बतकही

बातें कही-अनकही…

पल्लवी रावत

हम सबने कभी न कभी अल-सुबह या ब्रह्म-मुहूर्त में सूरज के निकलने की दिशा में उसके ठीक आगे-आगे आते हुए उस चमकते तारे को अवश्य देखा होगा, जो सूरज के आसमान में उदीयमान होने के ठीक पहले उसी स्थान से ऊपर उठता है, जहाँ से सूरज को आना है | वह लोगों को सूरज के आने और सुबह होने की सूचना देता है | …जब घड़ियाँ नहीं होती थीं, तब लोग उसे ही देखकर यह अनुमान लगाया करते थे कि अब सुबह होने वाली है | …उस चमकते तारे को देखकर ऐसा लगता है, जैसे वह सूरज को रास्ता दिखा रहा हो और रास्तों से अनजान सूरज उस दमकते तारे का अनुसरण करता हुआ उसके पीछे-पीछे चुपचाप चला आ रहा हो…! अथवा वह शक्तिशाली तारा उस ढीठ सूरज को बंधक बनाकर अपने पीछे-पीछे खींचकर ला रहा हो, ताकि संसार में रौशनी हो और अँधेरे एवं ठंढ से अकुलाते जीवों को नया जीवन मिले…! उस देदीप्यमान तारे को ‘शुक्रतारा’ कहते हैं |

…तो जिस प्रकार हमारे आसमान में सूरज को अपने पीछे-पीछे लेकर आने की कवायद करता हुआ हमारा वह ‘शुक्रतारा’ रात के छँटने और सुबह के आने का प्रतीक होता है, कुछ उसी प्रकार से हमारे समाज में कुछ ऐसे ऊर्जावान एवं सकारात्मक सोच वाले लोग होते हैं जिनके कार्य एवं विचार भविष्य में एक बेहतरीन समाज के निर्माण के सूचक होते हैं… जैसे वे भी मानवीयता एवं सद्भावनाओं के सूरज को जबरन समाज के आसमान में खीच लाने को उद्धत हों… ताकि सभी को सुखपूर्वक जीवन जीने के अधिकार मिल सकें… सभी सुखी हो सकें…

…ऐसे किशोर एवं युवा भावी जन-नायकों को समाज में ‘अग्रदूत’ कहा जाता है, जिसका समानार्थक शब्द फ़्रेंच भाषा में ‘आवाँगार्द’ (Avant Garde) है | आवाँगार्द या अग्रदूत वे लोग कहे जाते हैं, जो बँधी-बँधाई लकीर पर चलने की बजाय जन-कल्याण के निमित्त नए रास्ते खोजते और बनाते हैं | ऐसे लोगों को हिंदी साहित्य की दुनिया के एक बेहतरीन सितारे सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ‘नई राहों के अन्वेषी’ कहते हैं…

सवाल है, कि ये ‘नवयुवा अन्वेषी’ आते कहाँ से हैं? इनको यह रूप प्रदान कौन करता है? या ये निर्मित कैसे होते हैं? जबकि उसी समाज की अनुभवी प्रौढ़-पीढ़ी वही काम नहीं कर पाती, जो ये अनुभवहीन नवयुवा कर जाते हैं…! सवाल यह भी उठता है कि यह क्षमता उनमें आती कहाँ से है? इसका उत्तर उनके अपने व्यक्तित्व में तलाशना चाहिए, जिनका निर्माण उनके परिवेश, उनकी परवरिश एवं उनकी शिक्षा द्वारा हुआ है…

…जब कोई नवयुवा विद्यार्थी अपनी शिक्षा-यात्रा के दौरान उसके प्रभाव से अपने बौद्धिक-वैचारिक एवं भावनात्मक व्यक्तित्व के निर्माण की प्रक्रिया में आरम्भ से ही एक बेहतर और सबके लिए अनुकूल समाज के निर्माण की दिशा में अपनी भूमिका तय करने लगे, उसे निभाने की ओर अग्रसर होने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि उसके अध्यापक एवं अभिभावक किस दिशा में क्या और कितने प्रयास करते होंगे और साथ ही, भविष्य में उस युवा का व्यक्तित्व क्या आकार लेने वाला होगा…

…और यह तो तय है कि ऐसे नवयुवाओं के सृजन में हमारे विद्यालयों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है | तब प्रश्न यह उठता है, कि क्या हमारे देश में भी सरकारी विद्यालय और उनके अध्यापक ऐसे स्फूर्तिवान ‘अग्रदूतों’ का निर्माण कर रहे हैं या कर सकते हैं? क्योंकि हमारे सरकारी विद्यालयों के अध्यापकों के सम्बन्ध में तो यह आम धारणा है, कि वे विद्यालय में आकर कोई काम नहीं करते, बल्कि मोटी-मोटी तनख्वाहों के लिए विद्यालयों में आने की खानापूर्ति भर करते हैं और उन्हें इस बात से कोई असर नहीं पड़ता की विद्यालयों में आकर बच्चे पढ़ पाते हैं या नहीं, उनका भविष्य बन पाता है या नहीं, देश और समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझ पाते हैं या नहीं, उन ज़िम्मेदारियों को निभाने के काबिल बन पाते हैं या नहीं…| इन धारणाओं के पीछे के सत्य को समझने का एक बेहतरीन तरीका है उनके विद्यार्थियों को और उन विद्यार्थियों की गतिविधियों एवं भूमिकाओं को देखना-समझना…

…जब हम सरकारी विद्यालयों एवं उनके अध्यापकों की ओर इस अभिप्राय से देखते हैं, तो वाकई वस्तुस्थिति हमें अक्सर निराश ही करती है, लेकिन तब भी हमेशा नहीं…! क्योंकि उन्हीं के बीच कुछ विद्यालय एवं अध्यापक कुछ अलग-से नज़र आते हैं, जो अपने प्रयासों से ऐसे ही ‘सुबह के अग्रदूतों’ के सृजन नित्य कर रहे हैं | उपरोक्त आम धारणाओं को खण्डित करते हुए पिछले कुछ समय से ये कुछ अध्यापक जिन ‘अग्रदूतों’ की सर्जना कर रहे हैं, उनके बारे में हालाँकि यह तो निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता कि भविष्य में उनका ऊँट किस करवट बैठेगा, लेकिन वर्तमान में ये पूत अपने पाँव पालने में ही दिखाने लगे हैं…!

…तो सुबह के ऐसे ही ‘अग्रदूतों’ या ‘नई राहों के अन्वेषकों’ में एक नाम है— पल्लवी रावत, जिसकी उम्र इस समय महज लगभग साढ़े इक्कीस साल है और वह एमए की छात्रा है | और यह ‘अग्रदूत’ अपने माता-पिता सहित राजकीय अंतर महाविद्यालय (गवर्नमेंट इंटर कॉलेज) एकेश्वर के एक अध्यापक आशीष नेगी द्वारा ‘नई राहों की अन्वेषी’ के रूप में सृजित की जा रही है…

…पल्लवी रावत का जन्म 7 अक्टूबर 1999 को उच्चाकोट (एकेश्वर, पौड़ी, उत्तराखंड) में हुआ, मुन्नी देवी और विक्रमसिंह रावत की चौथी संतान के रूप में | पल्लवी अपने भाई-बहनों में सबसे छोटी और सबकी लाड़ली हैं | इनकी शुरूआती पढ़ाई, यानी कक्षा 1 से 5 की, उच्चाकोट (एकेश्वर) से हुई और कक्षा 6 से 12 की राजकीय बालिका उच्च विद्यालय एकेश्वर से, जहाँ से उन्होंने 2014 में 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की और 2016 में 12वीं की परीक्षा | पल्लवी की रूचि चूँकि हमेशा से चित्रकला में रही, इसलिए उन्होंने स्नातक की पढ़ाई कला विषय (फाइन आर्ट) से साल 2019 में पूरी की, डॉ. पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल (पीजी) कॉलेज (कोटद्वार) से | वर्तमान में वे डीएवी (पीजी) कॉलेज देहरादून से ही चित्रकला विषय में एमए कर रही हैं |

पल्लवी इतनी कम उम्र में सामाजिक-भागीदारी की ओर कैसे उन्मुख हुईं, जिस उम्र में नवयुवा अक्सर अपने सपनों में खोए हुए दोस्तों के साथ मौज-मस्ती और सैर-सपाटे में ही व्यस्त रहते हैं? इस सवाल के जवाब में वे बताती हैं कि हालाँकि अपने परिवार के भीतर ‘वाद-विवाद-संवाद’ की प्रक्रिया में पहले से ही वे बौद्धिक-वैचारिक रूप से समृद्धि और समझ प्राप्त करने लगीं थीं, ख़ासकर माता-पिता के सान्निध्य में | साथ ही, अपने विद्यालयों और कॉलेज (राजकीय प्राथमिक विद्यालय उच्चाकोट, राजकीय उच्च कन्या विद्यालय एकेश्वर, डॉ. पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल (पीजी) कॉलेज कोटद्वार) में भी उनके अध्यापकों ने उनकी वैचारिक-बौद्धिक आयामों की निर्मिति में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और अभी भी यह क्रम वर्तमान में डीएवी (पीजी) कॉलेज देहरादून के अध्यापकों द्वारा लगातार जारी है | किन्तु उस बौद्धिक-वैचारिक समझ को कार्य-रूप या व्यावहारिक-रूप मिला अपने अनौपचारिक अध्यापक आशीष नेगी के संपर्क में आने के बाद |

हालाँकि औपचारिक रूप से वे आशीष नेगी की विद्यार्थी नहीं हैं, लेकिन चित्रकला में रूचि के कारण सोशल मीडिया के माध्यम से आशीष नेगी के संपर्क में पहले से ही थीं और इस रूप में उनके सामाजिक कार्यों से प्रभावित भी थीं | साथ ही, एक ही स्थान (एकेश्वर) में दोनों का निवास होने का लाभ भी पल्लवी को मिला | इसी क्रम में एक विद्यार्थी के रूप में वे आशीष के विद्यार्थियों के समूह ‘दगड़्या’ से जुड़ीं | इससे चित्रकला के सम्बन्ध में कई बातें सीखने और सामाजिक कार्यों से अपनी कला को जोड़ने के तरीक़े समझने में उन्हें काफ़ी मदद मिली | उनके इस अनौपचारिक अध्यापक ने उनकी समझ और संवेदनाओं को व्यावहारिक धरातल पर उतारने में मदद की, सोच को नई दिशा प्रदान की…| इसलिए पल्लवी शिक्षक आशीष को अपने ‘सम्माननीय अध्यापक’ का स्थान देती हैं | उसी प्रभाव के कारण धीरे-धीरे उन्होंने आशीष के सामाजिक कार्यों में शिरकत करना शुरू किया |

ये ‘दगड़्या’ क्या है? पूछने पर पता चलता है कि यह आशीष नेगी द्वारा बच्चों के लिए बनाया गया समूह और मंच है, जिसका संचालन भी मुख्यतः बच्चे ही करते हैं और इसमें समस्त गतिविधियाँ भी बच्चों से ही संबंधित होती हैं | यह मंच बच्चों को पढ़ने-लिखने में अनौपचारिक मदद करने के साथ-साथ सामाजिक रूप से सचेत और ज़िम्मेदार भी बनाता है |

…अब तक की यात्रा पर नज़र डालने पर पल्लवी का व्यक्तित्व-विकास दो स्तरों पर दिखाई देता है, एक तो अपनी योग्यताओं एवं क्षमताओं के विकास के लिए कोशिश के सम्बन्ध में और दूसरा अपनी सामाजिक भूमिकाओं के प्रति अभी से सजग-सचेत होकर उसमें सक्रिय भागीदारी के रूप में | अपने अभिभावकों एवं शिक्षक आशीष के दिशा-निर्देश में पल्लवी अपने व्यक्तित्व-विकास के इन दोनों पक्षों को जोड़कर और उन्हें एक-दूसरे का पूरक बनाने की ओर भी अग्रसर हैं | सामाजिक ज़िम्मेदारियों के निर्वहन में भी वे दो स्तरों पर काम करती नज़र आती हैं— अपने से छोटे या समकक्ष साथियों (बच्चों) के प्रति, और साथ ही ‘बड़े बुजुर्गों’ तक अपनी बात पहुँचाने के संदर्भ में भी |

…आशीष ने एकेश्वर में अपने दो कमरों के किराए के घर में एक कमरे को लाइब्रेरी बना रखी है, जो पूरी तरह से बच्चों और उनके अभिभावकों को समर्पित है, विशेष रूप से बच्चों के लिए | इस लाइब्रेरी में केवल बच्चों के लिए पुस्तकें ही नहीं बल्कि चित्र, क्राफ्ट, रंगोली आदि बनाने की सामग्री भी बच्चों के लिए निःशुल्क उपलब्ध है | इसके साथ ही बच्चों को यहाँ आकर बच्चों की विचार-गोष्ठी एवं कविता-पाठ में शामिल होने के मौक़े मिलते हैं | पल्लवी अपने गाँव के लोगों, ख़ासकर बच्चों को इस लाइब्रेरी की जानकारी देती हैं, साथ ही उनको प्रेरित और प्रोत्साहित भी करती हैं वहाँ आकर अपनी पसंद की पुस्तकें पढ़ने एवं वैचारिक-चिंतन एवं कविता-वाचन जैसी गतिविधियों में शामिल होने के लिए और यदि उनकी कलाओं में रूचि हो तो उससे संबंधित गतिविधियों के लिए भी |

…पिछले साल 2020 में जब पूरे देश में लॉकडाउन के कारण सारे संस्थानों सहित बच्चों के विद्यालय भी बंद हो गए, तब उनकी पढ़ाई पर इसका बहुत अधिक नकारात्मक असर पड़ा | बच्चे न केवल पढ़ाई से दूर होने लगे, बल्कि पढ़ाई के प्रति उदासीन भी होने लगे | इन सबके साथ एक और समस्या सामने आई— ऊर्जा से भरे बच्चों का घरों में बंद होकर बोरियत का शिकार होना | आशीष और ‘दगड़्या’ ने इसका एक बेहद ही शानदार और बहुस्तरीय-लाभकारी उपाय निकाला— पढ़ने-लिखने से लेकर व्यक्तित्व-विकास के उद्देश्य से अनेक प्रकार की ऑनलाइन गतिविधियाँ | इसमें ‘दगड़्या’ के अनेक सुलझे और विचारशील किशोर एवं नवयुवा सदस्यों ने आशीष की सहायता की, परामर्श के स्तर पर भी और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के स्तर पर भी |

इस उद्देश्य से पल्लवी ने अपने गाँव के सभी बच्चों को ‘दगड़्या’ से और ‘एकेश्वर लॉकडाउन दगड़्या’ (ELD) ग्रुप से जोड़ा | इन समूहों के माध्यम से आशीष बच्चों की बोरियत दूर करने तथा कुछ पढ़ना-लिखना सिखाने एवं उनके व्यक्तित्व में कुछ सकारात्मक तत्व जोड़ने के विचार से चुनी हुई कहानियाँ रिकॉर्ड करके ‘दगड़्या’ के व्हाट्सएप समूह में साझा करते थे जिसे बच्चे बहुत चाव से सुनते थे और अपनी-अपनी राय भी एक-दूसरे से साझा करते थे | इसी तरह बच्चों द्वारा निबंध-लेखन, चित्रकला, क्राफ्ट बनाना, सामान्य-ज्ञान-प्रतियोगिता के माध्यम से ऑनलाइन परीक्षा देने की ट्रेनिंग जैसी अनेकों गतिविधियाँ ‘दगड़्या’ और ELD के माध्यम से आयोजित होती रहीं, जिसे सफ़लतापूर्वक एक मुकाम तक पहुँचाने में अपने जैसे नवयुवा साथियों के साथ मिलकर पल्लवी ने भी ‘दगड़्या’ की यथासंभव सहायता की |

ऐसी बहुत सारी गतिविधियों में शामिल होने के लिए पल्लवी ने अपने गाँव के बच्चों को भाग लेने की ख़ातिर प्रोत्साहित किया | यह पूछने पर कि वे बच्चों को क्यों इसके लिए प्रोत्साहित करती हैं? उत्तर मिला कि “…इस तरह की गतिविधियाँ बच्चों के व्यक्तित्व-विकास के लिए बहुत ज़रूरी होती हैं, जिसमें सभी भागीदारी करें | इससे वे एक-दूसरे के बारे में जानने लगते हैं, एक-दूसरे की प्रतिभाओं से परिचित होते हैं | जिससे उनके मन के कई वहम दूर होते हैं और वे समझने लगते हैं कि कमज़ोर दिखनेवाले बच्चे भी प्रतिभाशाली होते हैं, या प्रतिभा का ग़रीबी और जाति-धर्म जैसी चीजों से कोई संबंध नहीं है…| इसके अलावा ऐसी गतिविधियों में शामिल होने से अपनी लिखित या मौखिक अभिव्यक्ति के मामले में बच्चों की झिझक, संकोच, शर्म ख़त्म होती है और बच्चे खुलकर अपनी बात रखने के लिए धीरे-धीरे अभ्यस्त होने लगते हैं | …इन सभी गतिविधियों का वाकई में बहुत अधिक असर हुआ है, बच्चों के माता-पिता हमारे आशीष सर के इन सभी कामों की बहुत सराहना करते हैं और चाहते हैं कि ये गतिविधियाँ ऐसे ही आगे भी चलती रहें…|”

…पल्लवी की बढ़ती वैचारिक परिपक्वता और ज़िम्मेदारीपूर्वक दायित्वों के निर्वाह की कोशिशों को देखते हुए आशीष ने उन्हें 31 अक्टूबर 2020 को ‘दगड़्या’ के जन्मदिन, यानी स्थापना-दिवस, पर आयोजित बच्चों की ऑनलाइन प्रतियोगिताओं में अन्य कई किशोर एवं नवयुवा लड़के-लड़कियों के साथ उन्हें भी निर्णायक-मंडल का सदस्य, अर्थात् ‘जज़’ बनाया | इसमें निबंध-लेखन, चित्रकला, फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता आदि से जुड़ी प्रतियोगिताएँ आयोजित की गईं, जिसमें बच्चों ने लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन ही भाग लिया |

…लेकिन आशीष इन प्रतियोगिताओं को ‘प्रतियोगिता’ नहीं कहते, बल्कि एक बहाना भर मानते हैं | वे बार-बार ज़ोर देकर कहते हैं— “…दुर्भाग्य से हमारे समाज में ‘प्रतियोगिता’ शब्द इतना अधिक सर्वव्यापी बन गया है, कि सभी उसकी ओर अनायास आकर्षित हो जाते हैं | …लॉकडाउन के दौरान आयोजित इन कार्यक्रमों के लिए मैंने केवल बच्चों की दिलचस्पी जगाने भर के लिए ‘प्रतियोगिता’ शब्द का सहारा लिया है, ताकि बच्चों को प्रोत्साहित कर पहले इस प्रकार की शैक्षणिक-गतिविधियों से जोड़ा जा सके…| दरअसल इस तरह की शैक्षणिक-गतिविधियाँ बच्चों के सर्वांगीण बौद्धिक-वैचारिक एवं संवेदनात्मक विकास के लिए बहुत आवश्यक हैं, जो बच्चों के व्यक्तित्व को बेहतरीन आकार दें, जिनसे उनके मन के संकोच, झिझक, शर्म, डर, उपेक्षा की भावना, आत्म-विश्वास की कमी आदि को दूर किया जा सके और बच्चे एक-दूसरे की ख़ूबियों से परिचित हो सकें और जान सकें कि उनका कोई भी सहपाठी या समाज का कोई भी बच्चा ‘कमज़ोर’ नहीं होता है, बल्कि उसके हालात उसे अपनी प्रतिभा को बाहर लाने का मौक़ा नहीं देते…| लेकिन जब बच्चे इन कार्यक्रमों से जुड़ जाते हैं तब हम कोशिश करते हैं उनको ‘प्रतियोगिता’ की मानसिकता से बाहर निकालने की, ताकि वे सब मिलकर साथ चल सकें, दोस्तों और आत्मीयजनों की तरह…” 

…जहाँ तक इन गतिविधियों में अनुभवहीन किशोर एवं नवयुवा छात्र-छात्राओं को निर्णायक-मण्डल का सदस्य बनाए जाने का प्रश्न है, तो वस्तुतः यह क़दम ‘दगड़्या’ की लोकतांत्रिक और समतामूलक चरित्र का परिचायक है | जिस समाज में ‘बड़ों’ को ही समझदार समझने की मानसिकता काम करती हो और इसीलिए ‘निर्णय लेने’ का काम उनके ऊपर ही छोड़ा जाता हो, वहाँ बच्चों के इस ‘दगड़्या’ ग्रुप में सभी बच्चों को समान रूप से महत्वपूर्ण मानने और सभी को समान रूप से अवसर देने तथा साथ ही निर्णय की प्रक्रिया में उनको बराबर शामिल करने का चलन एक नई इबारत लिखने की कोशिश में है; जो इस बात की स्थापना करता है कि ‘बड़े’ ही नहीं बच्चे भी संतुलित, समझदारी-भरे और निष्पक्ष निर्णय ले सकते हैं, यदि उनको अवसर दिए जाएँ; बल्कि निष्पक्षता में वे ‘बड़ों’ से कहीं बेहतर प्रदर्शन करेंगे, क्योंकि अभी वे ‘भाई-भतीजावाद’ से संक्रमित नहीं हुए होते हैं…

…प्रसिद्द यूरोपीय कवि विलियम वर्ड्सवर्थ ने लिखा है— ‘Child is the Father of Man’, …तो यदि इसी पंक्ति को पकड़कर यह कहा जाए, कि बच्चों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं, यदि हमने अपने मन और मस्तिष्क को खुला रखा हो, या इसी बात को तनिक पलटकर यूँ कहा जाय कि बच्चे भी हमें बहुत कुछ सिखा सकते हैं, यदि हम अपने अहंकार में उनको तुच्छ न मानें, तो कहना पड़ेगा, कि हमारे स्कूल-कॉलेजों के किशोर और नवयुवा छात्र-छात्राएँ हमें बहुत कुछ सिखा सकते हैं…

…लॉकडाउन के दौरान आशीष नेगी ने व्यक्तिगत स्तर पर कई अभियानों के साथ एक और अभियान शुरू किया था— लोगों में विभिन्न मुद्दों को लेकर जागरूकता फ़ैलाने की मुहीम | इसे रोचक एवं प्रभावशाली बनाने के लिए चित्रकारी का सहारा लिया गया | यह अभियान अगली पीढ़ी के अग्रदूतों की तैयारी की दृष्टि से भी काफ़ी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन्हें मानवीय-दृष्टि प्रदान करता है, अपनी ज़िम्मेदारियों का एहसास कराता है, शिक्षा और कला की दुनिया में ‘बौद्धिक-विलास’ तक सीमित न रखकर उन्हें उनकी ज़िम्मेदारियों के प्रति सजग और सक्रिय करता है…| इसमें पुनः ‘दगड़्या’ ग्रुप को सामने लाया गया, जिसके किशोरों-किशोरियों एवं नवयुवाओं ने बेहद ख़ास भूमिका निभाई |

जब लॉकडाउन में सभी बाज़ार और दूकानें आदि बंद पड़े थे, तब इन लोगों द्वारा अपने-अपने इलाक़ों में उन बाज़ारों में जाकर बंद दूकानों एवं घरों की ख़ाली दीवारों पर विभिन्न मुद्दों से संबंधित चित्रकारी की गई, जैसे— धूम्रपान-निषेध, कोरोना-संबंधी (हाथ धोना, मास्क पहनना), महिलाओं से संबंधित विभिन्न मुद्दों को लेकर, अपनी संस्कृति के प्रति लोगों में जागरूकता लाने से संबंधित, जल के संरक्षण से संबंधित…| इसमें पहली पंक्ति के जिन ‘अग्रदूतों’ ने अपनी भूमिका निभाई उसमें पल्लवी का नाम भी प्रमुख है, जिन्होंने रंग और कूची उठाकर ख़ाली दीवारों पर अपने साथियों के संग आने वाले समय की नई इबारत लिखी…

इसके अलावा लॉकडाउन में बेहद ग़रीब परिवारों के सामने जो जीवन-यापन की समस्या उठ खड़ी हुई थी, कुछ सीमा तक उसके समाधान में आशीष ने विभिन्न इलाक़ों में मदद का हाथ बढ़ाया और पुनः इसमें ‘दगड़्या’ ग्रुप के ‘अनुभवहीन’ सदस्यों की मदद ली गई | इसी के तहत पल्लवी ने भी आशीष के दिशा-निर्देश में अपने गाँव में घर-घर जाकर बहुत कमज़ोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों का पता लगाया और उनकी ज़रूरतों के बारे में जानकारी एकत्र की तथा उसकी सूचना आशीष तक पहुँचाई | तब आशीष ने उन तक राशन (चावल, दाल, तेल, नमक, आटा, नहाने, बर्तन धोने और कपड़े धोने का साबुन, तेल, मसाले, डिटॉल सेनिटाइज़र आदि) पहुँचाए |

…किसी भी बच्चे की शिक्षा तब तक अधूरी है, जब तक वह बच्चों को अपने समाज और पर्यावरण के प्रति सचेत और जागरूक नहीं बनाती है | यह बात पल्लवी और उनके अध्यापक समझते हैं | इसलिए इस उद्देश्य से जब आशीष ने गाँव-गाँव के बच्चों को पर्यावरण के प्रति सचेत करने के लिए भारतीय पारंपरिक त्योहारों को माध्यम बनाया, तो पल्लवी भी उसमें शामिल हुईं और अपने परिवार के सदस्यों को भी शामिल किया | आशीष ने रक्षाबंधन के दिन ‘दगड़्या’ के बच्चों को अपनी तरफ़ से फ़लों के पौधे उपलब्ध कराकर उन्हें जमीन में लगाने और उनको राखी बाँधकर उनकी देखभाल और रक्षा करने को प्रोत्साहित किया | इस उद्देश्य से पल्लवी ने गाँव के अन्य बच्चों को तो अपनी तरफ़ से जानकारी देकर प्रोत्साहित तो किया ही, साथ ही अपने परिवार के सदस्यों को भी ‘दगड़्या’ की इस मुहीम में शामिल किया और पल्लवी, उनकी माँ एवं भाभी ने अपने घर में तीन फ़लदार पेड़ लगाए, जो न केवल पर्यावरण के पक्ष में हैं, बल्कि चिड़ियों का बसेरा भी भविष्य में बन सकते हैं |

जहाँ तक सामाजिक चेतना का प्रश्न है, तो किसी भी सामान्य बच्चे की तरह पल्लवी भी इस मामले में बचपन से ही कुछ विद्रोही स्वभाव की रही हैं | हालाँकि जाति, धर्म जैसी संकीर्णताओं से ग्रसित समाज द्वारा उनको भी ‘निम्न’ कहे जानेवाले लोगों एवं समुदायों से दूर रहने के निर्देश दिए गए, जिसके कारण बचपन से ही उनके मन में भी दर्ज़नों सवाल खड़े होते रहे हैं | लेकिन विद्रोही बाल या किशोर मन कब किसी बंधन को मानता है, और नवयुवा तो किसी के बाँधे आज तक नहीं बँधा है…! इसका असर यह हुआ कि इन बीते वर्षों में नई-पुरानी पीढ़ी के इस द्वंद्व ने पल्लवी सहित उनके परिवार को भी बौद्धिक-वैचारिक रूप से लगातार समृद्ध ही किया है…

…एक सरकारी विद्यालय के एक अध्यापक आशीष नेगी द्वारा निर्मित की जा रही यह ‘आवाँगार्द’ या ‘सुबह की अग्रदूत’ आज तो समाज के भीतर अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए यह आश्वासन-सा दे रही है, कि उम्मीद अभी शेष है, नवयुवाओं की कोशिश अभी ज़ारी है, उस सौहार्द एवं मानवीयता के सूरज को वापस लाने की… हाँ भविष्य में यह क्या करेगी, यह तो समय ही बताएगा…! लेकिन वर्तमान में यह नवयुवा लड़की सबकी आँखों का तारा तो बनी ही हुई है, क्योंकि ऊर्जा, उत्साह और कुछ कर गुजरने की चेतना से भरी हुई वह लगातार अपने सामाजिक-दायित्वों के प्रति और अधिक प्रतिबद्ध होती चली जा रही है… और उसके अभिभावक एवं अध्यापक भी उसकी ओर आशा भरी दृष्टि से देख रहे हैं…

  • डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

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8 thoughts on “‘सुबह के अग्रदूत’— एक

  1. U r a package Pallavi. Ur efforts are commendable. Go ahead and keep shining. Best wishes for the future. Kanak mam thanks to u again. Ur writing skill is too good.

  2. A lot of appreciation as well as a lot more of applauses you all actually deserve because the work you are doing for the welfare of society not everyone actually have guts to do that.

  3. A lot of appreciation as well as a lot more of applauses you all actually deserve because the work you are doing for the welfare of society not everyone actually have guts to do that.

  4. आशा है और उम्मीद भी आप इसी ऊर्जा के साथ निरंतर आगे बड़ो मेरी हार्दिक शुभकामनाएं आपके साथ है।

  5. तुम हमेशा स्वस्थ समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाओ और खूब उन्नति करो।

  6. Congrats “Pallavi Rawat”🌺🌷🥀🌹🌸💐, keep progressing dear 💓😚😚😚, & special thanks to “Dr. Kanak Lata” mam that she find such talents or qualities from the public, Radhe-Radhe 💓🙏🏻😚😚😚

  7. इन अग्रदूतों की जितनी सराहना की जाए कम है और आशीष तो स्वयं एक हस्ताक्षर ही हैं। वास्तव में ज़मीन के साथ जुड़ कर उत्कृष्ट कार्य करने के लिए उन्हें साधुवाद।
    आप को इन छुपे हुए महानायकों को सामने लाने के लिए धन्यवाद इस आशा और विश्वास के साथ कि आप की यह ऊर्जा कभी क्षीण न हो।
    शुभेच्छु

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