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खंड-तीन : पुस्तक मेले में ‘मोदी-वंदना’ के निहितार्थ

जैसाकि पुस्तक-मेले से संबंधित पिछले लेखों से आभास मिल रहा है कि 2023 का विश्व पुस्तक मेला (दिल्ली) एक ‘ख़ास प्रभाव’ से आच्छादित रहा, तो स्वाभाविक है कि उस ‘ख़ास प्रभाव’ का असर चारों ओर दिखाई देना ही था | उसी में शामिल है वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यहाँ विविध प्रकार से जबरन ख़ूब अधिक हाईलाइट किया जाना; जिस प्रकार से मौक़े-बेमौक़े पूरे देश में ‘मोदीनामा’ के गीत गाये जा रहे हैं और उनके माध्यम से परदे के पीछे से ‘ब्राह्मणीय-उद्देश्यों को आगे बढ़ाया जा रहा है | दरअसल इस बार के पुस्तक मेले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक स्तर और आगे बढ़कर, अकादमिक स्तर पर भी, ‘मोदी-फैक्टर’ बनाने की कोशिश ख़ूब अच्छी तरह से नज़र आई | यहाँ केवल दो-तीन स्तर की कोशिशों की बात करुँगी |

पहला तो यह कि पूरे मेले में स्थान-स्थान पर नरेंद्र मोदी के बड़े-बड़े पोस्टर और होर्डिंग लगाए गए थे, जो यह बता रहे थे कि यह मेला बहुत ही ख़ास उद्देश्यों से आयोजित किया गया है | उन ख़ास उद्देश्यों में से एक है, नरेंद्र मोदी के माध्यम से प्रकारांतर से आक्रामक हिंदुत्ववाद, आक्रामक राष्ट्रवाद और आक्रामक सनातनी विचारों एवं व्यवस्थाओं को वहाँ आनेवाले दर्शकों के मन में विविध मार्गों से उतारना | ताकि घर लौटने के बाद भी दर्शक अपने बच्चों सहित उन्हीं सब के बारे में सोचें-विचारें और परिवार में बड़ों के साथ-साथ बच्चों से भी उनपर बातचीत और चर्चा करें | इस रूप में शायद ये सभी आक्रामक चीजें (हिंदुत्ववाद, राष्ट्रवाद, सनातनी पुरातन विचार आदि) लोगों के घरों में इस रास्ते से भी प्रवेश कराई जाने की कोशिशें होती दिखाई दी, मीडिया तो इस मामले में अपना काम कर ही रहा है |

इसी कड़ी में नरेंद्र मोदी से लोगों को सीधे-सीधे जोड़ने के लिए एक और उपाय किया गया था, जोकि इस लेख में ऊपर कही गई बात का ही दूसरा विचारणीय बिंदु भी है | मेले में दो स्थानों पर मुझे ‘पीएम मोदी सेल्फी स्टैंड’ नज़र आये, हो सकता है कि अन्य स्थानों पर भी हों, जहाँ मेरी नज़र नहीं पड़ी या जहाँ मैं नहीं जा सकी | वे दोनों सेल्फी स्टैंड भी बड़े लाज़वाब थे | उनमें एक बड़े से फ्रेम के भीतर नरेंद्र मोदी का लगभग आदमकद कटआउट था, जो अपने हाथों में किसी पुस्तक को लिए खड़ा था | उनके बगल का स्थान ख़ाली था, जहाँ कोई भी खड़ा होकर अपनी फ़ोटो खिंचवा सकता था (अपने निजी कैमरे से) | इस प्रकार जो तस्वीर खींची जाती, उसमें वह व्यक्ति नरेंद्र मोदी के साथ किसी पुस्तक को साथ-साथ थामे खड़ा नज़र आता | और लोगों में इस ‘मोदी सेल्फी स्टैंड’ का इतना जबरदस्त क्रेज, जिसे मैं पागलपन कहना ज्यादा ठीक समझती हूँ, दिखा, जिसके आगे पुस्तकों के लिए क्रेज पानी भरता था |

कितने कमाल का प्रयोग था यह ! लोग आभासी रूप से नरेंद्र मोदी से सीधा जुड़ाव का भ्रम बना रहे थे | कुछ साल पहले एक फिल्म आई थी, ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ | उस फ़िल्म में खलनायक बिल्डर लक्की फ़ोटो तकनीक के माध्यम से दुनिया के बड़े-बड़े प्रभावशाली नेताओं, राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों के साथ अपनी तस्वीरें बनवाता था और अपने चारों ओर एक आभासी दुनिया (वर्चुअल) रचकर लोगों को बताता था कि वह कितना पॉवरफुल है, क्योंकि उसके ‘प्रगाढ़ सम्बन्ध’ दुनिया के बड़े-बड़े नेताओं, राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों के साथ हैं; और उससे भी अधिक वह अपने-आप को इस भ्रम में बाँधकर तसल्ली देता था कि इससे उसका दबदबा, सम्मान और रुतबा आसपास के लोगों पर अधिक होगा | इस कोशिश में वह अपने-आप को अति-शक्तिशाली समझने लगा था | क्या कुछ ऐसा ही प्रयोग इस समय नरेंद्र मोदी के ‘सेल्फी स्टैंड’ के माध्यम से किया जा रहा था? यहाँ कुछ तो नरेंद्र मोदी की आत्म-मुग्धता भी नज़र आती है, जिससे वे पिछले डेढ़ दशक से कुछ अधिक ही आवेशित दिखाई देते हैं; तो कुछ अंशों में जनता को भी आत्म-मुग्धता का शिकार बनाने की कोशिशें भी दिखाई दे रही हैं | इस तरह की घातक कोशिशों और प्रयोगों के परिणाम अभी आने बाक़ी हैं | पता नहीं भविष्य का ऊँट किस करवट बैठना चाहता है?

इस मेले में सनातनी-शक्तियों द्वारा नरेंद्र मोदी के माध्यम से तीसरा बड़ा प्रयोग उनपर लिखी गई क़िताबों के माध्यम से किया गया दिखा, वह भी इतने भयानक और ख़तरनाक ढंग से, जिसकी नज़ीर कम ही देखने को मिलती है | दरअसल कई प्रकाशन-संस्थानों के स्टॉलों पर अमित शाह, नरेंद्र मोदी जैसे आक्रामक हिन्दुत्ववादी नेताओं की ‘विजयगाथा’ को केंद्र में रखकर लिखी गई और प्रकाशित हुई दर्ज़नों क़िताबें नज़र आईं, जिनमें नरेंद्र मोदी को प्रमुख रूप से स्थान दिया गया था | उनमें से एक स्टॉल पर बहुत बड़ी संख्या में नरेंद्र मोदी पर लिखी गई क़िताबें नज़र आईं, कम से कम डेढ़ दर्ज़न | कुछ बानगी देखिए——

  1. ‘मोदी विजयगाथा 2019 (प्रदीप भंडारी),
  2. मोदी सक्सेसगाथा (प्रधानमंत्री मोदी के जीवन की 101 प्रेरक कहानियाँ), (रेनू)
  3. समर्थ भारत, विकास की राजनीति (डॉ. विजय सहस्त्रबुद्धि),
  4. सामाजिक समरसता’,
  5. ज्योतिपुंज नरेंद्र मोदी,
  6. भारतबोध का संघर्ष : 2019 का महासमर (डॉ. कुलदीप अग्निहोत्री),
  7. नरेंद्र मोदी के पाँच प्रण (हिमांशु कुमार),
  8. विकासनाम,
  9. नरेंद्र मोदी (कहानी जनता के प्रधानमंत्री की),
  10. नए भारत, राष्ट्र साधक नरेंद्र मोदी (आधुनिक भारत के शिल्पकार),
  11. चुनाव 2019 : कहानी मोदी 2.0 की (अकु श्रीवास्तव),
  12. भारत कैसे हुआ मोदीमय (संतोष कुमार),
  13. साधू से सेवक (मंजीत नेगी) ….आदि

ये तो कुछ उदाहरण भर हैं, और भी कई पुस्तकें नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर लिखी गई थीं, जो वहाँ प्रदर्शित की गई थीं | इन सभी पर नरेंद्र मोदी का चस्पा किया गया चेहरा पूरी गर्वीली चमक के साथ चमक रहा था और आनेवाले समय के भारत की तक़दीर के बारे में घोषणा-सी कर रहा था कि वह किस दिशा में ले जाए जाने को प्रतिबद्ध है | एक बात तो तय है कि उन ख़ास पुस्तकों के कुछ ख़ास उद्देश्य प्रतीत हो रहे थे | उनमें से एक शायद यह था कि नरेंद्र मोदी के माध्यम से प्रकारांतर से आक्रामक हिंदुत्ववाद, आक्रामक राष्ट्रवाद और आक्रामक सनातनी विचारों एवं व्यवस्थाओं को शिक्षा की दुनिया में भी इतनी गहराई से उतार देना ही उनकी कोशिश है | ताकि आने वाली पीढ़ियाँ स्वत्रन्त्र चिंतन करना, अपनी तार्किक बुद्धि से सोचना-समझना और व्यवहार करना यथासंभव भूल सकें और भेड़ों की तरह वही सोचें, समझें और करें, जैसा सत्ताधारी व्यवस्था चाहे, जैसा ‘हिन्दूराष्ट्र’ और ‘आर्य-सत्ता’ के पुरोधा चाहें, जैसा सनातनी-वर्चस्ववादी वर्ग चाहे…|

इस पुस्तक मेले ने बता दिया है कि इस बार ‘हिन्दूराष्ट्र’ और ‘रामराज्य’ के पुरोधा अच्छी तरह कमर कसकर तैयार हैं; जिनका एकमात्र उद्देश्य है ब्राह्मण-वर्चस्व, ब्राह्मण-शासन और ब्राह्मण-सत्ता की पुनर्स्थापना; जिसमें महिलाएँ, दलित, आदिवासी, ओबीसी, मुस्लिम, ईसाई न केवल ‘अ-नागरिक’ होंगे, बल्कि उन्हें अभी तक प्राप्त सभी मूल-अधिकारों सहित समस्त संवैधानिक अधिकार एवं हैसियत भी छीन ली जाएगी | उस व्यवस्था में इन वर्गों के साथ-साथ बुद्धिजीवी-वर्ग, वामपंथी, अम्बेडकरवादी, स्त्रीवादी, या किसी भी सामाजिक समुदाय के मानवाधिकारों के लिए स्वत्रन्त्र चिंतन वाले लोगों की खैर नहीं होगी | और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कोई नेता या सत्ताधारी स्वयं सामने आने की बजाय जनता के भीतर से ही एक हिस्से को इस काम के लिए तैयार कर रहे हैं, जिनको आक्रामक, बुद्धिहीन, चिंतनहीन, विवेकहीन बनाया जा रहा है, जो सही-ग़लत, उचित-अनुचित, करणीय-अकरणीय का अंतर न समझती हो | और इस वर्ग में युवाओं और किशोरों को ख़ास तौर पर टारगेट किया गया है, जिनको हिंसक, आक्रामक, संवेदनहीन बनाया जा रहा है; ताकि ठीक समय पर उनका ‘प्रयोग’ सनातनी उद्देश्यों के ख़िलाफ़ काम करनेवाले बुद्धिजीवियों सहित ग़ैर-सनातनी वर्गों (दलित, आदिवासी, ओबीसी में शामिल शूद्र) और ग़ैर-हिन्दुओं (मुस्लिम, ईसाई और बौद्ध) के दमन और नरसंहार में किया जा सके | मेले में आए बहुत सारे युवाओं के व्यवहारों में नज़र आ रही प्रवृत्तियाँ इस सनातनी-कोशिश की सफ़लता को साबित भी कर रही थीं |

लेकिन इतिहास का एक सच यह भी है कि समय और बदलाव की हवा कब किस दिशा से चलकर किस ओर बहेगी, यह कोई भी निश्चयपूर्वक नहीं बता सकता, शक्तिशाली से शक्तिशाली शासक भी नहीं, भविष्यवाणियाँ करनेवाले तथाकथित त्रिकालदर्शी ब्राह्मण-ज्योतिषी भी नहीं, अन्यथा वे त्रिकालदर्शी ज्योतिषी हर उस विद्रोह और जन-आन्दोलन के बारे में पहले से ही जान जाते, जिन्होंने अतीत में उनकी सत्ता को चुनौती दी थी और कई बार उनकी सत्ता को उखाड़ भी फेंका था | इतिहास कई बार अपने-आप को कुछ अंशों में न केवल आश्चर्यजनक ढंग से दोहराता है, बल्कि एकदम से चीजों को सिर के बल उलट भी देता है | तो भविष्य में क्या है, यह केवल भविष्य का समय ही जानता है |

लेकिन जिन वर्गों को निशाने पर रखकर उनके दमन के उद्देश्य से पुस्तक-मेले जैसे आयोजनों में भी ये सारे खेल रचाए जा रहे थे, उसी पुस्तक मेले में वे वर्ग कहाँ थे और क्या कर रहे थे? इसकी कथा अगले अंकों में…

—डॉ. कनक लता

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