बतकही

बातें कही-अनकही…

भाग-दो : ‘पहली अध्यापिका’ का अनोखा विद्यालय

पिछले लेख ‘सरिता मेहरा नेगी : ‘एक विद्यालय’ बनाने की कोशिश में ‘पहली अध्यापिका, भाग-एक’ में यह बात देखी जा चुकी है कि विद्यालय-दर-विद्यालय होते हुए सरिता मेहरा नेगी मई 2014 में स्थानांतरित होकर कोटद्वार स्थित जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के दायरे में मौजूद उस विद्यालय में आईं, जो अभी तक ‘अदृश्य’ रूप में था, जिसके ‘होने’ की सूचना वहाँ लगे सूचनापट्ट से ही मिलती थी |

अब सरिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में दो समस्याएँ थीं— एक तो, एक सूचनापट्ट पर शब्दों में मौजूद ‘अदृश्य विद्यालय’ को ‘दृश्य-रूप’ में सबके सामने ले आना; और दूसरे, उस विद्यालय के उन 35 ‘विद्यार्थियों’ को उनके विद्यालय तक ले आना, जिसके लिए उनके समुदाय के जहूर हुसैन ने कोशिशें की थी और शिक्षा-विभाग के यशवंत चौधरी ने स्वीकृति प्रदान की थी; और जिसके लिए सरिता मेहरा नेगी का स्थानांतरण वहाँ हुआ था | इसीलिए वे उस ‘विद्यालय’ की न केवल पहली अध्यापिका हैं, बल्कि उस विद्यालय की नींव रखनेवाली, उसको आकार देकर वर्तमान मुक़ाम तक लानेवाली उसकी रचनाकार भी हैं, जिसमें उनके सहयोगी रहे हैं उनके सहकर्मी सुनील दत्त, हालाँकि उनका इस ‘विद्यालय’ में अभी आना बाक़ी था |

जैसाकि पहले ही कहा गया है कि सरिता की इस ‘विद्यालय’ में नियुक्ति तब हुई, जब उस ‘विद्यालय’ का कहीं कोई नामोनिशान तक न था, केवल एक बोर्ड के अलावा, जिसपर लिखा था— ‘रा.प्रा.वि.सिगड्डी सोत, विकासखंड क्षेत्र-दुगड्डा, सी०आर०सी० झंडीचौड़’ | यह ‘विद्यालय’ केवल इस साइनबोर्ड पर ही था, न कोई भवन, न कोई बैठने की व्यवस्था, न कोई ‘विद्यालय’ संबंधी अन्य सामग्री | इस विद्यालय को साकार किया जाना अभी बाक़ी था, जिसकी ज़िम्मेदारी सरिता को ही उठानी थी |

इस विद्यालय में सरिता की नियुक्ति 25 मई 2014 को, यानी उस दिन हुई, जो उतराखंड के गर्म इलाक़ों के विद्यालयों में गर्मी की छुट्टियों के ठीक पहले का आख़िरी कार्य-दिवस था; अर्थात् अगले दिन से गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू होनेवाली थीं | उन्होंने वहाँ के सी.आर.सी. में पहुँचकर अपना नियुक्ति-पत्र जब संबंधित अधिकारी को दिया, तो उन्होंने कहा कि आखिरी कार्य-दिवस होने के कारण वे सरिता को उस दिन वहीँ पर ज्वाइन करवा देती हैं और गर्मी की छुट्टियाँ ख़त्म होने के बाद वे अपने संबंधित विद्यालय में जाकर काम शुरू करें | यह तार्किक भी था, क्योंकि अधिकारी जानते तो थे ही कि उस आखिरी कार्य-दिवस में उक्त ‘विद्यालय’ में जाकर कोई काम शुरू भी नहीं किया जा सकता था |

लेकिन उस दिन अपनी ड्यूटी ज्वाइन करने के बाद सरिता ने कुछ निश्चय भी कर लिया; शायद वे किसी अलग ही मिट्टी की बनी हैं | शायद ‘अलग मिट्टी के बने’ लोग ही कुछ ऐसा करते हैं कि शेष लोग दाँतों तले उँगली दबा लेते हैं | यह समझना मुश्किल है कि क्यों इस ‘मानव’ नामक प्राणी को अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाने के लिए ‘अलग मिट्टी’ का बनना ज़रूरी है? और क्यों ‘साधारण मिट्टी’ में यह ख़ूबी नहीं है?

अस्तु…! गर्मी की छुट्टियाँ शुरू होने के बाद छुट्टियों के ही दौरान सरिता ने एक दिन अपनी माँ को साथ लिया और चल पड़ीं उस स्थान को देखने, जहाँ उन्हें छुट्टियों के बाद काम करना था | वे कहती हैं— “दरअसल मैं उस विद्यालय को देखना चाहती थी, जहाँ मुझे काम करना था; वहाँ का माहौल देखना चाहती थी कि पढ़ाई को लेकर वहाँ के लोगों का क्या नज़रिया है; जानना चाहती थी कि वे बच्चे कौन हैं, जिनके साथ मुझे काम करना है, मैं उन बच्चों से मिलना थी, उनकी पढ़ने के प्रति रूचि और जिज्ञासा को समझना चाहती थी…!”

वहाँ जाने पर सरिता को ‘विद्यालय’ के नाम पर केवल एक वही साइनबोर्ड मिला, जिसका ज़िक्र ऊपर हुआ है | हाँ, लेकिन बच्चे मिले, उनके अभिभावक भी मिले और जहूर हुसैन भी मिले, जिन्होंने इस विद्यालय के लिए संघर्ष करके ‘साइनबोर्ड’ पर अपने समाज के बच्चों के लिए ‘विद्यालय’ प्राप्त करने में सफ़लता प्राप्त की थी | सरिता ने इन्हीं छुट्टियों में बच्चों से दोस्ती करने एवं उनको अपने अनुकूल बनाने की योजना बनाई और उसके लिए वे कभी उनके लिए चॉकलेट, कभी फ़ल, तो कभी गुब्बारे लेकर जातीं; उनकी ‘दोस्त’ के रूप में उनके साथ विविध प्रकार के खेल खेलतीं, कहानियाँ सुनाती, बातें करतीं, उनके अनुभव और किस्से सुनतीं |

बच्चे धीरे-धीरे उनसे खुलने लगे और उनकी उपस्थिति के प्रति सहज होने लगे | इसी के साथ सरिता ने उनके अभिभावकों से भी परिचय बढ़ाया | अभिभावक उनके व्यक्तित्व एवं बच्चों के प्रति उनके व्यवहार से परिचित होने लगे | अंततः उन्होंने अपने बच्चों की ‘शिक्षिका’ के रूप में उन्हें ‘पहचान’ लिया, स्वीकार कर लिया, अपना लिया ! सरिता गर्मी की छुट्टियों का उपयोग करके एक संघर्ष काफ़ी हद तक जीत चुकी थीं !

अब दूसरी चुनौती से जूझने की बारी थी | छुट्टियाँ ख़त्म होने पर स्कूल खुलते ही इस दिशा में भी कोशिश शुरू हो गई | हालाँकि गर्मीं की छुट्टियाँ ख़त्म होने के बाद औपचारिक रूप से बच्चों की पढ़ने-लिखने की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन वहाँ कोई ‘स्कूल’ नहीं होने से समस्या खड़ी हुई कि बच्चों की पढ़ाई कहाँ हो? इसके लिए उसी युवक जहूर हुसैन ने पुनः अपनी मदद पेश की | सरिता कहती हैं, “ये घुमंतू लोग बहुत ग़रीब होने के बावजूद बहुत बड़ा दिल रखते हैं…!” जहूर ने प्रस्ताव दिया कि उनके घर का बाहरी प्रांगण विद्यालय के रूप में प्रयोग किया जा सकता है | दरअसल यह जहूर के घर का वह हिस्सा था, जिसपर फ़ूस की छत थी और जिसका प्रयोग जहूर का परिवार रात को सोने के लिए करता था |

तत्काल कोई विकल्प न होने के कारण सरिता ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया | अब वह स्थान शाम से लेकर अगली अल-सुबह तक के लिए ‘घर’ के हिस्से के रूप में उस परिवार के लोगों का ‘शयनकक्ष’ बन जाता और सुबह की पहली किरण फूटते ही उनके समाज के बच्चों के लिए ‘विद्यालय’ का रूप ले लेता | उस परिवार के लोग तब अपना सारा सामान वहीँ एक कोने में समेट देते और बिछौनों को समेटकर वहीँ उसी कोने में टांग देते |

सरिता ने तब अपने संसाधनों से बच्चों के लिए अत्यावश्यक सामान ख़रीदे— बैठने के लिए दरियाँ एवं चटाइयाँ, पढ़ने-लिखने के लिए कॉपियाँ, क़िताबें, अन्य पठन-सामग्री आदि | अब चुनौती थी, बच्चों को ‘विद्यालय’, ‘शिक्षा’ और ‘अध्यापिका’ से औपचारिक रूप से परिचित कराकर उसके दायरे में लाने की | सरिता बताती हैं कि यह आसान भी था और बेहद कठिन भी | आसान इसलिए कि यदि सामने वाला स्नेहिल, निश्छल, हँसमुख और मिलनसार हो, तो बच्चों का दिल जीतना कोई मुश्किल नहीं है; और कठिन इसलिए कि प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर पढ़ना-लिखना पारंपरिक रूप से हमारी शिक्षा-प्रणाली में जितना बोझिल, ऊबाऊ, मशीनी और अरुचिकर बनाकर रखा गया है, उससे बच्चे सामान्य तौर पर पढ़ने-लिखने से भागते ही हैं, उसमें भी उन्मुक्त जीवन जीने के आदी घुमंतू-समाज के बच्चे |

आसान बनाने की क़वायद सरिता पहले ही थोड़ा-बहुत शुरू कर चुकी थीं, अब उन्होंने पढ़ाई को खेल और मनोरंजक गतिविधियों से जोड़ दिया | वे कहती हैं –“ मैंने बच्चों को शुरू में बताया ही नहीं कि मैं उनकी टीचर हूँ, ये बात केवल उनके माता-पिता ही जानते थे | स्कूल का समय शुरू होते ही मैं बच्चों को पहले उनके घर-घर जाकर बुलाती और कहती, ‘चलों हम खेलें’ | बच्चे कई बार कहते कि ‘हम तो खेलते ही हैं रोज़ अपने दोस्तों के साथ’ | तब मैं कहती कि ‘तुम्हारे पास तो दो-चार दोस्त ही होंगे, लेकिन मेरे पास बहुत-से दोस्त हैं, तुम चलकर देखो तो सही’ और बच्चे तब धीरे-धीरे आने लगे | मैं अपने साथ कुछ अन्य चीजें जैसे टॉफ़ियाँ, गुब्बारे आदि भी ले जाती | तब मैं खेल-खेल में उनको बिना आभास हुए कुछ चीजें बताने लगी | लेकिन शुरू में यह बहुत मुश्किल था | क्योंकि ‘खेलते’ समय अक्सर बच्चे जब बीच में ही उठकर यह कहते हुए चले जाते, कि ‘मैडमजी, मेरी भैंस आ रही है, मैं जा रहा हूँ’, तो बड़ी मुश्किल हो जाती…!”

ज़ाहिर है, शिक्षा और विद्यालय की दुनिया से अनजान बच्चे शिक्षा की गंभीरता से कैसे वाकिफ़ होंगे, उसपर से जब बच्चों को यह पता ही न हो कि उनको पढ़ने के लिए वहाँ भेजा गया है, न कि ‘खेलने’ के लिए !

लेकिन धीरे-धीरे बच्चे उन खेलों, कहानियों, मनोरंजक लेकिन शैक्षणिक-गतिविधियों के आदी होने लगे, जिसके ‘शैक्षणिक गतिविधि’ होने की कोई समझ भी तब तक उन्हें नहीं थी | यह सिलसिला कुछ समय तक चला और बच्चे पढ़ने-लिखने से जुड़ने लगे, उनको उसमें आनंद आने लगा; और तब बच्चों ने धीरे-धीरे जाना कि दरअसल उनको तो ‘पढ़ाया’ जा रहा है, और उनकी वह ‘दोस्त’, दोस्त’ न होकर उनकी अध्यापिका हैं | तब तक एक और अध्यापक सुनील दत्त की नियुक्ति वहाँ हो चुकी थी, जो वहाँ अक्टूबर 2014 में ज्वाइन कर चुके थे, गर्मी की छुट्टियाँ ख़त्म होने और विद्यालय की औपचारिक शुरुआत के तीन महीने बाद | अब दोनों अध्यापक एक-दूसरे के सहयोग से इस ‘विद्यालय’ को चलाने लगे थे |

तीन साल तक यह विद्यालय जहूर हुसैन के घर के प्रांगण में ही चला | लेकिन कहते हैं ना, कि घर ‘घर’ होता है और विद्यालय ‘विद्यालय’ | घर में विद्यालय या विद्यालय में घर हो, तो इसका असर दोनों पर नकारात्मक ढंग से पड़ता ही है, घर के वातावरण पर भी और विद्यालय के वातावरण पर भी | घर की सहजता और विद्यालय का अनुशासन, दोनों ही एक-दूसरे को नकारात्मक ढंग से प्रभावित करते हैं |

इसे वे दोनों अध्यापक समझते थे, लेकिन किसी कारण शिक्षा-विभाग से समय पर आर्थिक सहायता न मिलने और अन्य अनेक परेशानियों के कारण भी यह ‘विद्यालय’ अलग स्वतन्त्र रूप और आकार नहीं ले सका | अंततः लगभग तीन साल बाद 2017 में सरिता मेहरा और सुनील दत्त ने सम्मिलित रूप से यह तय किया कि वे अपने सम्मिलित निजी प्रयास से स्कूल को एक स्वतन्त्र साकार रूप देंगे|

इस निश्चय के बाद दोनों अध्यापकों ने अपने पास से पाँच-पाँच हज़ार रूपये लगाए और उस वनगूजर समाज के लोगों से भी निवेदन किया कि वे जिस भी रूप में उनकी मदद करना चाहे, कर सकते हैं | गाँव वालों ने तब लकड़ियाँ आदि उपलब्ध कराई और कुछ ने अपना श्रम भी दिया | उसके बाद शिक्षकों ने एक कच्चा-सा विद्यालय बनाया, मिटटी, फ़ूस और लकड़ियों की मदद से, क्योंकि अभयारण्य होने के कारण वहाँ कोई भी भवन आदि नहीं बनाया जा सकता था | हालाँकि वन-संरक्षण अधिकारियों से उन्होंने एक पक्का विद्यालय-भवन बनाने की अनुमति माँगी थी, लेकिन अधिकारियों की ओर से केवल कच्चे विद्यालयी-ढाँचे की ही अनुमति मिली; इसलिए यह विद्यालय अपने एक अनोखे रूप में खड़ा हुआ…

इस विद्यालय की कुछ ख़ास विशेषताएँ हैं— ‘दीवार’ के रूप में कुछ फिट ऊँची मिट्टी की ‘दीवार’ से घेरेबंदी करके उसके भीतर के हिस्से को विद्यालय मान लिया गया है; यानी यह ‘विद्यालय’ लगभग दीवार-रहित है; दरअसल डेढ़-दो हाथ ऊँची दीवार से झाँकता आसमान, हवाएँ, पेड़-पौधे ही उसकी असली ‘दीवारें’ और ‘खिड़कियाँ’ हैं; वाहनों के टायरों के दरवाज़े बनवाए गए हैं; और फ़ूस की ही छत है ! इसी तरीक़े से बच्चों के मध्याह्न-भोजन की व्यवस्था की ख़ातिर ‘रसोई’ भी बनाई गई है |

इसी ‘विद्यालय-परिसर’ में अनेक टिन के बक्से एवं आलमारियाँ रखी हुई हैं, जिनमें बारिश एवं कीड़े-मकोड़ों से बचाने के लिए विद्यालय की सारी सामग्री रखी रहती है; जैसे किताबें, रजिस्टर, चार्ट एवं अन्य शिक्षण-सामग्री, मध्याह्न-भोजन का राशन आदि | उन बक्सों एवं आलमारियों से बच्चों के पढ़ने के लिए प्रतिदिन क़िताबें बाहर निकाली और बक्सों के ऊपर फ़ैलाई जाती हैं और कीड़े-मकोड़ों से बचाने के लिए उसी तरह हर रोज़ वापस उसी में बंद कर दी जाती हैं | इस तरह यहाँ बच्चों की लगभग 100 पुस्तकों वाली वह विशिष्ट ‘लाइब्रेरी’ टिन की अलमारियाँ एवं बक्से हैं—पुस्तकें रखने के लिए भी और पुस्तकें पढ़ने के लिए मेज़ के रूप में भी |

यह अनोखा विद्यालय इसी रूप में चल रहा है | हालाँकि शिक्षा-विभाग से अब इस विद्यालय के रख-रखाव के लिए आवश्यक धनराशि मिलने लगी है; साथ ही, इस लेख के लिखे जाने के समय से शायद दो-ढाई महीने ही तीन जोड़ी डेस्क वाली कुर्सियाँ, दस कुर्सियों सहित दो गोल मेज़े भी मिली हैं |

एक बात और, यह विद्यालय ‘जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क’ का इलाक़ा होने के कारण मुख्य सड़क से क़रीब तीन-चार किलोमीटर दूर है और रास्ता घने जंगलों और जंगली हिंसक जानवरों से भरा हुआ, जिसे सरिता को शुरुआत में पैदल ही चलकर पार करना होता था | जंगली हाथी, चीते आदि कभी भी सामने आ जाते थे | उनके माता-पिता इससे बहुत चिंतित रहते |

वे बताती हैं— “तब मेरे पिता रोज़ मेरे साथ ही विद्यालय जाते और विद्यालय समाप्त होने के बाद मुझे अपने साथ लेकर ही वापस लौटते |” इस दौरान पिता अपनी बेटी सरिता के कई अध्यापकीय-कार्यों में हाथ बँटाया करते थे, इसलिए बच्चों ने शुरू में पिता को भी ‘टीचर’ समझा | यह सिलसिला भी कई महीनों तक चला, जब तक की उनके सहकर्मी सुनील दत्त वहाँ के लिए नियुक्त नहीं हो गए | उसके बाद सुनील दत्त और सरिता साथ-साथ जंगल का रास्ता पर करते |

इस तरह ख़ानाबदोश समाज के उन्मुक्त मिजाज़ के बच्चों का यह कारवाँ अपने इन दो अध्यापकों के नेतृत्व में चल पड़ा है शिक्षा की यात्रा पर, एक नई दुनिया देखने और नए क्षितिज पर उड़ान भरने के लिए ! अब यह तो भविष्य ही बताएगा कि यह यात्रा किस मुक़ाम तक पहुँच सकेगी…

–डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

Related Posts

5 thoughts on “सरिता मेहरा नेगी : ‘एक विद्यालय’ बनाने की कोशिश में ‘पहली अध्यापिका’

  1. एक बेहतरीन शिक्षिका के बारे आपकी बेहतरीन अभिव्यक्ति 🙏🙏👌

  2. उनके कार्यों को आपने बहुत ही बेहतरीन ढंग से अभिव्यक्त किया है ।

  3. सरिता मैडम एक हस्ताक्षर हैं जो कहावत चरितार्थ करते हैं जहां चाह वहां राह

    1. आपकी बात से सहमत हूँ…! दरअसल आप शिक्षकों के ऐसे प्रयास और अलग हटकर किए जा रहे कार्य ही अभी तक भारत की डावांडोल शिक्षा-प्रणाली को संभाले हुए हैं …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!