बतकही

बातें कही-अनकही…

‘भूख’ क्या है ?
‘भूख’ तो केवल ‘भूख’ है
किसी भी व्यक्ति को,
परिवार, समाज, नस्लों, पीढ़ियों को
भूखा रखकर
करवाया जा सकता है उनसे कोई भी काम
असंभव
जो नहीं कर सकते, खाए-पिए-अघाए लोग —
चोरी
झपटमारी
हत्या
बलात्कार…!
क्योंकि भूखा इन्सान ‘इन्सान’ नहीं होता है
वह केवल होता है—
‘भूख’ — ‘साक्षात् भूख’
एक धधकती आग
जिसमें भस्म हो जाती है
नैतिकता
ईमानदारी
प्रेम
इंसानियत
समझदारी
बुद्धि
ह्रदय
तन और मन भी… (स्व-रचित कविता ‘भूख-दो’ का अंश)

यदि पूछा जाय कि दुनिया की सबसे बड़ी समस्या क्या है? तो निश्चित रूप से अनेक उत्तर मिलेंगे, जैसे— ग़रीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, अंध-विश्वास, बौद्धिक-जड़ता, साम्प्रदायिकता, युद्ध और हिंसा… आदि ! लेकिन मेरी समझ से सबसे बड़ी समस्या है— भूख !

मेरा मानना है कि एकमात्र भूख ही वह तथ्य या स्थिति है, जिसको औज़ार’ और ‘हथियार’ बनाकर उसके माध्यम से किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज, जाति, नश्ल, पीढ़ियाँ, देश… को बिना किसी हथियार के ‘बंधक’ बनाकर उनसे कोई भी काम करवाया जा सकता है | मसलन— चोरी, झपटमारी, हत्या, बलात्कार, लूटपाट, नर-संहार, युद्ध, गृह-कलह… अर्थात् कुछ भी !

सवाल है कि कैसे ? इसका सबसे सटीक उत्तर मिलेगा शहरों में, हालाँकि उत्तर हमें गाँवों में भी मिलेंगें, और पर्याप्त मात्रा में मिलेंगें; लेकिन गाँवों में भूख घरों में छिपकर रहती है, ग्रामीण उसे अपने घर की कच्ची दीवारों के पीछे छुपा लेते हैं, ‘सामाजिक-प्रतिष्ठा’ के नाम पर ! यही काम शहर नहीं कर पाते हैं और वहाँ भूख की महिमा और उसकी शक्ति एकदम नग्न आँखों से देखी जा सकती है | दरअसल ‘शहर’ की एक ख़ासियत यह भी है कि आप मनवा-समाज की अनेक सच्चाइयों को, सामाजिक-षड्यंत्रों की परतों को, बौद्धिक-दार्शनिक चिंतन की नग्नता को खुली आँखों से देख सकते हैं; और शहर उन्हें छिपाता भी नहीं, बल्कि उनको उनकी वास्तविकता के साथ खोलकर दिखाता भी है |

शायद यही कारण है कि डॉ. अम्बेडकर दलितों को गाँवों से शहरों की ओर जाने को कहते रहे, ताकि दलित-वर्ग सच को देख सके, समझ सके, उनका सामना कर सके, उनसे लड़ सके; जबकि अटल बिहारी वाजपेयी ने नारा दिया— ‘चलो गाँव की ओर’; ताकि अन्य बहुत-से उद्देश्यों की प्राप्ति के साथ-साथ वंचित-आबादी को उस कुँए में वापस लाया जा सके, जिससे भारत के वंचित-वर्गों का जीवन पुनः ‘कुँए के मेढ़क’ जैसा बनाया जा सके; जिसके लिए वर्तमान सरकार व्यावहारिक धरातल पर जी-जान से सक्रिय हो चुकी है !

अस्तु, तो भूख की महिमा देखनी हो तो किसी रेस्टोरेंट, ढाबे या स्ट्रीट-फ़ूड की रेहड़ियों के आसपास नज़र डालना काफ़ी होगा, ख़ासकर उनके आसपास रखे कूड़ेदानों के आसपास के सामाजिक-समीकरण पर ! वहाँ आपको कई बच्चे इंतज़ार करते हुए दिखेंगे, कि कब रेस्टोरेंट, ढाबों या रेहड़ियों पर खाने वाले लोगों का खाना खाने का क्रम पूरा हो और कब वे अपना बचा हुआ खाना उन कूड़ेदानों में फ़ेंकें | वे बच्चे उसी फ़ेंके हुए ‘भोजन’ के इंतज़ार में वहाँ खड़े होते हैं; ‘भोजन’ जो किसी की जूठन है, ‘भोजन’ जो अब कूड़ेदान में फ़ेंका जाकर ‘कूड़ा’ बन चुका है, वही उन बच्चों का लक्ष्य है, वही उनका ‘भोजन’ है |

ये बच्चे कौन हैं ? किसके हैं ? उनका सम्बन्ध समाज के किस हिस्से से है ? अथवा समाज का कौन-सा वह वर्ग है, जिसके ‘भूख’ से व्याकुल हो उठे बच्चे कूड़ेदानों में ‘भोजन’ ढूँढने निकले हैं और माता-पिता उन्हें रोक नहीं सके ? माता-पिता ने उनको ‘कूड़ा’ या जूठन’ खाने से रोका क्यों नहीं ? क्या विवशता रही होगी उनकी ? वह उनकी विवशता थी या कुछ और ?…

शायद ‘सुसंस्कृत-समाज’ इसपर ग़ौर नहीं करना चाहता ! करेगा भी तो क्यों ? इससे उसी का भयानक चेहरा सामने आने का भय जो बना रहता है, जबकि वर्तमान समय में वह ‘मानवीय’ और ‘संवेदनशील’ दिखना चाहता है | क्या करे वह, ‘लोकतंत्र’ में ‘वोट’ की महिमा ही कुछ ऐसी है, उसे सत्ता में बने रहने के लिए ‘वोट’ तो चाहिए ही, जो बड़ी संख्या में इन्हीं भूखों के पास है; इसके अलावा भी अन्य सभी प्रकार की ‘सत्ताओं’ के लिए भी यह क़वायद बेहद ज़रूरी है !

लेकिन ‘समय’ और बुद्धि तो इसपर सवाल खड़े करेंगे ही ! ‘वर्तमान’ और ‘भविष्य’ तो सभी वर्गों और व्यवस्थाओं से पूछेंगें ही, और उनके उत्तर समझाने के लिए ‘अतीत’ या ‘इतिहास’ भी सबको आइना दिखाएगा ही…! कब तक बचेंगें हम ? और कैसे बचेंगे ? बचना भी क्यों आवश्यक है ?…

निश्चित रूप से सोचने की ज़रूरत है, कि जब कोई भी बच्चा इस फ़ेंके हुए भोजन, यानी ‘कूड़े’ या ‘जूठन’ को खाएगा, तो उसका स्वाभिमान या आत्मसम्मान कितने दिनों तक जीवित रहेगा, उसकी नैतिकता कितने दिनों तक शेष रहेगी, …बड़ों के स्वाभिमान की बात फ़िलहाल छोड़ देते हैं…! और ऐसे में यदि कोई खाया-पिया-अघाया व्यक्ति उनके सामने रोटी के कुछ टुकड़े फ़ेंक दे, तब क्या होगा ? निश्चित रूप से वह बच्चा उसके इशारे पर जान लेने और देने को सहजता से तैयार हो जाएगा | ‘स्वामिभक्ति’ और कैसे पैदा की जाती है ?

दुनिया के तमाम हिस्सों में किसी भी ‘आधुनिक-समाज’ का वर्चस्ववादी तबक़ा इस सबसे बड़े ‘सत्य’ को ख़ूब अच्छी तरह समझता है और ‘लोकतान्त्रिक-व्यवस्थाओं’ के भीतर रहते हुए भी अपने वर्चस्व की स्थापना में इस ‘भूख’ और ‘रोटी’ को एक औज़ार और हथियार की तरह इतनी ख़ूबसूरती से प्रयोग करता है कि यदि सचमुच में कोई ‘ईश्वर’ नाम की चीज कहीं होगी, तो वह प्रत्येक दिन अपना सिर पीटती होगी या पीटता होगा !

अपराध की दुनिया, जिसके सरगना या कर्ता-धर्ता अक्सर उसी वर्चस्ववादी समाज का व्यक्ति होता है, जो अक्सर दिन के उजाले में समाज में एक बेहद ही शानदार मुखौटा पहनकर निकलता है, जिसपर ‘इंसानियत’, ‘दयालुता’, ‘परोपकारिता’, ‘समाज-सेवक’ आदि के चमकते क़ीमती रत्न जड़े होते हैं; उसका असली चेहरा अपराध की अँधेरी दुनिया में दिखाई देता है, जहाँ सबसे निचले स्तर पर काम करनेवाले बेबस लोगों को वह ‘भूख’ एवं ‘रोटी’ के माध्यम से ही अपने अधीन ले आता है |

यही सत्य समाज का भी है, ‘आधुनिक’ एवं ‘लोकतान्त्रिक-समाज’ का भी | जब ये अपराध की दुनिया का ‘बिज़नेस’ इस कदर फ़ल-फूल नहीं रहा था था, तब भी समाज के वर्चस्ववादी तबक़े अपने नियंत्रण और वर्चस्व को बनाए रखने के लिए ‘भूख’ और ‘भोजन’ का इस्तेमाल हज़ारों सालों से करते आ रहे हैं और आज भी इसमें कोई कमी नहीं आई है | ‘अपराध’ की दुनिया तो बस उसका विस्तार-भर है |

वर्चस्ववादी-वर्गों ने समाज पर अपने वर्चस्व की स्थापना के लिए हज़ारों सालों पहले ही सबसे निचले पायदानों पर रहनेवाले वर्गों से उनकी आय के तमाम साधन छीन लिए और उनको पूरी तरह से अपनी दया के अधीन कर लिया | एक बार यह काम हो जाने के बाद आगे का रास्ता उनके लिए आसान हो गया, अर्थात् आनेवाली सदियों में अपने नियत्रण को बनाए रखने की ख़ातिर उनको किसी भी अतिरिक्त प्रयास की ज़रूरत बहुत अधिक नहीं रही; क्योंकि उनके साथ ‘धर्म’ ने पहले ही गठजोड़ कर लिया था और उस भूखी जनता को ख़ूब अच्छी तरह से समझा दिया कि उनकी दयनीय स्थिति तो उनके पापों का फ़ल है, या पिछले जन्मों के कर्मों का दण्ड | इस तरह ‘ईश्वर’, ‘पुनर्जन्म’, ‘स्वर्ग-नरक’, ‘पाप-पुण्य’, ‘कर्मफ़ल’ आदि के जाल में उलझी भूखी जनता कभी ठीक से अपनी समस्याओं का कारण समझ ही नहीं सकी | और यदि कभी उसे यह सारा खेल समझ में थोड़ा-बहुत आने भी लगा, तो वर्चस्ववादी तबकों की मदद के लिए राजा का ‘राजदण्ड’ भी उनके साथ ही था, जो अक्सर उन्हीं के बीच से निकलता था | उसे भी अपना शासन बनाए रखना था, उसे भी घी में तर सारे मालपुए खाने थे, शरीर पर रेशम और रत्न साजने थे, सारे भोग मुफ़्त में भोगने थे, सबका ‘स्वामी’ और ‘भाग्य-विधाता’ भी कहलाना था; और यह सब धर्म एवं व्यवसाय-जगत के सहयोग से आसानी से हासिल किया जा सकता था | अतः राजा, धर्म/पुरोहित और व्यवसाय जगत एक-दूसरे के साथ थे — और ये ही तीनों तो हैं किसी भी देश और समाज के वर्चस्ववादी तबक़े ! शेष तो जनता है, रोज़ भूख से लड़ती, रोटी के लिए ‘स्वामियों’ के इशारे पर एक-दूसरे का ही रक्त बहांती…

और ये तीनों वर्चस्ववादी तबक़े मिलकर धर्म और राज्याधिकार का प्रयोग करते हुए सदियों से बेहद इत्मिनान से मुफ़्त का माल खाते आ रहे हैं, बिना कोई हाथ-पैर हिलाए, बिना कोई परिश्रम किए, और अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए किसी और हथियार की ज़रूरत भी नहीं है, ‘भूख’ नामक हथियार काफ़ी है इसके लिए…

अगले लेख में इस बात पर चर्चा होगी कि ‘भोजन’ को किस तरह ‘हथियार’ की तारा प्रयोग किया जाता रहा है, सदियों से—‘स्वामी-वर्गों द्वारा भी और ‘भूखों की भीड़’ द्वारा भी…

–डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

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