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भाग-दो : ‘कार्य’ जो अपनी अनिवार्य शिक्षकीय ज़िम्मेदारी है

पिछले लेख में यह देखा जा चुका है कि किस प्रकार जब राजकीय प्राथमिक विद्यालय, किमोली के दोनों अध्यापकों (सुभाष चंद्र और प्रमोद कुमार) ने परस्पर सहमति से यह तय किया कि वे अपनी निजी कोशिशों से विद्यालय और बच्चों की शिक्षा को एक नया मुक़ाम देंगे, तब इस विद्यालय की ‘शैक्षणिक-यात्रा’ शुरू होती है…

यह भी देख चुके हैं कि अपने विद्यालय में सुभाष चंद्र जब तक अपने प्रयासों के संबंध में अकेले रहे, तब तक जैसे-तैसे काम किया, जहाँ तक संभव हो सका स्कूल और विद्यार्थियों की ज़िम्मेदारी सँभालने की कोशिशें करते रहे | और जब वहाँ प्रमोद कुमार का आना हुआ, तब उनके कार्यों को ही गति नहीं मिली, बल्कि उनकी कोशिशों को भी उड़ान भरने के लिए नई ताक़त मिली | शायद इसीलिए सुभाष अपने सहकर्मी प्रमोद को अपने छोटे भाई की तरह समझते हैं…

बात ठीक भी है, जब किसी भी कार्यस्थल पर वहाँ का नायक अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सजग, सचेत और समर्पित हो और उसके आसपास रहनेवाले लोग भी ज़िम्मेदार प्रवृत्ति वाले हों, तो उस समय उन लोगों से अनेक सार्थक कार्यों की उम्मीद की जा सकती हैं और वे करते भी हैं | समस्या तब आती है, जब इसमें से कोई भी एक अपनी ज़िम्मेदारी को लेकर गंभीर न हो, बल्कि खानापूर्ति करनेवाला या टालमटोल वाली प्रवृत्ति का हो !

इस विद्यालय में भी इन दोनों अध्यापकों ने अपनी ज़िम्मेदारी की जवाबदेहिता सुनिश्चित करने के लिए सम्मिलित रूप से कई निर्णय लिए, जिसके लिए सबसे अधिक ज़रूरत थी धन की; जोकि उनके पास पर्याप्त मात्रा में नहीं था (विभाग से आवंटित) | तब उन्होंने स्वविवेक से एक ठोस निर्णय लिया; अपना फण्ड बनाने का | हालाँकि विद्यालय का अपना खाता तो था, जिसमें स्कूल और बच्चों के लिए शिक्षा-विभाग से आनेवाली धनराशि जमा होती थी; लेकिन वह धनराशि स्कूल की स्थिति देखते हुए पर्याप्त नहीं थी |

इसीलिए दोनों शिक्षकों ने सरकारी खाते से अलग अपना एक संयुक्त खाता एक बैंक में खोला, जिसमें वे हर महीने अपने वेतन में से कुछ-न-कुछ पैसे जमा करते हैं | अध्यापकों ने इस खाते और इसमें जमा अपने निजी अंशदान के कुछ निश्चित उद्देश्य तय किए हुए हैं— वह है बच्चों एवं स्कूल के कार्यों को धन के अभाव में रुकने न देना | 2013 से शुरू किए गए इस खाते और उसमें धन-संचय से आगे आनेवाले वर्षों में जो कार्य किए गए और आज भी किए जा रहे हैं, वह आँखें खोलनेवाला है |

यह सोचने वाली बात है कि उन लोगों का ह्रदय कैसा होता होगा, जो अपने परिश्रम से कमाए पैसों को सारा-का-सारा अपने परिवार और अपने बच्चों पर ख़र्च न करके उसका एक भाग ‘दूसरों’ के लिए भी बचा लेते हैं? दरअसल समाज में परिवर्तन तो ऐसे ही लोग लाते हैं | ऐसे ‘छोटे-मोटे’ और ‘मामूली’ लोग कोई बड़ा झंडा गाड़ें या न गाड़ें, लेकिन परिवर्तन का एक ‘बीज’ तो बो ही देते हैं | और किसी ‘बीज’ की ताक़त क्या होती है, यह किसी बरगद के पेड़ से पूछना चाहिए, जिसपर सैकड़ों पक्षियों का बसेरा होता है, जिसकी छाँव में राहगीर तपती धूप में कुछ पल ठहरकर सुस्ता लेते हैं, गाँवों की बेटियों जिसकी शाखों पर झूले डाल अपने बचपन और कैशोर्य को जीती हैं, जिसके तले गाँवों के बच्चों की खिलखिलाहटें गूँजती हैं एवं उनकी धमाचौकड़ियाँ मचती हैं, जिसकी जड़ों के आसपास गाँवों की नन्हीं गुड़ियाओं के खेल-खिलौने सजते हैं, जिसके तले युवाओं के कहकहे गूँजते है, प्रेम-कहानियाँ बनती हैं, बूढों की जमघट लगती है, गाँवों की पंचायतें बैठती हैं…और हाँ कभी-कभी ‘भगवान्’ भी आश्रय पाते हैं…!  

पौड़ी में रहते हुए मैंने ऐसे भी विद्यालय और अध्यापक देखे हैं, जो अपने विद्यार्थियों को न केवल पढ़ाने से कतराते हैं, बल्कि उनके हक़ का पैसा भी विविध तरीक़ों से खा जाते हैं | एक विद्यालय का प्रसंग याद है, जिसमें बच्चों के लिए स्कूल में मध्याह्न-भोजन के लिए जो राशन आता था, उसमें वे अपने लिए भी कुछ चीजें मँगवाते थे और उससे वे प्रत्येक दिन (कार्यदिवस) बच्चों के भोजनावकाश के दौरान ‘भोजनमाताओं’ (स्कूल में बच्चों के लिए भोजन बनाने वाली स्त्रियाँ) से विविध व्यंजन, जैसे कभी सूजी का हलवा, तो कभी काले चने की चाट आदि बनवाते और स्वयं खाते | एक भी दिन ऐसा नहीं था जब मैं उक्त विद्यालय गई और अध्यापकों/अध्यापिकाओं को ऐसा करते नहीं देखा | इस विद्यालय में शिक्षकों का बच्चों के प्रति व्यवहार भी क़ाबिले-ग़ौर था | ज़ाहिर है, बहुत-सी बातें अन्योन्याश्रित ही होती हैं…!

इसीलिए सुभाष चंद्र और प्रमोद कुमार जैसे अध्यापकों का महत्त्व ऐसे में अपने-आप और अधिक बढ़ जाता है, जो अपनी ज़ेब के धन, अपने बच्चों के हक़ को कम करके दूसरे के बच्चों के लिए आरक्षित करते हैं, जिसके लिए वे कत्तई बाध्य नहीं हैं, जो उनका ‘काम’ नहीं है, बल्कि स्वेच्छा से ओढ़ी गई ‘ज़िम्मेदारी’ है |

इसीलिए इन दो अध्यापकों का अपने विद्यालय और विद्यार्थियों की शिक्षा एवं भविष्य-निर्माण के लिए बनाया गया यह निजी खाता अपने-आप में बहुत कुछ कहता है | अब देखना बहुत आवश्यक है कि अपनी विविध कोशिशों से, जिसमें एक भूमिका इस धन ने भी निभाई है और निभाती है, इन शिक्षकों ने ऐसा क्या किया है, जिसका ज़िक्र आवश्यक है |

वस्तुतः इसकी कहानी तो विद्यालय का ढाँचा, उसका वातावरण, बच्चों के लिए संयोजित की गई और उनके आसपास बिखरी तमाम चीज़ें, बच्चों का शैक्षणिक-स्तर, अभिभावकों का शिक्षकों के प्रति व्यवहार…इनकी कहानी अपने-आप कहते हैं |

जब इन दोनों शिक्षकों के उक्त निजी फण्ड में डेढ़ साल की कोशिश के बाद 2014 तक काम लायक एक ठीक-ठाक धनराशि (15 हज़ार रुपए) जमा हो गई, तब 2014 में उसमें से 10 हज़ार रुपये निकालकर उससे विद्यालय के गड्ढों से भरे बरामदे को ठीक करवाया गया | कुछ समय बाद उसी फण्ड में कुछ और धनराशि इकठ्ठा होने पर विद्यार्थियों को बैठने के लिए चटाई और टेबल की व्यवस्था की | यह बहुत ही सुन्दर और शानदार व्यवस्था हैं, जिसमें बच्चे चटाई पर बैठते हैं और टेबल को दो कार्यों में प्रयोग करते हैं—पढ़ने के दौरान ‘स्टडी-टेबल’ के रूप में और लंच के दौरान खाने के लिए ‘डाइनिंग टेबल’ के रूप में | और इस व्यवस्था को ‘सुन्दर और शानदार’ व्यवस्था कम-से-कम तीन अर्थों में मैं कहना चाहती हूँ— एक, अध्यापकों ने अपनी दूरदृष्टि का प्रयोग करके हर बच्चे के लिए अलग-अलग टेबल की व्यवस्था की है | यह व्यवस्था बच्चों को अपने ‘स्वतन्त्र’ और ‘आत्मनिर्भर’ ‘अस्तित्व’ का बोध कराने में बेहद कारगर हो सकती है, जिससे बच्चे ‘आज़ादी’ का अनुभव कर सकते हैं | अपनी टेबल को अपनी इच्छानुसार प्रयोग करना, उसपर अपने लिए एक छोटी-सी दुनिया का सृजन करना, जो केवल उनकी हो, उनकी इच्छानुसार रची गई हो और जिसका फ़ैलाव उस सम्पूर्ण टेबल पर हो… जैसे बेहद आवश्यक गुण आत्मसात कर सकते हैं | यह बच्चे में न केवल आत्म-विश्वास जगाने में, बल्कि उनमें आत्म-सम्मान की भावना जगाने और सबसे बढ़कर अपने लिए स्वयं निर्णय लेने की क्षमता का विकास करने में भी मददगार हो सकती है | ऐसा इसलिए कि बच्चे को सीखना होता है कि उसे अपने टेबल की साफ़-सफ़ाई से लेकर उसका रख-रखाव, उसका बहुविध प्रयोग, उसकी सुरक्षा कैसे करनी है | दूसरी बात, कि जब बच्चे उस टेबल का प्रयोग एक ‘स्टडी-टेबल’ के रूप में करते हैं, तो यह छोटी-सी ‘टेबल’ शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों में बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है | तीसरी बात, जब बच्चे उसी टेबल का प्रयोग ‘डाइनिंग टेबल’ के रूप में करते हैं, तो वे हर रोज़ विकसित हो रही दुनिया में जीने के तौर-तरीक़े भी सीख रहे होते हैं…

बच्चों के जीवन, व्यक्तित्व-विकास और भविष्य-निर्माण को ध्यान में रखकर ऐसी छोटी-छोटी पहलें अपने-आप में बेहद ही शानदार होती हैं…देखने में छोटी-सी पहल, लेकिन दूरगामी प्रभाव-युक्त |

बदल रही दुनिया के अनुसार बच्चों को ज्ञान के नवीन क्षेत्रों से जोड़ने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में बहुत तेज़ी से काम करने की बहुत अधिक ज़रूरत होती हैं, किन्तु अनेक कारणों से हमारा शिक्षा-विभाग पर्याप्त मात्रा में ऐसा नहीं कर पाता है | विभागीय मजबूरी और सीमा को समझते हुए इन दो अध्यापकों ने फ़िर से अपने निजी फण्ड की ओर देखा और उसके माध्यम से एक और पहल की है | वह है— अपने विद्यार्थियों के लिए विद्यालय में ‘ई-लर्निंग सेंटर’ का विकास |

2016-17 में अपने फण्ड से (जिसमें तब तक फ़िर से 20 हज़ार की रक़म जमा हो चुकी थी) दोनों शिक्षकों ने किसी साइबर कैफ़े से दो सेकेण्ड हैण्ड कंप्यूटर ख़रीदे और स्कूल में लगाया | और चूँकि दोनों शिक्षक कंप्यूटर के अच्छे जानकर हैं, इसलिए वे ही बच्चों को कंप्यूटर चलाना सिखाते और पढ़ाते हैं |

इससे एक क़दम आगे बढ़कर अपने ‘ई-लर्निंग सेंटर’ के सम्बन्ध में उन्होंने एक और पहल की है, स्कूल के आसपास के गाँवों में बच्चों की तकनीकी-शिक्षा या ज्ञान सम्बन्धी अभाव को देखते हुए स्कूल में शुरू की गई इस सुविधा के दरवाज़े कुछ समय बाद इन अध्यापकों ने केवल स्कूल के बच्चों तक सीमित न रखकर गाँव के सभी बच्चों के लिए खोल दिए हैं | अब स्कूल में भोजनावकाश या छुट्टी हो जाने के बाद कुछ समय के लिए वहाँ गाँव के 10वीं-12वीं कक्षा के बच्चे कंप्यूटर सीखने आते हैं |

लेकिन समस्या तो यह है कि कक्षा 1-2 के बच्चे कंप्यूटर चलाना नहीं जानते, जबकि उनको न केवल रोचक ढंग से पढ़ाना है, बल्कि तकनीक और उसकी शक्ति से परिचित भी करवाना है; और सबसे बढ़कर, पढ़ाई के प्रति उनमें रूचि भी विकसित करनी है | सवाल है कि यह काम कैसे हो? इन अध्यापकों ने इसका हल निकाला अपने निजी मोबाइल फ़ोन के रूप में | दरअसल 2018-19 से उन्होंने छोटे बच्चों (कक्षा 1-2) को पढ़ाने के लिए अपने व्यक्तिगत मोबाइल को एक ज़रिया बनाना शुरू किया, जिसके लिए वे उनकी कक्षा से संबंधित ऑडियो-वीडियो सामग्री का प्रयोग करते हैं | इससे बच्चों को न केवल पढ़ना बेहद मज़ेदार लगता है, बल्कि जल्दी सीखने की उनकी गति भी बढ़ जाती है |

ऐसा क्यों करते हैं अध्यापक? दरअसल सुभाष का मानना है कि बच्चों में पढ़ने के प्रति रूचि ठीक से विकसित करने के लिए कक्षा 1-2 ही वह सबसे मुफ़ीद समय है, जब यदि ठीक से काम कर लिया गया, तो आगे के लिए नींव तैयार हो जाती है | सुभाष चंद्र यह भी कहते हैं— “बच्चोंकी शिक्षा की आधारशिला दरअसल यहीं से शुरू होती है, इसलिए इस स्तर की पढ़ाई पर सर्वाधिक ध्यान देना एवं काम करना बेहद ज़रूरी है |”

अब सवाल है कि यह कैसे किया जाता है | इनके लिए अक्षरों आदि के 6 ब्लाक के सेट ख़रीदे गए हैं, इसके अलावा मात्राओं और अंकों के भी ब्लॉक ख़रीदे गए हैं | इनसे बच्चे ऱोज ‘खेलते’ हैं, जिसमें हिंदी एवं अंग्रेज़ी के अक्षरों को क्रम से लगाना, हिंदी में बिना मात्रा वाले एवं मात्राओं वाले शब्द बनाना जैसे ‘खेल’, ‘अंकों’ से जोड़ने-घटाने के भी विविध ‘खेल’ |

मांटेसरी ने ठीक ही कहा है— ‘बच्चे सबसे अधिक खेलना पसंद करते हैं; वे अक्षरों, शब्दों, वाक्यों, चित्रों, कहानियों, कविताओं इत्यादि सबसे खेलना चाहते हैं, क्योंकि उनको खेलना ही पसंद है |’  

शायद सुभाष चंद्र और प्रमोद कुमार ने इस रहस्य को ठीक से समझ लिया है और शायद इसी कारण बच्चों के ‘खेलने’ के लिए अक्षरों, मात्राओं, अंकों आदि के रूप में विविध सामग्रियाँ उनके लिए उपलब्ध करा दी हैं, जिसमें शिक्षा-विभाग की भी महत्वपूर्ण भूमिका है | इसके अलावा दीवारों पर अंकित/ चित्रित कविताएँ, कहानियाँ आदि तो हैं ही अपनी भूमिका निभाने के लिए, जिससे अक्सर बच्चे चिपके ही रहते हैं, उनसे बतियाने की कोशिश में |

यह तो हुई कक्षा 1-2 के बच्चों के लिए विशेष व्यवस्था; कक्षा 3-5 के लिए क्या ख़ास है? उनके लिए ‘ई-लर्निंग सेंटर’, दीवारों पर कहानियों, कविताओं तथा अन्य जानकारियों के अतिरिक्त कुछ और भी व्यवस्थाएँ देखी जा सकती हैं | उन्हीं में एक उल्लेखनीय व्यवस्था है गद्य को कविता की तरह प्रस्तुत करना या पढ़ाना | यह तकनीक न केवल अपने पाठ को रोचक ढंग से समझने में मदद करती है, बल्कि बच्चों में भी रचनात्मकता का सृजन एवं उनको प्रोत्साहित करती है |

इसके अतिरिक्त एक और महत्वपूर्ण तकनीक है, कविताओं पर बहुविध काम करने के लिए ‘ताश के पत्तों’ का रचनात्मक प्रयोग | ताश, जिसका प्रयोग अन्य लोग जुआ खेलने के लिए करते हैं, सुभाष एवं उनके सहकर्मी प्रमोद उसका प्रयोग बच्चों को पढ़ाने के लिए करते हैं | कक्षा 4-5 को पढ़ाने के लिए उन्होंने ताश की दो गड्डियाँ ख़रीदी हैं | उसकी पत्तियों पर कविता की पंक्तियाँ लिख दी जाती हैं, जिससे बच्चे कविता की पंक्तियों को जोड़ना, तोड़ना, क्रम से लगाना सीखने हैं |

लेकिन एक प्रश्न और है, विद्यालय और कक्षा के सभी बच्चे क्या बहिर्मुखी और चंचल ही होते हैं? यदि नहीं और कुछ बच्चे शर्मीले स्वभाव के एवं अंतर्मुखी होते हैं, तो उनके लिए क्या कोई योजना इन अध्यापकों के पास है? इस सम्बन्ध में सुभाष एक बालिका का उदाहरण देकर बताते हैं कि किस प्रकार दूसरी कक्षा में कीर्तिका नाम की एक बच्ची आई थी, जो स्वभाव से बेहद संकोची और सदैव भयभीत-सी रहा करती थी | तब एक प्रयोग करते हुए उसे कक्षा में अन्य बच्चों की ‘टीचर’ बनाया गया; टीचर की ‘नक़ल’ करते-करते कब उसकी आवाज़ खुल गई, वह सबसे बात भी करने लगी और उसका भय भी दूर हो गया और वह निडर हो गई, इसका पता शायद उसके माता-पिता को भी नहीं चला | इस समय वह कक्षा-6 में है और पास के ही उच्च प्राथमिक विद्यालय में पढ़ती है | ऐसे ही प्रयोग अन्य बच्चों के साथ किए गए और किए जाते हैं, जिसका मकसद होता है बच्चों के व्यक्तित्व का सर्वागीण विकास एवं उनको प्रोत्साहन देना | इस तरह विविध तरीक़ों से ‘बच्चों को मंच प्रदान करना’ उनके लिए एक कारगर उपाय है, जिसे वे अक्सर अपनाते हैं, प्रत्येक बच्चे की अपनी ज़रूरत के अनुसार |

लेकिन वह विद्यालय एवं वह शिक्षा अधूरी है, जो बच्चों को पुस्तकें पढ़ने, उनके प्रति ललक पैदा करने एवं उनसे प्रेम करने के लिए प्रोत्साहित न कर सके, उनमें सफ़लतापूर्वक रूचि न पैदा कर सके | शायद इसीलिए हमारी शिक्षा-प्रणाली में प्रत्येक विद्यालय में एक पुस्तकालय की अवधारणा की गई है |

इस विद्यालय में भी लाइब्रेरी का एकदम मुक्त प्रयोग होता है | उसकी पूरी ज़िम्मेदारी कक्षा 5 के बच्चे उठाते है और उसकी देखभाल भी करते हैं; पुस्तकें आवंटित करना, रजिस्टर में उन्हें दर्ज़ करना, अलग-अलग तरह की पुस्तकों को सूचीबद्ध करना…जैसे कई काम करते हुए बच्चे न जाने कितनी बातें अनायास ही सीख जाते हैं | अपने इस पुस्तकालय से बच्चे पढ़ने के लिए पुस्तकें अपने घर भी ले जाते हैं |

अब सवाल है कि क्या इसका प्रभाव बच्चों के माता-पिता पर भी किसी अंश में हुआ है, या नहीं? क्या वे ‘शिक्षा’ को ‘सम्मानजनक ढंग से जीवन जीने के अधिकार’ के रूप में समझ पा रहे हैं या नहीं? अध्यापकों की दिन-रात की मेहनत, लीक से हटकर कोशिशें, बच्चों के लिए अपने निजी संसाधनों एवं व्यक्तिगत पैसों का उपयोग, कई सरकारी विद्यालयों से अलग सोच और कोशिशें… ज़ाहिर है, जब माता-पिता यह सब अपनी आँखों से प्रतिदिन देखते होंगे, तो क्यों न उनको विश्वास हो कि ये अध्यापक उनके बच्चों के वास्तविक शुभचिंतक हैं | अभिभावक अपने विश्वास और शिक्षकों के प्रति अपने आदरभाव के प्रमाण भी समय-समय पर देते हैं | जब अध्यापकों ने काम शुरू किया, तो उसके कुछ समय बाद से ही, अर्थात् 2014-15 से गाँववालों का सहयोग उनको मिलने लगा | वे एसएमसी की बैठकों के समय खुद ही आसपास की साफ़-सफ़ाई कर देते हैं, विद्यालय में अन्य समस्याओं के आने पर सदैव मदद के लिए हाज़िर रहते हैं, अध्यापकों का हौसला बढ़ाते हैं, उनके प्रति आदर एवं कृतज्ञता प्रकट करना तो है ही | संभव है कि तब एक दिन अभिभावक सचमुच में समझ पाएँ, कि ‘सम्मानजनक ढंग से जीवन जीने का अधिकार’ उनके बच्चों का मौलिक अधिकार है, जो उन्हें भारत का संविधान देता है…

–डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

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2 thoughts on “सुभाष चन्द्र : जिसके लिए उसके विद्यार्थी अपनी संतान से भी अधिक प्रिय हैं

  1. Aapke jaise teacher Bharat Desh ke har bache ko mile toh kyon nahi bacha ek zimmedar nagrik banega .kyonki wah bacha apne teachers se seekh raha hai ki desh ke liye zimmedaari kya hoti hai?. God bless you both of you. Keep on showering your blessings on your students.because that is our responsibility. 🙏🙏.

  2. आभार व्यक्त करती हूं मैडम आप का।आप की सम्वेदना शिक्षकों से जुड़ी हुई हैं।सुभाष और प्रमोद सर जैसे एक सिक्के के दो पहलू हैं।जितना भी इनके बारे में कहा जाए वो सूरज को दीपक दिखाने जैसा होगा।हृदय से नमन।

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