बतकही

बातें कही-अनकही…

क्या किसी भी व्यक्ति, समाज या देश को हमेशा-हमेशा के लिए नेस्तोनाबूत किया जा सकता है? क्या किसी का सिर हमेशा के लिए कुचला जा सकता है? क्या किसी के विवेक को, इच्छाओं और अभिलाषाओं को, स्वाभिमान और आत्म-चेतना को हमेशा के लिए मिटाया जा सकता है…

बहुत साल पहले, आज से लगभग दो दशक पहले, किसी अख़बार में मैंने एक शोध पढ़ा था; हालाँकि अब यह याद नहीं कि वह अख़बार कौन-सा था, लेख किसका था— शायद वह अमेरिका के ‘काले’ नागरिकों पर किया गया शोध था… उस शोध में शोधकर्ताओं ने उस देश के ‘काले नागरिकों’, अर्थात् ‘नीग्रो’ आदिवासियों से कुछ सवाल पूछे थे, और उन सवालों के ज़वाब इतने भयानक और चिंता में डालनेवाले थे कि शोधकर्ताओं के भी होश फ़ाख्ता हो गए |

दरअसल उन ‘काले नीग्रो आदिवासियों’ से पूछा गया था कि यदि ‘उनको कुछ भी करने की शक्ति और अधिकार दे दिया जाए, तो वे सबसे पहले क्या करना चाहेंगे’? उनका जवाब था कि ‘हम सबसे पहले ‘गोरों’ के सामने ही उनकी औरतों और बच्चियों के साथ बलात्कार करेंगें और उनके बच्चों की हत्याएँ करेंगें |’ जब पूछा गया कि ‘ऐसा क्यों?’ तो जवाब मिला, कि ‘उन्होंने हमारे साथ सदियों से ऐसा ही व्यवहार किया है; इसलिए हम उनको बताना चाहते हैं कि जब तुम्हारे सामने तुम्हारी बेबस स्त्रियों और नन्हीं बच्चियों पर बलात्कार होते हैं, और वे छटपटाती हैं, अपने-आप को और अपने स्वाभिमान को बचाने में नाकाम होती हैं, तो तुम भी देखो और समझो कि उनकी तकलीफ़ देखकर तुम्हें कैसा लगता है; जब तुम्हारे सामने ही तुम्हारे निर्दोष बच्चे जान से मार दिए जाते हैं, तो तुम भी महसूस करो कि अपनी आँखों के सामने अपने बच्चों की निर्मम हत्या होते देख तुम पर क्या बीतती है…’

समाज के पुरोधा कहेंगें कि ‘यह तो उन ‘जंगलियों की क्रूरता है !’ लेकिन क्या वाकई…?! क्या सचमुच में यह उनकी ही क्रूरता का परिणाम है…?! क्या उन आदिवासियों, यानी ‘जंगलियों’ की यह प्रतिक्रिया उनकी बेबस छटपटाहटों का ही प्रतिबिम्ब नहीं है…? क्या उनकी यह बेचैनी और उनको इस ‘प्रतिहिंसा’ की स्थिति में ले जाने के लिए समाज के पुरोधा ही ज़िम्मेदार नहीं हैं…?

एक सत्य घटना का ज़िक्र अनिवार्य है, जिसके बारे में इसी जगह पर मैंने पहले भी लिखा है, श्रीनगर की अध्यापिका संगीता फरासी की बात करते हुए, लेख था—संगीता कोठियाल फरासी : भीख माँगते बच्चों को अक्षरों की दुनिया में ले जाती एक शिक्षिका; भाग-चार : होटल में धुमंतू बच्चे और बारिश में भीगता समर्थ-समाज’ | संगीता फ़रासी ने अपने निजी प्रयास से श्रीनगर (उत्तराखंड) के बंजारे समाज के कुछ बच्चों को पढ़ाई की ओर उन्मुख किया है और वही एक दिन दुनिया के रोचक और स्वप्निल हिस्से से उन बच्चों को परिचित करवाने के उद्देश्य से वहीँ के एक रेस्टोरेंट में ले गई थीं | उसी दौरान तेज़ बारिश आई और रेस्टोरेंट के भीतर बैठे बच्चे उन लोगों को देखकर चहक उठे थे, जो सड़क पर भागते हुए बारिश से बचने के लिए छिपने की की कोशश में इधर-उधर जगह ढूँढ रहे थे | पूछने पर बच्चों ने अपनी शिक्षिका को बताया कि ‘हम भी कई बार बारिश से बचने के लिए जब किसी के घर की मुंडेर या किसी ढाबे वगैरह के नीचे खड़े होने की कोशिश करते हैं, तो ये लोग ही हमको दुत्कार कर वहाँ से भगा देते हैं, ठंढ के मौसम में भी; आज इनको भी पता चलेगा कि बारिश में भीगने पर कितना बुरा लगता है |’  

सोचने की बात है, जिस उम्र में बच्चों के अनुभव में खेल-खिलौने, मौज-मस्तियाँ, सैर-सपाटे, क़िताबें-कहानियाँ आदि होते हैं, उस उम्र में उन बच्चों को समाज से ऐसे अनुभव हासिल हुए, जिन्होंने उन बच्चों के कोमल मन में न जाने कितने क्रूर भाव भर दिए, उस दिन की उनकी वह प्रतिक्रिया समाज के ‘कृत्यों’ का एक अक्स भर ही थी | और उन बच्चों का अपराध क्या था? यही कि वे समाज के ऐसे हिस्से से थे, जिसे छूकर ‘संस्कारशील’ और ‘धर्म-प्राण’ समाज अपवित्र हो जाता है !

लेकिन उस ‘संस्कारशील’ और ‘धर्म-प्राण’ समाज को यहीं पर रुककर तनिक गंभीरता से सोचना ही होगा कि उसके अमानवीय कृत्य क्या कभी वापस पलटकर उसकी ओर नहीं आएँगें—क्या न्यूटन का तीसरा नियम ‘क्रिया के विपरीत और उसके बराबर प्रतिक्रिया’ का सिद्धांत भौतिकी के साथ-साथ मानव-जीवन में भी लागू नहीं होता है? आख़िर नीग्रो-आदिवासियों पर किया गया शोध क्या यही बात नहीं कहता कि अत्याचार के विरुद्ध भी उसी के समान प्रतिक्रिया हो सकती है, और अवसर मिलते ही होती भी है— उनके ऊपर हुए अत्याचार जैसी, अर्थात् रेप और हत्या के बदले रेप और हत्या…?!

दूर जाने की ज़रूरत नहीं, अभी बीते कुछ सालों पहले ही पूरे देश ने देखा कि जब दलितों पर अमानवीय अत्याचार बढ़ गए, तो उसके विरोध में दलितों ने अपने पारंपरिक काम करने बंद कर दिए; अर्थात् उन्होंने दबंगों के यहाँ से उनके मरे जानवरों को उठाने से इंकार कर दिया, उनके घरों से कूड़ा उठाने से मना कर दिया | इतना ही नहीं दलितों की अस्मिता के विरुद्ध बयानबाज़ी करनेवाले कई दबंग-वर्गीय नेताओं के घरों के सामने ही कूड़ा ले जाकर फ़ेंकने लगे |

कहने का तात्पर्य यह कि जब-जब सब्र की इन्तहा होती है, प्रत्येक अत्याचार का विरोध होता ही है, चाहे अत्याचार कितना ही बड़ा हो, अथवा अत्याचारी कितना ही ताक़तवर | 750 ई. से 1350 ई. के दौरान भारत में ‘बौद्ध-सिद्ध’ हुए | जब इतिहास को उठाकर देखते हैं तो समझ में आता है कि अत्याचार कितना भी बड़ा हो, कितना भी कठोर, क्रूर, अमानवीय… ‘समय’ या ‘काल’ प्रत्येक ‘अत्याचारी’ को समझाता ही है कि कोई भी इतना ताक़तवर कभी नहीं हुआ कि वह सबसे ऊपर हो सके | सिद्धों ने भारतीय इतिहास के ‘स्वर्णिम-युग’ का भ्रम तोड़ते हुए न केवल दबंगों के ‘ईश्वर’ और ‘धर्म’ को ही नकार दिया, बल्कि उनके द्वारा भोजन, जीवन-शैली, भाषा, विचार, मान्यताओं और परम्पराओं के संबंध में बनाए गए सैकड़ों नियम-कानूनों को भी ठेंगा दिखाते हुए सबको नकार दिया | और उनके पीछे-पीछे उन्हीं दबंगों की औरतें आँखें मूंदे चल पड़ीं, जो स्वयं ही उनके द्वारा प्रताड़ित थीं | और ‘सम्मानित’ दबंग समाज उनको ‘व्यभिचार’, ‘व्यभिचार’ कहता रहा, लेकिन न तो सिद्ध रुके, न उनका आन्दोलन रुका, न दबंगों की औरतें जीवित रहने की आशा में अपने-अपने घरों की मर्यादाएँ तोड़कर उनके आन्दोलन में शरीक होने से रुकीं; वे ‘व्यभिचार’, ‘व्यभिचार’ रटते रहें, उनकी बला से… 

जब ‘भूख’ और ‘भोजन’ की बात करते हैं, तो अभी कई रिपोर्टें ऐसी आईं हैं, जो बताती हैं कि कैसे सरकारी विद्यालयों तक ने, जिनका काम है विद्यार्थियों को और उनके माध्यम से समाज को तार्किक बनाना और उनमें वैज्ञानिक सोच विकसित करना, स्वयं ही ‘दकियानूसी विचारों का दामन नहीं छोड़ा है; और वहाँ बच्चों को दिए जाने वाले मध्याह्न-भोजन के दौरान वंचित-बच्चों से छुआछूत का व्यवहार किया जा रहा है | पौड़ी में रहते हुए यह सब तो मैंने अपनी आँखों से देखा है—शिक्षकों द्वारा भी और तथाकथित ‘समाज-सेवकों’ द्वारा |

लेकिन सोचने की बात है, कि जिस तरह के देश के हालात बन रहे हैं, क्या एक दिन ‘भूख’ से लड़ता हुआ कमज़ोर समाज अपनी सम्मानजनक ‘रोटी’ के लिए आवाज़ नहीं उठाएगा…? क्या सच में वर्तमान समय में जो साहस, हौसला, स्वाभिमान-चेतना पिछली एक-डेढ़ सदियों के संघर्ष के दौरान उनमें विकसित हुई है, वह उनको अभी भी दीन-हीन और लाचार ही बनी रहने देगी? हालाँकि वर्तमान सरकार तो यही कोशिश कर रही है कि ऐसा ही हो; अर्थात् कमज़ोर वर्गों को पुनः उसी ‘स्वर्ण-युग’ (गुप्त-काल) में पहुँचा दिया जाए, जहाँ कमज़ोरों को भोजन के रूप में कुछ भी खाने को बाध्य किया जा सकता था, और किया गया था, सफ़लतापूर्वक ! किन्तु क्या अभी भी वही समय है, यानी ‘स्वर्णिम गुप्त-काल’; अथवा बुद्धिचेता मानवों का युग है यह…?

तब क्या वाकई में अब समर्थ-समाज को अपनी क्रूर करतूतों के प्रति, दूसरों की रोटी छीनने एवं उनको दाने-दाने को अपना मोहताज बनाने की अपनी पाशविक मानसिकता के प्रति सचेत नहीं हो जाना चाहिए…? वर्तमान सरकार आज जो काम कर रही है, देश की 80-85 फ़ीसदी जनता को पुनः भूखा रखने के लिए, क्या वह कोई आग नहीं सुलगाएगा उन 80-85 फ़ीसदी बेबस लोगों के मन में…?

‘समर्थ-समाज’ को वाकई में सोचने की बहुत ज़रूरत है… 

–डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

Related Posts

2 thoughts on “वर्चस्ववादी समाज को डरने की ज़रूरत है !

  1. सुप्रभात कनक मैडम। यह असमानता की क्रूर अभिजात्य भावना का ही दुष्परिणाम है आज का माहौल। वर्षों से दबे कुचले लोग जिन को इंसान ही नहीं माना गया अगर आज विरोध दर्ज कर रहे हैं तो करेंगे ही बस अब वो15% को सुधार की जरूरत है।अब उनको भी अपने समकक्ष समझें और इज्ज़त दें।

  2. नमस्कार कनक मैडम ।सही बात है।केवल कुछ अभिजात्य सामंतवादी लोगों की विकृत मनोवृत्ति के फलस्वरूप आज का माहौल तैयार हुआ है जिस में कोई किसी पर विश्वास नहीं कर रहा। वो जो 80-85%दबे कुचले लोग धे,जो विविध अत्याचारों के शिकार हुए ,वर्षों तक चिंगारी अंतर्तम में दबाये रहे वो आज ज्वालामुखी बनकर फट पड़ी है।सही हैं सब।वर्ण व्यवस्था के नाम पर वीभत्स अत्याचार हुए।और वही सब का प्रतिदान है ये सब जो आज हो रहा है।समाज में समानता का भाव आना आवश्यक है तभी समाज का कल्याण हो सकेगा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!