बतकही

बातें कही-अनकही…

रचनाकार— अंजलि डुडेजा ‘अभिनव’

बहुत बुरा लगता है,
जब जंगल जलाए जाते हैं
धुंए का वो गुबार
बहुत बुरा लगता है।
कितने मासूम
जंगली जानवर
चिड़ियों के घोंसले
घोंसलों में नन्हें बच्चे
उस आग में जल जाते हैं
तब बहुत बुरा लगता है।
बहुत बुरा लगता है
दावानल
जब वह नन्हे पेड़,
कोमल पौधे और
हरी घास लील जाता है
आग का वो सैलाब,
छोड़ जाता है अपने पीछे
धुंए की गंध
जिस में मिली होती है
भुने हुए जीव जंतुओं के मांस की दुर्गंध।
बहुत बुरा लगता है
जला हुआ वह जंगल
झुलसे बुरांस और फ्यूंली
हवा के साथ उड़ती
काली काली राख
वह पहाड़
और उस पर नज़र आती
वह काली काली बरफ…

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