बतकही

बातें कही-अनकही…

लेखिका— अंजलि डुडेजा ‘अभिनव’

मां, मैं तो बेटी हूं तेरी,
मुझे बचा ले।
कोई गलती नहीं मेरी,
मुझे बचा ले।
मां का नाम है ममता,
फिर क्यों है ये विषमता?
बेटा तेरे कलेजे का टुकड़ा,
मेरे लिए दिल
क्यों न उमड़ा?
तू क्यों हुई इतनी बेदर्द,
मैं तो बेटी हूं तेरी
मुझे बचा ले।
मुझसे ये घर महक उठेगा,
उपवन सारा चहक उठेगा;
तेरा सारा काम करूंगी,
तुझको मैं आराम भी दूंगी;
घर आंगन में नाचूंगी छम-छम
मैं तो बेटी हूं तेरी,
मुझे बचा ले।
मां, मैं असहाय सहमी-सी,
तेरे गर्भ में छिपी
एक कन्या हूं
मुझे मत दो
इंजेक्शनों का दर्द
मत फेंको
कुत्तों, कौओं के लिए।
एक बात बताना मां
क्या बेटे को भी तूने
यों ही मारा है?
मैं तो बेटी हूं तेरी
मुझे बचा ले।
कल मैं लक्ष्मीबाई बनूंगी,
गार्गी, मैत्रेयी, पन्नाधाय
बनूंगी
किरन बेदी, कल्पना चावला, सायना, दुतीचंद
बनूंगी
नाम तेरा रोशन करूंगी
तुझको सम्मान दिलाऊंगी
कोई गलती नहीं मेरी,
मुझे बचा ले,
मैं तो बेटी हूं तेरी
मुझे बचा ले।

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