बतकही

बातें कही-अनकही…

एक बात सच-सच बताओगे, सखा…?
देखो फिर से अपनी मोहक मुस्कान से टाल मत देना…
जानती हूँ तुम्हें,
और तुम्हारी रहस्यमयी मुस्कान को भी…

…तो मुझे बताओ जरा…
कि क्यों कहा था तुमने उस दिन
कि मेरी आस्था ही तुम्हारी आत्मा का पोषण करती है…?
गढ़ता है मेरा विश्वास, तुम्हारे व्यक्तित्व को…?
जबकि मैं तो स्वयं तुम पर आश्रित हूँ, सखे |
करती हूँ तुमपर विश्वास…
निश्छल…
कि मेरी आस्था है तुमपर…
अटूट…!

हाँ, सखे…!
मैं प्यार करती हूँ, अपने सभी पुत्रों को, …कम या अधिक
प्रिय हैं मुझे, अपने पाँचों पति …कमोवेश
प्रिय हैं मुझे, मेरे सभी परिजन, मेरे आत्मीयजन
मैं यथासंभव रखती हूँ, उन सभी का ध्यान,
समर्पित हूँ उन सभी के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के वशीभूत होकर
करती हूँ सभी का भरण-पोषण और संरक्षण …यथासंभव
अच्छा लगता है मुझे उनका साथ …|

किन्तु तुम……?
तुम तो मेरी वह आस्था हो, सखे,
जिसके सहारे मैं रखती हूँ विश्वास उस जीवन पर,
जिसकी चाहना होती है सबको
मैं आस्था-विहीन जीवन नहीं जी सकती, वासुदेव…!
वह मुझे अस्वीकार्य है…!

सत्य है,
मैं नहीं रखती तुम्हारा ध्यान, उसी तरह,
जैसे अपने परिजनों का रखती हूँ |
मैं नहीं करती तुमसे वैसा ही प्रेम, जैसा अपने आत्मीयों से करती हूँ
क्योंकि तुम मेरे परिजन नहीं हो, प्रेमी भी नहीं, भ्राता या कुछ और भी नहीं
तुम कुछ भी नहीं हो…
केवल मेरे सखा हो तुम,
मेरे प्रिय सखा…!
तब क्यों हैं मुझे विश्वास तुमपर इतना, जैसा नहीं है किसी भी परिजन पर…?
किस कारण मेरी आस्था है तुमपर, जैसी किसी भी आत्मीय पर नहीं…?
क्यों महसूस करती हूँ, …तुमसे वह जुड़ाव
जैसा ह्रदय का भावों से…
जैसा आत्मा का अनुभूति से…
जैसा शरीर का प्राणों से…
जैसा वाणी का भाषा से…!

विश्वास किसी के हर क्षण साथ होने की—
सुख हो या दुःख, अच्छा हो या बुरा |
आस्था किसी ऐसे के प्रति,
जिसके बिना जीवन अर्थहीन लगे, दुष्कर लगे, असहनीय हो जाय…!
जुड़ाव उससे,
जिससे भिन्नता का एहसास ही न हो सके, कोशिश करके भी …!
जिसका ‘होना’ ही सबसे बड़ा सुख बन जाय…!
जो समझता हो मन के सभी भावों को,
तनावों और दबावों को,
मन की उलझनों को…!

‘पास रहना’ और ‘साथ रहना’ कितना अलग है ना, सखा …..!?
मेरे परिजन सदैव मेरे पास रहते हैं, लेकिन वे मेरे साथ नहीं होते
अक्सर …|
जब दुःशासन ने मुझे वस्त्रहीन करना चाहा था, भरी सभा में
तब मेरे पाँचों समर्थ और शक्तिशाली पति मेरे सामने ही थे,
जो सदैव मेरे पास रहते थे, छाया की तरह
जो मुझसे अत्यंत प्रेम भी करते थे |
पितामह भीष्म, काका विदुर, पितृ-तुल्य महाराज धृतराष्ट्र भी
अपने-अपने समर्थ आसनों पर विराजमान;
जो थे मेरे आदरणीय परिवार-जन,
रखते थे मुझसे स्नेह,
देते थे हमेशा, मुझे सदैव सुखी रहने का आशीर्वाद |
किन्तु उस दिन पास होकर भी,
इनमें से कोई नहीं था,
साथ मेरे
मैं एक-एक कर सभी को पुकारती रही,
करुण याचना भी की सभी से
हाथ जोड़कर…
गिड़गिड़ाकर…
किन्तु किसी ने भी नहीं सुनी मेरी चीखती आवाज़…!
सभी के कान बंद थे, धर्म और परंपराओं के पालन में |

और तुम……?
तुम अक्सर मेरे पास नहीं होते…|
उस दिन भी कहाँ थे,
तुम,
पास मेरे ?
लेकिन मैंने अपनी अंतरात्मा में पुकारा तुम्हें,
निःशब्द…मौन…!
…और अपने साथ खड़ा पाया तुम्हें…सखा…!
मैंने उस दिन तुम्हें महसूस किया, वासुदेव
मेरे साथ खड़े हुए…
जब तक दुःशासन मेरे आत्मसम्मान को बलपूर्वक मुझसे अलगाने के असफ़ल प्रयास करता रहा
मेरे वस्त्रों के साथ…!
दुःशासन की उस असफ़लता में तुम ही तो थे…
मेरे आत्मसम्मान के रक्षक बनकर;
जो मेरे साथ खड़े थे, उस दिन, हर क्षण…
पास नहीं होकर भी…!

…मैं जब भी किसी संकट में पड़ी, और कोई सहायक नहीं था मेरा…
…मैं जब भी किसी दुविधा में फँसी, और कोई मार्गदर्शक नहीं हुआ मेरा…
…जब भी किसी उलझन ने घेरा मुझे, और किसी उद्धारक को मैंने नहीं पाया…
…तो हर ऐसे क्षण में मैंने तुम्हें अपने साथ देखा…
…बहुत दूर रहते हुए भी….!
…और इसी कारण कभी मैं महसूस ही नहीं कर सकी,
कि तुम मेरे साथ नहीं हो…!
क्या तुम मुझे समझा सकते हो, माधव, इसका तात्पर्य…?

मेरी समस्त भावनाएँ जब चुक जाती हैं
और मैं निःशेष हो जाती हूँ,
रिक्त हो जाती हूँ,
रीतने और बीतने लगती हूँ
तब तुम एकदम से सामने आकर मुझे चौंका देते हो, सखे,
यह कहकर,
कि ‘मेरे प्रति अभी तुम्हारी भावनाएँ शेष हैं, सखी;
तुम अभी चूकी कहाँ हो,
तुम रीत नहीं सकतीं
तुम्हें बीतना भी नहीं है’…
और मैं पुनः भर उठती हूँ, किसी अनजाने सुखद एहसास से…
जी उठती हूँ, नई आस से…
तब महसूस करती हूँ अपनी अंतरात्मा में एक निर्वचनीय आनंद …!
मुझे बताओ, सखे ! इसका रहस्य !

तब तुम क्यों कहते हो,
कि मेरी आस्था से ही तुम ऊँचाई प्राप्त करते हो,
अपने व्यक्तित्व में ?
तुम क्यों कहते हो, मेरा विश्वास तुम्हें गढ़ता है, रचता है …?

हाँ, कृष्णे….!
तुमने ठीक ही कहा…|
मानता हूँ मैं,
मुझपर तुम्हारी आस्था है—अटूट आस्था…!
लेकिन तुम्हारी यही आस्था मुझे मेरे ‘मैं’ से परिचित कराती है
मुझे ‘मुझसे’ मिलाती है…!
मैं, तुम्हारी इसी आस्था के कारण, तुममें विश्वास सृजित करने का सामर्थ्य रख पाता हूँ…

मैं अपनी पत्नियों, पुत्रों, परिजनों सहित अनेकानेक लोगों का समर्पित संरक्षक हूँ |
अपनी प्राणप्रिया राधा और अपनी प्रिय गोपियों का आकुल प्रेमी भी हूँ |
किन्तु तुम्हारा विश्वास, तुम्हारी आस्था…
मुझे एक नई पहचान देते हैं,
मेरे व्यक्तित्व को नया विस्तार देते हैं…|
सभी चमत्कृत होते हैं, मेरे कठिन कार्यों को ‘चमत्कार’ मानकर
…मुझे ईश्वर जानकर…|
किन्तु तुम्हें मेरे ‘विश्वास’ और ‘साथ होने’ की चाह रही है
सदैव
जो बनाती है मुझे मानव —ईश्वरत्व से परे, मानव रूप देकर
एक विश्वसनीय व्यक्तित्व !
लीलाओं से इतर,
चमत्कारों से परे |
और मैं…?
—तुम्हारे विश्वास की रक्षा में,
तुम्हारी आस्था को पाने की लालसा में
बनता हूँ मानव—एक विश्वसनीय मानव…!

जानती हो सखी, आस्था कितनी मूल्यवान होती है…!?
यह दोनों को ही भाग्यशाली बनाती है, उद्धार करती है उनका—
जिसको आस्था है किसी पर,
और जिसके प्रति आस्था है किसी की |
आस्था रखने वाला अक्सर जीवन के प्रति संशय से बच जाता है
अति कठिन परिस्थितियों में भी,
वह मजबूत होता है, भीतर से |
…और जिसे यह आस्था प्राप्त होती है, वह सामर्थ्यवान बनता है— धीरे-धीरे…|
इसकी लालसा सबको होती है, कि उसपर भी हो आस्था किसी की
जिसे मैंने सहज ही पा लिया तुमसे
कि मैं भाग्यशाली हूँ…!
कि बनाया है विश्वास के योग्य तुमने मुझे…!
गढ़ा है आस्था के प्रतीक-रूप में तुमने मुझे…!

…मैं अपने व्यक्तित्व को हर दिन नया विस्तार देता हूँ,
अपने को विश्वसनीय बनाने के प्रयास में;
ताकि तुम मुझसे अभिभूत होने की बजाय,
अपना विश्वास बनाए रख सको मुझपर
—एक मानव-चरित्र पर…|
तुम मेरे व्यक्तित्व की निर्मात्री हो, सखी
अनजाने में ही तुम मुझे गढ़ती हो, रचती हो, सँवारती हो
एक विश्वसनीय मानव-रूप प्रदान करती हो…!
तुम्हारे विश्वास में मेरे व्यक्तित्व का विकास है
तुम्हारी आस्था में मेरे चरित्र की गरिमा है
और सच कहूँ,
तो मेरा विश्वसनीय मानवीय रूप ही
मुझे श्लाघ्य है…
प्रिय है…
स्वीकार्य है…|

…और सत्य तो यह है, याज्ञसेनी,
कि तुम जिस आस्था का मूर्त रूप हो, मैं उसी के विश्वास की अभिव्यक्ति हूँ |
और इसी कारण मुझमें तुम्हारे, स्त्री के, अपमान के निराकरण हेतु
‘महाभारत’ रच सकने की शक्ति भी है— मानवता की रक्षा में |
इसलिए यह कभी न भूलना,
कि जब तक तुम्हारी आस्था मुझपर कायम है,
मैं तभी तक…
विश्वसनीय हूँ,
सामर्थ्यवान हूँ,
स्तुत्य हूँ…!
…आस्था और विश्वास का सत्य यही है, कृष्णे …!!!
…तुम्हारा और मेरा यही सम्बन्ध है, सखी …!!!

डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

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