बतकही

बातें कही-अनकही…

पिछले दो दशकों से लेकर वर्तमान तक हमारे देश में सरकार एवं शिक्षा-मंत्रालयों द्वारा संचालित विभागों ने सरकारी-विद्यालयों में बच्चों के पढ़ने-लिखने के लिए जो पुस्तकें निर्मित की हैं, उनको देखना काफ़ी दिलचस्प है | कुछ निजी महँगे विद्यालयों द्वारा अपने यहाँ इन पुस्तकों को तो शामिल ही नहीं किया जाता है | और जहाँ ये शामिल हैं, तो वहाँ भी गौण रूप में; और मुख्य रूप से वहाँ कुछ अन्य पुस्तकें पढ़ाई जाती हैं, जो उन विद्यालयों की अपनी निजी लिस्ट में होती है !

हालाँकि सरकारी-विद्यालयों में भी ‘पुस्तकालय’ के लिए कुछ पुस्तकें अवश्य अनुशंसित की जाती हैं, जो सामान्य रूप से ‘साहित्य’ की श्रेणी की होती हैं—अर्थात् कविताएँ, कहानियाँ, जीवनियाँ आदि | और अधिकांश विद्यालयों में वे आलमारियों की शोभा बढ़ाती ही मिलती हैं, बहुत कम विद्यालयों में वे बच्चों के हाथों का स्पर्श पा पाती हैं |

और कहीं-कहीं तो इससे भी एक क़दम आगे बढ़कर एक अलग क़िस्म के ‘पुस्तकालय’ बने हुए दिखते हैं, जहाँ कक्षा 6-8 के बच्चों के स्कूलों में भी बच्चों के नाम पर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं (मेडिकल, इंजीनियंरिंग, शिक्षक, क्लर्क, बैंक आदि में नौकरियों के लिए) की ‘गाइड’ टाइप की पुस्तकें भी पुस्तकालयों की आलमारियों में भरी हुई देखी जा सकती हैं !

अस्तु, जो पाठ्यपुस्तकें सरकार, शिक्षा-मंत्रालय, शिक्षा-विभाग एवं शिक्षाविदों ने निर्मित और ज़ारी की हैं, उन्हीं पाठ्यपुस्तकों का निजी-विद्यालयों में कोई ख़ास महत्व नहीं; जहाँ उन्हीं शिक्षा-मंत्रालयों और शिक्षा-विभागों के अधिकारियों के बच्चे पढ़ते हैं; जहाँ सभी शिक्षाविदों, सरकारी-अधिकारियों, प्रशासकों, नेताओं, उद्योगपतियों एवं व्यवसायियों सहित समस्त सरकारी-संस्थानों एवं सरकारी-विद्यालयों के समस्त सक्षम कर्मचारियों के बच्चे पढ़ते हैं | उन निजी अंग्रेज़ी-विद्यालयों में वे पुस्तकें सामान्य रूप से केवल पाठ्य-पुस्तक-सूची की शोभा बढ़ाती मिलती हैं | वहाँ मुख्य ज़ोर उन पुस्तकों पर होता है, जो अलग से शामिल होती हैं— ख़ासकर गणित, विज्ञान, सामाजिक-विज्ञान जैसे विषय | वहाँ यदि शिक्षा-मंत्रालय द्वारा निर्मित और ज़ारी कोई पाठ्यपुस्तक पढ़ाई भी जाती है, तो वह हैं ‘साहित्य’ यानी ‘भाषा’ की पुस्तकें |

हाँ, जो सस्ते निजी विद्यालय होते हैं, जहाँ निम्न-मध्यवर्गों के बच्चे पढ़ने जाते हैं, वहाँ अवश्य सरकार द्वारा ज़ारी इन पाठ्यपुस्तकों को कुछ महत्त्व मिलता है |

सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है?

इसका उत्तर इन पुस्तकों की विशेषताओं में दिखाई देता हैं…

जहाँ तक ‘भाषा’ या ‘साहित्य’ (स्थानीय-भाषा और अंग्रेज़ी) की पुस्तकों का सवाल है, तो हर प्रकार की साहित्यिक पुस्तकों में कविता, कहानी, यात्रा-वृतांत, संस्मरण, निबंध आदि ही होते हैं, चाहे वो निजी-विद्यालयों की पुस्तकें हों, या सार्वजनिक या सरकारी-विद्यालयों की | इसलिए वहाँ चिंता की ऐसी कोई बात नहीं, यदि भाषा और साहित्य के मामलों में भारत सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा निर्मित पुस्तकें प्रयुक्त हों |

चिंता की बात तो तब है, जब बच्चे को समाज, राजनीति, देश, विज्ञान एवं तकनीक जैसे तार्किक विषयों को समुचित ढंग से पढ़ाने की बारी आती है | ये वो अध्ययन-क्षेत्र हैं, जो बच्चों को अपने देश, समाज, इतिहास, राजनीति, अर्थव्यवस्था, वैज्ञानिक विकास आदि के विषय में समुचित ज्ञान का रास्ता दिखाते हैं, बच्चों में आगे की शिक्षा के लिए ललक पैदा करते हैं और उसके लिए पृष्ठभूमि भी बनाते हैं, उनकी भावी शिक्षा की नींव रखते हैं |

अब सवाल है कि इन पाठ्यपुस्तकों, ख़ासकर गणित, विज्ञान, सामाजिक-विज्ञान जैसे विषयों की पुस्तकें, में ऐसा क्या है कि निजी-विद्यालय अपने यहाँ पठन-पाठन में इनको कोई विशेष महत्त्व और स्थान नहीं देते, जिनको देश एवं राज्यों के शिक्षा-मंत्रालय बेहद परिश्रम से बनाते हैं…? जिन पुस्तकों से देश के सरकारी-विद्यालयों के बच्चे शिक्षा हासिल करते हैं, वे ही पुस्तकें प्रमुखता से किन कारणों से उन्हीं अंग्रेज़ी माध्यम के निजी-विद्यालयों में पढ़ाए जाने के लायक नहीं हैं, जिनमें इन पुस्तकों के निर्माता अधिकारियों एवं प्रशासकों के बच्चे पढ़ते हैं…??

इन पुस्तकों, ख़ासकर छोटी कक्षाओं की पुस्तकें, को ध्यान से देखने पर कई बातें दिखाई देती हैं, उनमें से बेहद महत्वपूर्ण यह है कि पुस्तकों में कोई बात समझाने के लिए बच्चों के अपने अनुभवों से जोड़कर पढ़ाने के उद्देश्य से पाठ को बातचीत की भाषा में, रोज़मर्रा के जीवन की घटनाओं को आधार बनाकर तैयार किया गया है |

यह विशेषता बच्चों की समझ विकसित करने के लिए काफ़ी लाभकारी हो सकती थी, यदि इसको क़ायदे से और उचित तरीक़े से विद्यालयों और कक्षाओं में प्रयोग किया जाता; अध्यापकों को विद्यालय में अधिक-से-अधिक समय तक बच्चों के साथ रहकर पढ़ाने के मौक़े मिलते; विद्यालयों में विविध सांस्कृतिक-कार्यक्रमों, प्रतियोगिताओं और जयंतियों की रेलमपेल कुछ कम होती और पढ़ने के अवसर अधिक मिलते…!

दूसरी बात यह, कि यदि इस तकनीक को पुस्तकों में कुछ सीमित मात्रा में प्रयोग किया जाता, तो भी बात समझ में आती, कि बच्चों के रोज़मर्रा के जीवन से जुड़े अनुभवों के इन विविध क्षणों को अपनाकर बच्चों में स्थायी समझ विकसित किया जा रहा है |

लेकिन शिक्षा-मंत्रालय एवं शिक्षा-विभाग द्वारा एक के बाद एक ऐसे उपाय करना, जिससे बच्चों की शिक्षा अधिक-से-अधिक बाधित हो रही हो, इन तकनीकों को संदेह के घेरे में ले आते हैं; ठीक वैसे ही  जैसे नमक यदि उचित मात्रा में भोजन में मिलाया जाए, तो यह उसके स्वाद को बढ़ाने के साथ हमारे शरीर को कई आवश्यक खनिज उपलब्ध कराता है, लेकिन यदि उसकी मात्रा भोजन में बहुत अधिक बढ़ा दी जाए, तो वह अनेक समस्याएँ उत्पन्न करता है, जैसे कि उच्च रक्तचाप |

इसलिए शिक्षा-मंत्रालय की गतिविधियों एवं मंशाओं पर उस संदेह को लगातार गहरा करते हैं, पाठ्य-पुस्तकों में बहुत अधिक मात्रा में ‘अनुभवों’ और ‘परिवेश’ के नाम पर कहानियों की ठूसमठूस और वास्तविक-शिक्षा एवं ज्ञान की दुनिया में विचरण करने के कम-से-कम अवसर देना; जोकि अंग्रेज़ी-माध्यम के निजी विद्यालयों में पढ़ने वाले उन अधिकारियों एवं ‘दबंग-जातियों’ के बच्चों के निजी-विद्यालयों की पाठ्य-पुस्तकों में नहीं होती है | कहानियों एवं बातचीत की बहुत ज्यादा ठूस-ठास से सरकारी-विद्यालयों में अपनी पढ़ाई के लिए इन पाठ्य-पुस्तकों पर निर्भर रहकर वहाँ पढ़नेवाले बच्चे या तो उन्हीं में गुम होकर खो-से जाते हैं, अथवा पुस्तकों से ही दूर होते जा रहे हैं; और इस तरह वे शिक्षा से लगातार दूर हो रहे हैं और शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य से भी | यही कारण है कि इन सरकारी-विद्यालयों के जो अध्यापक बच्चों की पढ़ाई के प्रति वास्तव में गंभीर होते हैं, वे इन पुस्तकों की तुलना में अपनी वैयक्तिक कोशिशों को अधिक प्राथमिकता देते हैं |

जबकि निजी-विद्यालयों में पढ़नेवाले ‘दबंग-समाज’ के बच्चे उन निजी-विद्यालयों के द्वारा अपने पाठ्यक्रम में शामिल अन्य पुस्तकों के माध्यम से अच्छी शिक्षा पाकर आगे निकल जाते हैं | और उसके बाद उच्च-शिक्षा, अच्छी नौकरियों, बेहतर व्यवसायों, बेहतर संसाधनों पर धीरे-धीरे उनका नियंत्रण अपने-आप तय हो जाता है |

इसके अलावा शिक्षा-मंत्रालय द्वारा ‘नवीनीकरण’ एवं ‘समय की ज़रूरत या माँग’ के नाम पर कई पुस्तकों में बहुत महत्वपूर्ण कुछ ऐसे पाठों को समय-समय पर हटाते रहना, जो समाज, विज्ञान, महापुरुषों आदि के बारे में आवश्यक समझ विकसित करते हैं; और उसकी जगह ऐसे पाठों का समायोजन जो बच्चों के स्वतंत्र-चिंतन को बाधित करते हैं, अथवा उसे सांप्रदायिक एवं संकीर्ण मानसिकता की ओर धकेलते हैं, उस संदेह को और भी अधिक पुख्ता करने का काम करते हैं | पाठ्य-पुस्तकों एवं पाठ्य-क्रमों का समय के साथ आधुनिकीकरण और नवीनीकरण बहुत ज़रूरी होता है, लेकिन उसके नाम पर बच्चों की चिंतन-प्रक्रिया को कुंठित करना और उनकी सोच को सांप्रदायिक, जातीय एवं नस्लीय दुराग्रहों से सिंचित करना कितना ठीक है?

–डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

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