बतकही

बातें कही-अनकही…

शोध/समीक्षा

नवाचारों की भीड़ में क़िताबों से बढ़ती दूरियाँ

‘नवाचार’ एक ऐसा ज़रिया हैं, जिनके माध्यम से विद्यालयों में आसानी से एवं रोचक तरीक़ों से बच्चों को बहुत सारी चीजें हँसते-खेलते पढ़ाया जा सकता है | यही कारण है कि भारत ही नहीं दुनिया के सभी देश, जो ख़ुशनुमा माहौल में बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की वक़ालत करते हैं एवं उसके लिए कोशिश करते है, इन नवाचारों को बहुत महत्त्व देते हैं | लेकिन एक बात यहाँ बहुत ध्यान से समझने की है... वह…

कथेतर

विनीता देवरानी : जिसकी नज़र में प्रत्येक विद्यार्थी ख़ास है !

भाग-तीन : बच्चों के लिए ‘विशिष्ट’ व्यवस्थाएँ  बच्चों में आत्म-विश्वास पैदा करने और उसको पल्लवित-पुष्पित करने के कई तरीक़े हो सकते हैं; मसलन उनके कार्यों की उचित मात्रा में प्रशंसा करना, अच्छे कार्यों के लिए शाबाशी देना एवं प्रोत्साहित करना, उनका उत्साह एवं हौसला बढ़ाना...| एक उपाय और हो सकता है—उनको उनके अस्तित्व की विशिष्टता का एहसास कुछ ख़ास तरीक़ों से दिलाना | यह कार्य हमारे देश के सरकारी-विद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए बहुत ज़रूरी…

शोध/समीक्षा

जी हाँ, आपके नाम में बहुत कुछ रखा है !

हिंदी उपन्यासकार भगवान सिंह ने अपने उपन्यास ‘अपने-अपने राम’ में एक पात्र के हवाले से लिखा है—“वसिष्ठ के लिए शूद्र मनुष्य होते ही नहीं | उनका कोई सम्मान नहीं होता | अपमान से उन्हें पीड़ा नहीं होती | उनके लिए गर्हित से गर्हित शब्द और संबोधन प्रयोग में लाये जा सकते है | नहीं संबोधन ही नहीं उन्हें अपना नाम तक ऐसा रखने का अधिकार नहीं जो घृणित न हो | शूद्र का नाम जुगुप्सित…

कथेतर

विनीता देवरानी : जिसकी नज़र में प्रत्येक विद्यार्थी ख़ास है !

भाग-दो : सब साथ चलें, तो मंज़िलें आसान हों ! किसी भी कार्य-स्थल पर कार्य की सफ़लता और उस सफ़लता की मात्रा एवं गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि वहाँ कार्यरत लोगों के परस्पर संबंध कैसे हैं— उनमें प्रतिद्वंद्विता, ईर्ष्या, एक-दूसरे को नीचा दिखाने एवं हानि पहुँचाने जैसी प्रवृत्तियाँ हैं; अथवा उनमें परस्पर सहयोग, सह-अस्तित्व की स्वीकार्यता, एक-दूसरे की मदद से आगे बढ़ना और बढ़ाना जैसी सकारात्मक प्रवृत्तियाँ हैं ! दोनों ही परिस्थितियों…

कथेतर

विनीता देवरानी : जिसकी नज़र में प्रत्येक विद्यार्थी ख़ास है !

भाग-एक : ‘स्टूडेंट’ से ‘टीचर’ के निर्माण की विकास-यात्रा “आज के राजा तुम्हीं हो ! इसलिए महसूस करो कि तुम्हारा जन्म कितना ख़ास है ! तुम अपने माता-पिता, भाई-बहन, दोस्तों, शिक्षकों और बहुत सारे लोगों के लिए कितने स्पेशल हो, जो तुमसे बहुत प्यार करते हैं | आज तुम महसूस करो कि तुम विशेष उद्देश्य से संसार में आए हो, इसलिए तुम्हें आगे चलकर कुछ अच्छे काम करने हैं, जिससे दुनिया तुम्हें याद रखे !”…

कविता

मिट्टी की रोटियाँ

क्या कभी मिट्टी की रोटियाँ खाई हैं ? कैसी लगती हैं वे रोटियाँ स्वाद में ? क्या भूख मिट जाती हैं उनसे ? उन आदिवासियों का दावा तो यही है...! रिसर्च में भी साबित हो गया कि भूख मिटाने में सक्षम हैं वे रोटियाँ मिट्टी वाली सभी आवश्यक पोषक तत्व भी देती हैं शरीर को, ये रोटियाँ यदि रोज़ खाई जाएँ उन्हें...! क्या उन रोटियों को रोज़ खाकर देखी हैं उन शोधकर्ताओं ने ? क्या…

निबंध

वर्चस्ववादी समाज को डरने की ज़रूरत है !

क्या किसी भी व्यक्ति, समाज या देश को हमेशा-हमेशा के लिए नेस्तोनाबूत किया जा सकता है? क्या किसी का सिर हमेशा के लिए कुचला जा सकता है? क्या किसी के विवेक को, इच्छाओं और अभिलाषाओं को, स्वाभिमान और आत्म-चेतना को हमेशा के लिए मिटाया जा सकता है... बहुत साल पहले, आज से लगभग दो दशक पहले, किसी अख़बार में मैंने एक शोध पढ़ा था; हालाँकि अब यह याद नहीं कि वह अख़बार कौन-सा था, लेख…

निबंध

वर्चस्व-स्थापना के प्रयास में ‘भूख’ को बचपन से साधती सरकारें

कहते हैं कि ‘बचपन’ ही वह समय होता है, जब किसी बच्चे के भविष्य के लिए उसके व्यक्तित्व की रुपरेखा तैयार की जाती है; अर्थात् उसकी नींव डाली जाती है | बच्चे के मन में जिस प्रकार के बीज रोपित किए जाएँगे, उसका व्यक्तित्व उसी के अनुरूप आकार लेगा | जिस बच्चे को बचपन से आत्म-निर्भर, स्वाभिमानी बनाया जाएगा, वह आगे चलकर उसी के अनुरूप आत्म-विश्वासी, स्वावलंबी और स्वाभिमानी बनेगा; और जिस बच्चे को बचपन…

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