बतकही

बातें कही-अनकही…

भाग-दो : सब साथ चलें, तो मंज़िलें आसान हों !

किसी भी कार्य-स्थल पर कार्य की सफ़लता और उस सफ़लता की मात्रा एवं गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि वहाँ कार्यरत लोगों के परस्पर संबंध कैसे हैं— उनमें प्रतिद्वंद्विता, ईर्ष्या, एक-दूसरे को नीचा दिखाने एवं हानि पहुँचाने जैसी प्रवृत्तियाँ हैं; अथवा उनमें परस्पर सहयोग, सह-अस्तित्व की स्वीकार्यता, एक-दूसरे की मदद से आगे बढ़ना और बढ़ाना जैसी सकारात्मक प्रवृत्तियाँ हैं ! दोनों ही परिस्थितियों में उनका असर उस स्थान पर होनेवाले कार्यों एवं सभी लोगों पर बहुत आसानी से देखा जा सकता है | यदि पहली स्थिति होगी, तो वह वहाँ ख़राब गुणवत्ता वाले कार्यों के रूप में दिखेगी, वहाँ हमेशा अस्त-व्यस्तता की स्थिति होगी, सदैव कर्मचारियों के चेहरों, स्वभावों एवं भाषा में झुंझलाहट, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, नाराज़गी दिखाई देगी; और यदि दूसरी परिस्थिति होगी, तो वातावरण में एक अलग क़िस्म की ख़ुशनुमा गरमाहट महसूस होगी, जैसी किसी ने आकाश से बहुत-सी सकारात्मक ऊर्जा बटोरकर वहाँ लाकर बिखेर दी हो— सभी के चेहरे खिले हुए, गुनगुनाती आँखें, वाणी में शहद, लहजे में संगीत, व्यवहार में शीतल अपनापन… ये सब कोई अजनबी भी महसूस कर लेगा !

और किसी संस्थान में या कार्य-स्थल पर कैसा वातावरण होगा, यह काफ़ी कुछ, या यूँ कहा जाए कि सबसे अधिक, उस संस्थान के लीडर या नेतृत्वकर्ता पर निर्भर करता है | लीडर का सकारात्मक या नकारात्मक व्यवहार, सोच एवं नज़रिया ही अन्य सदस्यों की मनोवृत्तियों या प्रवृत्तियों को नियंत्रित या प्रोत्साहित करते हैं |

राजकीय प्राथमिक विद्यालय, खैरासैंण (जयहरीखाल, पौड़ी-गढ़वाल) एक ऐसा ही विद्यालय है, जहाँ उपरोक्त वर्णित परिस्थितियों में से दूसरी स्थिति महसूस की जा सकती है, जिसकी प्रधानाध्यापिका हैं— विनीता देवरानी और वर्तमान में सहायक-अध्यापक हैं अनूप कुमार बर्थवाल; तथा अन्य कर्मचारियों में वर्तमान भोजनमाता ऐश्वर्या शामिल हैं |

जैसाकि ऊपर कहा गया है कि नेतृत्वकर्ता का नज़रिया और व्यवहार अपने अन्य सहयोगियों के सकारात्मक-नकारात्मक व्यवहारों को तय करता है, तो विनीता के सन्दर्भ में इसे समझने के लिए उनके व्यवहार को, उनकी भाषा और लहज़े को ध्यान से देखना चाहिए…

जब भी उनसे बात होती है, तो अपनी बातचीत में वे अपने विद्यार्थियों को बहुत ख़ास शब्दों से संबोधित करती हैं; अपने विद्यार्थियों के बारे में बात करते हुए उनका वाक्य इन शब्दों से आरम्भ होता है— “मेरी बेटियों ने / मेरे बेटों ने…” | उनसे यदि कोई अजनबी बात करे, और उसमें उनके विद्यार्थियों का ज़िक्र आए, तो सुननेवाले को यही लगेगा कि शायद वे अपनी संतानों के बारे में बात कर रही हैं | लेकिन जो लोग उन्हें जानते हैं, वे समझ इन शब्दों का सन्दर्भ जानते हैं |

एक संस्था में काम करते हुए मुझे शिक्षकों के बीच जाने के कई बड़े अच्छे मौक़े मिले, विभिन्न कार्यक्रमों में भी और उनके कार्यस्थलों, यानी विद्यालय, पर भी | उन अवसरों पर मैं शिक्षकों के व्यवहार और गतिविधियों को बड़े ग़ौर से देखती थी, बातचीत में आए शब्दों, उसे कहने के लहजों आदि पर ग़ौर करती | दरअसल ऐसा करना, एक तो मेरे भीतर के विद्यार्थी की आदत है, जो समाज और व्यवस्थाओं को समझने की कोशिश में कुछ चीजों को एक जिज्ञासु विद्यार्थी की नज़र से ग़ौर से अवलोकन करती रहती है; दूसरे, उक्त संस्था में रहते हुए यह मेरा काम भी था कि अध्यापकों के काम को और उससे जुड़ी आवश्यक गतिविधियों को ध्यान से देखते हुए उस ‘सत्य’ तक पहुँचने की कोशिश करूँ, जो अध्यापकों की बातों एवं कई बार उनके द्वारा जानबूझकर किए जा रहे छद्म ‘लोकतांत्रिक-मानवीय-व्यवहारों’ से प्रकट नहीं होता, ताकि ‘कथनी और करनी’ के अंतर को समझा जा सके | हालाँकि उक्त संस्था में भी ऐसे लोग थे, जिनकी कथनी-करनी में ज़मीन-असमान का अंतर होता था, लेकिन मैं अपनी समझ से यही मानकर चलती थी कि कम-से-कम उक्त संस्था का अपना वास्तविक उद्देश्य यही है |

अस्तु, विनीता से बातचीत के दौरान उनकी भाषा में आनेवाले शब्दों पर मेरा ध्यान अनायास चला जाता है | उसी बातचीत के दौरान शुरू में कई बार मुझे लगता था कि वे अपने बच्चों के बारे में बात कर रही हैं, लेकिन बातचीत आगे बढ़ने पर पता चलता है कि वे दरअसल अपने ‘छात्र-छात्राओं’ के बारे में बात कर रही हैं | उनके ऐसे ही चंद शब्दों से उनके कार्यस्थल की अनदेखी परिस्थितियों की प्राथमिक समझ बनी; उसके बाद जब उनके कार्यों को एवं कार्यस्थल के बारे में गहराई से जानने के अवसर मिले, तो वह प्राथमिक समझ गहरी होती चली गई |

अपने विद्यालय की प्रधानाध्यापिका विनीता के विद्यालय में वर्तमान में सहायक-अध्यापक के पद पर अनूप कुमार बर्थवाल कार्यरत हैं, जिन्हें विनीता अपने बड़े भाई का स्थान और सम्मान देती है | वे अपने पूर्व सहयोगियों, ख़ासकर सहायक-अध्यापकों के योगदान को भी कम महत्वपूर्ण नहीं मानती; बल्कि विनीता का कहना है कि उनसे अधिक उनके साथियों ने उक्त विद्यालय को इस मुक़ाम तक पहुँचाने में परिश्रम किया है | विनीता के इस विद्यालय में नियुक्ति के बाद विद्यालय के पूर्व सहायक-अध्यापकों में योजना ध्यानी, ऊर्मिला रावत, मंजू जैकब शामिल हैं | इसी के साथ भोजनमाताएँ विजयलक्ष्मी एवं ऐश्वर्या का काम भी काफ़ी महत्वपूर्ण है | कहते हैं, कि ‘संगत से गुण होत है, संगत से गुण जात’; उसी का प्रतिफ़लित रूप इस विद्यालय में देखा जा सकता है | जब विद्यालय की प्रधानाध्यापिका लगातार सक्रिय रहती हों, विद्यालय एवं बच्चों के हित में किसी भी काम को करने के लिए हमेशा तत्पर रहती हों, बच्चों से स्नेहपूर्ण व्यवहार करती हों, अपनी ज़िम्मेदारियों का काफ़ी गंभीरता से निर्वहन करती हों; तो अन्य कर्मचारियों को इससे न केवल प्रेरणा मिलती है, बल्कि वे उत्साहित भी होते हैं, नए कार्यों एवं नई ज़िम्मेदारियों का दायित्व उठाने को हमेशा ख़ुशी-ख़ुशी तत्पर भी रहते हैं; बल्कि यूँ कहा जाए कि वे सभी अपने गुणों के विस्तार का अवसर एवं वातावरण पाकर उसी की अभिव्यक्ति करते हैं |

और यदि नेतृत्वकर्ता अपने साथियों के व्यक्तिगत सुख-दुःख, परेशानियों एवं तकलीफ़ों के प्रति सदय, संवेदनशील, सहायक भी हो तो क्या कहना; क्योंकि सच तो यही है कि किसी का भी सार्वजनिक जीवन उसके व्यक्तिगत जीवन से सर्वथा पृथक नहीं हो सकता, इन दोनों का असर एक-दूसरे पर कमोवेश होता ही है | उक्त विद्यालय में पहले दो भोजनमाताएँ होती थीं— ऐश्वर्या और विजयलक्ष्मी; लेकिन आगे चलकर 2018 में बच्चों की संख्या कम हो जाने के कारण विजयलक्ष्मी को इस काम से हटना पड़ा | पहले से ही भोजनमाताओं की तनख्वाह बहुत कम होती है, नाममात्र की, इसलिए ज़ाहिर है कि अक्सर इस कार्य में प्रायः वे ही महिलाएँ आती हैं, जिनके सामने बहुत अधिक आर्थिक तंगी हो | ऐसे में यदि यह काम भी उनसे छिन जाए, तो उस महिला की स्थिति समझी जा सकती है | जब विजयलक्ष्मी के पास ‘भोजनमाता’ का काम नहीं रहा, तब उनकी आर्थिक मज़बूरी को समझते हुए विनीता ने उन्हें विद्यालय एवं उसकी फुलवारी की देखभाल की ज़िम्मेदारी सौंप दी, जिसके लिए वे अपने पास से मानदेय देती थीं | हालाँकि लॉकडाउन के दौरान विजयलक्ष्मी को कोई और काम मिल गया |

सवाल है कि समाज की दृष्टि में बेहद मामूली समझी जानेवाली भोजनमाता, जिसके प्रति प्रधानाध्यापिका की कोई अनिवार्य ज़िम्मेदारी नहीं है, के लिए जो व्यक्ति इस हद तक सोच सकता है और सक्रिय सहयोग भी करता है, वह अपने अन्य सहकर्मियों के प्रति भी सदय होगा ही | इसका असर सहकर्मियों के मनो-मस्तिष्क पर होना ही है |

प्रमाण रूप में… वर्तमान भोजनमाता ऐश्वर्या अपने बच्चों के जन्मदिन पर साल में दो बार विद्यालय में विद्यार्थियों को दावत देती हैं, जिसमें बच्चों के भोजन के लिए काफ़ी अच्छी व्यवस्था होती है | यह सोचनेवाली बात है, कि हमारे समाज में अधिकांश साधन-संपन्न लोग अन्य लोगों, ख़ासकर कमज़ोर तबकों के बच्चों पर एक पैसा ख़र्च नहीं करना चाहते, वहाँ दो-ढाई हज़ार रुपए वेतन पानेवाली एक स्त्री साल में दो बार 20-25 बच्चों को बेहतरीन भोजन करवाए, तो उस महिला के ह्रदय की विशालता को समझा जा सका है | दरअसल यह कुछ उस भोजनमाता ऐश्वर्या का अपना व्यक्तित्व है, तो कुछ प्रधानाध्यापिका एवं अन्य सहयोगियों की संगत का असर | सत्य है, जब हमारे आसपास हमारी ही भावना के अनुकूल लोग मिल जाते हैं, तो उसी के अनुरूप हमारे व्यक्तित्व में मौजूद सकारात्मक या नकारात्मक तत्व अपने-आप बाहर आ जाते हैं |

अस्तु, इन शिक्षकों ने अपने विद्यालय में कैसी व्यवस्था बनाई है, इसे भी समझना ज़रूरी है | सबसे पहले बात करते हैं विद्यालय के इन्फ्रास्ट्रक्चर की | विद्यालय का निर्माण 1995 में हुआ था और वह काफ़ी ख़स्ताहाल स्थिति में था, लेकिन उसका रंग-रोगन करते हुए कई सालों तक इसके शिक्षक इसे सँभालने की कोशिश करते रहे | यह भौगोलिक रूप से भी ऐसी जगह स्थित है, जो गर्मियों के लिए तो अनुकूल है, लेकिन सर्दियों में पाला पड़ने के कारण वहाँ बच्चों को पढ़ाना मुश्किल हो जाता है, इसलिए उस समय खेतों में पढ़ाई होती थी | इसी कारण जब नई बिल्डिंग बनाने की बात शिक्षा-विभाग द्वारा की गई, तो अध्यापकों ने उपयुक्त स्थान चुनकर वहाँ एक बड़ा-सा हॉल बनवाया और उसी में अधिकांश शैक्षणिक-गतिविधियाँ होती हैं— लाइब्रेरी की व्यवस्था, पढ़ाई लिखाई, अन्य अनेक गतिविधियाँ…

विद्यालय में बच्चों के लिए लाइब्रेरी की व्यवस्था विनीता ने अपने कार्यकाल के दौरान अपने सहकर्मी-सहयोगियों की मदद से की, जिसमें आर्थिक-मदद शिक्षा-विभाग से मिली | बच्चे उसी नए हॉल में जमीन पर बिछी दरी पर अपनी पुस्तकें फ़ैलाकर उनके बीच विचरण करते हैं |

लेकिन एक बात, जिसपर विचार किया जाना एवं तेज़ी से काम होना बहुत ज़रूरी है, वह है तकनीकी-शिक्षा की उचित व्यवस्था | क्योंकि तकनीक के युग में बच्चों को कंप्यूटर से आरम्भिक परिचय, मित्रता एवं जानकारी बचपन से दिया जाना एवं उनकी शिक्षा में इसे शामिल किया जाना कितना ज़रूरी है, इससे अब इन्कार नहीं किया जा सकता | विनीता के विद्यालय को कंप्यूटर की अनुमति यद्यपि लॉकडाउन के दौरान मिल तो गई, लेकिन इस लेख के लिखे जाने तक वह विद्यालय में पहुँचा नहीं था | वस्तुतः कंप्यूटर को भी विशिष्ट देखभाल और रख-रखाव की ज़रूरत होती है, लेकिन विद्यालय में कुछ सीलन की दिक्क़त, तो कुछ उसके लिए ख़ास व्यवस्था की ज़रूरत के कारण वह विद्यालय में अभी तक नहीं आया है | यहाँ इसकी कमी कुछ महसूस होती है, जिसके विषय में विद्यालय द्वारा तेज़ी से काम किए जाने की ज़रूरत है |

लेकिन चित्रों के बिना बच्चों की ज़िन्दगी और बच्चों के बिना चित्रों की दुनिया की सार्थकता अधूरी होती है | इस विद्यालय में जब ख़ाली दीवारों पर चित्रों के अंकन की बारी आई, तो विनीता ने एक ख़ास मक़सद से एक दिन बच्चों को किचन के पास स्थित एक ख़ाली कमरा दिखाकर पूछा “इस कमरे को कैसा होना चाहिए?” तब बच्चों ने अपनी-अपनी पसंद बताई; और अध्यापिका ने पेंटर की मदद से बच्चों की पसंद को महत्त्व देते हुए उस कमरे की दीवार पर उनकी पसंद के कार्टून कैरेक्टरों को उकेर दिया, जिनके साथ बेहतरीन स्लोगन लिखे हुए हैं, कविताओं और तुकबंदियों के रूप में, जो स्वयं विनीता की कल्पना की उपज हैं; एक उदाहरण देखते हैं— “भोजन प्रेम से बांटिए, मगर रहे यह ध्यान | बच्चों को अच्छा लगे गरम गरम पकवान |” बच्चों को और क्या चाहिए, वे आनंद से अपने पसंदीदा कार्टून कैरेक्टरों से बतियाते रहते हैं | यदि विद्यालयों में शैक्षणिक-भ्रमण का आयोजन किया जाना संभव हो सके, तो उससे भी संबंधित कुछ चित्रों को इन कार्टून कैरेक्टरों के बीच जगह दी जा सकती है | वैसे यहाँ अध्यापिका का बच्चों को इतना अधिक महत्त्व देना ग़ौर-तलब है |

अब एक नज़र बच्चों के भोजन एवं उससे संबंधित व्यवस्थाओं पर डालना भी ज़रूरी है, क्योंकि ‘भूखे पेट भजन न होई गोपाला’ | रसोई में बाक़ी चीजें अन्य विद्यालयों की ही तरह हैं— एक ठीक-ठाक सी रसोई, बच्चों के भोजन की संतोषजनक व्यवस्था आदि | जो ख़ास बात है, वह है खाने के लिए बैठने की सम्मानजनक व्यवस्था; क्योंकि हम किसी को किस तरीक़े से भोजन कराते हैं, यह काफ़ी मायने रखता है | कई लोग समाज में ग़रीबों या कमज़ोर तबकों के लोगों के सामने रोटी आदि खाद्य-सामग्री एक तरह से फ़ेंक कर देते हैं, जबकि ‘पंडितजी’ या अपने प्रियजनों को चौकी पर या टेबल-कुर्सी पर सादर बिठाकर खिलाते हैं |

संभवतः विनीता एवं उनके सहयोगी इस मनोविज्ञान से परिचित हैं, शायद इसीलिए उन्होंने इस संबंध में एक ख़ास व्यवस्था कर रखी है— वह है बच्चों के भोजन के लिए सीमेंट से ही अंग्रेज़ी के ‘C’ आकार, यानी अर्द्ध-गोलाकार में मेज़नुमा संरचना का निर्माण; जिसके पीछे प्लास्टिक के स्टूल रखकर बच्चे बैठते हैं | इससे केवल एक आदत ही नहीं बनती है, बल्कि बच्चों के मन में कहीं एक दबा-ढँका सा सपना भी जन्म ले सकता है— ‘डाइनिंग-टेबल’ (जो केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि व्यक्ति की बेहतर सामाजिक-स्थिति ही नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति का भी परिचायक है) पर भोजन की आदत के साथ-साथ उस सुविधा और अधिकार को अर्जित करने के सपने देखना एवं उसके लिए परिश्रम एवं संघर्ष करना भी |

बच्चों को सम्मानजनक ढंग से भोजन कराने की सामाजिक-सोच एवं भविष्य में भी उसकी उपलब्धता के सपने बुनने को परोक्षतः प्रोत्साहित करने के संबंध में हम अनेक अध्यापकों को याद कर सकते हैं, जैसे सुभाष चंद्र, जिनके संबंध में इसी स्थान पर कई लेख लिखे जा चुके हैं, ‘सुभाष चंद्र : जिसके लिए उसके विद्यार्थी अपनी संतान से भी अधिक प्रिय हैं’ शीर्षक से |

यहाँ तक की यात्रा के बाद यह भी समझना बहुत ज़रूरी है कि बच्चों के साथ इस विद्यालय में धरातल पर क्या और कैसा व्यवहार किया जाता है— उनकी पढ़ाई के बारे में, नित्य-प्रतिदिन के व्यवहार में, जीवन के महत्वपूर्ण पक्षों के संबंध में…! और उसके परिणाम किस रूप में देखने को मिलते हैं… बच्चों के वर्तमान और भविष्य पर, उनके अभिभावकों की मनःस्थिति पर, समाज पर, और स्वयं इस अध्यापिका पर भी…! इस संबंध में विनीता से जुड़े अगले लेख में बात होगी… कुछ दिनों बाद…

–डॉ. कनक लता

Related Posts

One thought on “विनीता देवरानी : जिसकी नज़र में प्रत्येक विद्यार्थी ख़ास है !

  1. आज जैसे ही आप की पोस्ट आई मैने लपक ली क्योंकि मैं प्रतीक्षारत थी।देवरानी मैम को इतनी स्पष्टता से और सहजता सब से परिचित कराना आप ही का दम है।यदि अपना मान कर निस्वार्थ भाव सेरुचिपूर्वक काम किया जाए तो समाज का कुछ कल्याण ही होता है।पूरी टीम को हार्दिक शुभकामना।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!