बतकही

बातें कही-अनकही…

वह पूछ रहा था सबसे
भीड़ में खड़ा—
‘संसार की सबसे बड़ी समस्या क्या है?’
‘साम्प्रदायिकता’ एक ने कहा, उभरता हुआ नेता था वह
‘बेरोज़गारी’ दूसरे का स्वर था, हाथ में फ़ाइल थामे एक युवक
‘ग़रीबी’—तीसरा बोला, एक रिक्शाचालक
‘प्रेम’ चौथा भी बोल पड़ा, जो शायद दिल टूटा प्रेमी था
तभी भीड़ में से एक अस्फुट-सी आवाज़ आई, बहुत धीमी—
‘भूख !’
सबकी आँखें मुड़ गईं उस आवाज़ की ओर— वह साक्षात्
वहाँ एक बालक खड़ा था
हाथ थामे एक बालिका का
हाथ में उसके एक कटोरा था,
ख़ाली, टूटा हुआ
लेकिन वह जगजीत सिंह की ग़ज़लों का
आधा चाँद नहीं था,
जिसे गले में डाले आस्माँ पर रात चलती है…

–डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

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7 thoughts on “भूख-एक

  1. आपने अपनी छोटी-सी कविता में बहुत वृहद बात कह दी। निश्चय ही भूख से बड़ी कोई समस्या नही है विश्व में।

  2. सुप्रभात कनक मैडम।
    आप कहती हैं छोटी सी
    तो ये छोटी है ज़रूर
    मगर चोट करे गंभीर
    गागर में सागर कैसे समाना है
    कोई आप से सीखे।

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