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भाग-चार – आशीष के ‘दगड़्या’ : बच्चों का, बच्चों के लिए, बच्चों द्वारा

क्या कोई ऐसा ऐसा संगठन या संस्था हो सकती है, जो न केवल बच्चों के लिए हो, बल्कि वह बच्चों की भी हो और उसका संचालन भी प्रमुख रूप से बच्चे ही करते हों…? सरकारी स्कूलों में हालाँकि ‘बाल-सभाएँ’ होती हैं, लेकिन यह पता नहीं कि वह कितनी कारगर है और क्या-क्या काम कितने प्रभावशाली ढंग से करती है? उनमें बच्चों की हिस्सेदारी और उसका बच्चों के जीवन, शिक्षा एवं व्यक्तित्व-निर्माण पर असर कितना होता है? लेकिन हमारे आसपास कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो बच्चों के भीतर उनकी सामाजिक ज़िम्मेदारियों एवं कर्तव्य-बोध का एहसास करा रहे हैं और बच्चे भी हँसते-खेलते हुए उनका अभ्यास और प्रयास भी कर रहे हैं |

ऐसा ही एक नाम है—दगड़्या’; जीआईसी एकेश्वर के अध्यापक आशीष नेगी के द्वारा स्थापित ‘दगड़्या’ एक ऐसी संस्था, जो न केवल बच्चों की है और उनके लिए काम करती है, बल्कि उसका संचालन भी बच्चे ही करते हैं, उसके लिए नियम क़ायदे भी मुख्यतः बच्चे ही तय करते हैं | इस समूह की अपनी मीटिंग भी होती है, जिसमें वे अपने पिछले कार्यों का मूल्यांकन करते हैं और आगे की रणनीति तय करते हैं |

वस्तुतः ‘दगड़्या’ का गढ़वाली में अर्थ होता है— भाई, दोस्त, साथी, साथ चलने वाला/वाली हमराही | यहाँ ‘दगड़्या’ नामक जिस संस्था की बात की जा रही है, वह ‘दगड़्या’ क्या है? यह कैसी संस्था है, जिसका संचालन बच्चे कर रहे हैं? यह ऐसा क्या काम करती है, जिसका उल्लेख इतना आवश्यक है और हम सबके लिए जानना महत्वपूर्ण है?

दरअसल आशीष नेगी (अध्यापक जीआईसी एकेश्वर के अध्यापक) ने इस संस्था की नींव साल 2018 में में रखी | इस संस्था के निर्माण का कारण क्या था? इस प्रश्न के उत्तर में वे बताते हैं कि अपने कार्य-स्थल ‘जीआईसी एकेश्वर’ में जब उन्होंने बच्चों के साथ बहुविध रूप में काम करना शुरू किया, अर्थात् पेंटिंग, क्राफ्ट और रंगमंच को लेकर, तब उनके स्कूल के बच्चे इससे काफ़ी संख्या में जुड़े | इससे बच्चों के जीवन और व्यक्तित्व में उन गतिविधियों के परिणामस्वरूप अनेक सकारात्मक परिवर्तन आए | बच्चे अपने आसपास, समाज के सभी वर्गों के लोगों और पर्यावरण एवं प्रकृति के प्रति बहुत सजग और सचेत होने लगे | उनके माता-पिता भी अपने बच्चों में आ रहे अनुकूल परिवर्तनों को महसूस करने लगे और इस परिवर्तन से काफ़ी संतुष्ट भी थे |

लेकिन बच्चे जब तक विद्यालय का हिस्सा रहते थे, तभी तक वे उन गतिविधियों से एवं उसके प्रभावों से जुड़े रह पाते थे और उनके द्वारा शुरू की गई विविध गतिविधियों में भागीदारी कर पाते थे | लेकिन विद्यालय की अपनी पढ़ाई पूरी करके वहाँ से निकलकर जब वे कॉलेज की दुनिया में चले जाते थे, या जीवन-यापन के उद्देश्य से किसी काम-धंधे में लग जाते थे, तब वे अपने अध्यापक, सहपाठियों और इन सभी गतिविधियों से भी पूरी तरह कट जाते थे | तब इस रूप में आशीष एवं बच्चों द्वारा पिछले कई सालों के काम निरर्थक-से हो जाते थे |

तब बच्चों के जीवन में विद्यालयी-जीवन के दौरान आए परिवर्तनों को स्थाई रूप देने के लिए और इस विकास को निरंतर आगे ले जाने के उद्देश्य से लगभग तीन साल पहले ही 2018 में आशीष ने विद्यालय के बच्चों, अपनी शिक्षा पूरी करके विद्यालय छोड़कर जानेवाले एवं जा चुके बच्चों का एक ग्रुप बनाया और उसका नाम रखा—‘दगड़्या’ | इस आलेख के लिखे जाने के समय तक इस ग्रुप से लगभग 70-80 बच्चे जुड़ चुके थे, जिसमें कक्षा छः से लेकर एमए तक के विद्यार्थी हैं |

अब सवाल है कि ऐसा करके क्या हासिल करने की कोशिश की जा रही है? यह ग्रुप ऐसा क्या काम करता है, जिसका ज़िक्र यहाँ आवश्यक है? आशीष से इस सन्दर्भ में बात करने पर पता चला कि इस ग्रुप के माध्यम से दो स्तरों पर काम होता है— एक, बच्चों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन के लिए किए जानेवाले कार्य तथा दूसरा बड़ों के जीवन में परिवर्तन से संबंधित | इस समूह के माध्यम से आशीष दूर-दूर के ग्रामीण इलाकों के बच्चों से जुड़ते हैं और उनके लिए उनके साथ मिलकर अनेक शैक्षणिक गतिविधियों को अंजाम देते हैं | वर्तमान कोरोना-महामारी की स्थिति में यह बच्चों का छोटा-सा समूह जो महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, वह वाकई बड़ों को नई राह दिखाने के लिए एक दिन जाना जाएगा | उसकी कहानी आशीष एवं उनके ‘दगड़्या’ से संबंधित अगले खंड में…

जहाँ तक बच्चों की इस संस्था का बच्चों के जीवन में बच्चों के ही द्वारा भूमिका निभाने का प्रश्न है, तो इस समूह का केन्द्रीय लक्ष्य है, अपनी तमाम शैक्षणिक एवं कलात्मक गतिविधियों के माध्यम से दूर-दूर के इन पहाड़ी इलाक़ों के बच्चों को देश-दुनिया से जोड़ना एवं उनके व्यक्तित्व का चहुँमुखी विकास | दरअसल पहाड़ों में दूर-दूर के ग्रामीण इलाकों के बच्चे प्रायः देश-दुनिया के बारे में इतने अनजान रहते हैं कि उनसे छोटी-मोटी जानकारियों की उम्मीद करना भी चुनौतीपूर्ण बन जाता है |

आशीष और उनके विद्यार्थियों ने यूँ तो साथ मिलकर बहुत-से अद्वितीय एवं अनुकरणीय कार्य किए हैं, लेकिन पूरे भारत में कोरोना-महामारी के कारण मार्च 2020 से लेकर अब तक ज़ारी घोषित-अघोषित लॉकडाउन ने बच्चों की पढ़ाई पर जो बुरा असर डाला है, उससे एक हद तक निकलने और पढ़ाई को ज़ारी रखने के लिए जो प्रयास किए गए हैं, वे उल्लेखनीय है | जब लॉकडाउन के दौरान पूरी व्यवस्था ठप-सी पड़ चुकी है और बच्चों की पढ़ाई लगभग रुक गई है, तब यह एक बड़ी चुनौती देश और शिक्षा-जगत के सामने खड़ी हो गई है, कि बच्चों को किस तरह पढ़ाई से जोड़े रखा जाय? आशीष ने अपने ‘दगड़्या’ की मदद से बीते एक-सवा साल के दौरान अपने विद्यालय के विद्यार्थियों को ही नहीं, बल्कि पूरे देश के अनेक इलाक़ों के हज़ारों बच्चों को न केवल पढ़ाई और उससे जुड़ी गतिविधियों से जोड़े रखा है, बल्कि अपने बहुविध प्रयासों से बच्चों की पढ़ने-लिखने की इच्छा को कई गुणा बढ़ा दिया है | साथ ही शिक्षा एवं बच्चों के व्यक्तित्व-विकास से जुड़ी अनेक कलात्मक गतिविधियों एवं सामाजिक कर्तव्य-निर्वहन से भी बच्चों को बख़ूबी जोड़े रखा है |

इसके लिए आशीष ने सोशल मीडिया का सहारा लिया, अर्थात् ‘दगड़्या’ के ही बच्चों का एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया, ‘दगड़्या’ नाम से ही, जिसमें प्रत्यक्षतः लगभग 75 बच्चे जुड़े हैं और परोक्षतः लगभग 120-130 बच्चे, यानी ग्रुप में शामिल बच्चों के भाई-बहन | इसमें भी कक्षा 6 से लेकर कॉलेजों के एम.ए. के छात्र शामिल हैं | जब पूरा देश संकटकाल में हतबुद्धि-सा होकर निस्तेज पड़ा था, तब इन्हीं बच्चों एवं नव-युवाओं की मदद से आशीष ने लॉकडाउन के दौरान भी लगातार सक्रिय रहते हुए बहुत सारे कार्य आयोजित किए और अभी भी करते हैं, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते, जिसमें कहानी-वाचन से लेकर सामान्य ज्ञान-संबंधी जानकारी शेयर करना, क्राफ्ट का कार्यक्रम आदि सहित अनेक बाल-प्रतियोगिताएँ भी शामिल हैं |

लॉकडाउन के दौरान बच्चों की पढ़ाई के प्रति रूचि को बनाए रखने के साथ-साथ उनकी पढ़ने-लिखने, सुनने-गुनने, सोचने-समझने की आदत को और अधिक विकसित करने के लिए आशीष ने पहले स्वयं अनेक लेखकों (प्रेमचंद, अशोक भाटिया, असग़र वज़ाहत, मुकेश साहनी… आदि) की 500 से अधिक बाल-कहानियाँ स्वयं पढ़ी, उसके बाद उनमें से बच्चों की रूचि और आकर्षण को ध्यान में रखकर लगभग 100 कहानियों को अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करके बच्चों के व्हाट्सएप ग्रुप ‘दगड़्या’ में भेजते रहे हैं | इन कहानियों के बैकग्राउंड में सुन्दर मनमोहक धुनें भी सुनी जा सकती हैं | ये कहानियाँ अनेक लोगों द्वारा शेयर किए जाने के माध्यम से अभी तक कम-से-कम 9000-10,000 बच्चों तक पहुँच चुकी है | उन कहानियों में उनकी अपनी रचना “मजदूर” और उनकी छात्रा भूमिका बडोला की रचना “बारी” भी शामिल हैं |

यह पूछने पर कि “इतनी मेहनत करके इस तरह रिकॉर्ड करके बच्चों के बीच कहानियाँ भेजने की बजाय आप उनको वे कहानियाँ लिखित रूप में भी तो भेज सकते थे; तब इतनी मेहनत करने की क्या ज़रूरत थी?” आशीष ने कहा कि “उस तरह हो सकता है कि अधिकांश बच्चे अनेक कारणों से उनको नहीं पढ़ते, लेकिन जब कहानियाँ लिखित की बजाय आवाज़ में होंगी, तो बच्चे अपना दूसरा काम करते हुए भी उसे सुन सकते हैं | इसके अलावा जिन बच्चों को पढ़ना-लिखना नहीं आता, वे भी सुन सकते हैं और फ़िर क्या पता कहानियाँ सुनते-सुनते दूसरी अन्य कहानियों को पढ़ने की इच्छा भी उनमें जागृत हो जाए, जिसके लिए वे पढ़ने-लिखने की ओर उन्मुख हो जाएँ? …बैकग्राउंड में एक अच्छी धुन/संगीत कहानी को मनमोहक और रोचक बनाने के लिए डाली गई है और इसका असर भी ख़ूब हुआ है |”

बात तो ठीक है, जब एक-डेढ़ सौ साल पहले काव्यों-महाकाव्यों से साहित्य की अन्य विधाओं (उपन्यास, निबंध, यात्रा-वर्णन, संस्मरण आदि) का विकास अपनी शैशवावस्था में था, तो उस समय लोगों की रूचि विकसित करने के लिए साहित्यकारों ने आरम्भ में हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में जासूसी, रोमांचक, अय्यारी आदि को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखे, जिन्हें पढ़ने के लिए लोगों ने बाकायदा हिंदी सीखी | हिंदी में लिखी गई ‘चन्द्रकान्ता’ और ‘चन्द्रकान्ता-सन्तति’ किसी को भूली न होगी, जिसे पढ़ने के लोभ ने न जाने कितने ग़ैर-हिंदी भाषी समाज के लोगों को हिंदी पढ़ना-लिखना सीखने को मजबूर कर दिया था, और इस ‘मजबूरी’ ने हिंदी साहित्य को अनेक रचनाकार प्रदान किए | किसी को भी पढ़ना-लिखना सिखाने की क्या ख़ूब तरक़ीब है ये !

इसी प्रकार बच्चों को उनके व्हाट्सेप ग्रुप ‘दगड़्या’ के माध्यम से ही सामान्य-ज्ञान की जानकारी दी जाती है, ताकि बच्चे अपने आसपास के अलावा बाहर की दुनिया को भी जान-समझ सकें | बच्चों के व्यक्तित्व-विकास के लिए उनके भीतर कलात्मक अभिरुचियों को विकसित करने के उद्देश्य से आशीष कलाओं का भी सहारा ख़ूब लेते हैं, लेकिन लॉकडाउन में बच्चों के साथ मिलकर यह करना संभव नहीं रहा | तब उन्होंने एक नई तरक़ीब निकाली | अपने ‘दगड़्या’ से परामर्श लेकर वे अपने घर पर ही स्वयं क्राफ्ट बनाते हुए वीडियो बनाते हैं और उसे बच्चों के व्हाट्सएप ग्रुप ‘दगड़्या’ में शेयर करते रहे हैं | उसे देखकर बच्चे भी कोशिश करते हैं और उसकी फ़ोटो उस ग्रुप में भेजते हैं |

इसके अलावा बच्चों की चिंतन-क्षमता और रचनात्मक-प्रवृत्ति को और अधिक बढ़ावा देने के लिए भी आशीष अनेक तरह के कार्य इस व्हाट्सेप ग्रुप के माध्यम से करते हैं, जिसके लिए वे ‘प्रतियोगिता’ का सहारा लेते हैं; जैसे निबंध-लेखन, सामान्य-ज्ञान, चित्रकला, फैंसी-ड्रेस आदि | निबंध-लेखन,जिसमें चित्रों की ही तरह समय-समय पर बच्चे किसी विषय पर निबंध लिखते हैं और उसकी तस्वीर ‘दगड़्या’ पर भेजते हैं, जिससे सभी बच्चे सभी बच्चों के निबंध पढ़ पाते हैं |

आगे बढ़ने से पहले एक बार ‘प्रतियोगिता’ को समझना ज़रूरी होगा, क्योंकि आशीष एक ओर तो ‘प्रतियोगिता’ शब्द को ही नापसंद करते हुए उसे सिरे से ख़ारिज करर्ते हैं, जबकि दूसरी ओर इसे आयोजित भी कर रहे हैं ! यह विरोधाभास क्यों? दरअसल ‘प्रतियोगिता’ शब्द का प्रयोग केवल यहाँ बच्चों को सजग-सचेत करने-भर के लिए किया जाता है, किसी को नंबर एक और किसी को अंतिम नंबर पर रखने के लिए नहीं | इसलिए यहाँ प्रतियोगिताएँ तो आयोजित होती हैं, किन्तु प्रत्येक बच्चे की प्रतियोगिता स्वयं अपने-आप से होती है कि समय के साथ उसमें कितना विकास हुआ…

अस्तु, बच्चे प्रत्येक ‘प्रतियोगिता’ में अपने काम की तस्वीर को अपने इस ‘दगड़्या’ ग्रुप में शेयर करते हैं, जिसे सभी देखते हैं और अपनी राय देते हैं, चाहे वह निबंध-लेखन हो, या सामान्य-ज्ञान, चित्रकला, अथवा फैंसी-ड्रेस प्रतियोगिता, या कोई भी ऐसी ही प्रतियोगिता अथवा कार्यक्रम |

एक बात और, ‘फैंसी-ड्रेस प्रतियोगिता’ को देखकर यहाँ आश्चर्य हो सकता है, क्योंकि यह तो ‘सुन्दरता’ को ‘महत्त्व देने’ जैसा लगता है…! एकदम सही बात है, आश्चर्य होना ही चाहिए ! लेकिन इस बारे में आशीष क्या सोचते हैं, यह भी समझना होगा | उनका कहना है— “दुनिया में चल रही गतिविधियों से बच्चों को अवगत कराने एवं बच्चों के मन में, अपने भीतर मौजूद सुन्दरता को ‘देखने’ और उसे स्वीकार करने के लिए यह एक कारगर उपाय हो सकता है | अपने भीतर की सुन्दरता को जानकार बच्चों का आत्म-विश्वास बढ़ता है, उनके मन में यह विश्वास पैदा होता है, कि सुन्दरता केवल साधन-संपन्न गोरे लोगों में ही नहीं होती, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति में अपनी निजी सुन्दरता होती है, जो केवल उसी में होती है और वह उसे दूसरों से अलग बनाती है, जिस कारण प्रत्येक व्यक्ति अपने-आप में अद्वितीय होता है, इसलिए सुन्दरता उनमें भी है |” बच्चे इस प्रतियोगिता में अपने-अपने घरों में तैयार होकर अपनी फ़ोटो खींचकर ‘दगड़्या’ में भेजते हैं |

बच्चों द्वारा अपनी प्रत्येक गतिविधि की तस्वीर अपने इस व्हाट्सेप ग्रुप में शेयर करने से फ़ायदा ये होता है कि ग्रुप के सभी बच्चों को अपने प्रत्येक ‘दगड़्या’ की रचनाओं, उसकी कलात्मक क्षमताओं, पढ़ने-लिखने की विशेषताओं, लेखन की ख़ूबियों को जानने का मौक़ा मिलता है | इससे दो-स्तरीय लाभ होते हैं— एक, सभी बच्चे ‘दगड़्या’ के सभी बच्चों की ख़ूबियों से परिचित होते हैं, जिससे वे समझ पाते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति में अनेक गुण होते हैं, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, क्षेत्र या भाषा का हो; इसलिए किसी को भी इन आधारों पर ‘नीच’ या ‘महान’ नहीं समझा जा सकता है | यह समझ बच्चों के बीच आपसी सौहार्द, संवेदनशीलता, सहयोगी-प्रवृत्ति जैसे मानवीय मूल्यों का विकास करने में बहुत मदद करती है | दूसरा, इससे प्रत्येक बच्चा अपने प्रत्येक ‘दगड़्या’ से बहुत कुछ सीखता है, जिसका लाभ उसके अपने व्यक्तित्व-विकास एवं ज्ञान-वर्द्धन में होता है |

इसके अतिरिक्त आशीष अपने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हैं कि वे अपने हमजोलियों की सहायता करें, जिसका परिणाम यह निकल रहा है कि बड़ी कक्षाओं के बच्चे दूर-दराज़ के गाँवों के बच्चों को निःशुल्क ट्यूशन पढ़ाते हैं, ताकि उनकी भी पढ़ाई बेहतर चल सके | साथ ही उनकी सहायता के लिए  ‘दगड़्या’ की मदद से ही उन बच्चों के लिए थियेटर, क्राफ्ट-वर्कशॉप, लघु-बाल-फ़िल्म, जनजागरूकता, स्वच्छता-अभियान का आयोजन भी किया करते हैं | इस रूप में इन तमाम गतिविधियों का लाभ उन दूर-दराज के बच्चों तक भी एक सीमा तक पहुँच पाता है, जहाँ सामान्य रूप से कोई मदद नहीं पहुँच पाती है |

इन तमाम कार्यों को देखते हुए यह समझ पाना आसान है कि क्यों आशीष एवं उनके ‘दगड़्या’ के कार्यों एवं उसके परिणामों से सबसे अधिक गाँवों की निरक्षर माताएँ प्रभावित हुई हैं? उनके विद्यालय के बच्चों की माँएँ तो आशीष एवं उनके ‘दगड़्या’ के काम से अपने बच्चों में आए परिवर्तनों के लिए पीटीएम (पेरेंट्स-टीचर्स-मीटिंग) में उनकी सराहना करते थकती ही नहीं हैं और उनका आभार भी व्यक्त करती हैं, लेकिन दूर-दराज के गाँवों की माँओं के लिए तो जैसे आशीष के ‘दगड़्या’ एक वरदान की तरह हैं | इसके अलावा लॉकडाउन के दौरान की गतिविधियों से भारत के अनेक क्षेत्रों के बच्चे उनसे बेहद प्रभावित तो हुए ही हैं और वे अनेक माध्यमों से अपनी ख़ुशी और प्रतिक्रिया भी पहुँचाते रहते हैं |

‘दगड़्या’ के माध्यम से बच्चों को इसी उम्र में एक ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में विकसित करने की शुरुआत एक ज़िम्मेदार अध्यापक ही कर सकता है, क्योंकि यदि हँसते-खेलते हुए ही बच्चे अपने उत्तरदायित्वों को समझने लगें, एक-दूसरे से मानवीय आधार पर जुड़ने और परस्पर सद्भावनापूर्ण व्यवहार करने लगें, तो बड़े होने पर ये बातें अलग से उनको सीखने-सिखाने की ज़रूरत नहीं होगी; अन्यथा हम तो अक्सर यही सुनते हैं, कि ‘बच्चों को खेलने-खाने की उम्र में ज़िम्मेदारियों से क्यों लादना?’…

मुझे एक विज्ञापन याद आ रहा है, जिसमें कपड़े को सुरक्षित धोने के संबंध में एक लगभग आठ-नौ साल का लड़का अपनी बड़ी बहन को कहता है- “सीखो, सीखो, तुम्हारे ही काम आएगा”, अर्थात् उसके मन में यह बात अपने वातावरण के कारण बैठ गई है कि कपड़े धोना महिलाओं का काम है | तब उसकी माँ उसे बड़े ही रोचक ढंग से समझाती है कि ‘घर के काम केवल महिलाओं के काम नहीं होते हैं, बल्कि प्रत्येक काम परिवार के प्रत्येक व्यक्ति का होता है’ | कितनी सरलता से यह बात हँसते-खेलते दोनों बच्चों ने सीख ली | सामाजिक-ज़िम्मेदारी एवं अपने साथियों या हमजोलियों के साथ संवेदनापूर्ण मानवीय व्यवहार सीखने की शुरुआत करने के लिए बचपन से बेहतर कौन-सा समय हो सकता है? अन्यथा जिन युवाओं ने अपने जीवन के अठारह-बीस साल सामाजिक-कुरीतियों को अपने वातावरण से ग्रहण किया, क्या वे बड़े होने के बाद उन ‘सीखों’ के विपरीत जाकर कुछ और सहजतापूर्वक सीख पाएँगे? क्या उनके मन में अपने समाज एवं परिवार के दोगले व्यवहार के प्रति अविश्वास नहीं होगा?

आशीष इस बात को बख़ूबी समझते हैं, इसलिए उन्होंने इसकी शुरुआत बच्चों के बचपन से की है | वर्तमान में आशीष के ये ‘दगड़्या’ अपने बेहद ज़िम्मेदारीपूर्ण कार्यों से बड़े-बड़ों को दांतों तले ऊँगली दबाने को मजबूर कर रहे हैं | बड़ों के जीवन में उनकी सामाजिक-चेतना और कार्यों पर लेख अगले खंड में, तब तक इंतज़ार…

–डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

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4 thoughts on “आशीष नेगी : कला के मार्ग से शिक्षा के पथ की ओर

  1. आशीष जी बहुआयामी प्रतिभा के धनी होने के साथ साथ शिक्षा और सामाजिक सरोकारों के लिए पूरी तरह से समर्पित शिक्षक हैं| पौड़ी में उनकी कार्यशाला में प्रतिभाग करने का अवसर मिलता रहता था| उनके द्वारा बच्चों के लिए किये जा रहे काम प्रशसनीय और अनुकरणीय हैं|

  2. आशीष नेगी की सबसे बड़ी विशेषता धरातल पर चुप चाप काम करने की है। हर चुनौती को एक अवसर में कैसे बदला जा सकता है यह कोई आशीष से सीखे, पिछली बार लॉक डाउन में जब सब कुछ ठप था तब आशीष कहानियों के जरिए दूर दूर तक अपनी आवाज़ पहुंचा रहे थे।वो एक महान जमीनी परिवर्तन के लिए समर्पित अध्यापक हैं,जिनका कार्य प्रेरक अनुकरणीय और प्रशंसनीय है।

  3. ‘दगड़्या ‘ के माध्यम से श्री आशीष नेगी जी जो काम कर रहे हैं बच्चों के बीच, उसकी जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है।
    आपको साधुवाद mdmji ji, जो आप अपनी लेखनी के माध्यम से ऐसे व्यक्तित्वाें को समाज के सामने ला रहीं हैं।??

  4. एक और महत्वपूर्ण योगदान आप का कनक मैडम जो कि अध्यापक समाज के लिए बड़ी उपलब्धि है।
    आशीष सर किसी परिचय के मोहताज नही है।एक छोटे से दिये से प्रकाश स्तम्भ कैसे रोशन किया जाता है यह आशीष से कोई सीख सकता है।वास्तव मे वह सैल्यूट के हकदार है।

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