, लेकिन विश्वामित्र बच कर भाग गया और छिप गया | लेकिन युद्ध में अपनी इस जीत के बावजूद भरत-कबीले के शासकों और उनके पुरोहित वशिष्ठ (वशिष्ठ के वंशज भी अपने को ‘वशिष्ठ’ ही कहते थे) की नाराजगी विश्वामित्र (विश्वामित्र के वंशज भी अपने को ‘विश्वामित्र’ कहते थे) के प्रति कम नहीं हुई | शायद इसी कारण विश्वामित्र के उपरोक्त दोनों कार्यों (वशिष्ठ के राजपुरोहित होने पर विश्वामित्र का ऐतराज करना और इस कारण भरत-कबीले के खिलाफ ‘दस राजाओं को उकसाकर भरत-कबीले से लड़वाना) का हिसाब बराबर करने के लिए आगे चलकर भरत-कबीले के शासक दुष्यंत और उसके राजपुरोहित वशिष्ठ ने पहले तो विश्वामित्र को घेरने के लिए मेनका नाम की एक वेश्या भेजी और जब उसमें भी वे सफ़ल नहीं हुए, तो मेनका से उत्पन्न विश्वामित्र की पुत्री शकुंतला को अपने प्रेम के जाल में फँसाया और उसके साथ प्रेम का खेल खेला; अर्थात् वर्त्तमान सवर्णों की भाषा में कहें, तो पिता-पुत्री दोनों ही ‘लव-जिहाद’ के शिकार बनाए गए | यह घटना निश्चित रूप से ‘दाशराज्ञ-युद्ध’ के कुछ ही समय बाद की है, बहुत समय बाद की नहीं |

ऐसा लगता है कि उस युद्ध के बाद विश्वामित्र ने वशिष्ठ-भरत से चिढ़नेवाले कबीलों को अपना समर्थक बनाकर अपने को बहुत शक्तिशाली बनाया | इसलिए वशिष्ठ-भरत के वंशजों शांतनु-वशिष्ठ के लिए भी अपने शुभचिंतकों के सुरक्षित घेरे के बीच रहनेवाले विश्वामित्र को घेरकर काबू में करना और सुरक्षा-घेरे से उसे बाहर लाना इतना आसान नहीं था | इस कोशिश में जब उनके सारे उपाय असफ़ल हो गए, तब अचूक उपाय के रूप में उन्होंने एक स्त्री को चारे की तरह प्रयोग किया | इसके लिए दुष्यंत-वशिष्ठ ने मेनका नाम की एक वेश्या (जिसे आर्यों ने अप्सरा कहा, लेकिन जो काम वेश्याओं का करती थी) उसके पास भेजी | मेनका ने कई दिनों तक विश्वामित्र को रिझाने के लिए उसके इर्द-गिर्द चक्कर काटे और कई दिनों की कोशिशों के बाद विश्वामित्र को अपने यौवन और सौन्दर्य के जाल में फाँसने में क़ामयाब हो गई | विश्वामित्र शत्रुओं के जाल में लगभग फँस गया और मेनका से प्रेम करने लगा और दोनों के बीच यौन-सम्बन्ध भी बनने लगे | लेकिन मेनका की कुछ गतिविधियों से विश्वामित्र को उसपर संदेह हो गया और जब विश्वामित्र ने मेनका से सख्त़ी से पूछताछ की, तो उसने सारा सच उगल दिया | विश्वामित्र को उसका सच पता चलते ही वह उसे छोड़कर वहाँ से किसी अन्य गुप्त या सुरक्षित स्थान पर भाग गया |

इसलिए जो कथा हमें सुनाई जाती है, कि विश्वामित्र की तपस्या से इंद्र का सिंहासन डोलने लगा था और उसने देवगुरु वृहस्पति के परामर्श से विश्वामित्र की तपस्या भंग करने के लिए एक सुन्दर अप्सरा मेनका उसके पास भेजी थी; असल में वह ‘इंद्र’ स्वयं दुष्यंत था और वह ‘वृहस्पति’ स्वयं उसका राजपुरोहित वशिष्ठ | क्योंकि उस समय आर्य-परम्परा के अनुसार आर्य-कबीलों में से सबसे शक्तिशाली कबीले के शासक को ‘इंद्र’ और उसके राजपुरोहित को ‘वृहस्पति’ की पदवी दी जाती थी |

जो भी हो, आर्य इस कथा को हमें जिस भी रूप में सुनाएँ, लेकिन यह काफी स्वाभाविक लगता है कि दुष्यंत-वशिष्ठ ने विश्वामित्र को घेरने के लिए मेनका नाम की एक सुन्दर युवा-स्त्री उसके पास भेजी थी; जिसका एकमात्र उद्देश्य था, विश्वामित्र को प्रेम के जाल में उलझाकर उसे सोचने-समझने से दूर करना, भरमाकर उसे अपने लोगों के सुरक्षित घेरे से दूर करते हुए अकेला अपने स्वामियों वशिष्ठ-शांतनु तक ले जाना या शत्रु को उसका पता देना, ताकि दुष्यंत-वशिष्ठ उसका अंत कर सकें, या मौक़ा मिलते ही स्वयं मेनका ही उसका काम तमाम कर दे |

लेकिन सत्य का पता चलते ही विश्वामित्र उस स्त्री को छोड़कर वहाँ से कहीं और भाग गया और उसकी जान बच गई | तक तक मेनका गर्भवती हो चुकी थी, जिससे विश्वामित्र की बेटी शकुंतला का जन्म होना था | वशिष्ठ-दुष्यंत जब अपनी उपरोक्त योजना में असफ़ल हो गए, तब वे विश्वामित्र को समाज में अपमानित करने और घेरने के लिए उसकी इसी बेटी शकुंतला को अगला निशाना बनाने वाले थे; जिसे ब्राह्मणों ने हमें ‘शकुंतला-दुष्यंत की प्रेम-कहानी’ कहकर हज़ारों बार सुनाई है…

शकुंतला की इस कहानी का विवरण अगले अंक में…

सन्दर्भ ग्रन्थ

  1. भगवतशरण उपाध्याय, भारतीय समाज का ऐतिहासिक विश्लेषण, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1978
  2. भारतीय संस्कृति के स्रोत, भगवतशरण उपाध्याय, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 1991
  3. डी.एन.झा, प्राचीन भारत : एक रुपरेखा, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली, 2000
  4. ऋग्वेद
  5. ऐतरेय ब्राह्मण
  6. महाभारत
  7. शिव पुराण
  8. विष्णु पुराण
  9. हरिवंश
  10. वाल्मीकि रामायण
  • डॉ. कनक लता

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