बतकही

बातें कही-अनकही…

भाग-दो :- कक्षा में बैठने की व्यवस्था भी लोकतान्त्रिक हो

विद्यालय वह स्थान है, जहाँ ज्ञान की न तो कोई सीमा होती है, न कोई दायरा; वहाँ न सीखने के लिए कोई भी चीज बेकार समझकर नज़रंदाज़ की जा सकती है, न की जानी चाहिए | और इसलिए जिन अध्यापकों ने यह तय कर लिया हो कि उनका एक ही लक्ष्य है— समाज को सहिष्णु बनाते हुए उसके भीतर सह-अस्तित्व की भावना को उन सभी रूपों में अधिकतम पिरोना, जिसमें नागरिकों का कोई भी व्यवहार किसी को भी किसी भी रूप में अपमानजनक, कठोर, उपेक्षापूर्ण या तिरस्कारपूर्ण न लगे; तो वह अध्यापक अपने विद्यार्थियों में हर उन विशेषताओं का विकास करने की कोशिश करेगा, जो उसके विद्यार्थियों में ऐसे ही मूल्यों का समावेश कर सके | वह अध्यापक सीखने-सिखाने के किसी भी क्षेत्र को नज़रअंदाज नहीं करेगा, वह अपने विद्यालय में हो रही छोटी-से-छोटी बात, छोटी-से-छोटी गतिविधि पर भी पूरा ध्यान रखेगा…

अब कौन विश्वास करेगा कि कक्षा में छात्र-छात्राओं के बैठने की व्यवस्था के माध्यम से भी बच्चों में सह-अस्तित्व, परस्पर-स्वीकार्यता, सहिष्णुता, परस्पर-सहयोग, पीछे छूट गए बच्चों की हौसलाअफ़जाई, साधन-संपन्न बच्चों का बेहतर शैक्षणिक वातावरण पाकर कुछ अधिक आगे बढ़ जाने से उत्पन्न अपनी ‘तीक्ष्ण बुद्धि’ एवं ‘श्रेष्ठ’  होने के अहंकार से मुक्ति आदि को प्रोत्साहित किया जा सकता है? शायद ही किसी को विश्वास हो, लेकिन यह सच है ! जिसका प्रयोग करते हैं विनय शाह… जीआईसी, नाहसैंण (कोट ब्लॉक, पौड़ी) के अंग्रेज़ी विषय के प्रवक्ता ! और जिस व्यवस्था को स्वयं विनय ही ‘लोकतांत्रिक प्रयोग’ कहते हैं |

बैठे की व्यवस्था में लोकतांत्रिकता? यह क्या है? किसी का बैठना भी कोई ध्यान देनेवाली चीज है क्या? किसी का उठना-बैठना ध्यान देनेवाली चीज है या नहीं, यदि इसे समझना हो, तो फ़्रेंच नारीवादी चिन्तक सिमोन दा बोउवार को पढ़ना चाहिए, ख़ासकर उनकी पुस्तक ‘द सेकेण्ड सेक्स’ (अनुवाद प्रभा खेतान की ‘स्त्री-उपेक्षिता’) | हालाँकि सिमोन ‘सेकेण्ड सेक्स’ अर्थात् दूसरी या दोयम दर्ज़े वाली आबादी, यानी ‘स्त्रियों’ की बात अपनी इस पुस्तक में करती हैं, लेकिन किसी को बैठने की व्यवस्था मात्र से ही कैसे और किन कारणों से नियंत्रित किया जा सकता है, इसे समझने में यह पुस्तक बहुत मदद करती है |

इस पुस्तक का नाम लेने का कारण केवल इतना ही है कि अनेक व्यवस्थाओं में से एक, बैठने की व्यवस्था से भी किसी सामाजिक-समूह, वर्ग, श्रेणी आदि को नियंत्रित भी किया जा सकता है और अनियंत्रित भी; अर्थात् उसके पंख काटे भी जा सकते हैं तो उसके पखों में परवाज़ भरी भी जा सकती है | और इस व्यवस्था से किसी के आत्म-सम्मान एवं आत्म-विश्वास को अपने पैरों तले कुचलकर उसे हीन-दीन अवस्था में पहुँचाया भी जा सकता है, तो उसके भीतर आत्म-सम्मान एवं आत्म-विश्वास को आसमान की ऊँचाई तक ले भी जाया जा सकता है | यदि इसे समझना हो तो किसी भी पारंपरिक सरकारी विद्यालय के भीतर जाकर बच्चों की कक्षा में उनके बैठने की व्यवस्था को देखना चाहिए | इससे भी अधिक अच्छा यह होगा कि हम अपने अतीत में एक बार झाँकें और अपने विद्यालयी-शिक्षा के दिनों को याद करें, जब निजी विद्यालय इक्का-दुक्का ही हुआ करते थे और हम सबकी शिक्षा प्रायः सरकारी विद्यालयों में ही होती थी…

अब सवाल है कि बैठने की पारंपरिक व्यवस्था से तो हम भली-भाँति परिचित हैं, लेकिन कक्षा के भीतर बैठने की लोकतांत्रिक-व्यवस्था क्या और कैसे की जा सकती है? तो चलते हैं विनय शाह की क्लास में और देखते हैं उस लोकतांत्रिकता को |

उनकी कक्षा में भी तरह-तरह के विद्यार्थी हैं— कुछ बेहद शरारती, तो कुछ बेहद शांत स्वभाव वाले आज्ञाकारी क़िस्म के विद्यार्थी, जबकि कुछ विद्यार्थी इन दोनों स्थितियों की अति वाली अवस्था से कुछ दूर मध्यम-मार्गी टाइप के; कुछ विद्यार्थी पढ़ने में बहुत बेहतरीन, तो कुछ ठीक-ठाक और कुछ औसत से कम; कुछ बेहद जिज्ञासु, तो कुछ के मन में शायद कोई सवाल ही नहीं उठता…| यानी कक्षा विविधताओं से भरी रहती है— हर विद्यार्थी अपने-आप में एक अलग क़िस्म का, सबका अपना व्यक्तित्व, सबकी अपनी मनःस्थिति, सबके अपने विचार, सबकी अलग सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि…वैविध्य की कोई कमी नहीं…!

वैसे शरारती एवं चंचल बच्चों तथा उनके बरक्स शांत एवं आज्ञाकारी बच्चों के सन्दर्भ में मेरी धारणा थोड़ी अलग-सी है | क़ायदे से मुझे शरारती एवं चंचल बच्चे या विद्यार्थी पसंद आते हैं, क्योंकि मैं यह मानकर चलती हूँ एक सीमा तक अभी उन्होंने अपनी मौलिकता और अपना प्राकृतिक-स्वभाव बचाकर रखा है, समाज एवं संस्कृति की पारंपरिक बेड़ियाँ अभी उनको बाँध पाने में कामयाब नहीं हो सकती हैं, उन बच्चों ने अपनी स्वाभाविकता की रक्षा के लिए संघर्ष ज़ारी रखा है | तभी तो उनकी चंचलता और शरारतीपन अभी जीवित है; और कक्षा में ही नहीं, परिवार, समाज, दोस्तों की मंडलियों तक में भी वे अपने अनेक नए एवं कई बार अजीब-अजीब प्रश्नों से सबकी नाक में दम किए रहते हैं | कुछ विशिष्ट करने, नया रचने, समाज को नई दिशा में ले जाने, प्रयोग करने और उन प्रयोगों से नई इबारत लिखने की क्षमता जैसी बातें अक्सर इन्हीं चंचल, शरारती और लगातार प्रश्न करते बच्चों में होती है | विभिन्न समाजों और संस्कृतियों में उनके नायकों का इतिहास उठाकर देखना चाहिए, ख़ासकर उनके बचपन एवं कैशोर्य का इतिहास | जबकि शांत एवं आज्ञाकारी बच्चों से बहुत सहानुभूति होती है क्योंकि शायद ये बच्चे अपने मन के किसी कोने में अपनी पराजय को स्वीकार कर चुके होते हैं और समाज का प्रवाह उन्हें जिस दिशा में ले जाना चाहता है, वे बिना किसी विरोध के चले जाते हैं…

दरअसल समाज और संस्कृतियों की कोशिश ही होती है अपने बच्चों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसी साँचे और खाँचे में ढालते जाना जो सदियों पहले बनाई गई थीं, ताकि उसकी समस्त व्यवस्थाएँ अक्षुण्ण रहें और समाज में वर्चस्ववादी वर्ग की सत्ता एवं परिवार में पुरुष की सत्ता कायम रहे | और इसके लिए वे बच्चों को ‘आज्ञाकारिता’, ‘अनुकरण’ प्रश्न की बजाय ‘आस्था’ की शिक्षा देते हैं | यह शिक्षा दोनों तरह के लोगों को दी जाती है ताक़तवर को भी और कमज़ोर को भी | ताक़तवर को अपनी सत्ता कायम रखने के लिए कमज़ोरों को दमित करने से संबंधित अपने वर्ग के बड़ों के प्रति आज्ञाकारिता एवं अनुकरण की शिक्षा; तो कमज़ोरों को अपनी औक़ात में रहने के लिए अपने जैसे अन्य कमज़ोरों के अनुकरण और ताक़तवरों के आज्ञापालन की शिक्षा | परिवार में दादियों, माँओं आदि का अनुकरण करते हुए पिताओं-भाइयों की आज्ञाओं का पालन करती बेटियाँ एकदम अपनी आँखों से दिखाई देंगी |

…जब कोई माता-पिता कभी अपने बच्चों के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि ‘मेरे बेटे/बेटी ने सबकी नाक में दम कर रखा है, इसकी शरारतों से हम तंग आ गए है | काश, ये थोड़े-से आज्ञाकारी हो जाएँ, तो हमको भी चैन मिले’; तो मैं कहती हूँ “मुबारक हो, आपका बच्चा समाज में एक नया इतिहास रच सकता है | कृपया इसकी चंचलता को आप कुछ सालों तक सहन कर लें | कुछ सालों के बाद शायद आपको अपने इसी बच्चे पर गर्व भी हो सकता है…|” और जब किसी माता-पिता को अपने बच्चों, ख़ासकर बेटियों की आज्ञाकारिता पर गर्व करते देखती हूँ, तो उनसे अवश्य कम-से-कम एक बार कहने की कोशिश करती हूँ “आपकी बेटी की आज्ञाकारिता आपको जीवन भर रुलाने वाली है, क्योंकि आज्ञाओं की आदी आपकी बेटी अपने जीवन की हर छोटी-बड़ी समस्या को सुलझाने के लिए आपका या किसी का भी केवल मुँह ही देख सकेगी, क्योंकि उसे आज्ञा-पालन की आदत है, स्वयं सोचने और करने की नहीं | इसलिए आपको जीवनभर अपनी बेटी को असहाय देखना होगा, हमेशा उसकी मदद के लिए तैयार रहना होगा, क्योंकि वह अपनी मदद नहीं कर सकती | इसलिए हो सके तो उसे उसे थोड़ी चंचल और जिज्ञासु बनाएँ …!”

…तो विनय शाह क्या करते हैं, ऐसी सामाजिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध या पक्ष में, अपनी कक्षा में लोकतान्त्रिक व्यवस्था के भीतर? और उनके उद्देश्य क्या हो सकते हैं ऐसा करने के? ज़रा उनकी कक्षा में झाँकते हैं, चुपके-से, बिना उन सबको डिस्टर्ब किए…

कक्षा में विद्यार्थी शोरगुल करते हुए एक-दूसरे से बातें करने में मशगूल हैं, कुछ इधर-उधर घूम कर दूसरों के साथ शरारतें करने का आनंद भी उठा रहे हैं | विद्यालय में कुछ ही समय पहले स्थानांतरित होकर आए विनय शाह तभी कक्षा में आते हैं, उन्हें देख कुछ बच्चे तो ‘सलीके’ से बैठ गए हैं, लेकिन लगता है कुछ विद्यार्थी अभी भी शरारत के मूड में हैं | विनय अनुमान लगाते हैं, पूरी कक्षा को ध्यान से देखते हैं, जिस प्रकार वे पिछले कुछ दिनों से देख रहे हैं | एक-एक कर सभी बच्चों के मिजाज़ को समझने की कोशिश कर रहे हैं | उनको बच्चों से दोस्ती भी तो करनी अभी बाक़ी है, और अपनी प्रयोगधर्मिता और उसकी रोचकता का परिचय भी उनको देना है; जिसके कई दूरगामी उद्देश्य और उसके परिणाम विनय ने मन-ही-मन सोच रखे हैं | वे विद्यार्थियों से कहते हैं— “चलिए, आज हम नए तरीक़े से बैठते हैं…| आपलोग एकदम रिलैक्स होकर बैठिए, जैसे आप बैठना चाहें |” बच्चे चौंकते हैं— ‘ये नई बात क्या हुई…!’ लेकिन विनय के थोड़े और प्रोत्साहन के बाद बच्चों की झिझक थोड़ी कम होती है और कुछ बच्चे अपनी इच्छानुसार बैठने की कोशिश करते हैं, कोई अपने दोस्तों के साथ बैठता है, तो कोई अपने किसी सहपाठी संबंधी के साथ | एक शरारती लड़का कुछ अधिक मुस्कुरा रहा है और यह क्या? वह तो पालथी मारकर बैठ गया अपनी कुर्सी के ऊपर पैर रखकर ! अब विनय क्या करेंगे? क्या होगा उनकी प्रयोगधर्मिता का?

अरे, यह क्या, वे तो मुस्कुरा रहे हैं ! वे कह रहे हैं— ‘बहुत बढ़िया, यदि तुम्हे ऐसे बैठना पसंद है, तो मज़े से बैठो…!’ अरे, यह क्या उन्होंने कुछ और बच्चों को भी उसी तरीक़े से पालथी मारकर बैठने को प्रोत्साहित किया ! क्या इस तरह ये कक्षा व्यवस्थित रह पाएगी? पता नहीं ! लेकिन यह क्या, अभी तो दस मिनट भी नहीं बीते और वह शरारती लड़का अपने पैरों में दर्द महसूस करने लगा ! अब उसने बड़े सलीक़े से अपने पैर नीचे कर लिए हैं और ठीक से बैठ गया है, एक कक्षा के विद्यार्थी की तरह ! विनय अन्य बच्चों को भी अपनी सुविधानुसार पैर सीधे करने को कहते हैं |

ओहो..,! तो विद्यार्थियों को सबसे पहले आराम की स्थिति देना उनका उद्देश्य है, शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से, ताकि वे उन्हें बता सकें कि उनका मकसद बच्चों को बहुत सहज ढंग से पढ़ाना है, किसी बोझ की तरह नहीं, जिसके लिए कक्षा में भी वे अपनी सहूलियत के अनुसार बैठ सकते हैं ! और क्या वे इस गतिविधि द्वारा यह भी विश्वास दिलाना चाहते हैं कि वे अपने विद्यार्थियों के सहज-मित्र हैं, न कि कोई कठोर छड़ी-धारक गंभीर गुरु…? क्या इसके माध्यम से वे बच्चों का विश्वास जीतने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि आगे के प्रयोगों के प्रति उनको आश्वस्त कर सकें, उन्हें विश्वास दिला सकें कि उनके सभी प्रयोग उनके भविष्य-निर्माण और उनकी बेहतरीन शिक्षा के हित में सहायक बनेंगे, बाधक नहीं? हाँ, शायद यही बात हो…!

विनय अपने विद्यार्थियों का विश्वास जीतने के बाद पढ़ने-पढ़ाने के संबंध में भी दर्जनों नवीन प्रयोगों के साथ-साथ कक्षा में केवल बैठने के पैटर्न के माध्यम से भी बहुत सारे उद्देश्यों की ओर बढ़ते हैं, जिसमें वे निरंतर अपने इन किशोरवय विद्यार्थियों से परामर्श भी करते हैं, उनकी राय भी लेते हैं, सहमति भी और उनका सहयोग भी माँगते हैं |

कक्षा में सभी स्वाभाविक रूप से ‘तेज़’ और ‘होशियार’ बच्चे हमेशा आगे बैठने को लालायित रहते हैं, ताकि अपने अध्यापकों की नज़र में आ सकें; जबकि ‘कमज़ोर’ और ‘मंदबुद्धि’ समझे जाने वाले बच्चे हमेशा कोई अँधेरा कोना ढूँढते हैं | लेकिन विनय ने तो जैसे ठान रखी है कि वे अपनी कक्षा के किसी भी बच्चे को ‘कमज़ोर’, ‘नालायक’ और ‘मंदबुद्धि’ रहने ही नहीं देंगे— न सहपाठियों की नज़र में, न बच्चों की अपनी ही नज़र में और न समाज या परिवार की नज़र में…! उनके सभी विद्यार्थी क़ाबिल हैं, क़ाबिल ही समझे जाएँगे |

इसके लिए वे अनेक विधियाँ अपनाते हैं | एक विधि है रोटेशन की, अर्थात् जैसे हाथ में माला के दाने घूमते हैं, कुछ वैसे ही | कक्षा में पहली या सबसे आगे की पंक्ति में बैठनेवाले बच्चे दूसरी पंक्ति में चले जाते हैं, दूसरी पंक्ति वाले तीसरी में और इसी प्रकार सबसे अंतिम पंक्ति के विद्यार्थी सबसे आगे चले आते हैं, जो पुनः अगले दिन दूसरी पंक्ति में चले जाते हैं, ताकि पिछले दिन जो बच्चे आखिरी पंक्ति में बैठे थे, वे पुनः सबसे आगे आ सकें | इससे सभी बच्चों को आगे बैठने का अवसर मिल जाता है |

एक शिक्षक की दृष्टि में इसके कई लाभ हैं | सबसे आख़िरी में बैठनेवाला विद्यार्थी भी सबसे आगे बैठकर अपने अध्यापक की ‘नज़र में आता’ है और अपनी पढ़ाई में सजग होने लगता है, न कि कक्षा के अँधेरे कोने में छिपकर अपने जीवन के अँधेरों में ही शरण पाने की कोशिश करता है | इसके अलावा, ‘सबसे होशियार’ विद्यार्थी भी सबसे आख़िरी की पंक्ति में बैठकर उस ‘अँधेरे’ की उपस्थिति और उसकी तकलीफ़ को महसूस करता है और पिछली कक्षाओं में अपने उन सहपाठियों के प्रति सदय और सहिष्णु बनता है, जो कभी उन्हीं अँधेरे कोनों में क़ैद रह गए | इससे उसके मन का मानवीय क्षेत्र जीवित होने लगता है, जहाँ मानवतावादी मूल्य सोये रहते हैं | साथ ही, कभी उन्हीं अँधेरे कोनों के वाशिंदे सहपाठी भी पहली पंक्ति में बैठकर यह महसूस कर पाते हैं कि कई सालों से पहली पंक्ति में बैठनेवाले उनके सहपाठी उनके प्रति कुछ असहिष्णु-से क्यों हो जाते थे…

पहली और आख़िरी पंक्ति के बीच संतुलन स्थापना का यह प्रयास कक्षा को कितना मानवीय और सौहार्दपूर्ण बनता होगा, यह विनय की कक्षाओं में जाकर देखना चाहिए, सच का अनुमान शायद तभी होगा | ये तो पहली और आख़िरी पंक्ति के बीच संतुलन की कोशिश हुई, लेकिन किसी कक्षा में केवल इतना ही तो नहीं होता, कक्षाओं में बच्चों की बौद्धिक भिन्नता भी होती है, किसी बच्चे को पढ़ने-लिखने का अच्छा माहौल मिल जाता है, जबकि कुछ बालकों-बालिकाओं की सुबह माता-पिता की आर्थिकोपार्जन में मदद से होती है और दिन भी ऐसे ही उनकी मदद में बीतता है, अर्थात् आर्थिक रूप से कुछ कमज़ोर परिवारों के लड़के-लड़कियाँ सुबह उठकर अपने हाथों में नाश्ते की प्लेट के साथ अपनी क़िताब-कॉपियाँ नहीं थाम पाते, बल्कि खेत या दूकान पर जाकर माता-पिता की मदद करते हैं | ऐसे बच्चों की मदद के लिए विनय क्या प्रयोग करते हैं अपनी कक्षाओं में? …और मदद की ज़रूरत तो उन बच्चों को भी होती ही है, जिन्हें पढ़ने की अच्छी सुविधा मिल जाती है, लेकिन अलग क़िस्म की …तब विनय उनके लिए क्या करते हैं…?

दरअसल उनकी कक्षाएँ इस मामले में भी काफ़ी निराली हैं | प्रत्येक पंक्ति पर कम से कम एक विद्यार्थी ऐसा होता है, जो अपने जीवन में अवसर पाकर अपनी बौद्धिक क्षमता बेहतर स्तर तक पहुँचा चुका होता है और कम से कम एक ऐसा विद्यार्थी, जिसे पढ़ने-लिखने के वैसे ही अच्छे मौक़े नहीं मिले और वह अपने सहपाठियों की तुलना में कुछ पिछड़-सा गया | इससे क्या होता है? दरअसल तब ये विद्यार्थी एक-दूसरे की मदद करते हैं पढ़ने-लिखने में, एक-दूसरे को समझने की कोशिश करते हैं और तब उनको समझ में आता है कि उनके कुछ सहपाठी पढ़ने-लिखने में या अन्य शैक्षणिक गतिविधियों में पीछे क्यों और कैसे रह गए? साथ ही ‘कमज़ोर’ बच्चे भी समझ पाते हैं की पढ़ाई में ‘होशियार’ बनना इतना भी मुश्किल नहीं है, जितना वे समझते थे | ‘चक दे इण्डिया’ फ़िल्म में वह दृश्य तो सबको याद ही होगा, जिसमें झारखण्ड की आदिवासी लड़कियों को कमज़ोर समझकर उनसे लड़ते रहनेवाली लड़कियाँ ही उनकी मददगार बनती हैं…

…विनय की कक्षा में एक पंक्ति में साथ बैठनेवाले इन विद्यार्थियों का स्थान भी पुनः कुछ दिनों बाद बदल जाता है और अब वे अपने दूसरे सहपाठियों के साथ बैठते हैं | इस तरह पूरी कक्षा को अपने प्रत्येक सहपाठी के साथ बैठने और उसे क़रीब से जानने-समझने के मौक़े मिलते हैं | जबकि हम पारंपरिक कक्षाओं में इसके विपरीत विद्यार्थियों के अनेक छोटे-छोटे समूह बने हुए पाते हैं, लेकिन यहाँ पूरी कक्षा ही प्रायः एक विशाल समूह बन जाती है, जिसका प्रत्येक विद्यार्थी अपने प्रत्येक सहपाठी को न केवल नज़दीक से जानता और समझता है, बल्कि उसके प्रति सहानुभूति और आत्मीयता भी महसूस करता है, जो अंततः सह-अस्तित्व, परस्पर सहयोग और कक्षा में सौहार्दपूर्ण वातावरण निर्मित करने में मदद करती है | इस पूरी प्रक्रिया में सामाजिक-पृष्ठभूमि, जैसे विविध वर्ग, धर्म आदि का भी समायोजन किया जाता है | कमाल की बात तो यह है कि कुछ दिनों के अभ्यास के बाद बच्चों को यह इतना पसंद आने लगता है कि वे बिना अध्यापक की पहल के स्वयं ही इस प्रक्रिया में शामिल हो जाते हैं, शिक्षक के कक्षा में आने से पहले | लोकतंत्र और लोकतंत्र की शिक्षा और किसे कहते हैं…

क्या यही उद्देश्य है विनय के इन लोकतान्त्रिक-प्रयोगों का? शायद हाँ…! आप क्या सोचते हैं…

–डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

Related Posts

2 thoughts on “विनय शाह : लोकतान्त्रिक प्रयोगों का अध्यापक

  1. विनय सर एक प्रयोगधर्मी शिक्षक है और छात्रों का हित सर्वोपरि है।

  2. Abhi me half hi padh paya hu pura karunga fir comment karunga but jitna bhi padha h bahut achha h aage bhi achha hi hoga

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!