बतकही

बातें कही-अनकही…

भाग-एक : ‘स्टूडेंट’ से ‘टीचर’ के निर्माण की विकास-यात्रा

“आज के राजा तुम्हीं हो ! इसलिए महसूस करो कि तुम्हारा जन्म कितना ख़ास है ! तुम अपने माता-पिता, भाई-बहन, दोस्तों, शिक्षकों और बहुत सारे लोगों के लिए कितने स्पेशल हो, जो तुमसे बहुत प्यार करते हैं | आज तुम महसूस करो कि तुम विशेष उद्देश्य से संसार में आए हो, इसलिए तुम्हें आगे चलकर कुछ अच्छे काम करने हैं, जिससे दुनिया तुम्हें याद रखे !”

ये शब्द एक अध्यापिका के हैं, जो वह अपने प्रत्येक विद्यार्थी से उस दिन कहती हैं, जिस दिन उस विद्यार्थी-विशेष का जन्मदिन होता है |

दरअसल हम सब जानते हैं कि ‘राजा’ के पद का संबंध गरिमा, अधिकार, अपने विशिष्ट होने के एहसास से होता है; इसलिए इस पद पर आसीन व्यक्ति न केवल आत्म-विश्वास और आत्मसम्मान से भरा होता है, बल्कि उसे यह एहसास भी होता है कि उसका जीवन या उसका ‘होना’ कितना ख़ास है | इसीलिए ‘राजशाही’ में ‘युवराज’ जैसे पदों की व्यवस्था होती थी, ताकि छोटी उम्र से उस ‘भावी राजा’ में अपने लिए विशिष्ट भावों और आत्सम्मान एवं आत्म-विश्वास को भरपूर मात्रा में भरा जा सके |

…और अपने विद्यार्थियों को ‘अपने होने’ की उसी विशिष्ट अनुभूति का एहसास कराने वाली अध्यापिका का नाम है— विनीता देवरानी; राजकीय प्राथमिक विद्यालय खैरासैंण (जयहरीखाल, पौड़ी-गढ़वाल, उत्तराखंड) की प्रधान-अध्यापिका | और उन्हीं का वह कथन है, जिसका ज़िक्र इस लेख के एकदम आरंभ में हुआ है ! उनकी उपरोक्त बातचीत एवं उससे जुड़े कार्यों पर बातचीत अगले लेख में होगी…

अस्तु, विनीता देवरानी का जन्म 1 अप्रैल 1971, लैंसडाउन (जयहरीखाल, पौड़ी-गढ़वाल, उत्तराखंड) में हुआ था, जो उनका एवं उनके माता-पिता भुवनचंद्र जोशी एवं सरोज जोशी का स्थाई निवास-स्थान है | वस्तुतः विनीता भी अपनी जॉब के सिलसिले में वहीँ माता पिता के साथ रहती हैं | विनीता अपने माता-पिता की चार संतानों या चार बेटियों में दूसरे स्थान पर हैं | उनके पिता अपने समय में अध्यापक रह चुके हैं और माँ हाई स्कूल तक पढ़ी हैं | माता-पिता की शिक्षा का असर बेटियों पर भी हुआ और सभी बहनों ने पढ़ाई के महत्त्व को समझा और परिणामस्वरूप आज वे सभी अध्यापन-कार्य से जुड़ी हैं | माँ की स्कूली शिक्षा से भी बेटियों को मदद मिली और उनके द्वारा सिखाई गई गणित की तकनीकें विनीता के भी बहुत काम आ रही हैं, जिनका प्रयोग वर्तमान में वे अपने विद्यालय में करती हैं |

दरअसल माँओं की शिक्षा का असर बच्चों पर अनिवार्यतः पड़ता ही है | मैंने भी गणित की शुरूआती समझ के अलावा बहुत सारी चीजें अपनी माँ से ही सीखी, जिसका लाभ आज भी मुझे मिलता है |

विनीता का विवाह 1996 में अखिलेश देवरानी से हुआ, जो इस समय सीआईएसएफ़ (Central Industrial Security Force) में कार्यरत हैं और इस समय चेन्नई में तैनात हैं | इन दोनों का एक बेटा अभिषेक है, जो इस पढ़ाई कर रहा है |

जहाँ तक विनीता की पढ़ाई का सवाल है, तो वह उनके पैतृक स्थान में ही हुई, जिसमें कक्षा 1 से 6 तक की शुरूआती पढ़ाई प्राथमिक विद्यालय जयहरीखाल से हुई और कक्षा 7 से 12 तक की शिक्षा राजकीय इंटर कॉलेज, लैंसडाउन से हुई | यहाँ से उन्होंने 10 वीं का इम्तहान 1986 में उत्तीर्ण किया और 12 वीं का 1988 में | उच्च-शिक्षा (बी.ए.) की शुरुआत जयहरीखाल डिग्री कॉलेज से हुई, लेकिन वे उसका पहला साल ही पूरा कर पाईं | क्योंकि इसी दौरान जयहरीखाल में लड़कियों के लिए पहली बार बीटीसी का कॉलेज खुला; और जब वहां चयन के लिए पहली प्रतियोगिता आयोजित हुई, तब माता-पिता के आग्रह और परामर्श पर विनीता उसमें शामिल हुईं और पहले ही प्रयास में चयनित हो गईं | तब उससे संबंधित ‘दीक्षा विद्यालय’ में 2 की ट्रेनिंग के लिए दाख़िल हुईं, साल 1989-1991 के दौरान | इसी बीच बी.ए. की अपनी अधूरी रह गई पढ़ाई को उन्होंने प्राइवेट से पूरी की, साल 1993 में; अपनी नौकरी ज्वाइन करने के बाद |

ट्रेनिंग के बाद उन्हें पहली नियुक्ति 23 मार्च 1992 को प्राथमिक विद्यालय, पड़ेरगाँव (जयहरीखाल, पौड़ी-गढ़वाल) में मिली, जो उनके घर से दूर था | इसलिए यहाँ अपने ही एक विद्यार्थी के घर में एक कमरा किराए पर लेकर रहने लगीं; लेकिन मकान-मालिक उनसे कोई किराया नहीं लेते थे | दरअसल उस समय शिक्षकों का समाज में इतना आदर था कि लोग उनको सिर-आँखों पर रखते थे | समाज द्वारा यहाँ विनीता को भी बहुत ही आदर-सम्मान मिलता था | लोगों के घर किसी भी समारोह में उनको विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता और काफ़ी आदरपूर्ण व्यवहार किया जाता था | विनीता कहती हैं— “उस समय और इस समय में बहुत अंतर आ गया है, पहले शिक्षकों को लगभग भगवान की तरह आदर-सत्कार मिलता था और अब कोई पूछता भी नहीं है | लेकिन इसका कारण समाज से अधिक हम शिक्षक ही हैं | शायद हम शिक्षकों ने अपनी ज़िम्मेदारी इन बीते दो-तीन दशकों के दौरान ठीक से नहीं निभाई | देश और समाज के हालात भी ऐसे हो गए हैं, जहाँ दूर-दराज के इलाक़ों में बच्चों की पढ़ाई अब अभिभावकों की प्राथमिकता में रही ही नहीं…”

विनीता का यह पहला स्कूल उनके सीखने और शिक्षक की ज़िम्मेदारी को समझने का स्थान बना | वे स्वयं बताती हैं— “जब मैंने जॉब ज्वाइन की, तो उस समय मेरी उम्र बहुत कम थी; जीवन और स्वभाव से लड़कपन अभी गया नहीं था | इसलिए अपने इस पहले विद्यालय में शुरू के कुछ समय में मैं उस ज़िम्मेदारी की गंभीरता को नहीं समझ सकी, जो एक अच्छे शिक्षक में होनी चाहिए | इसीलिए मैं जिन बच्चों को पढ़ाती थी, शाम को स्कूल ख़त्म होने के बाद उन्हीं के साथ खेलती भी थी और सुबह होते ही स्कूल पहुँचकर उनकी टीचर बन जाती, और मेरे शिक्षकों ने मुझे जिस तरह से पढ़ाया था, उसी तरीक़े से उनको पढ़ा देती थी | इस तरह शाम को उनकी ‘दोस्त’ और ‘हमजोली’, और सुबह को उनकी ‘टीचर’ का दोहरा काम करती थी…! लेकिन जब समाज में लोगों द्वारा एक शिक्षक होने के नाते मुझे विशेष सम्मान मिलने लगा, तो मैं अक्सर इसपर सोचती थी कि मुझे ये विशेष आदर-सम्मान क्यों मिल रहा है? मुझमें क्या ख़ास बात है?…”

अपने खेल के साथी ‘हमजोलियों, और उससे भी अधिक यहाँ के लोगों से मिलनेवाले विशेष महत्त्व एवं आदर-सत्कार से अभीभूत विनीता, अपने ‘मकान-मालिक’ एवं अन्य लोगों के साथ रहते हुए अक्सर अपने घर को भूल जाती थीं और बहुत ज्यादा दूर नहीं होने के बावजूद छुट्टियों में घर नहीं जाती थीं | लेकिन कहते हैं कि व्यक्ति के व्यक्तित्व, जीवन और स्वभाव में गंभीरता समय के साथ-साथ आती हैं, जब व्यक्ति विविध अनुभवों से गुजरता है, चिंतन-प्रक्रिया से गुजरता है, अपने आसपास को समझने की कोशिश करना शुरू करता है | विनीता को भी अभी ‘शिक्षक’ के दायित्व को समझना बाक़ी था, माता-पिता के सुरक्षित संरक्षण में रहे बच्चे अपने कार्यों की गंभीरता और समाज में अपनी भूमिका को ऐसे ही तो सीखते हैं |

विनीता बताती हैं— “…स्कूल में कुछ महीने बीतते-बीतते मैं समझने लगी कि बच्चों और समाज के जीवन में ‘शिक्षक’ की एक ख़ास भूमिका होती है, जिसके कारण ‘शिक्षकों’ के बहुत ही अधिक उत्तरदायित्व होते हैं, उनके कन्धों पर बच्चों के अच्छे भविष्य की ज़िम्मेदारी होती है; इसीलिए समाज उनको विशेष महत्त्व और सम्मान देता है…! तब मैं धीरे-धीरे वास्तविक रूप में ‘टीचर’ की भूमिका में आने लगी और अपने कार्यों के प्रति कुछ-कुछ गंभीर होने लगी…”

इस प्रकार अपने ‘शिक्षक’ होने की भूमिका को सीखती हुई विनीता इस स्कूल में लगभग पौने छः साल तक रहीं, 23 मार्च 1992 से 10 दिसम्बर 1997 तक | कल तक खेल-खिलौनों में मस्ती और आनंद खोजती एवं अपने ही विद्यार्थियों की खेल की साथी ‘हमजोली’ बनी हुई, एक हद तक बचपने से भरी ‘विद्यार्थी-हमजोलियों’ के साथ खेलती-कूदती एक लड़की यहाँ अब गंभीर और दायित्वपूर्ण ‘शिक्षिका’ बनने की प्रक्रिया में थी |

लगभग पौने छः साल के बाद 11 दिसम्बर, 1997 को विनीता का स्थानांतरण प्राथमिक विद्यालय खरका, जयहरीखाल (पौड़ी-गढ़वाल) में हो गया, जहाँ वे एक साल तक रहीं | पिछले विद्यालय में धीरे-धीरे अपने काम के महत्त्व और गंभीरता को समझते हुए विनीता के भीतर जो ‘शिक्षिका’ निर्मित हुई थी, वह इस विद्यालय में आकर अब काफ़ी गंभीरता से शिक्षिका के कार्यों को सीखने लगी, इसलिए वे इस स्कूल को अपने ‘सीखने का स्कूल’ कहती हैं | यह इस अध्यापिका के व्यक्तित्व निर्माण का दूसरा चरण कहा जा सकता है |

यहाँ वे अपनी जिम्मेदारियों के प्रति काफ़ी गंभीर हो चुकी थीं | लेकिन दुर्भाग्य से यहाँ ‘स्कूल’ तो था, किन्तु व्यावहारिक रूप में नहीं, बल्कि ‘अदृश्य-रूप’ में; अर्थात् विद्यालय के लिए कोई भवन या कोई स्थान नहीं था | विद्यार्थी भी केवल 4-5 थे | इसलिए विनीता को अपने उन विद्यार्थियों को अपने घर पर ही पढ़ाना होता था | बच्चे अपने बस्ते के साथ उनके घर आते और वहीँ पढ़ते | हालात इंसान को नए उपाय भी बताते हैं और नए रास्तों से रू-ब-रू भी कराते हैं |

इस बारे में विनीता कहती हैं— “अब मैंने धीरे-धीरे यह समझा कि शिक्षक का काम कितना अधिक विस्तृत होता है | उसे कितने स्तरों पर सोचना, समझना और लगातार सक्रिय रहना पड़ता है | उसके काम का कितना अधिक असर समाज और बच्चों पर पड़ता है | तब मैं अपने काम को और अधिक गंभीरता से समझने और उसे करने की की कोशिश करने लगी |…इसके लिए अपने आसपास से, अन्य विद्यालयों के अपने साथी-शिक्षकों से भी मैं लगातार सीखने की कोशिशें करती…|”

विनीता के एक ज़िम्मेदार ‘टीचर’ के व्यक्तित्व-निर्माण के इन दो महत्वपूर्ण चरणों से गुजरने के बाद उनके सामने वास्तविक परीक्षा की घड़ी तब आई, जब बतौर ‘प्रधान-अध्यापिका’ उनको नई क़िस्म की ज़िम्मेदारी उठाने का काम सौंपा गया | दरअसल उपरोक्त उल्लिखित दूसरे विद्यालय में रहते हुए ही उनका प्रमोशन ‘अध्यापक’ के पद से ‘प्रधान-अध्यापक’ के पद पर हुआ और साथ ही स्थानान्तरण भी; नया विद्यालय था—प्राथमिक विद्यालय, खैरासैंण | यहाँ उन्होंने अपना कार्यभार 5 दिसम्बर 1998 को संभाला और वर्तमान में भी, इस लेख के लिखे जाने के दौरान, यहीं कार्यरत हैं |

अपने ‘अध्यापकीय-जीवन’ के इस तीसरे विद्यालय में कार्य के संबंध में विनीता कहती हैं— “एक अध्यापिका के रूप में पिछले दो विद्यालयों में अपने काम को समझने और उसे ठीक से सीखने के बाद एक टीचर के रूप में वास्तविक रूप में काम की शुरुआत मैंने यहीं आकर की | मेरे पिछले विद्यालयों के कार्य मेरे सीखने के लिहाज से ख़ास थे, जहाँ मैंने जाना-समझा कि एक टीचर को क्या और कैसे करना चाहिए | उस सीखे हुए को मैंने यहाँ व्यवहार में प्रयोग करना शुरू किया…”

इस विद्यालय में जब उन्होंने अपने पिछले अनुभवों के साथ काम शुरू किए, तब कुछ सालों के बाद उनके परिणाम आने शुरू हो गए | उस परिणाम में वे अपनी पूर्व एवं वर्त्तमान सहयोगियों का नाम लेना नहीं भूलती हैं; जिनमें पूर्व सहायक शिक्षिकाएँ योजना ध्यानी, ऊर्मिला रावत, मंजू जैकब एवं वर्तमान में अनूप कुमार वर्थवाल हैं; तथा पूर्व भोजनमाताएँ विजयलक्ष्मी (जो वर्तमान में विद्यालय की फुलवारी की ज़िम्मेदारी संभाल रही हैं) एवं वर्तमान भोजनमाता ऐश्वर्या शामिल हैं |

ज़ाहिर है, शिक्षा ही नहीं किसी भी कार्यक्षेत्र में जब सभी लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने एवं हानि पहुँचाने की नीयत से काम करने के स्थान पर एक-दूसरे के साथ सहयोगात्मक व्यवहार करते हैं, एक-दूसरे की सहायता से आगे के लिए रास्ते निर्मित करते हैं, तो सफ़लता अपने-आप को कई गुणा करके सामने आती है | शिक्षकों एवं विद्यालय के अन्य कर्मचारियों तथा माता-पिता सहित विद्यालय के विद्यार्थियों ने भी उनके साथ ही समान रूप से परिश्रम किया और अनेक क्षेत्रों में विविध स्तरों पर सफ़लता की कहानियाँ लिख रहे हैं | इस यात्रा में बच्चों में माता-पिता का योगदान भी कम नहीं है, जिसपर विस्तार से बात होगी |

उस सफ़लता की यात्रा विद्यालय में कैसे की गई, विनीता के साथ-साथ उनके सहायक अध्यापकों एवं अन्य सहयोगियों द्वारा तथा ही विद्यार्थियों एवं उनके माता-पिता द्वारा भी, इसकी कहानी अगले अंक में…

डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

Related Posts

One thought on “विनीता देवरानी : जिसकी नज़र में प्रत्येक विद्यार्थी ख़ास है !

  1. बहुत शानदार। फिर एक चमकीले सितारे से रूबरू करवाने के लिए आभार। जो लोग धरातल पर काम कर रहे हैं उन को पहचान दिलाने का उत्कृष्ट योगदान कर रही हैं आप। वास्तव में बहुत ऋणी रहेगा शिक्षक समाज आप का।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!