बतकही

बातें कही-अनकही…

भीख माँगते बच्चों को अक्षरों की दुनिया में ले जाती एक शिक्षिका

भाग-एक :

कहते हैं, कि यदि किसी इंजीनियर या डॉक्टर अथवा किसी भी पेशे का काम समाज के भौतिक, आर्थिक, प्रशासनिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, तो किसी भी समाज या देश की वैचारिक-मनोभूमि को गढ़ने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका उसके शिक्षक-समाज की होती है | इसका अर्थ यह कदापि नहीं है, कि अन्य कार्य ग़ैर-महत्वपूर्ण या गौण हैं, लेकिन जब भी समाज के चरित्र को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिकाओं की बात होगी, निश्चित रूप से शिक्षक-समाज की ओर ही देखा जाएगा | क्योंकि शिक्षक वह व्यक्ति है जो अपने विचारों से, अपने आचरण से, अपने व्यवहार से, अपने जीवन से, अपने रोजमर्रा के कार्यों से हर दिन अपने समाज को गढ़ रहा होता है, अपने विद्यार्थियों के माध्यम से भी, और उन बच्चों के अभिभावकों के माध्यम से भी |

इसलिए किसी भी समाज के शिक्षक की जैसी सोच होगी, जैसा आचरण, व्यवहार, आदर्श आदि होंगें, जिस प्रकार की उसकी गतिविधियाँ एवं क्रियाकलाप आदि होंगें, उसका सीधा प्रभाव उस समाज पर पड़ रहा होगा | शिक्षक अपने व्यवहार, आचरण आदि से पीढ़ियों की वैचारिकी को, उसकी मानसिकता को, उसके आदर्शों को उसके आचरण तथा व्यवहारों को गढ़ रहा होता है |

इसलिए यदि किसी समाज को बहुत अच्छे शिक्षकों का समूह मिल जाता है, तो उस समाज का बौद्धिक-विकास उच्च कोटि का होगा, उसके आचरण में उदात्तता, उदारता, सदाचार और मानवीय संवेदनाएँ कूट-कूटकर भरी होंगी, उस समाज का युवा-वर्ग चिन्तनशील ही नहीं, प्रयत्नशील और संघर्षशील भी होगा, उसे आसानी से कोई भी षड्यंत्रकारी-शक्ति विघटित या खंडित नहीं कर सकती | लेकिन जिस समाज को विघटनकारी एवं दूषित मानसिकता वाले अध्यापक अपेक्षाकृत अधिक प्राप्त होते हैं, उस समाज के युवा-वर्ग को नष्ट करने के लिए किसी भी बाहरी शत्रु की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, वह समाज अपने-आप विनाश को प्राप्त करता है | इसलिए यदि किसी समाज की बौद्धिक, वैचारिक एवं भावनात्मक स्थिति को ध्यान से समझने की कोशिश की जाय, तो अपने आप इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है, कि उसे अपने पिछले दो-तीन दशकों में कैसे शिक्षक प्राप्त हुए थे, और उन युवाओं को कैसी शिक्षा मिली थी ? उसे किस प्रकार के मार्गदर्शन दिए गए थे… इसी प्रकार किसी समाज के शिक्षकों की वैचारिक-बौद्धिक स्थिति देखकर सहजतापूर्वक भविष्यवाणी की जा सकती है, कि आने वाले दशकों में उस समाज को कैसा युवा-वर्ग हासिल होनेवाला है… 

…संगीता कोठियाल फरासी एक ऐसी ही अध्यापिका हैं, जो अपने सकारात्मक विचारों, संवेदनशील व्यवहारों एवं दायित्वपूर्ण कर्तव्य-निर्वहन के माध्यम से हमारे समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करने में निरंतर प्रयत्नशील है | उन्होंने अपने तयशुदा फ़र्ज से आगे बढ़कर ऐसे काम किए और अभी भी कर रही हैं, जिसने अनेक लोगों का जीवन बदल दिया, बल्कि कहना चाहिए, कि एक छोटे-से समाज का, अपने सीमित इलाक़े में ही सही, जीवन, संसार, जीवन को देखने का नज़रिया…यानी बहुत कुछ बदल दिया …| लेकिन यह इतना आसान काम नहीं था, बल्कि उन्होंने इस बदलाव के लिए बहुत संघर्ष किया, न जाने कितने कष्ट सहे, लोगों के ताने सुने… आलोचनाएँ सही …

संगीता जी से मेरी पहली भेंट यद्यपि दिसम्बर 2018 में, डाइट की ‘शिक्षारत शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम’ (इन सर्विस टीचर्स ट्रेनिंग-ISTT) में हुई थी, जब मैं एक संस्था में बतौर सुगमकर्ता (Resource Person) कार्यरत थी और संस्था की ओर से उक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम में अपने अन्य साथियों के साथ भेजी गई थी, सुगमकर्ता के रूप में प्रशिक्षण लेने के लिए | ताकि आने वाले समय में राज्य के विभिन्न स्थानों में होने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों (ISTT के अंतर्गत) में राज्य के द्वारा नियुक्त सुगमकर्ताओं (KRP’s-Knowledge Resource Persons) को प्रशिक्षण के दौरान आवश्यकतानुसार संस्था द्वारा हमारे माध्यम से, सहायता उपलब्ध कराई जा सके | वहीँ पर संगीता जी भी प्रशिक्षु के रूप में आईं थीं | मुझे वहीँ संगीता जी की टीम के साथ बैठने और काम करने का मौक़ा मिला | लेकिन तब न तो मैं उन्हें जानती थी, न उनके काम के बारे में, सिवाय इसके कि अन्य शिक्षकों की भाँति वे भी एक अध्यापिका हैं |

प्रशिक्षण में भी उनसे बहुत अधिक बात करने का मौक़ा नहीं मिला, क्योंकि अनेक कथनीय-अकथनीय कारणों सहित अपने कार्य में व्यस्त होने की वजह से भी, अध्यापकों से व्यक्तिगत स्तर पर बहुत अधिक बातचीत करने और उन्हें जानने-समझने का अवसर ज्यादा नहीं था | इसके अलावा संगीता जी श्रीनगर में रहती थीं और मैं पौड़ी में, इस कारण भी उनसे मेरी कभी भेंट नहीं हो पाई और न ही उनके बारे में मैं कुछ ख़ास जान पाई | हाँ, ऑफिस में ज़रूर कभी-कभी साथियों से उनका जिक्र सुनती थी, लेकिन उनके लीक से हटकर किए जाने वाले काम के बारे में तब भी कुछ ख़ास नहीं मालूम हो सका, क्योंकि मेरे सहकर्मी भी अध्यापकों के केवल उन कार्यों, चीजों आदि के विषय में बात करते थे, जिससे उनके उद्देश्यों में मदद मिले |

लेकिन इन सब के बावजूद तथा कुछ और समय बीतते-बीतते अनेक अवसर मिले, जब मुझे उनके विषय में उनसे तथा अन्य अनेक स्रोतों से जानने के अच्छे-ख़ासे अवसर मिले | साथ ही, उनके काम को नज़दीक से देखने के भी कुछ मौक़े मिले | विभिन्न प्रशिक्षण-कार्यक्रमों में इन्हीं भेटों-मुलाक़ातों में कई बार उनसे काफ़ी घनिष्ठता और अनौपचारिक रूप से भी मेरी बातें हुईं, जब उन्हें क़रीब से और गहनता से जानने-समझने के अवसर मिले…

संगीता फ़रासी जी मूलतः गोपेश्वर (उत्तराखंड) की रहनेवाली हैं | वहीँ के निवासी एवं शिक्षक-दंपत्ति श्री भगवतीप्रसाद कोठियाल और श्रीमती शशिप्रभा कोठियाल की 4 संतानों में संगीता जी उनकी तीसरी संतान थीं, और तीन भाइयों की इकलौती बहन भी | संगीता जी का जन्म गोपेश्वर में ही 16 जुलाई 1975 को हुआ था | वे अनौपचारिक बातचीत में कई बार बताती हैं, कि उनके माता-पिता एक ज़िम्मेदार शिक्षक और जागरूक अभिभावक रहे हैं, जिन्होंने अपने बच्चों में मानवीय संवेदनशीलता, सहृदयता, सहयोगी-प्रवृत्ति, सेवा-भावना जैसे सद्गुणों का विकास किया | संगीता जी का कहना है, कि उनका व्यक्तित्व मूलतः उनके माता-पिता के संस्कारों और शिक्षा का परिणाम है, जिसको समय, परिस्थितियों और उनके अन्य सहयोगियों आदि ने निखारा है |

उनकी शिक्षा का क्षेत्र भी वैविध्यपूर्ण है, जिस कारण उनको उत्तराखंड के विभिन्न इलाक़ों को छोटी उम्र में ही देखने-समझने के मौक़े मिले | उन्होंने अपनी 12 वीं तक की शिक्षा चमोली में पूरी की, वहाँ से अपने निवास-स्थान गोपेश्वर आकर वहाँ से एम.ए. की पढाई पूरी की, गौचर से बी.टी.सी. किया और श्रीनगर से बी.एड. की पढाई पूरी की | अपने जन्म-स्थान में ही उन्होंने सन् 1999 में बतौर शिक्षक एक विद्यालय राजकीय प्राथमिक विद्यालय कुरुड़, में नौकरी की शुरुआत की | उसके बाद सन 2015 में श्रीनगर में राजकीय प्राथमिक विद्यालय, गहड़, में उनका ट्रांसफर हो गया | तब से अभी तक वे यहीं पर कार्यरत हैं | उनके परिवार में उनके पति श्री अनुसूयाप्रसाद फ़रासी और दो बच्चे, बेटी अपूर्वा और बेटा गौरव हैं, जो उनके साथ सिर्फ़ रहते ही नहीं हैं, बल्कि उनके सभी कार्यों, सामाजिक कार्यों सहित, में उनकी सहायता करते हैं |

संगीता जी का व्यक्तित्व बहु-आयामी है, जिसमें अनेक परतें हैं, वे कवयित्री भी हैं और शिक्षिका भी, वे अपनी कोख से पैदा की हुई संतानों की प्रेममयी माता भी हैं तो अपने गोद लिए हुए बच्चों की ममतामयी माता भी, वे सभ्य सुशिक्षित समाज में सम्माननीय स्थान रखती हैं तो मलिन बस्तियों के लोगों के बीच भी सहजता से घुली-मिली उनके बीच भी समान रूप से आदर पाती हैं, वे साहित्यकार बिरादरी में अपनी रचनाएँ बड़े चाव से सुनाती हैं तो ग़रीब दलित ‘असभ्यों’ की खुरदरी बातें एवं उनके दुःख-दर्द भी उतने ही ध्यान से सुनती हैं, वे अपने निजी संघर्षों में अपराजिता-सी खड़ी रहती हैं, तो समाज एवं परिस्थितियों से पराजित वंचित समाज के बच्चों को भी संघर्ष करने के लिए निरंतर प्रेरित-प्रोत्साहित करती रहती हैं …

भीख माँगनेवाले बच्चे पढ़ना नहीं चाहते साहब …!

संगीता जी के व्यक्तित्व और कार्यों का वास्तविक परिचय मुझे बड़े इत्तिफ़ाक से तब मिला, जब मैंने अपनी आँखों से उनके काम को देखा | और उनसे मेरी भेंट कराई एक अन्य अध्यापक सम्पूर्णानन्द जुयाल जी ने एवं मेरी एक सहकर्मी तथा मेरी मित्र पल्लवी पांडे ने | सम्पूर्णानन्द जुयाल जी कुछ समय से संगीता जी के साथ इस मुहीम में एक स्तर की सहभागिता कर रहे हैं और वर्तमान समय में इसके अतिरिक्त भी उन्होंने अपने साथियों की मदद से अपनी एक अलग क़िस्म की मुहीम छेड़ रखी है, जिसका ज़िक्र फ़िर कभी…

हमारे समाज के कई ‘समझदार’, ‘तजुर्बेकार’ और ‘ज़िम्मेदार’ लोग अक्सर सड़कों पर भीख माँगते बच्चों के विषय में यह कहते पाए जाते हैं, कि ‘ये बच्चे पढ़ना नहीं चाहते’, ‘इनके पीछे माथापच्ची बेकार है’, ‘इनको पढ़ा दो तब भी ये भीख ही माँगेंगें’, ‘इनको पढ़ाने की ज़रूरत ही क्या है ?’, ‘इनको पढ़ाकर लाट-गवर्नर बनाना है क्या ?’ …आदि …आदि |

लेकिन संगीता फ़रासी, संपूर्णानंद जुयाल जैसे जुनूनी अध्यापक ऐसा नहीं मानते …पता नहीं ऐसे शिक्षकों को कौन-सी सनक सवार रहती है, कि ये हमेशा ही समाज की ‘मुख्य-धारा’ की मान्यताओं को ठेंगा दिखाने निकल पड़ते हैं ? इनको समझाए कौन ? इनको कैसे बताया जाय, कि समाज का ‘मुख्य’ और प्रभावशाली वर्ग इस प्रकार के कार्यों को पसंद नहीं करता है, ऐसे सनकी अध्यापकों को अपने बीच नहीं देखना चाहता ?

समाज की ‘मुख्यधारा’ के साधन-संपन्न वर्गों को वैसे अध्यापक पसंद हैं, जो विद्यार्थियों को कूपमंडूक बनाएँ न कि जिज्ञासु, उन्हें आज्ञाकारी बनाएँ न की स्वतंत्र रूप से चिंतन करने वाला, संस्कारी और बड़ों का अनुगामी बनाएँ न कि उनसे सवाल पूछने वाला, उनपर संदेह करने वाला, अपने और दूसरों के लिए नए रास्तों का निर्माण करनेवाला | उस ‘मुख्यधारा’ के समाज को वैसे अध्यापक अच्छे लगते हैं, जो हर बच्चे को क़ाबिल बनाने से बचें, क्योंकि इससे शक्तिशाली वर्गों के बच्चों के लिए समस्याएँ पैदा होती हैं और उनके लिए अवसर एवं संसाधन कम हो जाते हैं, क्योंकि उसे सबके साथ बाँटना पड़ता है, जबकि उन संसाधनों पर पारंपरिक रूप से सिर्फ़ और सिर्फ़ समाज के शक्तिशाली तबकों का ही एकाधिकार है, सदियों से ….

लेकिन संगीता फ़रासी और संपूर्णानंद जुयाल जैसे अध्यापकों के कारण ही समाज के मुख्य तबके के सामने हमेशा ही नई-नई चुनौतियाँ एवं परेशानियाँ खड़ी होती रहती हैं, क्योंकि ऐसे सिरफ़िरे अध्यापकों के पागलपन और सनक के कारण ही भीमराव अम्बेडकर जैसे ‘भयानक’ और ‘खतरनाक’ लोग पैदा होते हैं, जो मुख्य तबकों की सत्ता और सम्पूर्ण समाज पर, संसाधनों एवं सुविधाओं पर, उनके एकाधिकार को चुनौती देते रहते हैं, और उसके स्थान पर ग़रीब से ग़रीब, कमज़ोर से कमज़ोर व्यक्ति के अधिकारों की वक़ालत करते रहते हैं | ‘मुख्यधारा’ का समाज इसी कारण ऐसे अध्यापकों को पसंद नहीं करता …

…शिक्षिका संगीता फ़रासी जी भी एक ऐसी ही शिक्षिका हैं, जिसने शायद जाने-अनजाने में लोगों की पारंपरिक सोच को चुनौती दे रखी है | अपनी जुनूनी सनक और अपने विश्वास के बलबूते कुछ साल पहले उन्होंने श्रीनगर (उत्तराखंड) में सड़कों पर भीख मांगने वाले ख़ानाबदोश समाज के बच्चों के साथ काम करना शुरू किया और उनको एक मुक़ाम तक ले आने में सफ़ल हो चुकी हैं, अनेक चुनौतियों और कठिनाइयों के बावजूद ….और उनकी यह मुहीम अभी भी जारी है ….

…मुझे उनके काम को नज़दीक से देखने का मौक़ा बड़े ही इत्तिफ़ाक से मिला | बात जून 2019 की है, जब एक दिन मेरी दोस्त और सहकर्मी पल्लवी पाण्डे ने मुझसे कहा

  • “दीदी, एक मैडम हैं, श्रीनगर में…संगीता फ़रासी मैडम… वे भीख माँगने वाले बच्चों के साथ काम करती हैं और वे चाहती हैं, कि तुम उनके बच्चों के साथ आर्ट और क्राफ्ट को लेकर कुछ काम करो | जुयाल सर (संपूर्णानंद जुयाल जी) का मेरे पास फ़ोन आया था, वे पूछ रहे थे, कि क्या तुम उनके साथ काम करना पसंद करोगी ?”

पल्लवी की बात से पहले तो मैं असमंजस में पड़ गई | इसके कई कथनीय-अकथनीय कारण थे | एक तो यह कि संस्था ज्वाइन करने के कुछ ही दिनों बाद लीडर द्वारा व्यक्तिगत रूप से मुझे किसी भी अध्यापक और उनके विद्यार्थियों से, साथ ही अपने सहकर्मियों से भी बात करने से मना किया गया था | दूसरे, मैं संगीता जी के विषय में कुछ ख़ास नहीं जानती थी, इसलिए तत्काल समझ नहीं सकी, कि उनके साथ काम करना ठीक होगा या नहीं, क्योंकि मैं अपने जीवन में ऐसे कई लोगों और संस्थाओं से मिल चुकी हूँ, जिनके खाने के दाँत और होते हैं, जबकि दिखाने के दाँत और ही होते हैं | …मैं नहीं जानती थी, कि यह अध्यापिका वास्तव में क्या हैं, सचमुच अपने इस अतिरिक्त-उद्देश्य (भीख माँगते बच्चों की शिक्षा और बेहतरी के प्रयास) के प्रति समर्पित हैं या समाज-सेवा का केवल एक दिखावा-भर करती हैं ? … इसलिए मैं असमंजस में पड़ गई थी और इसी कारण इस प्रस्ताव को टालने की कोशिश की 

  • “पल्लवी, आप तो जानती हैं, कि मैं संगीता जी को या सम्पूर्णानन्द जी को अधिक नहीं जानती, फिर मैं ऐसे कैसे चली जाऊँ…?”

लेकिन मेरी स्थिति से अनभिज्ञ होने के कारण उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया  

  • “दीदी, तुम जाओ, तुम्हें अच्छा लगेगा उनके साथ काम करके…वे लोग बहुत अच्छे हैं …|”

तब पल्लवी के आग्रह पर मैं सोचने लगी और उनसे थोड़ा समय माँगा, सोचने के लिए | मैंने सोचा, कि अध्यापकों के बारे में कुछ भी राय बनाने से पहले ख़ुद उनके साथ थोड़ा समय बिताकर, उनके साथ कुछ काम करते हुए उनको समझने की कोशिश करना ज़्यादा बेहतर होगा |

इसके अलावा पल्लवी की बात को टालना भी इतना आसान नहीं था, क्योंकि वह उस समय मुझसे आयु में लगभग आधी थीं तो क्या हुआ, उन्हें कुछ मामलों में मैं अपनी गुरु मानती हूँ | उन्होंने संस्था में, मेरी उस समय मदद की, जब मैं वहाँ एकदम नई कर्मचारी थी और मुझे काम को समझने में पुराने सहकर्मियों से सहायता की बहुत अधिक ज़रूरत थी | वह भी मुझसे बहुत लगाव रखती थीं, इसी कारण लाड़ में वह अक्सर मुझे ‘दीदी’ और ‘तुम’ शब्द से संबोधित किया करती थीं…  

और अपनी गुरु, तथा समय, हालात और समाज की एक अच्छी समझ रखनेवाली इस लड़की की बात को एकदम से ख़ारिज कर देना आसान नहीं था मेरे लिए | मुझे एक सीमा तक विश्वास था, कि यदि पल्लवी कह रही हैं, तो अवश्य कोई ख़ास बात होगी, उन दोनों अध्यापकों में | तब मैंने सबसे पहले अपने मेंटर और लीडर से उनकी अनुमति ली | उन्होंने मुझे अनुमति दे दी, क्योंकि इसमें संस्था का ही परोक्ष रूप से लाभ था | उस दिन रविवार, यानी अवकाश का दिन होने के कारण भी कोई समस्या नहीं थी | उसके बाद पल्लवी के माध्यम से अपनी सहमति उन दोनों अध्यापकों तक पहुँचा दी |

तय दिन और समय पर, यानी 5 जून 2019 को सुबह मैं सम्पूर्णानन्द जी के साथ श्रीनगर गई, जहाँ दोनों अध्यापकों ने किसी का एक छोटा-सा कमरा किराए पर लिया था, उन बच्चों के साथ पढ़ने-लिखने से लेकर कलात्मक-गतिविधियाँ करने के लिए | वहाँ उनके लिए संगीता जी एवं उनके सहयोगियों द्वारा सात दिवसीय ग्रीष्मकालीन कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा था | वहाँ उस दिन लगभग 10-12 बच्चे आए हुए थे | सुबह लगभग 9:00 बजे से लेकर अगले लगभग 4 घंटे तक हम तीनों (संगीता जी, सम्पूर्णानन्द जी और मैं) ने मिलकर बच्चों के साथ पढ़ने-लिखने से लेकर कलात्मक गतिविधियों तक, कई काम किए |

बच्चों के लिए अनेक रोचक पुस्तकें, कॉपियाँ, पेन-पेंसिल, क्राफ्ट के लिए रंगीन कागज़, कैंची, कलर, और न जाने कितनी तरह की सामग्रियाँ वहां उपलब्ध थीं, जो उन बच्चों की इस अध्यापिका द्वारा ख़रीदकर लाई गई थीं, उन्हीं के लिए | दिलचस्प और हैरान करने वाली बात तो यह थी, कि इस दौरान सभी बच्चों ने, तमाम शरारतों के बावजूद, सभी कामों में बेहद दिलचस्पी के साथ भागीदारी की |

इसी बीच संगीता जी ने किसी विद्यार्थी के बारे में पूछा, कि ‘वह कहाँ है और वह आया क्यों नहीं’ | जब बच्चों ने अपनी अध्यापिका को बताया, कि वह एक रेड लाइट पर भीख माँग रहा है, तो वे बच्चों को मेरी ज़िम्मेदारी पर थोड़ी देर के लिए छोड़कर तुरंत उस बच्चे को वहाँ से लाने के लिए अपने मददगार, संपूर्णानंद जी के साथ उनकी बाइक पर निकल पड़ीं और उसे लेकर ही वापस लौटीं | उन बच्चों को भीख माँगने से रोकने के प्रति उनकी इस प्रतिबद्धता ने अपने-आप में उस दिन बहुत कुछ कह दिया था…

बाद में दूसरे किसी अवसर पर जब मैंने उनसे इस बारे में पूछा था, तो उनका कहना था, कि “मैंने यह निश्चय कर रखा है, कि मैं इस प्रकार के जितने भी बच्चों की ज़िम्मेदारी लूँगी, उन सबके हाथ से भीख का कटोरा छीनकर फेंकूँगी, हमेशा के लिए, और उसकी जगह क़िताबें पकड़ाऊँगीं… और कोशिश करूँगी, कि वे जल्द से जल्द सम्मानजनक ढंग से आत्म-निर्भर और स्वावलंबी बन सकें…”

वे ऐसा कैसे और किस अधिकार से कर पाईं, इसकी कहानी फ़िर कभी…

…तो इन तीन-चार घंटों के दौरान अध्यापिका के, बच्चों के प्रति एक-एक व्यवहार को, उनके विचारों को, बच्चों के प्रति लगाव को, इन बच्चों के भविष्य के प्रति उनके विचारों में रह-रहकर व्यक्त होनेवाले तनावों-दबावों को, बच्चों और उनकी इस अध्यापिका की एक दूसरे के प्रति सहजता और अपनेपन को ध्यान से देखने-समझने की कोशिशें मैं करती रही…| इन तीन-चार घंटों में बच्चों ने कागज़ से कई आकृतियाँ बनायीं, उन आकृतियों के माध्यम से समूह में कहानियाँ बनायीं, उन कहानियों को कागज़ पर लिखा | संगीता जी एवं सम्पूर्णानन्द जी ने बोर्ड पर चंद शब्द लिखकर बच्चों को उनके प्रयोग से कविता लिखने को कहा | मुझे यह देखकर हैरानी हुई, कि बच्चों ने अपने आयु के अनुसार बहुत ही अच्छी कविता लिखी थी | उन्हें एवं उनके काम को देखकर ऐसा लग ही नहीं रहा था, कि इन बच्चों ने विद्यालय का मुँह नहीं देखा है | मैं स्वयं ही सुखद आश्चर्य से भरी हुई थी | निश्चित रूप से यह उनकी इस अध्यापिका के अथक परिश्रम का परिणाम था |

इतना ही नहीं, बच्चों का अपनी किताबों और बाक़ी सामानों, जो उनकी इस अध्यापिका ने उनके लिए उपलब्ध कराये थे, के प्रति लगाव, उन्हें सहेजकर रखने और उनके प्रति गहरी दिलचस्पी से मैं इतना तो समझ गई, कि यह एक दिन की कोशिश का नतीज़ा नहीं हो सकता | निश्चित रूप से संगीता जी की सालों की मेहनत से ये बच्चे, मानसिक और भावनात्मक रूप से यहाँ पहुँच सकें हैं, जिसमें इन बच्चों के प्रति उनके ममत्व की भी बहुत अहम् भूमिका है | वैसे भी सभी बच्चे कमोवेश इतने संवेदनशील होते हैं, कि अपने प्रति सच्ची ममता, प्रेम और लगाव को बहुत बारीकी से पहचान लेते हैं, बड़ों की तुलना में कहीं अधिक…

उन बच्चों की सहजता एकदम साफ़-साफ़ बता रही थी, कि उनकी अध्यापिका का उनके प्रति वास्तविक व्यवहार क्या है | वे खुलकर शरारतें भी कर रहे थे, जिनपर उनके दोनों अध्यापक उनके साथ मिलकर चुटकियाँ भी ले रहे थे | सामान्य तौर पर विद्यालयों में बच्चों को ठोक-पीटकर सिखाया गया कृत्रिम अनुशासन वहाँ नदारद था, उसकी जगह वहाँ सहजता, उन्मुक्तता और खिलखिलाहटें थीं …बच्चों को इतने स्वाभाविक रूप से पढ़ने में तल्लीन मैंने बहुत ही कम स्थानों में देखे हैं | मुझे वहाँ आने की इतनी ख़ुशी हुई, कि बाद में मैंने तीनों सहयोगियों —संपूर्णानंद जी, पल्लवी और संगीता जी — को कई-कई बार आभार प्रकट किए, इस बेहतरीन अनुभव के लिए |

…जहाँ तक उन बच्चों में शिष्टाचार और अनुशासन का प्रश्न है, तो कहते हैं, कि किसी बच्चे को उसके अभिभावकों एवं अध्यापकों द्वारा क्या सिखाया गया है और वह बच्चे तक कैसे और कितना पहुँचा है, यदि यह देखना हो, तो उसे समाज में देखना चाहिए, उसका वास्तविक व्यवहार वहाँ पर क्या है —अपने से छोटों के प्रति, अपने से बड़ों के प्रति, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों के प्रति, निर्जीव चीजों के प्रति | क्योंकि व्यक्ति का वास्तविक व्यवहार समाज में ही अक्सर तब दिखाई देता है, जब-जब उसे यह प्रतीत होता है, कि उसके व्यवहारों पर किसी की नज़र नहीं है, और इस कारण वहाँ पर वह अक्सर बनावटी मुखौटे से बाहर होता है | बच्चों को भी अपने अध्यापकों एवं अभिभावकों द्वारा, अपने व्यवहार एवं आचरणों के माध्यम से जो भी सिखाया जाता है, वह समाज में ही अक्सर अभिव्यक्त होता रहता है |  

संगीता जी के, भीख का कटोरा थामनेवाले ये बच्चे, भीख के कटोरे के स्थान पर किताबें थामने और अपनी शिक्षिका के सान्निध्य में रहने के बाद तथाकथित सभ्य समाज के शिष्टाचार सीख पाए या नहीं, उनमें जीवन के प्रति कोई अनुशासन आया या नहीं, दूसरों के प्रति उनमें संवेदना का कोई अंश विकसित हुआ या नहीं, इसकी झलकें मुझे उनके साथ काम करते हुए तो मिलीं ही, लेकिन सबसे सटीक और प्रामाणिक अनुभव सड़क पर मिला… शिक्षिका की अनुपस्थिति में, जहाँ अनुशासन और संवेदना-प्रदर्शन का उन बच्चों पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था…

…उस दिन जब बच्चों के साथ काम करने के बाद मैं वापस अपने घर (पौड़ी) लौट रही थी, तब रास्ते में उन बच्चों में से दो लड़कियाँ (दोनों की उम्र लगभग दस-बारह साल के आस-पास होगी) रास्ते में मिलीं | उन्होंने मुझे रोका और कुछ देर तक बहुत उत्सुकता से मुझसे कई तरह की बातें पूछती रहीं, मसलन मुझे उन लोगों के साथ कैसा लगा, मैं उन लोगों से परेशान तो नहीं हुई, मैं अपने घर कैसे जाऊँगी, मुझे रास्ते में परेशानी तो नहीं होगी, मुझे भूख लगी हो तो उनके साथ उनके घर चलूँ और खाना खाकर जाऊँ, क्या मैं उनके घर का खाना खाना पसंद करूँगी …आदि | उन्होंने जितने प्यार और अपनेपन से मुझे अपने घर चलने का आग्रह किया, उसने मेरा मन मोह लिया | उनके उस आग्रह भरे निमंत्रण में न तो कोई दिखावा था, न बनावटीपन, बल्कि एक सहज आत्मीयता थी, प्रेम भरा अपनापन था, मेरी चिंता थी | उन छोटी बच्चियों के नन्हें हृदयों की मेरे प्रति चिंता भरी आकुलता ने मेरे मन को भीतर तक भिगो दिया, जबकि मैं उनसे उस दिन पहली बार मिली थी | कौन कहता है, कि इन बच्चों में संस्कार विकसित नहीं हो सकते, या संस्कार होते ही नहीं हैं ? वह पाषाण-ह्रदय ही होगा, जो इन मासूम बच्चों की स्वाभाविक मानवीय सद्भावनाओं एवं इंसानियत पर संदेह करता है ?

संगीता जी के इन बच्चों ने पढ़ाई के प्रति अपनी लगन का भी ख़ूब अच्छा परिचय दिया | बात उसी महीने, यानी 11 जून 2019 की है, जब मैं, अपनी संस्था में स्थानीय स्तर की होनेवाली मासिक बैठक के सिलसिले में श्रीनगर गई थी, तब वे बच्चे भी पढ़ने के उद्देश्य से वहाँ मौजूद थे | उसी दौरान उनमें से कुछ बच्चों से मेरी मुलाक़ात हुई | उनमें से एक, लगभग 13-14 वर्षीया लड़की, अपनी एक बाँह पर पेन से बहुत सारी चीजें लिखे हुए थी, लिखावट से उसकी पूरी बाँह ही नीले रंग की हो गई थी और इसी कारण मेरी नज़र उसपर पड़ गई | इस सिलसिले में उससे मेरी जो बातचीत हुई, उसने मुझे बेहद आहत भी किया, हमारे समाज के इन बच्चों के प्रति दुर्व्यवहारों के कारण, और साथ ही मैं इस बात के प्रति आश्वस्त भी हुई, कि इन बच्चों में पढ़ने-लिखने के प्रति ललक और उत्सुकता जगाने में संगीता जी किस सीमा तक सफ़ल हो सकी हैं

सवाल — “बेटे, आपने अपनी बाँह पर क्यों लिखा है, कॉपी में आप लिखतीं ? देखिए तो, आपकी पूरी बाँह ही ख़राब हो गई…”

लड़की — “मै’म, क्योंकि मेरे पास हमेशा कॉपी नहीं होती है…|” लड़की संकोचपूर्वक उत्तर देती है

सवाल — “…और पेन…?”

लड़की — “पेन तो मैं हमेशा अपने पास रखती हूँ…|” उसके हाथ में उस समय भी एक टूटी हुई और जगह-जगह स्याही से खराब हो चुकी बॉल पेन थी, उसकी किसी चिर-सहचरी सखी या संगिनी की तरह, जिसे दिखाकर उसने उत्तर दिया था

सवाल — “क्या आपको लिखना बहुत अच्छा लगता है…?”

लड़की — “…हाँ…” कुछ शर्माकर झिझकते हुए उसने कहा था   

सवाल — “आपने अपने हाथ पर क्या लिखा है…? कोई कहानी या कविता, या कुछ और…? …क्या मैं देख सकती हूँ…?

लड़की — “कुछ नहीं मैमजी, कुछ नहीं…! बस ऐसे ही….कुछ-कुछ लिखा है…!” बच्ची अपना हाथ अपने दुपट्टे में जल्दी-जल्दी छुपा लेती है | 

बच्ची शायद अब इसपर बातचीत करने में संकोच महसूस कर रही थी, इसलिए उसने अपनी कॉपी मेरी तरफ़ बढ़ा दी, चेक करने के लिए, जिसमें उसने गणित के कुछ सवाल हल किए थे | उसके संकोच को देखते हुए और उसका मान रखते हुए, साथ ही उससे अपना अल्प-परिचय होने के कारण परिचित होने के लिए थोड़ा और समय देने के लिहाज से भी इस बातचीत को मैंने वहीँ रोक दी और उसकी कॉपी में लिखे हुए पर उससे बात करने लगी |

इसी प्रकार उन्हीं बच्चों में से कुछ और से भी बातचीत हुई, जिसमें पढ़ने के प्रति उनकी इच्छा और रूचि, उनके द्वारा लिखी गई चीजें (जैसे कहानी, निबंध आदि) शामिल थीं | उस दिन उन बच्चों से बातचीत के बाद मैं इस बात को लेकर और भी अधिक आश्वस्त हो गई, कि तथाकथित सभ्य-समाज के तथाकथित सुसंस्कृत और अनुभवी लोग भीख माँगते बच्चों के विषय में जो यह धारणा रखते और समाज में फैलाते हैं, कि वे नहीं पढ़ सकते, चाहे उन्हें पढ़ाने की कितनी भी कोशिश की जाय, वे पूरी तरह से ग़लत हैं, ग़लत ही नहीं बल्कि एक प्रकार के अपराधी भी हैं ऐसे लोग, जो ऐसे बच्चों के प्रति समाज का नकारात्मक नज़रिया विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और बदले में समाज उनके प्रति दुर्व्यवहार करने में कोई कसर नहीं छोड़ता |

इन बच्चों में ये सकारात्मक व्यवहार और एक उत्सुक विद्यार्थी के गुण तब विकसित हुए हैं, जब न तो वे किसी विद्यालय के छात्र-छात्रा हैं, जो उन्हें पढ़ने-लिखने की सारी सुविधाएँ देकर संस्कार और अनुशासन सिखाए, न ही उनके पास विपुल पुस्तकें और अन्य संसाधन हैं, जिनकी मदद से वे अपनी कल्पनाओं, सपनों और इच्छाओं के खुले आकाश में उड़ सकें | उनकी ‘संगीता मै’म’ ने अपने जैसे ही कुछ जुनूनी सहयोगियों की मदद से तथा सीमित संसाधनों में ही उनके लिए कुछ रुचिकर किताबें एवं अन्य संसाधनों के माध्यम से इन बच्चों को रुचिकर एवं रचनात्मक ढंग से पढ़ना-लिखना सिखाया और उनके हर बच्चे के भीतर कहीं सो चुके उस स्वाभाविक विद्यार्थी को हौले से थपकी देकर जगाया, जिसे पढ़ना-लिखना, सपने देखना, कल्पनाओं के आकाश में उड़ना पसंद है…

एक बात और, बच्चे चाहे किसी भी सामाजिक समुदाय या वर्ग/वर्ण के हों —धनी या ग़रीब, तथाकथित उच्च या निम्न वर्ण/वर्ग— उनमें आकर्षक किताबों के प्रति ललक लगभग एक जैसी होती है, नई-नई चीजों के प्रति उत्सुकता, उनके विषय में जानने की इच्छा और ख़ोज-बीन की प्रवृत्तियाँ भी समान रूप से विद्यमान होती हैं | ऐसे में यदि किसी की कोशिशों से समाज के तथाकथित सबसे ‘अपात्र’, ‘नकारात्मक’ एवं ‘घृणित’ समाज के बच्चों में पढ़ने की ललक जगती है, तो यह एक तरफ़ उन बच्चों की योग्यता एवं क्षमता के संदर्भ में पारंपरिक मिथकों और भ्रमों को खंडित करती है; तो दूसरी तरफ़ हमारे तथाकथित ‘सभ्य-सुसंस्कृत-समाज’ की कुत्सित सोच पर फिर से विचार करने को बाध्य भी करती है… 

                                                              …. बात अभी जारी है…

  • डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस आलेख का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

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One thought on “संगीता कोठियाल फ़रासी

  1. एक शिक्षक की जिम्मेदारी केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहती, जो इस बात को समझते हैं , वही समाज और देश को बदल सकते हैं। संगीता मैडम का कार्य बेहद सराहनीय है। बिना किसी सरकारी या अन्य बाहरी आर्थिक सहायता के , अकेले इतना बड़ा कार्य आसान नहीं रहा होगा। काफी संघर्ष उन्होंने भी किया होगा। उनके इस जज्बे को सलाम है। आपने उनके संघर्ष को बेहद सलीके से कलमबद्ध किया है।

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