बतकही

बातें कही-अनकही…

भाग-चार : होटल में धुमंतू बच्चे और बारिश में भीगता समर्थ-समाज

‘बारिश में भीगना किसे अच्छा नहीं लगता है’? यदि यह सवाल किसी से पूछा जाए, तो जवाब मिलेगा कि हर व्यक्ति सुहानी बारिश में भीगना चाहता है, बच्चे हों या जवान अथवा बूढ़े; बस मौक़ा मिलने भर की देर है ! क्या जीव-जंतु और क्या पशु-पक्षी, सभी को उमस और गर्मी से राहत के लिए बारिश में भीगना पसंद है, आनंदित होने के लिए बारिश में भीगना पसंद है; फ़िर इंसान की क्या बात कही जाए, उसे तो आनंद का बस बहाना भर चाहिए !

और बच्चे…! बारिश और बच्चों का साथ तो कुछ वैसा ही है, जैसे मछली और पानी का— दोनों की ज़िंदगी और उस जीवन का आनंद पानी में भीगने में है | मुझे याद है मेरे एक परिचित का लगभग साल भर का शिशु दिसम्बर की ठंढ में भी ज़मीन पर बैठा एक बोलत से पानी को अपने सामने रखी कटोरी में थोड़ा-थोड़ा लेकर अपने सिर पर लगातार उड़ेले जा रहा था, उसे ठण्ड की न तो चिंता थी और न वह ठण्ड महसूस कर रहा था | सभी उसकी मस्ती को देखकर मुस्कुरा रहे थे, …मैं भी ! इसलिए कई बार सोचती हूँ, कि यदि बच्चों के जीवन से बारिश और पानी को निकाल दिया जाए, तो क्या होगा? तब शायद उनके बचपन के आनंद का बहुत बड़ा भाग उनसे छिन जाएगा, वे ‘छपाक-छपाक’ करते हुए अपने महँगे जूते और कपडे कहाँ पानी से सराबोर करेंगे? उनकी कागज़ की नाव कहाँ चलेगी? और बड़े या वयस्क लोग भी कैसे जी सकते हैं बारिश के बिना?

लेकिन रुकिए…! यहीं पर कुछ और भी सवाल हैं, जो हमें जीवन का एक दूसरा पक्ष भी दिखाते हैं, समाज के एक और चेहरे को दिखाते हैं; और जिसके बारे में बात किए बिना, जिसे जाने बिना, जिसे सुने बिना न तो जीवन की बात पूरी होती है, न मानवता की बात, न बारिश की, न समाज के कर्तव्यों की, न अधिकारों की, न मस्ती की, न सुख की, न दुःख की, न पीड़ा की, न आनंद की….! और वह सवाल यह है कि बारिश किसके लिए मस्ती और आनंद का पर्याय है? बारिश का इंतज़ार कौन करता है? किसे यह बारिस लुभाती है?

ये प्रश्न बहुत आवश्यक हैं, क्योंकि जब शहरों, नगरों एवं महानगरों के फुटपाथों पर दर्जनों की संख्या में रात के समय लोगों को आप सोते देखेंगे, चाहे कड़ाके की सर्दी की रात हो, या गर्म हवाओं के थपेड़े चलाती भयंकर गर्मीं की रात | आपको रूककर उन लोगों को भी एक बार तो देखना ही चाहिए, जो इन्हीं फुटपाथों पर अपनी गर्मियाँ और ठिठुराती सर्दियाँ बिताते हैं और केवल सोने-भर की जगह की तलाश में वहाँ आए सदी और गर्मीं से रात भर कुनमुनाते अपने-अपने बच्चों को सीने से चिपकाए कई बार हवाखोरी को निकले या लॉन्ग-ड्राइव पर निकले साहबजादों-साहबजादियों की महँगी कारों के पहियों के नीचे आकर सीधे स्वर्ग को प्रस्थान करते हैं | क्या उनके लिए भी बारिश मस्ती का पर्याय हो सकती है? क्या उनके बच्चे भी अपनी काग़ज़ की कश्ती हाथ में थामे आसमान में उमड़ते-घुमड़ते बादलों को बुलाते होंगे अपने संग खेलने-बतियाने के लिए? अथवा उमड़ते बादलों को देखकर उन्हें यह चिंता सताने लग जाती होगी, कि रात को वे कहाँ सोएँगे?…

…जिन लोगों के घर कच्चे होते हैं, जो हर साल बारिश आने पर यह संकल्प लेते हैं कि ‘बस, ये बारिश निकल जाए किसी तरह, अगले साल ज़रूर कुछ पैसे जोड़कर घर की मरम्मत करा देंगे’, लेकिन धन के अभाव में अगला बरस भी ऐसे ही एक संकल्प के लिए आ खड़ा होता है; क्या उनको भी बारिश का इंतज़ार रहता होगा? क्या उनके बच्चे भी बारिश की प्रतीक्षा उसी तरह करते होंगे, जो अपने घरों में बारिश का पानी भर जाने पर माता-पिता के साथ मिलकर पानी को घर से बाहर निकालने में ही बारिश का पूरा सुहाना मौसम बिताते होंगे, ताकि रात को सोने के लिए थोड़ी-सी सूखी जमीन मिल सके? क्या वे अपने घरों में भरे पानी में ‘छपाक-छपाक’ करके अपने कपड़े भिगोते होंगे?…

बात श्रीनगर (गढ़वाल मंडल, उत्तराखंड) की है, साल 2018, 2 जून की गर्मियों की | संगीता फरासी अपनी दो सहयोगियों के साथ अपने घुमंतू विद्यार्थियों को एक रेस्टोरेंट में ले गईं | ना, ना …आप यह यह सोचें, कि वे बच्चे अपने घरों से पैसे लेकर आये थे, माता-पिता से मिली पॉकेट-मनी के साथ ! क्योंकि वे उन साधन-संपन्न घरों के बच्चे नहीं हैं, जिनको एक ठीक-ठाक ‘पॉकेट-मनी’ मिलती है, दोस्तों के साथ कभी-कभी मौज-मस्ती करने के लिए, कभी स्कूल से लौटते हुए रास्ते में अपनी पसंद की आइसक्रीम, चॉकलेट आदि खाने के लिए…| यदि वे इतने ही ख़ुशनसीब होते, तो उनकी शिक्षिका को अपने साथ उन बच्चों को लेकर जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती, बल्कि वे बच्चे अपने-अपने माता-पिता के साथ वहाँ आते | पैसे तो उनकी वह शिक्षिका खर्च करने वाली थी |

यह पूछने पर कि “ग़रीब बच्चों को तो लोग केवल कुछ खाने-पीने या कुछ पुराने कपड़े वगैरह ही देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेते हैं | फ़िर आप क्या सोचकर बच्चों को रेस्टोरेंट में खाना खिलाने के लिए ले गईं? उनके लिए क्या केवल उनकी मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति ही पर्याप्त नहीं थी? इतना पैसा क्यों फ़िजूल ख़र्च किया आपने?” जवाब मिला कि “क्या इन बच्चों को किसी अच्छी जगह जाकर अच्छा खाना खाने या अपनी पसंद की चीज खाने का अधिकार केवल इसलिए नहीं है, कि वे ग़रीब हैं? …मैं उनको रेस्टोरेंट इसलिए लेकर गई, ताकि वे यह देख सकें की एक दुनिया यह भी है, जहाँ खुशियाँ हैं, सम्मान है, सपने हैं; जिसका सपना उनको भी देखना चाहिए | और जब तक वे सपने नहीं देखेंगे, तब तक वे अपने सपनों के लिए कोशिश कैसे करेंगे? रेस्टोरेंट उन स्थानों में से एक है, जहाँ व्यक्ति अपनी हैसियत के अनुसार अपने सम्मान या अपने अपमान की स्थिति को महसूस कर सकता है | मैं उन्हें सपने दिखाने के लिए, अपने लिए सम्मान कमाने की भूख पैदा करने के लिए और उनकी आँखों में एक बेहतरीन और सुन्दर जीवन चाह पैदा करने के लिए ही ऐसे स्थानों पर ले जाती हूँ, जहाँ जाने की कल्पना तक उनके परिवार और समाज के लोग नहीं कर सकते | …”

सत्य है, एक प्रसिद्द कवि अवतार सिंह संधू उर्फ़ ‘पाश’ ने लिखा है “सबसे ख़तरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना” ! जब किसी व्यक्ति, परिवार या समाज के भी सपने सामूहिक रूप से मर जाएँ या मार दिए जाएँ, तो उससे आप कोई भी काम करा लीजिए, उनके साथ कोई भी बुरे-से-बुरा व्यवहार कर लीजिए, वे कुछ नहीं कहेंगे, क्योंकि तब सपनों के साथ उनकी इच्छाएँ, आत्म-सम्मान और स्वाभिमान की भी मौत या हत्या हो चुकी होती है | इसीलिए कहा गया है कि किसी कमज़ोर-से-कमज़ोर और अत्यधिक निराश व्यक्ति या समाज को उसकी दुरावस्था से बाहर निकालना हो, तो आपको कुछ अधिक करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, आप केवल उनकी आँखों में कुछ सपने बसा दीजिए, शेष काम तो वे स्वयं ही कर लेंगे तनिक-सा सहारा मिल जाने पर |

यही सपने बसाने के लिए संगीता फरासी अपने विद्यार्थियों को ऐसे स्थानों पर ले जाती हैं, जो अनकहे रूप से संभ्रांत, साधन-संपन्न, इज्ज़तदार लोगों के लिए ही आरक्षित होता है | ताकि उन समाज के हाशिए पर फ़ेंक दिए गए वंचित एवं कमज़ोर समाज के बच्चे भी वे सपने देख सकें, जिनमें उनका और उनके परिवार तथा समाज का सम्मान किया जा सके, सबके साथ-साथ उनके लिए भी खुशियाँ पलकें बिछा रही हों | और किसी समाज या देश के भीतर रेस्टोरेंट उन स्थानों में से एक है, जिसके माध्यम से उन बच्चों के मन-मस्तिष्क में सपने बसाने की कोशिश संगीता करती हैं |

…तो संगीता अपने लगभग एक दर्जन घुमंतू विद्यार्थियों को सुनहरे भविष्य के सपने दिखाने एवं उसके बहाने एक नई दुनिया में ले जाने के लिए वहाँ ले गई थी | रेस्टोरेंट में सभी बच्चे उस स्थान की सुन्दरता, सजावट और चकाचौंध से हैरान होकर आँखें फाड़-फाड़कर देख रहे थे | तभी खाने का समय हुआ और शिक्षिका ने उनसे अपनी पसंद का भोजन ‘ऑर्डर’ करने को कहा, लेकिन व्यंजनों के नाम से अनजान बच्चे कुछ न समझ पाने के कारण अपनी अध्यापिका का मुँह देखने लगे | संगीता ने बच्चों की मनःस्थिति भाँप ली और बच्चों की उम्र और बाल-प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए स्वयं ही ‘ऑर्डर’ दे दिए | अपनी आँखों के सामने विविध व्यंजन देख बच्चे हैरान थे | उन्हें यह बात पहली बार पता चली कि व्यंजन इतने भी तरह के हो सकते हैं | अभी बच्चे अपने सामने रखे विविध स्वादिष्ट व्यंजनों का आनंद ले ही रहे थे, कि अचानक बारिश शुरू हो गई और बच्चे अपनी-अपनी प्लेटें छोड़कर रेस्टोरेंट की खिड़की की ओर भागे | शिक्षिका हैरान…! …

वे तत्काल समझ ही नहीं पाईं, कि जो बच्चे एक-एक दाने के लिए इतने मोहताज रहते हैं कि उसके लिए वे चौराहे पर भीख माँगते हैं | वही बच्चे जब आज इतना स्वादिष्ट और अपनी पसंद का खाना छोड़कर भागे, पता नहीं किस कारण से, तो संगीता को बहुत दुःख हुआ | यह भोजन का अपमान भी था | वे बच्चों को पुकारने लगीं और अपना-अपना भोजन ख़त्म करने को कहने लगीं | लेकिन एक भी बच्चे के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी | पता नहीं वे खिड़की पर खड़े और एक-दुसरे पर लदे हुए क्या देख रहे थे, कि अपनी इस बेहद प्रिय अध्यापिका की बात तक वे नहीं सुन रहे थे | संगीता को बुरा भी लगा और थोड़ा गुस्सा भी आया भोजन का निरादर देखकर |

तब वे स्वयं खिड़की के पास गईं और देखने की कोशिश करने लगीं, कि वह क्या चीज है जिसके लिए बच्चों ने उस भोजन को भी छोड़ दिया, जिसके लिए उनका परिवार और समाज दिन-रात जद्दोजहद करता है | लेकिन उन्हें बाहर हो रही बारिश और सड़क पर आते-जाते लोगों के अलावा कुछ भी नज़र नहीं आया | तब वे बच्चों से थोड़ी-सी नाराज़गी के स्वर में बोलीं—“बच्चो, तुम लोग ऐसा क्यों कर रहे हो, मुझे बताओ | तुमलोग जिस खाने के लिए रोज़-रोज़ परेशान होते हो और वे सारे काम करते हो जो तुम्हें नहीं करना चाहिए, उसी खाने को तुमलोगों ने ऐसे छोड़ दिया? …क्यों? क्या तुमलोगों को खाना पसंद नहीं आया?” बच्चे उनकी उस मार्मिक बात पर भी कोई ख़ास ध्यान दिए बिना लगातार अपनी नज़रें गड़ाए बाहर पता नहीं क्या देख रहे थे, संगीता का मन टूट गया अपने विद्यार्थियों के इस व्यवहार से, वे सोचने लगीं—“क्या मैं बच्चों की पढ़ाई को सही दिशा में नहीं ले जा पा रही हूँ? क्या उनमें जीवन के मूल्यों का विकास सही तरीक़े से नहीं कर पा रही हूँ?…”

इसी बीच उन दर्ज़न भर बच्चों में से एक किशोर-वय के बच्चे ने कहा—“मै’म…! बाहर लोग बारिश में भीग रहे हैं, हम उन्हीं को देख रहे हैं !” यह कहकर वह किशोर पुनः अपनी निगाहें बाहर गड़ा चुका था | संगीता को लगा कि बच्चे शायद बाल-स्वभाव के अनुसार बारिश में भीगना चाहते हैं | उन्होंने दुःखी मन से पूछा— “क्या तुमलोग भी बारिश में भीगना चाहते हो?” उसी किशोर ने कहा—“नहीं मै’म ! हम बिल्कुल भी बारिश में नहीं जाना चाहते हैं | हमको तो लोगों को भीगते देखने में ही बहुत मजा आ रहा है ! और…वो देखिए, मै’म ! वे लोग कैसे भाग-भागकर इधर-उधर छिपने की कोशिश कर रहे हैं ! उनको भागते देखकर हमको बहुत मजा आ रहा है ! आपको पता है मै’म, बारिश के आने पर आज तक हम इधर-उधर भागकर छिपने की कोशिश करते थे | और यदि हम बचने के लिए किसी के घर की छत के नीचे खड़े होते थे, तो वे लोग हमें डाँटकर भगा देते थे |…” उस किशोर ने दुःखी मन से कहा | “मै’म…! और आपको पता है? कभी-कभी तो हमको अपने घर की छत के नीचे से भगाने के लिए वे हमें मारते भी हैं !” एक नन्हा बच्चा बोल पड़ा, जिसने जिंदगी के कड़वे अनुभव और समाज की क्रूरता को अपने बचपन में ही देख लिया था | अध्यापिका सन्न रह गईं…! काटो, तो खून नहीं…

“जब हमलोग चौराहे पर भीख माँग रहे होते थे, और बारिश आ जाती थी, तो हमको कोई भी अपने घर के नीचे खड़ा नहीं होने देता, होटलवाले (रेस्टोरेंट) भी हमको भगा देते हैं | हम तब पेड़ के नीचे ही खड़े होते हैं और भीग जाते हैं | हमको फ़िर बहुत ठंढ लगती है, मै’म…!” एक अन्य बच्चे ने आगे बात बढ़ाई | “मै’म, बारिश आने पर मेरे घर में भी पानी भर जाता है और उस दिन हमारे घर में कोई नहीं सोता है, क्योंकि सारी जमीन गीली हो जाती है बारिश से ! हमको सोने के लिए सूखी जमीन नहीं मिलती उस दिन, इसलिए हमको पूरी रात जागना पड़ता है !” एक बालिका ने कहा

“लेकिन देखो मै’म, आज हमलोग छत के नीचे खड़े हैं और बारिश में नहीं भीग रहे हैं, और दूसरे लोग पानी में भीगते हुए छिपने के लिए इधर-उधर भाग रहे हैं, जैसे अब तक हम भागते थे | इसलिए हमको बहुत मजा आ रहा है | अब लोगों को पता चलेगा कि बारिश में भीगना कितना बुरा लगता है, कितनी ठंढ लगती है !” एक अन्य किशोर ने अपनी व्यथा कही | “हाँ मै’म, इनको भी पता चलेगा, कि भीगे हुए कपड़े ही दिनभर पहने रहने से कितना बुरा लगता है !” एक अन्य लड़की ने अपनी पीड़ा कही |

कुछ देर पहले अपने विद्यार्थियों की बदतमीजी और भोजन के अपमान पर दुःखी और अपने काम पर ही संदेह करनेवाली अध्यापिका संगीता फरासी की आँखें भीग उठीं, जिसे बच्चों के सामने प्रकट होने से रोकने के लिए वे थोड़ी देर के लिए वहाँ से चली गईं | वापस लौटीं तो उनका निश्चय और भी दृढ हो चुका था, अब वे उन सभी बच्चों को स्वावलंबी बनाने का निश्चय करके लौटी थीं, ताकि अपने गोद लिए इन पंद्रह बच्चों की इस अध्यापिका माँ के ये बच्चे न तो कभी किसी के आगे हाथ फैलाएँ, न बारिश के आने पर किसी के घर की मुंडेर के नीचे खड़े होने पर डांट या मार खाएँ, न एक अच्छा मनपसंद भोजन उनके लिए सपना-मात्र रह जाए, न कोई रेस्टोरेंट वाला उनको दुत्कार कर भगाए…!

संगीता फरासी ने निश्चय कर लिया कि वे अपने बच्चों की आँखों में सपनों को इतनी गहराई में उतार देंगी, कि बच्चे अपने सपनों के लिए जी-जान से जूझ पड़ें…

बच्चे भोजन करने लगे, लेकिन इस बार उनकी चहक से सारा रेस्टोरेंट गूँज रहा था और उनकी प्रसन्नता से वातावरण महक उठा था… और उनकी ‘अध्यापिका-माँ’ संगीता फरासी अपने संकल्प को मन में बार-बार दोहराती हुई अपनी उन मानस-संतानों को ममत्व से निहार रही थीं…

—डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

Related Posts

3 thoughts on “संगीता कोठियाल फरासी : भीख माँगते बच्चों को अक्षरों की दुनिया में ले जाती एक शिक्षिका

  1. बेहतरीन लिखा आपने फरासी mdmji के सम्बन्ध में👌
    आपको एवं फरासी mdmji के कर्म को नमन 🙏

  2. उनकी संवेदनशीलता और उनके प्रयासों को नमन..! निश्चित एक शिक्षिका के रूप में उन बच्चों के साथ होना अपने आप में एक बड़ी नेमत है..! काश के हर बच्चे को संगीता मैम जैसी शिक्षिका मिल पाए…🙏

  3. संवेदनशील और मर्मस्पर्शी । दोनों शब्द भी कम हैं विवेचना के लिए।शिक्षक जिस पीड़ा को जीता है आप उसे हृदय के अंतर्तम तक महसूस कराती हैं। इसके लिए आपको एक सैल्यूट करना तो बनता है।
    संगीता फरासी मैम की संवेदना परिचय की मोहताज नहीं है।दूसरा सैल्यूट दिल से उनके लिए ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!