बतकही

बातें कही-अनकही…

भाग-एक :- विद्यार्थी जिसकी प्रथम ज़िम्मेदारी हैं

भारतीय शिक्षा-प्रणाली की स्थिति यह है कि यहाँ बहुलांश में सरकारी विद्यालयों के शिक्षक किसी भी अन्य सरकारी विभाग की तरह अपने पेशे को अच्छे-ख़ासे वेतन के रूप में मोटी आय का ज़रिया-भर मानते हैं | लेकिन उस पद से संबंधित ज़िम्मेदारियाँ और कार्य करने की जब बात हो तो ये उसे पसंद नहीं करते | कारण…? भारतीय समाज के इस हिस्से को पीढ़ियों से काम करने की आदत नहीं है और दूसरों की मेहनत से अर्जित माल को बैठकर खाने की लत लगी हुई है, अपने काम/नौकरी के लिए मोटे वेतन के बदले भी ! हालाँकि इसके पीछे और भी कई सामाजिक तथ्य कार्य करते हैं, जो उनको अपना काम करने से रोकते हैं | लेकिन इस तरह अपने पद से संबंधित अपना काम न करने का परिणाम यह होता है कि जनसाधारण के मन-मस्तिष्क में यह बात बैठ गई है या बिठा दी गई है कि ‘सरकारी कर्मचारी काम नहीं करते’ !

उत्तराखंड में (कई अन्य राज्यों में भी कमोवेश यही स्थिति है) जन-समाज के बीच अक्सर यह सुनने को मिल जाता है कि “यहाँ सरकारी स्कूलों के अध्यापकों के लिए उनकी यह सरकारी नौकरी ‘साइड बिज़नेस’ के रूप में है, इनका ‘मुख्य बिज़नेस’ तो कुछ और है ! इन लोगों ने या तो कई तरह की  अपनी-अपनी दूकानें (जैसे किराना, कपड़े, स्टेशनरी आदि) खोल रखी हैं, या कोई और बिज़नस करते हैं और वही उनका मुख्य काम है | स्कूल तो केवल वे वेतन लेने के लिए जाते हैं, जो उनकी नियमित एवं निश्चित आय का ज़रिया है |” जनता के बीच बन चुकी यह धारणा निर्मूल भी नहीं है |

पौड़ी में एक संस्था में काम करने के दौरान ऐसे विद्यालयों में जाने और वहाँ के आसपास के गाँवों में लोगों से बातचीत के दौरान ये बातें सामने भी आई, कि जिन विद्यालयों में दो या उससे अधिक अध्यापक हैं, वहाँ आपसी सहमति से शिक्षक/शिक्षिकाएँ एक-दूसरे की मदद से दिन के हिसाब से आते हैं; यानी वहाँ ऐसे विद्यालय में कोई भी शिक्षक रोज़ विद्यालय आने का कष्ट नहीं उठाता, उस दौरान वे अपना ‘मुख्य बिज़नेस’ सँभालते हैं |

ज़ाहिर है ऐसे शिक्षक/शिक्षिकाओं के लिए उनके विद्यार्थी क्या हैसियत रखते होंगे, यह समझना कोई मुश्किल नहीं है ! कुछ कटूक्तियाँ तो मेरे कानों में पड़ीं ही हैं, जब शिक्षक/शिक्षिकाओं ने बिना यह सोचे-समझे, कि वहाँ कोई अन्य व्यक्ति भी मौजूद है जो उनकी बातें सुन रहा है, यह कहते कि— “ये हराम…पढ़कर करेंगे भी क्या? आख़िर इनको भी तो वही करना है, जो इनके बाप-दादे करते आए हैं…!” ज़ाहिर है आज वर्तमान हालातों में यदि सरकारी विद्यालयों के निजीकरण की शुरुआत हो रही है, तो निश्चित रूप से इसकी पृष्ठभूमि में ऐसे ही अध्यापकों के पिछले दशकों के ‘परिश्रम’ ज़िम्मेदार हैं |

लेकिन इन्हीं ‘खाए-पिए-अघाए’ तथाकथित ‘शिक्षक-समुदायों’ के बीच जब कोई अध्यापक यह कहे कि “मेरे विद्यार्थी मुझे मेरे अपने बच्चों से भी अधिक प्रिय हैं, क्योंकि इनके कारण ही मेरा परिवार चलता है, मेरी रोज़ी-रोटी चलती है, मेरे बच्चे पलते हैं; इसलिए मैं इनपर अपने बच्चों से भी अधिक ध्यान देता/देती हूँ; इनके विकास के लिए जो भी संवैधानिक रूप से संभव है, वह सारे कार्य करता/करती हूँ…! एक शिक्षक/शिक्षिका होने के नाते मेरा यह कर्तव्य भी है…!” तब रुककर सोचना पड़ता है; और हाँ, तभी यह बात भी समझ में आती है कि सरकारी-स्तर पर शिक्षा को लेकर कुछ उम्मीदें जो अभी तक बची हुई हैं, वह ऐसे ही शिक्षकों के कारण |

दरअसल यह उपरोक्त बात जिसने मुझसे कही थी उस शिक्षक का नाम सुभाष चंद्र है | सुभाष चंद्र…! राजकीय प्राथमिक विद्यालय, किमोली (ब्लॉक कल्जीखाल, पौड़ी) के प्रधान अध्यापक, जो इस विद्यालय में साल 2006 से कार्यरत हैं, जब यहाँ 65 बच्चे पढ़ते थे | किन्तु तेज़ी से होते पलायन के कारण आज उस विद्यालय में केवल 12 विद्यार्थी ही रह गए हैं, 5 वीं कक्षा तक के इस विद्यालय में पाँचवीं कक्षा पास करके विद्यार्थी यहाँ से निकलते चले गए, लेकिन उसी अनुपात में नए विद्यार्थियों ने दाख़िला नहीं लिया |

ज़ाहिर है, जब सरकारें निजी कंपनियों को सस्ते श्रमिक उपलब्ध कराने के उद्देश्य से स्वयं ही इस बात के लिए प्रत्यक्ष-परोक्ष कोशिश कर रही हों कि मेहनतकश सामाजिक-समुदाय अपने गाँवों में खेती-किसानी का काम छोड़कर शहरों की ओर जाएँ, ताकि इनकी बहुत बड़ी आबादी शहरों में एक-दूसरे से लड़ती-उलझती कम-से-कम मज़दूरी पर काम करने के लिए उपलब्ध हो सके | तब पलायन क्यों न हो?

अस्तु, वर्तमान में सुभाष चंद्र इस विद्यालय में न केवल सरकारी मुलाज़िम के रूप में अपना काम कर रहे हैं, बल्कि विद्यालय में बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए और उसकी ख़ातिर सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए अपने सहयोगी प्रमोद कुमार के साथ मिलकर शिक्षा के पटल पर एक नई इबारत भी लिख रहे हैं |

सुभाष चंद्र का जन्म 3 मार्च, 1975 को गाँव सूला, कल्जीखाल (उत्तराखंड) में हुआ | वे अपने माता-पिता सुभद्रा देवी एवं स्वर्गीय मंगतराम (1991 में जूनियर हाई स्कूल के हेड मास्टर के पद से रिटायर) की छः संतानों (पाँच पुत्र, एक पुत्री) में सबसे छोटे हैं | पिता शिक्षित थे और जूनियर हाई स्कूल में शिक्षक भी, इसलिए बच्चों की पढ़ाई के महत्व को ख़ूब अच्छी तरह समझते थे | इसका असर यह हुआ कि सभी भाई-बहनों की शिक्षा बेहतरीन ढंग से हुई और सभी किसी-न-किसी महत्वपूर्ण कार्य से जुड़े रहे हैं, हालाँकि एक भाई (वन अधिकारी/फ़ॉरेस्टर) का अब देहांत हो चुका है |

जहाँ तक सुभाष की पढ़ाई का प्रश्न है, तो उनकी प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 1 से 5) उनके गाँव सूला, कल्जीखाल से हुई है और कक्षा 6-10 तक की पौड़ी से, जहाँ से उन्होंने 1991 में 10 वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की | कक्षा 11-12 की पढ़ाई इंटर कॉलेज, कल्जीखाल से विज्ञान विषय से हुई और यहाँ से 1993 में उन्होंने 12 वीं उत्तीर्ण की | आगे उच्च शिक्षा, अर्थात् डिग्री कॉलेज की पढ़ाई बीएससी (साइंस विषय से) पौड़ी से ही की और 1996 में स्नातक की उपाधि प्राप्त की |

जहाँ तक शिक्षण-क्षेत्र में आने का सवाल है, तो जिस साल सुभाष चंद्र ने स्नातक की डिग्री हासिल की, उसी साल (1996) शिक्षा-विभाग में बैकलॉग पर भर्ती-प्रक्रिया चल रही थी, जिसमें सुभाष का भी चयन हो गया | उनको पहली नियुक्ति अप्रैल 1996 में ही प्राथमिक विद्यालय, भटवाड़ा, विरोंखाल (जिला पौड़ी) में मिली | यहाँ वे तीन साल रहे, अर्थात् 25 जुलाई 2000 तक | उसके बाद जुलाई 2000 में उनका स्थानांतरण प्राथमिक विद्यालय एकेश्वर (जिला पौड़ी) में हो गया, जहाँ वे लगभग 2 महीने, अक्टूबर 2000 तक रहे | साल 2000 में ही पुनः एक बार ट्रान्सफर हुआ, राजकीय प्राथमिक विद्यालय, पैंछारी, (पाटीसैण और सतपुली के बीच, जिला पौड़ी) में, जहाँ वे अक्टूबर 2000 से अगस्त 2003 तक रहे | 2003 में एक बार पुनः सुभाष का ट्रान्सफर हुआ, राजकीय प्राथमिक विद्यालय मिर्चोड़ा, कल्जीखाल (पौड़ी) में; जहाँ वे अगस्त 2003 से अगस्त 2005 तक कार्यरत रहे |

उनके कार्यों को देखते हुए वह समय भी आया, जब शिक्षा-विभाग द्वारा उनको अधिक महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गई | साल अगस्त 2005 में उनका प्रमोशन हुआ और साथ ही ट्रान्सफर भी; विद्यालय था— राजकीय प्राथमिक विद्यालय बलोद (जिला पौड़ी), जहाँ वे हेड टीचर की हैसियत से पहुँचे | यहाँ लगभग सवा साल तक (अगस्त 2005- नवम्बर 2006) काम करने के बाद उनका पुनः एक बार ट्रांसफर हुआ,  राजकीय प्राथमिक विद्यालय, किमोली, (ब्लॉक कल्जीखाल, पौड़ी), 13 नवम्बर 2006 को | और वे इस लेख के लिखे जाने तक वहीँ कार्यरत हैं |

जब सुभाष किमोली पहुँचे, वहाँ पहले प्रधान अध्यापक के पद पर सुरेन्द्र सिंह कार्यरत थे, जिनका ट्रान्सफर हो गया था | उन्हीं के स्थान पर कार्यभार सँभालने के लिए सुभाष का वहाँ स्थानांतरण हुआ था |

तब इस विद्यालय में (साल 2006) में कक्षा 1-5 तक में कुल 65 बच्चे थे और अध्यापक थे— सुभाष चंद्र (प्रधान अध्यापक) और रफ़ीक अहमद (सहायक अध्यापक) | सुभाष को स्कूल की व्यवस्था पारंपरिक ही मिली; रुटीन में चलता विद्यालय, विद्यालय और उसका ढाँचा कुछ जर्जर टूटा-फ़ूटा सा…|

शिक्षा-विभाग की ओर से मिलनेवाला निश्चित बज़ट विद्यालय को एक अच्छी गति देने के लिए काफ़ी नहीं था | कहीं से कोई अतिरिक्त मदद मिलने या प्रोत्साहन मिलने की भी उम्मीद नज़र नहीं आती थी | लेकिन सुभाष के मन में उथल-पुथल मची ही रहती थी | मन में कुछ अच्छे काम करने की तीव्र इच्छा हो, ख़ासकर जब उस व्यक्ति के उन लक्षित कार्यों का संबंध उसकी अपनी ‘स्वयं-वेदना’ से हो, लेकिन परिस्थितियाँ अनुकूल न हों, तो जो बेचैनी और छटपटाहट इन्सान के मन में होती है, उससे सुभाष कई साल तक गुजरते रहे | इस तरह कुछ साल बीते | स्थितियों को सुधारने की ख़रामा-ख़रामा कोशिशें भी होती रहीं, जो भी संभव था, किन्तु वह सुभाष को हमेशा ही अपर्याप्त लगा |

उन्हें इस बेचैनी से निज़ात मिली 2013 में, जब उस विद्यालय में एक नए अध्यापक आए— प्रमोद कुमार | अब इस विद्यालय में ये दो अध्यापक, सुभाष चंद्र और प्रमोद कुमार, एक साथ मिलकर शिक्षा की दुनिया में एक नई इबारत लिखने की ओर अग्रसर हुए | सुभाष ने अपने इस सहकर्मी से बात की और फ़िर दोनों अध्यापकों ने मिलकर विद्यालय एवं बच्चों के बेहतर विकास और अच्छे भविष्य के लिए कई ठोस योजनाएँ बनाएँ | उन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए सबसे अधिक ज़रूरत थी धन की; और वही उनके पास नहीं था | लेकिन उन्होंने धैर्य से काम लिया, क्योंकि उनको पता था कि कोई भी लम्बी पारी खेलने के लिए धैर्य की कितनी आवश्यकता होती है; और शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर परिणाम के लिए तो दशकों तक लगातार परिश्रम करना पड़ता है |

इस लम्बी पारी के लिए सबसे पहले धन की व्यवस्था आवश्यक थी | शिक्षा-विभाग से तो एक निश्चित रक़म ही मिल सकती थी, जिसे ख़र्च करने के लिए क्षेत्र भी शिक्षा-विभाग की ओर से ही लगभग तय होते हैं; और यह रक़म भी निश्चित समय पर ही मिलती है | इससे विद्यालय एवं बच्चों की बेहतरीन शिक्षा एवं व्यक्तित्व-विकास को अनुकूल गति देना काफ़ी मुश्किल था |

तब दोनों अध्यापकों ने सम्मिलित रूप से एक निर्णय लिया; अपना फण्ड बनाने का | अर्थात् दोनों शिक्षकों ने सरकारी खाते से अलग अपना एक संयुक्त खाता खोला, जिसमें वे हर महीने अपनी जेब से कुछ पैसे जमा करते हैं | इस खाते का और इसमें जमा इन शिक्षकों के निजी अंशदान का उद्देश्य था— बच्चों एवं स्कूल के कार्यों को धन के अभाव में रुकने न देना | आगे आनेवाले वर्षों में इस धन से न जाने कितने कार्य किए गए और आज भी किए जा रहे हैं, इसका लेखा-जोखा भले ही समाज न रखे, देश की शिक्षा-प्रणाली और यहाँ का शिक्षा-विभाग भी न रखे; लेकिन वे विद्यार्थी और उनके अभिभावक अवश्य रखेंगे; और सबसे बढ़कर, सबके कार्यों का हिसाब रखने वाला ‘समय’ भी अवश्य इन कार्यों का भी हिसाब रखेगा और उचित समय पर समाज को उसकी क़ीमत भी समझाएगा…!

इन दो अध्यापकों का अपने विद्यालय और विद्यार्थियों की शिक्षा एवं भविष्य-निर्माण के लिए बनाया गया यह निजी खाता अपने-आप में बहुत कुछ कहता है | वह कहता है कि कोई यूँ ही अपने बच्चों के हक़ (माता-पिता के वेतन के रूप में) किसी अन्य को नहीं दे देता, उसके लिए कुछ अलग ही क़िस्म की संवेदनशीलता चाहिए, उसके लिए कलेजा भी कुछ बड़ा होना चाहिए, अपने दायित्वों के प्रति गंभीरता ही नहीं बल्कि स्वेच्छा से उठाई गई जवाबदेही की भावना भी ह्रदय में होनी चाहिए…! अन्यथा ‘शिक्षक’ की ‘जॉब’ करनेवालों की कमी है क्या हमारे देश में… जो अपने अध्यापन-कार्य को केवल अपनी निश्चित मासिक आय का ज़रिया-भर मानते हैं और वेतन लेने भर का काम करते हैं…?!?!

इन अध्यापकों ने ऐसा क्या किया, इसकी कहानी अगली कड़ी में अगले सप्ताह…

तब तक इंतज़ार…

–डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

Related Posts

5 thoughts on “सुभाष चंद्र : जिसके लिए उसके विद्यार्थी अपनी संतान से भी अधिक प्रिय हैं

  1. सुभाष सर जो हमेशा बड़े भाई के समान मेरे साथ खड़े रहते है। हर वक्त रचनात्मक एवं सामाजिक कामों के लिए तैयार। सिर्फ बातों में नही उनके कर्मों में भी धार है । ऐसी धार जो समाज को बेहतर बनाने के लिए प्रयासरत रहती है। सरल एवं प्यारे स्वभाव के सुभाष भाई को सलाम ओर सलाम कनक मेम की लेखनी के लिए।

    1. आपके शब्द सुभाष जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का एक उल्लेखनीय दस्तावेज़ हैं

  2. A big salute to you Kanak mam.
    सुभाष सर समाज में ईश्वर की बेहतरीन कृति हैं एक सच्चे इंसान, कर्तव्यनिष्ठ, संवेदनशील और जागरूक अध्यापक और उन के जोड़ीदार भी उन के अनुरूप।
    वास्तव में सरकारी तंत्र में सुधार लाने के लिए ऐसे ही लोगों को आगे लाया जाना चाहिए जो पहले अपने कर्तव्य ईमानदारी से निभाए।

  3. सुभाष जी एक समर्पित सहज सरल और अपनी समजिक जिम्मेदारियों के प्रति बेहद जागरूक अध्यापक हैं। सुभाष जी के क्षमतावान साथी हैं जिनका अभी सामने आना शेष है।उनके विद्यार्थी खुशनसीब हैं कि उन्हें इतना गुणी अध्यापक मिला है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!