बतकही

बातें कही-अनकही…

‘मध्याह्न भोजन’ से जुड़ी यह जीवित घटना एक ऐसे ‘चोर विद्यार्थी’ की ‘जीवित कहानी’ है, जो भूख से बेहाल अपने छोटे भाई-बहन और अपनी लाचार माँ के लिए स्कूल के मध्याह्न भोजन या ‘मिड-डे-मील’ की चोरी करता है…|

भूख वह बला है, जो सीधे-सरल व्यक्ति को भी अपराधी बना देती है— चोर, लुटेरा, यहाँ तक कि हत्यारा भी…! वैसे चोरी भी कमाल की कला और बला है ना…! जब साधन-संपन्न व्यक्ति या समुदाय अपनी ताक़त, ठसक, रुतबे का प्रयोग करते हुए और राज्य की व्यवस्थाओं के साथ मिलकर कोई चोरी करता है, तो वह चोरी ‘चोरी’ नहीं, बल्कि पैसे ‘कमाने की कला’ होती है | ऐसे लोगों की भूख, …लेकिन भूख रोटी की नहीं बल्कि दौलत की, कभी शांत होने का नाम ही नहीं लेती और इस कारण वे अपनी ‘कमाने की कला’ की बाज़ीगरी ताउम्र दिखाते रहते हैं और लगातार और अधिक और अधिक धनी होते चले जाते हैं | …और आय के किसी भी ज़रिए के न होने की स्थिति में यदि कोई बेबस व्यक्ति भूख से बेहाल अपने या अपने बच्चों अथवा बूढ़े लाचार माता-पिता के लिए किसी ‘अनैतिक’ ढंग से रोटी हासिल करता है या उसकी कोशिश करता है, तो वह कोशिश ‘अनैतिक’, ‘पाप’, ‘अपराध’ और ‘चोरी’ कहलाती है | कमाल की बात तो यह है कि ऐसी कोशिश को ‘चोरी’ और ‘अपराध’ की संज्ञा सबसे अधिक उन्हीं लोगों और समुदायों द्वारा दी जाती है, जो दौलत ‘कमाने की कला’ में माहिर होते हैं और देश एवं जनता को भी जमकर चूना लगाते हैं | या हो सकता है, कि यह उनका डर हो कि कहीं भूख से बेबस होकर ‘चोरी’ करते-करते ये ग़रीब और लाचार लोग एक दिन उन ‘माहिर कलाकारों’ की तिजोरी में भी सेंध न लगा दें | इसलिए वे सदियों पहले ही इसकी रोकथाम के उपाय के रूप में यह तरक़ीब निकाल चुके हैं, जिसमें धन्नासेठों या ‘स्वामियों’ की तिजोरी में सेंध लगाने के काम को ‘अनैतिक’, ‘पाप’, ‘अपराध’ और ‘चोरी’ आदि कहकर उसे एक दंडनीय ‘अपराध’ बना दिया गया, ताकि उन्हें ‘चोरी’ जैसे अपराध करने से रोक दिया जाए और साधन-संपन्नों की संपत्ति हमेशा सुरक्षित रहे | 

सवाल तो यह पैदा होता है कि कोई समाज अपने ही भीतर के कुछ हिस्सों को भूखा क्यों रखता है? क्या कभी यह प्रश्न आपके ज़ेहन में उठता है? अवश्य उठता होगा…! जो ‘देखेगा’, उसके मन में सवाल उठेंगे ही; जो ‘सोचेगा’, उसका मन विचलित होगा ही | जो ‘समझेगा’, उसकी अंतरात्मा विद्रोह भी अवश्य करेगी या करती होगी ही…| लेकिन जो सम्पूर्ण समाज पर अपनी एवं अपने समूह या समुदाय की सत्ता एवं वर्चस्व की कामना करेगा और उसके लिए कोशिश करेगा, उसका मन ‘देखने’, ‘सोचने’ और ‘समझने’ पर भी विचलित नहीं होगा…! उसका मन स्थिर रहेगा— धीर-गंभीर, स्थितप्रज्ञ सन्यासी की तरह अविचलित !     

…तो जैसाकि ऊपर कहा गया कि ‘मध्याह्न भोजन’ की यह घटना एक ऐसे ‘चोर विद्यार्थी’ की ‘जीवित कहानी’ है, जिसे भूख, ग़रीबी और बेबसी ने लाचार कर दिया अपने विद्यालय के मध्याह्न भोजन की चोरी करने ले लिए…| वह बालक जयपुर के एक गाँव की पाठशाला का विद्यार्थी था, महज छठी कक्षा का विद्यार्थी |

जयपुर …राजस्थान का गुलाबी शहर ! एक ख़ूबसूरत शहर, …क़िलों का शहर, …शौर्य-गाथाओं का शहर, …रणबाँकुरों का शहर, …जौहर का शहर, …जहाँ देश-विदेश के लोग राजपूतों के शानदार और मोहक इतिहास को अपनी आँखों से ‘देखने’ और ‘महसूस करने’ आते हैं | …इस उम्मीद में कि शायद राजपूतों की शौर्यगाथाएँ इतिहास से निकलकर इधर-उधर कहीं चलती-फ़िरती नज़र आ जाएँ…?! या जौहर करती हुई किसी राजकुमारी अथवा रानी और उसकी सखियों/दासियों की धधकती चिताओं की लपटें अतीत से निकलकर और वर्त्तमान में आकर अपने ‘भव्य रूप’ के दर्शन ही दे दें…?! लेकिन कभी-कभी सोचती हूँ कि क्या सामान्य साधारण समाज के बेबस लोगों की सदियों से अपनी बेबसी और ग़रीबी की चिता की अग्निधूम पर भी कभी किसी को नज़र गई होगी…? ग़रीबी और बदहाली से लड़ने में दिखाई देने वाले उनके ‘शौर्य’ को जानने, देखने, महसूसने की रूचि भी किसी सैलानी में होगी? …पता नहीं…! लेकिन कभी-कभी किसी की नज़र भूले-भटके जब ऐसे लोगों पर पड़ जाती है, तब दर्ज़नों दबी-ढँकी कहानियाँ बाहर आने लगती हैं, अपने भयानक और क्रूर रूप में…जैसे यह कथा आई है…

…तो बात है जयपुर की, बात है केवल डेढ़-दो साल पुरानी…| बात है जयपुर के एक विद्यालय की; विद्यालय, जो सरकारी है, जहाँ बच्चों को मिड-डे-मील दिया जाता है लंच में, ताकि बच्चों में कुपोषण का स्तर कम हो और बच्चे एक स्वस्थ जीवन पा सकें | साथ ही, यह कोशिश भी है कि परिवार की आमदनी बढ़ाने के लिए बच्चों को काम पर लगाने की प्रवृत्ति को भी कम किया जाए, जिसके लिए बच्चों की खातिर स्कूल में एक समय के भोजन की व्यवस्था करके माता-पिता पर आर्थिक दबाव को कम करने की कोशिश की जाती है |

…जयपुर में ग्रामीण इलाक़े का एक सरकारी विद्यालय और उसमें पढ़ता हुआ एक बालक…| बालक की उम्र तब महज़ 11 साल थी, जिस समय की उसकी कहानी मुझ तक पहुँची थी | इस बच्चे के परिवार में माता-पिता के अलावा एक छोटी बहन और एक शिशु-उम्र का भाई था | पिता का एकाध महीने पहले ही एक बनती हुई बिल्डिंग में मजदूरी करते समय वहाँ हुए एक हादसे में निधन हो गया | लगभग चार-पाँच महीने की गर्भवती माँ इस सदमे को झेल न सकी और बीमार होकर उसने चारपाई पकड़ ली | लेकिन भूख का क्या? क्या कभी किसी ने भूख को भी बीमार होकर चारपाई पकड़ते देखा है? ग़रीबी और मुफ़लिसी में तो वह और अधिक निखर जाती है, जवान हो जाती है | ग़रीब पर जैसे सब हमला करते हैं, वैसे ही भूख भी पुरज़ोर हमला करती है…| माँ तो फ़िर भी सहन कर ले, लेकिन 4 साल की शिशु-बहन कैसे सहन करे भूख के आक्रमण को…? और 7-8 साल का भाई भी इतन बड़ा नहीं हुआ है कि अधिक दिनों तक भूख के हमले को झेल पाए | और माँ…? गर्भवती माँ अपनी भूख को तो झेल ले, लेकिन अपने गर्भस्थ शिशु के लिए तो उसे भोजन देना ही होगा |

खेलने की महज़ 11 साल की उम्र में उस बालक ने जान लिया, कि एक गर्भवती स्त्री को पर्याप्त भोजन और आराम की ज़रूरत होती है, इसलिए माँ को आराम भी देना होगा और आय के लिए काम पर जाने से रोकना भी होगा, और साथ ही छोटे भाई-बहन के साथ-साथ उसके लिए भी भोजन जुटाना होगा | बेबसी और लाचारी कैसे ग़रीब के बच्चों का बचपन छीनकर निश्चिन्त-निर्द्वन्द्व जीवन जीने की उम्र में उसे ‘ज़िम्मेदार’ और ‘वयस्क’ बना देती है…!?

…लेकिन यहीं पर ध्यान रहे, जनसंख्या-विस्फ़ोट पर भाषण देनेवाले उस स्त्री एवं उसके पति द्वारा उस चौथे गर्भस्थ बच्चे को लेकर कत्तई जनसंख्या-विस्फ़ोट का सवाल न खड़ा करें कि ‘इन लोगों की इस दुर्दशा का कारण उनके घर में चार-चार बच्चों का पैदा होना भी है’ | क्योंकि ग़रीबों द्वारा अधिक बच्चे पैदा करके ‘जनसंख्या विस्फ़ोट’ में बढ़-चढ़कर योगदान देने की भर्त्सना और निंदा करनेवाले लोग कत्तई यह न भूलें कि इस औरत और उसके पति द्वारा चार-चार संतानों को पैदा करना ही/भी उनकी ग़रीबी का ही एक परिणाम है ! ‘तार्किकों’ का तर्क और नाराज़गी अपनी जगह ठीक हो सकते हैं, लेकिन वे यह कदापि न भूलें, कि ग़रीबी अपने-आप में पर्याप्त कारण है अधिक संतानें पैदा करने की, जहाँ अपने बच्चों को कुपोषण एवं बीमारी के कारण लगातार खोते चले जाते माता-पिता अक्सर यह कहते हुए मिलेंगे कि ‘पता नहीं मेरे बच्चों में से कौन ज़िन्दा बचे और कौन नहीं’ | इसके लिए पूरी तरह से हमारी सामाजिक-संरचनाएँ, आर्थिक-विषमताएँ, संसाधनों सहित सारी सुविधाओं (मेडिकल फैसिलिटी सहित) पर ताक़तवर लोगों का कब्ज़ा ही ज़िम्मेदार हैं | साथ ही, हमारे ‘पवित्र दैवीय’ धार्मिक-ग्रंथों में यह आदेश दिया गया है कि शारीरिक श्रम करने वाले वर्गों को अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने चाहिए, जिसका उद्देश्य निश्चय ही यह था कि ‘प्रभु-वर्ग’ की सेवा करनेवाले ‘सेवकों’ की संख्या में कोई कमी न आए और इसके लिए एक तरह से धार्मिक-नारा दिया गया— ‘बच्चे तो भगवान की देन होते हैं’ | वस्तुतः यह सत्य तो दुनिया के प्रत्येक धर्म और प्रत्येक समाज का है, आप कहीं भी किसी भी धर्म और समाज में देख लीजिए, यही नारा अलग-अलग तरीक़ों से सुनाई देगा | और बेहतर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित ग़रीब अशिक्षित समाज और उसके लोग इस ‘धार्मिक षड्यंत्र’ को कहाँ समझ पाते हैं…?

…अब भूख से बेहाल इस परिवार के सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया | पड़ोसी भी कितने दिन मदद करते? और पड़ोसी भी कोई धन्ना-सेठ तो थे नहीं? वैसे यदि वे धन्ना-सेठ होते, तो क्या उतनी भी मदद करते, जितनी उन्होंने अपनी ग़रीबी के बावजूद की? माँ इस हालत में नहीं थी कि बच्चों के लिए कुछ काम करके भोजन की व्यवस्था कर सके | छोटे भाई-बहन खाने के लिए रोज़ बिलखते | हालाँकि स्कूल में इस 11 साल के बालक और उसके 7-8 वर्षीया छोटे भाई को तो एक समय का खाना मिल जाता था, लेकिन 4 साल की बहन और बीमार माँ स्कूल तो नहीं जा सकते थे उस एक वक़्त के भोजन के लिए? उस बालक को समझ में नहीं आया कि वह अपनी छोटी बहन और गर्भवती बीमार माँ के लिए खाने की व्यवस्था कहाँ से करे |

…लाचारी, ग़रीबी और बेबसी भी कमाल की चीज होती है, वह छोटे-छोटे बच्चों को बचपन में ही कितनी ज़िम्मेदार बना देती है | जब बड़े और साधन-संपन्न घरों के लाड़ले और लाड़लियाँ अपने घरों में डाइनिंग टेबल पर सामने परोसी गई स्वादिष्ट व्यंजनों की प्लेट को यह कहकर पटक देते हैं कि उनको ‘यह’ नहीं ‘वह’ खानी है, उस समय छोटे और ग़रीब घरों के बच्चे अपनी उम्र से आगे निकलकर यह सोच रहे होते हैं कि अपने भूखे परिवार के लिए भोजन की किसी भी सामग्री, मामूली से मामूली, की व्यवस्था कैसे और कहाँ से करें | समाज और विद्यालयों में सिखाई जा रही ‘नैतिकता’ और ‘संस्कारों’ के पाठ भी उनका रास्ता कम नहीं रोकते हैं | इस बालक के सामने भी ज़िम्मेदारी और ‘नैतिकता’ की यह परस्पर विरोधी चुनौती मुँह खोले खड़ी थी, वह अपने छोटे भाई-बहनों एवं गर्भवती बीमार माँ के लिए कहाँ से खाना लाए?

एक दिन विद्यालय में मध्याह्न भोजन में रोटी खाते हुए उसे एक तरक़ीब सूझी | दरअसल राजस्थान में भोजन संबंधी आदतों में रोटी का स्थान काफ़ी ख़ास है | …कई राज्यों में लोगों की ख़ास पसंद रोटी की ओर झुकी होती है, तो कई जगह चावल या भात की | यह पसंद प्रायः उन इलाक़ों में होनेवाली पैदावार से प्रभावित होती है | शायद इसी कारण कम वर्षा वाले इलाक़े राजस्थान में रोटी को भात की तुलना में वरीयता प्राप्त है, क्योंकि गेहूँ के उत्पादन में धान की तुलना में कम पानी की ज़रूरत होती है | और शायद इसी कारण वहाँ विद्यालयों में मिड-डे-मील में बच्चों को कभी रोटी तो कभी चावल परोसा जाता है |

…तो उक्त बालक ने विद्यालय में ‘मिड-डे-मील’ में रोटी खाते हुए एक रास्ता चुना— रोटी चुराने का रास्ता ! क्योंकि उसके पास कोई दूसरा उपाय नहीं था, उतने छोटे बच्चे को कोई व्यक्ति काम देता भी तो कैसे? जब विद्यालय में सभी बच्चों को रोटियाँ परोसी जाती थीं, तो वह बालक अपने लिए एक से अधिक रोटियों की इच्छा ज़ाहिर करता | हालाँकि रोटियाँ काफ़ी मोटी होती थीं, जिससे एक या दो रोटी उसकी उम्र के किसी भी बच्चे का पेट भरने के लिए पर्याप्त थीं | अध्यापक या ‘भोजनमाता’ (विद्यालयों में बच्चों के लिए मिड-डे-मील पकाने वाली स्त्री-कर्मचारी को इसी नाम से जाना जाता है) उसकी थाली में दो-तीन मोटी रोटियाँ डाल देते | और जैसे ही वे दूसरे बच्चों को परोसने के लिए आगे बढ़ जाते, वह लड़का फुर्ती से, लेकिन सबकी आँख बचाकर, अपनी थाली में एक रोटी छोड़कर बाक़ी रोटियों को अपनी शर्ट के भीतर छुपा लेता | निश्चय ही शुरू में अध्यापकों ने इसपर गौर नहीं किया होगा | लेकिन कुछ दिनों बाद तो उनका भी ध्यान गया ही होगा | ख़ासकर तब, जब उतने छोटे बच्चे ने तीन-तीन रोटियाँ लेने के बाद भी परोसनेवाले से दोबारा रोटियाँ देने की इच्छा ज़ाहिर की होगी | क्योंकि उसके परिवार में तीन सदस्य थे, जो दिनभर भूखे रहते थे और जिनके लिए उसे व्यवस्था करनी थी |

जिस व्यक्ति से मुझे इस पीड़ादायक घटना की जानकारी मिली, उन्होंने मुझे बताया कि कैसे उन्होंने बच्चे को एक ही समय में तीन बार रोटियाँ ‘चुराकर’ अपनी शर्ट में छिपाते देखा था…

उन्होंने बताया कि बच्चे को जब पहली बार थाली में तीन रोटियाँ दी गईं, तो उसने उसमें से दो रोटियाँ जल्दी से ‘चुराकर’ अपनी शर्ट में छुपा लीं और एक रोटी को खाने लगा | जब उसकी थाली में लगभग आधी रोटी बची थी, तो उससे दुबारा पूछा गया— ‘और रोटी चाहिए?’ तो उसने संकोच के साथ केवल ‘हाँ’ में सिर हिला दिया | उसे दोबारा दो रोटियाँ दे दी गईं, उसने उन दोनों को भी शर्ट में रख लिया और आधी रोटी को ही धीरे-धीरे कुतरता रहा | उसे देखकर कोई भी बता सकता था कि उसे खाने में मन नहीं लग रहा है, बल्कि उसका सारा ध्यान रोटियों को अपनी शर्ट के भीतर पहुँचाने पर है | बच्चे के चेहरे पर बेचैनी, घबराहट और साथ ही एक अपराधबोध भी एकदम साफ़-साफ़ देखा जा सकता था, मेरे परिचित ने ही इसकी जानकारी मुझे दी | परोसने वाले जब वापस आए, तो बच्चे ने तीसरी बार भी दो रोटियों की इच्छा ज़ाहिर की और उनको भी मौक़ा मिलते ही शर्त के भीतर रख लिया | इस तरह कुल 6 रोटियाँ उसकी शर्ट के भीतर जा चुकी थीं और एक रोटी उसके पेट में |

मेरे उक्त परिचित यह सब अपनी आँखों से देखते रहे, लेकिन उन्होंने उस समय किसी से कुछ नहीं कहा | सबके खाना खा चुकने के बाद उन्होंने अकेले में बच्चे से इस पूरी घटना के बारे में पूछा और तब वह दर्दनाक कहानी सामने आई, जिसका ज़िक्र इस लेख के आरम्भ से हो रहा है | उन्होंने तब अध्यापकों से इस घटना के संबंध में पूछा | अध्यापकों ने जो उत्तर दिया, वह सरकारी विद्यालयों के उन चंद गिने-चुने अध्यापकों का चेहरा उजागर करता है, जो अपनी मानवीय-संवेदना से समाज का एक अलग इतिहास गढ़ने की कोशिश में हैं | अध्यापकों ने बताया कि वे लोग जानते हैं कि बच्चा रोटियाँ चुरा रहा है, और यह भी कि किसके लिए एवं क्यों? लेकिन बच्चा यह नहीं जानता कि उसके अध्यापकों को उसकी इस हरकत के बारे में मालूम है | वे बच्चे को भोजन परोसे जाने के बाद उस तरफ़ से अपनी नज़र जानबूझकर घुमा लेते हैं |

जब उनसे पूछा गया कि क्यों उन्होंने बच्चे को नहीं बताया कि वे लोग बच्चे की इस चोरी के विषय में जानते हैं? जवाब मिला— बच्चे पर ग़रीबी, भुखमरी और लाचारी की मार पहले से ही है, यदि वे लोग बता देंगे कि उन्होंने उसे रोटियाँ चुराते देख लिया है, तो उसके स्वाभिमान की भी धज्जियाँ उड़ जाएँगी | अध्यापकों ने कहा—“चोरी तो बड़े-बड़े धन्नासेठ भी करते हैं, और बड़े ही शान से, जिसके लिए उन्हें कभी किसी ने शर्मिंदा होते नहीं देखा, जबकि उनके पास दौलत की कोई कमी नहीं होती है | इस बच्चे ने रोटी चुराई, वह भी अपनी बीमार माँ और भूख से बिलखते भाई-बहन के लिए | यदि इस बच्चे के पास कोई दूसरा विकल्प होता तो यह ऐसा नहीं करता | इसलिए हम सबकुछ जानते हुए भी आँखें बंद कर लेते हैं और कोशिश करते हैं कि बच्चा 5-6 रोटियाँ अपने घर ले जा सके…|” … “आपलोग बच्चे को सीधे-सीधे भी तो रोटियाँ दे सकते हैं, फ़िर चोरी क्यों करने देते हैं? इससे तो वह चोर ही बनेगा?” इस सवाल के जवाब में अध्यापकों का कहना था कि हर रोज यदि वे सामने से बच्चे को भोजन देंगे तो इससे कई समस्याएँ खड़ी होंगी | सबसे पहली समस्या यह कि बच्चा समझ जाएगा कि उसपर दया की जा रही है और इससे उसका आत्म-सम्मान चूर-चूर होकर बिखर जाएगा | दूसरे, कि किसी बच्चे को स्कूल से मिलनेवाला मिड-डे-मील घर ले जाने की इजाज़त नहीं है, समाज के दूसरे लोग अपने-अपने स्वार्थों से आपत्ति कर सकते हैं | बच्चा स्कूल में लंच के दौरान जितना खाना चाहे खा सकता है, लेकिन घर नहीं ले जा सकता | और वे अध्यापक इसी नियम का लाभ उठाते हुए उसकी थाली में उतनी रोटियाँ डाल देते हैं, जितने की वह इच्छा करता है या जितना अध्यापकों के वश में होता है | और समाज इसपर आपत्ति नहीं कर सकता | इस दौरान सबकी आँख बचाकर बच्चा उन रोटियों का क्या करता है, समाज यह अध्यापकों से नहीं पूछेगा, और यदि सबकुछ जानते हुए निर्लज्ज होकर वह पूछता भी है, तो उसका उत्तर वे आसानी से दे सकते हैं |

तब मेरे परिचित ने पूछा कि ‘आपलोग सीधे-सीधे परिवार की मदद क्यों नहीं कर देते? इससे बच्चे को चोरी भी नहीं करनी पड़ेगी और उनकी मदद भी हो जाएगी |’ जवाब मिला कि ‘हमारा समाज इतना पिछड़ा हुआ है कि शिक्षकों द्वारा पवित्र मन से भी एक स्त्री की मदद को उस युवती स्त्री के चरित्र के पतन से जोड़कर दर्ज़नों मनगढ़ंत कहानियाँ कहने लगेगा | तब यह बालक इन बातों को कैसे लेगा और किस प्रकार देखेगा-समझेगा, यह हम कैसे बता सकते हैं? इसीलिए हमें यह रास्ता सबसे आसान लगा…|’

कमाल की बात है ना ! जब किसी जवान स्त्री के बच्चे भूखे हों, उसके परिवार पर हर तरह के संकट हों, तो ‘संस्कारों एवं नैतिकताओं’ का कोई भी ठेकेदार उनकी सुध लेने नहीं आता, लेकिन यदि कोई निःस्वार्थ भाव से उनकी मदद करने लगता है, तो सभी ठेकेदार नैतिकता का झंडा लेकर धर्म की रक्षा के लिए सन्नद्ध हो जाते हैं…

घर में इंतज़ार करते भाई-बहन और गर्भवती माँ अपने भाई/बेटे की शर्ट में छुपाकर लाई गई बच्चे के पसीने से तर-बतर रोटियों के सहारे अपनी भूख से लड़ते हैं | साहब, सब्जी और दाल की बात मत कीजिएगा, वह यहाँ जघन्य अपराध होगा ! उन्हें पसीने से भीगी रोटियाँ मिल जाती हैं, यह भी गनीमत है…! क्या माँ का दिल तड़पता नहीं होगा अपने बच्चे को रोज़-रोज़ रोटियाँ चुराकर लाते हुए…? लेकिन वह क्या करे…? आप भी कुछ मत कहिए, यदि आप कुछ कर नहीं सकते तो…!!!

मैं अक्सर सोचती हूँ कि रोटियों को तो शर्ट में छुपाना आसान है, लेकिन जिस दिन स्कूल में बच्चों को मिड-डे-मिल में भात या कोई ऐसी ही गीली चीज दी जाती होगी, उस दिन बच्चा क्या करता होगा? क्योंकि भात को तो शर्ट के भीतर नहीं रखा जा सकता? क्या उस दिन बच्चे के छोटे भाई-बहन को खाने के लिए कुछ नसीब हो पाता होगा? उसकी 4 वर्षीया शिशु बहन फ़िर कैसे सँभाली जाती होगी भूख से बिलखने पर?… और जब दशहरा, दीपावली जैसे उल्लासमय उत्सवों के लिए विद्यालय में लंबी-लंबी छुट्टियाँ पड़ती होंगी, तब…? तब यह परिवार क्या करता होगा? गर्मी की महीने-डेढ़ महीने अथवा सर्दी की कुछ सप्ताह की लंबी छुट्टियों में उन्होंने क्या खाया होगा…? …

‘नैतिकता’, ‘संस्कार’, ‘परम्परा’, ‘आदर्श’, ‘धर्म’, ‘पाप-पुण्य’, ‘अपराध’, ‘दण्ड-विधान’ पर बड़ी-बड़ी बौद्धिक जुगाली करनेवाले समाज के पुरोधा यदि कुछ बता सकते हैं, तो कृपया बताएँ…

  • डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

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2 thoughts on “मध्याह्न भोजन — दो

  1. सुप्रभात कनक मैडम, आप के ब्लाॅग उद्द्वेलित कर देते हैं और अपने अनुभव भी याद आने लगते हैं।ऐसा लगता है कि किसी फिल्म की शूटिंग चल रही है और हम प्रत्यक्षदर्शी हैं उन सब घटनाओं के।
    A big salute to you.

  2. बहुत ही मार्मिक ?
    गरीबी, लाचारी, बेबसी बहुत कुछ करवा देती है। आपने बहुत बेहतरीन तरीके से बेहतरीन बातों, सच्चाई को एक बेहतरीन कहानी के माध्यम से उजागर किया। साधुवाद ???

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