बतकही

बातें कही-अनकही…

क्या 1857 के प्रसिद्ध ग़दर से अंग्रेजों द्वारा भारत में बिछाई गई रेल-प्रणाली का भी कोई सम्बन्ध था? यदि हाँ, तो क्यों और कैसे? किस कारण रेल-प्रणाली ने भारत के सुविधा-भोगी सवर्णों को एक ऐसा विद्रोह करने को बाध्य किया, जिसमें वे अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने पर आमादा हो उठे थे? जबकि उस रेल-प्रणाली से, अंग्रेज-व्यापारियों के बाद सबसे अधिक लाभ उन्हीं सवर्णों को हो रहा था | तब उसी रेल-प्रणाली के कारण ऐसा क्या हुआ था, जिससे वह सवर्णों को अपने खिलाफ प्रतीत हुई? क्या रेल के माध्यम से केवल अंग्रेजों द्वारा भारतीय वस्तुओं को यहाँ के कोने-कोने से इकठ्ठा करके इंग्लैंड भेज देना ही एकमात्र कारण था, अर्थात् धन-निकासी; अथवा इसके साथ कुछ और भी कारण थे, जिससे सवर्ण-समाज को झटका लगा था और जिसका ठीक से विवरण सवर्णीय-मानसिकता वाले इतिहासकार नहीं देते?

अंग्रेजों ने रेल-प्रणाली का विकास क्यों किया?

जब अंग्रेजी ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ भारत में व्यापार के इरादे से आई थी, तो उसने यहाँ अपने व्यापार के प्रसार के लिए रेल-प्रणाली का विकास शुरू किया; उद्देश्य केवल एक था, अपने व्यापार के लिए अच्छी गुणवत्ता वाला कच्चा माल भारत के कोने-कोने से बटोरना और इंग्लैंड भेजता और वहाँ अपने कारखानों में मशीनों से तेजी से बड़ी मात्रा में बन रहे सामानों (सूती कपड़े, जूट, लैवेंडर घड़ियाँ, आदि) को बेचने के लिए भारत के कोने-कोने के बाजारों में पहुँचाना—

“भारत में रेल-व्यवस्था का जो विस्तार हुआ था उसका प्रमुख उद्देश्य यह था कि ब्रिटिश उद्योगों के लिए चारों ओर से कच्चा माल जुटाया जाए तथा उनके उत्पाद के लिए बाजार तैयार किया जाए |…इसने देश की परिवहन व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया |”1

रेल-प्रणाली की इस सुविधा का लाभ निश्चित रूप से सवर्ण-व्यापारियों ने भी उठाया और कई क्षेत्रों में अपने व्यापार का विकास और विस्तार किया, जिसे और भी अधिक स्पष्ट रूप से 20वीं सदी में टाटा, बिड़ला, सिंघानिया आदि बड़ी-बड़ी पूर्णतः भारतीय कम्पनियों के तेजी से विकास के मामले में देख सकते हैं | इसे भी सवर्णीय-मानसिकता वाले इतिहासकारों द्वारा बड़ी चतुराई से छिपाया गया है—

“किन्तु रेलों का जाल बिछ जाने से भारतीय अर्थव्यवस्था के एक अन्य स्तर पर गहरा असर हुआ | आतंरिक और विदेशी व्यापार दोनों की मात्रा में आशातीत वृद्धि हुई | भारत के अंदरूनी हिस्से निर्यात केन्द्रों से जुड़ चुके थे | …भारत के आतंरिक बाजारों में भी अंतः-संपर्क बढ़ गया और वे सभी विदेशी बाजार से जुड़ गए |” 2

अंग्रेजों का रेल-प्रणाली के विकास का दूसरा महत्वपूर्ण उद्देश्य था, अपने सैनिकों को देश के दूर-दराज के इलाकों तक आसानी से ले जाने के लिए सुगम रास्ते का निर्माण | हालाँकि इसके लिए सड़कें भी बनाई जा रही थीं और इससे भी सवर्णों और सुविधाभोगी वर्गों को परेशानी थी | लेकिन रेल-प्रणाली कहीं अधिक कारगर, सुविधाजनक और सुरक्षित थी और रेलों में बड़ी संख्या में सैनिकों और बड़े-बड़े युद्ध अस्त्र-शस्त्रों (टैंक, तोप, गोले, बंदूकें, रायफलें आदि) को दूर-दराज के इलाकों तक ले जाया जा सकता था |

लेकिन कहते हैं ना कि कुछ मामलों में यदि किसी के द्वारा अपने स्वार्थ के लिए भी कोई उत्पादक काम किया जाता है, तो कई बार उसका एक परिणाम उस स्वार्थ-विशेष के शिकार हुए लोगों और वर्गों को भी लाभ के रूप में प्राप्त होता है, यदि पीड़ित-वर्ग उसे समय रहते पहचान ले | यह तब अवश्यंभावी हो जाता है, जब इस खेल में तीन पक्ष शामिल हों | एक पक्ष पहले से ही जड़ें जमाए बैठा उत्पीड़क व्यक्ति या उत्पीड़क-वर्ग (जैसे भारतीय समाज में ब्राह्मण सहित सभी सवर्ण); दूसरा पक्ष, उसके शिकार बन रहे उत्पीड़ित या शोषित (जैसे भारत के मूल-निवासी दलित, आदिवासी और शूद्र तथा स्त्रियाँ); और तीसरा पक्ष, बाद में आने वाला उत्पीड़क या शोषक (जैसे भारत में मुस्लिम और ब्रिटिशर्स) | दरअसल जब दो शोषक व्यक्ति या वर्ग अपने-अपने लाभ के लिए एक-दूसरे को हानि पहुँचाते हुए एक-दूसरे से नकारात्मक प्रतिद्वंद्विता करते हैं और अपने-अपने लाभ को बढ़ाने के लिए पीड़ित-वर्गों या व्यक्तियों के परिश्रम और उत्पादन पर कब्ज़ा करने की कोशिश करते हैं, तब अक्सर ही ऐसी स्थिति पैदा होती है, जिससे पीड़ित-वर्गों को कई फायदे होते हैं | वास्तव में इन दोनों प्रतिद्वन्द्वी शोषक-वर्गों द्वारा उन पीड़ित-वर्गों के परिश्रम पर कब्ज़ा करने के लिए जो तरीके अपनाए जाते हैं, वे तरीके ही कई बार पीड़ित-वर्गों की अनजाने में सहायता कर जाते हैं | भारत में परिश्रमी-वंचितों की मेहनत पर कब्ज़ा किए बैठे सवर्ण-वर्गों के वर्चस्व और एकाधिकार को तोड़कर उस मेहनत पर अपना कब्ज़ा ज़माने के लिए उनके प्रतिद्वंद्वी मुसलमानों और उनके बाद ब्रिटिशर्स ने इसी रणनीति को अपनाया था |

ईस्ट इंडिया कंपनी और उसके बाद ब्रिटिश क्राउन ने भारत में जो रेलों का जाल बिझाया, उससे यही स्थिति बनी | ब्राह्मण सहित सवर्ण-समाज अंग्रेजों की इस नीति को समझने की बजाय अपनी जातीय सत्ता और वर्चस्व को बनाए रखने के पीछे ही हाथ धोकर पड़ा रहा और अंग्रेज इस मौके को भुना ले गए | उन्होंने अपने व्यापार के लिए रेलों का जाल बिछा दिया और उसमें बैठने की आजादी सबको दे दी, जिससे भारत के मूल-निवासियों को अपने विकास के दर्जनों रास्ते अनजाने में ही खुल गए | लेकिन इसी कारण सवर्णों की सामाजिक-सांस्कृतिक एकान्तिक सत्ता के पाए हिल उठे और उन्होंने अपनी पूरी ताकत तमाम परिवर्तनों के साथ-साथ रेल-प्रणाली को भी बर्बाद करने में लगा दिए | इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि रेलों ने सवर्णों की सत्ता को कैसे हानि पहुँचाई |

सवर्णी-जातीय-श्रेष्ठता के अहम् और अस्पृश्यता पर करारी चोट

जैसाकि ऊपर कहा गया कि रेलों में बैठने का हक़ सबको मिला, क्योंकि अंग्रेजों के यहाँ जन्म के आधार पर छुआछूत जैसी व्यवस्था उसी तरीके से नहीं थी, जैसी भारतीय समाज में सवर्णों की व्यवस्था में थी | इसलिए उनके यहाँ दलितों को भी उन सभी जगहों पर बेरोकटोक आने-जाने की इजाजत थी, जिसकी कल्पना तक सवर्ण-समाज करने को तैयार नहीं था | अंग्रेजों के यहाँ कई विभागों में नौकरी करते हुए केवल शूद्रों की ही नहीं बल्कि कई दलितों की आर्थिक स्थिति भी इतनी ठीक हुई थी कि वे रेलों में टिकट खरीदकर यात्रा कर सकते थे, वह भी सवर्णों की बगल में बैठकर | क्योंकि कई बार उनको सीटें भी सवर्णों की बगल में ही आवंटित हो जाती थीं |

यह स्थिति सबसे अधिक ब्राह्मणों के लिए उनके सिर पर तेजाब पड़ने जैसी थी | जिन दलितों की परछाई तक से वे अपवित्र हो जाते थे, जो अछूत कभी ब्राह्मणों से कई मीटर दूर ही रहते थे; वही अछूत अब रेलगाड़ी के एक ही डिब्बे के एक ही कोच में बैठते थे, कई बार तो उनकी एकदम बगल में | तब क्यों नहीं ब्राह्मणों के सिर पर तेजाब पड़ता? क्यों नहीं उनकी चुटिया खड़ी होती? क्यों नहीं उनका सनातनी-धर्म खतरे में पड़ता? यह स्थिति समस्त सवर्णों के लिए बर्दाश्त से बाहर थी—

“अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ की नीति के फलस्वरूप पश्चिमी विद्या प्रणाली के प्रसार के कारण, एक समान दंड संहिता (1861) तथा दंड प्रक्रिया संहिता (Criminal,Prosedure Code) (1872)  के लागू होने से, रेलों के विस्तार से (जिनमें प्रत्येक व्यक्ति टिकट मोल लेकर किसी भी उपलब्ध स्थान पर बैठ सकता था), राष्ट्रीय जागरण के विकसित होने से, समानता तथा सामाजिक समतावाद पर आधारित आधुनिक राजनैतिक विचारों के प्रसार, सभी ने एक ऐसा सामाजिक तथा राजनैतिक वातावरण बना दिया, जिसमें जाति-प्रथा को न्यायसंगत कहना असम्भव हो गया |” 3

इतिहासकार ठीक कह रहा है कि ऐसे सामाजिक-राजनीतिक वातावरण में ‘जाति-प्रथा को न्यायसंगत कह पाना किसी भी तरह संभव नहीं’ था | इसी वातावरण में दलित-वर्ग को यह समझ में आने लगा कि उसके साथ हजारों सालों से किया जा रहा छुआछूत का व्यवहार गलत था, क्रूर था, सवर्णों का एक षड्यंत्र था | ब्राह्मण सहित समस्त सवर्णों का जातीय-अहंकार अब धूल-धूसरित होकर जमीन चाटने लगा था और दलितों में उनका डरना कम होने लगा था | सवर्ण-समाज के लिए यह बहुत बड़ी समस्या थी और उसे पूरी तरह एहसास था कि आनेवाले समय में यह तेजी से बढ़ने वाली है | इसलिए धर्म के नाम पर रेलों का विरोध करना भी जरूरी हो गया |

कपड़ों की पहुँच अर्द्ध-नग्न वंचितों तक

रेल-प्रणाली के कारण भारतीय समाज के सबसे दबे-कुचले वर्गों के जीवन में इतने परिवर्तन हुए, जिन्होंने उनके जीवन में आमूलचूल परिवर्तन ला दियाए | जब इंग्लैंड में मशीनों से बना सामान बेहद सस्ते दामों में रेलों के जरिए भारत के गरीब वंचितों तक भी पहुँचने लगा, जिनको खरीदने और उपयोग करने के लिए बहुत अधिक दाम नहीं देना पड़ता था, तो गरीबों का जीवन प्रभावित होने लगा | इनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका कपड़ों की थी—

“रेल के कारण ब्रिटेन की बनी-बनाई चीजों को खपाने के लिए नए-नए बाजार मिले | लंकाशायर और मैनचेस्टर के सूती कपड़ों की भारतीय बाजार में बाढ़-सी आ गई …|” 4

भारत में हथकरघे से बने सबसे सस्ते सूती कपड़े भी इतने महंगे होते थे, जिसको परिवार के हर सदस्य के लिए पर्याप्त मात्रा में खरीदना शायद ही किसी शूद्र या दलित परिवार के लिए संभव रहा हो | इसलिए सदियों से ये वर्ग सवर्णों की ‘उतरन’ ही पहनते आये थे | लेकिन इंग्लैंड के कारखानों में मशीनों से कम समय और कम लागत में बड़ी मात्रा में कपड़े बनने से स्थिति बदल गई—

“अठारहवीं शताब्दी के अंत तक ब्रिटेन में कपड़ा उद्योग में व्यापक स्तर पर मशीनों का इस्तेमाल होने लगा | इससे सूती कपड़े के उत्पादन में बहुत तेजी से वृद्धि हुई |” 5

इंग्लैंड में बड़ी मात्रा में बनने वाले यही कपड़े भारतीय बाजार में पहुँचने लगे, तो शूद्रों और दलितों ने पहली बार नए कपड़े पहनने का सुख महसूस किया | इसी सुख और संतोष की अधिक-से-अधिक कामना ने उनकी इच्छा, इच्छाशक्ति और उसके लिए कोशिश को उनके मन में जगा दिया और वे अधिक मेहनत करके अपने परिवार के छोटे-छोटे बच्चों के लिए भी कपड़ों की व्यवस्था करने लगे | जाहिर है कि इससे बहुत अधिक मात्रा में कपड़ों की बिक्री बढ़ी, क्योंकि भारत की दो-तिहाई से भी अधिक आबादी इन्हीं शूद्रों, दलितों और आदिवासियों की रही है, इसलिए इस बड़ी आबादी द्वारा यदि बहुत कम भी कपड़े ख़रीदे गए होंगे, तो भी उसकी कुल मात्रा बहुत बड़ी ही रही होगी—

इसीलिए “भारत की विशाल मंदी में अपने माल की खपत की व्यापकता को देखकर अंग्रेज उत्पादक दंग रह गए | …यह भी निश्चित था कि भारत में कपड़े की खपत कई गुना और बढ़ सकती थी क्योंकि 1832 में भी यह भारत में कपड़े के कुल उद्योग का केवल चार प्रतिशत था |” 6

अर्थात् शायद 96 प्रतिशत कपड़ा-उत्पादन उद्योग उस समय तक भी सवर्णों के हाथों में ही था और केवल 4 प्रतिशत अंग्रेजों के नियंत्रण में | इस एक परिवर्तन ने इसी कड़ी में आगे चलकर एक लम्बी प्रक्रिया और परिवर्तन के तहत उनमें आत्म-विश्वास और आत्म-सम्मान की भावना भी पैदा की | यह सवर्ण-समाज की दूसरी पीड़ा थी | सवर्ण-समाज को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि शूद्र और दलित उनकी छोड़ी हुई उतरन पहनने की बजाय नए कपड़े पहनें, वह भी अपने पैसों से खरीदकर | और वंचितों के अन्दर पैदा हो रहे आत्मविश्वास की भावना और आत्म-सम्मान की भूख ने तो जैसे सवर्णों के तन-बदन में आग ही लगा दी और वे व्यंग्य में कहने लगे— ‘कौआ चला हंस की चाल’ | लेकिन शायद ही किसी इतिहासकार ने इस पक्ष को ठीक से उजागर किया हो |

वंचितों को भी आवागमन उपलब्ध

रेल के कारण दलितों को अवागमन के साधन भी उपलब्ध हुए, जिसने उनको अपने अति-सीमित स्थान से निकलकर दुनिया देखने (भारत के अन्य हिस्से में और दुनिया के अन्य कई देशों में भी, जहाँ दलित और शूद्र मजदूरी करने गए) के बड़े ही अच्छे और परिवर्तनकारी मौके उपलब्ध कराये | यही कारण है कि औपनिवेशिक-काल में सबसे अधिक शूद्र और दलित ही विदेशों में जाते दिखाई देते हैं | हालाँकि इससे उनका शोषण भी हुआ, लेकिन इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने दुनिया भी देखी और अपने जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन भी किया | ऐसी यात्राओं के कारण नए स्थानों से मिले अनुभवों ने उनको अपनी जातीय-बेड़ियों का अनुभव और ज्ञान कराया और उनमें विरोध और विद्रोह की चिंगारी एवं आग पैदा करने में बड़ी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई |

वंचितों के लिए नए रोजगार के अवसर उपलब्ध

भारत में और दूसरे देशों में भी नए-नए स्थानों के बारे में जानकारी हासिल करनेवाले शूद्रों और दलितों ने जब यह देखा कि उनके मूल निवास-स्थान से अलग किसी अन्य स्थान पर रोजगार और पैसे कमाने के बेहतर मौके उपलब्ध हैं, तो उन्होंने शुरूआती झिझक के बाद इसका लाभ उठाना शुरू किया—

“इधर रेलों के बिछाने के साथ एक नए वर्ग के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ था | यह वर्ग था औद्योगिक मजदूर वर्ग या सर्वहारा (Industrial working class) | …जमीन से बेदख हुए भूमिहीन किसान और बेरोजगार दस्तकार अब रोजी-रोटी कमाने के लिए नए उद्योगों की ओर जा रहे थे |” 7

जाहिर है कि बेरोजगार दस्तकार प्रायः अंग्रेजों के कारण बेरोजगार हुए थे, जबकि अपनी जमीनों से बेदखल हुए किसान प्रायः सवर्णों की लालची-प्रवृत्तियों के शिकार होकर अपनी जमीनों से हाथ धो बैठे थे; और ये दोनों ही वर्ग शूद्र-वर्णीय थे |

इससे भी बुरी स्थिति दलितों की थी, लेकिन कारखानों में, सड़क-निर्माण, रेल-निर्माण आदि के कार्यों में मजदूर बनकर उनको अपनी आर्थिक-स्थिति पहले से बेहतर बनाने के अच्छे मौके मिले थे | हालाँकि इन स्थानों में इनका शोषण भी खूब होता था और शोषकों में अंग्रेजों के साथ-साथ, बल्कि उनसे भी कहीं अधिक, सवर्ण-उद्योगपति और उनके सवर्ण-कारिंदे बढ़-चढ़कर शामिल थे | लेकिन कम-से-कम इतना तो लाभ उनको हुआ ही कि वे पैसे कमाने की स्थिति में आ गए, नकद पैसे हाथ में मिलने पर वे उन पैसों को अपनी मनपसंद चीजों (जैसे कपड़े, किताबें, कलमें, बच्चों के लिए खिलौने आदि) को भी खरीदने लगे, उनको सरकारी-स्कूलों में पढ़ने-लिखने के कुछ मौके मिलने लगे, दुनिया की समझ बनने लगी, …आदि |

रेलों के विरोध में सवर्णों ने क्या किया

सवर्णों ने ब्राह्मणों के इशारे पर रेल-प्रणाली को नुकसान पहुँचाने के लिए जो भी काम कर सकते थे, वह सब किया | दिन में जो रेल-पटरियां बिछाई जाती थीं, उनको वे रात में उखाड़ देते थे | कई बार जहाँ रेल बिछाने का काम शुरू किया जाता था, तो वहाँ जमीनों के नीचे रातोंरात किसी देवी-देवता की मूर्ति रख दी जाती थी और उस मूर्ति के नीचे बड़ी मात्रा में सूखे चने रख दिए जाते थे, उसके बाद किसी ब्राह्मण द्वारा भोली-भाली अज्ञानी-जनता से यह कहा जाता था कि सपने में देवता या देवी ने दर्शन देकर यह कहा है कि वे उस जमीन के नीचे हैं और वे वहाँ प्रकट होना चाहते हैं | ऐसी ऊंटपटांग बातें करते हुए ब्राह्मणों द्वारा और उनके उकसावे पर अन्य लोगों द्वारा भी वहाँ घंटों जल चढ़ाया जाता, जिससे सूखे हुए चने पानी से फूलकर मिट्टी को और उसके ऊपर रखी मूर्ति को ऊपर धकेलते थे और देवी-देवता इस तरह अचानक प्रकट होते थे |

कमाल की बात तो यह है कि कभी भी किसी ब्राह्मण, बनिया, साहूकार, जमींदार, पुजारी आदि के घर या जमीन के भीतर से कोई भी देवी या देवता इस तरह प्रकट नहीं हुए | जब भी हुए वंचितों के घर या जमीन से, या सड़क, रेल-मार्ग या सार्वजनिक स्थानों से ही हुए, जिनका संबंध शूद्रों, दलितों, महिलाओं के कल्याण से रहा | कुछ साहित्यकारों ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में 1857 के विद्रोह के पहले और बाद में भी ऐसी घटनाओं को अपने कथानकों में पिरोया है, जैसे अमृतलाल नागर का उपन्यास ‘करवट’, जिसमें 1857 के विद्रोह के पहले रेलवे लाइनों के नीचे से देवी-देवताओं को इसी तरह प्रकट कराया गया है |

वास्तव में सवर्ण-समाज, उनमें भी सबसे अधिक ब्राह्मण, जिस तरह केवल यही चाहते रहे हैं कि भारत में कोई भी बाहरी शक्ति आये, तो वह केवल उनके ही तलवे चाटे, उनकी ही जी-हुजूरी करे | ठीक उसी तरह वे यह भी चाहते रहे हैं कि सत्ता या किसी के द्वारा भी जो भी अवसर पैदा किए जाएँ, उनके लाभ केवल-और-केवल उन्हीं को मिले, सवर्णों के जूतों के नीचे रहनेवाले भारत के मूल निवासी उन लाभों में से रत्ती-भर भी न ले सकें | इसलिए यदि अंग्रेजों ने अपने तमाम आधुनिक विकास-कार्यों (रेलवे, डाक, औद्योगिक-क्रांति, आधुनिक शिक्षा, चिकित्सा आदि) का लाभ लेने की छूट केवल सवर्णों को ही दी होती और शूद्रों-दलितों-आदिवासियों को इनसे बिलकुल दूर रखा होता, तो शायद ही रेल की पटरियों के नीचे से कोई देवी-देवता प्रकट होते, शायद ही 1857 की क्रांति या उसके पहले और बाद की क्रांतियाँ या संघर्ष होते…

सन्दर्भ-सूची

  1. पृष्ठ-139, इन्दु अग्निहोत्री, ‘1857 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव’, आधुनिक भारत का इतिहास, आर. एल. शुक्ल (संपादक), हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, सितम्बर 2003
  2. पृष्ठ-141,वही
  3. पृष्ठ-285, बी.एल. ग्रोवर और यशपाल, आधुनिक भारत का इतिहास : एक नवीन मूल्यांकन, एस.चंद एंड कम्पनी लि., दिल्ली, 2000
  4. पृष्ठ-141, इन्दु अग्निहोत्री, ‘1857 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव, आधुनिक भारत का इतिहास, आर. एल. शुक्ल (संपादक), हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, सितम्बर 2003)
  5. पृष्ठ-220, स्नेह महाजन, ‘ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार, 1820-1856’, आधुनिक भारत का इतिहास, आर. एल. शुक्ल (संपादक), हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, सितम्बर 2003
  6. पृष्ठ-223, वही
  7. पृष्ठ-172 इन्दु अग्निहोत्री, ‘1857 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश शासन का प्रभाव, आधुनिक भारत का इतिहास, आर. एल. शुक्ल (संपादक), हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली, सितम्बर 2003

–डॉ. कनक लता

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