बतकही

बातें कही-अनकही…

— “अरे सुनीता, ये बच्चे जिस समाज के हैं, यदि उस समाज के बच्चे भी बड़े सपने देखने लगेंगे, तो हमारे समाज के लिए ख़तरा पैदा कर देंगें | फिर हमारे बच्चों का और हमारे समाज की श्रेष्ठता का क्या होगा? ये तो हमारी बराबरी करने लगेंगे…! …इसलिए यही अच्छा होगा, कि ये बच्चे भी वही करें, जो इनके समाज के लोग करते हैं और केवल सफ़ाईकर्मी या किसान बनने का ही सपना देखें | हमारे लिए भी यही ठीक है और इनके लिए भी यही ठीक होगा …समाज में इससे शांति और संतुलन बना रहता है | मैंने इसीलिए उनको कोई और सपना देखने से रोका |” सुरेश ने एकदम बेबाकी से कहा, सुनीता हैरान थी   

— “लेकिन हमारी संस्था तो सभी बच्चों के लिए समान शिक्षा के सिद्धांत पर काम करती है ना ! …और हम सभी बच्चों को सपने देखने के लिए प्रेरित करने की बात भी करते हैं…! …तो फिर मुझे यह समझ में नहीं आया, कि बच्चों को सपने देखने से क्यों रोक रहे हैं आप?” सुनीता की जिज्ञासा कम होने का नाम नहीं ले रही थी, वह दुखी और हैरान थी  

सुनीता दिल्ली विश्वविद्यालय की एक अच्छी छात्रा थी, उसने वहाँ से ही पढ़ाई करते हुए पीएच.डी. की थी और कुछ समय तक अस्थाई रूप से वहाँ पढ़ाया भी | उसके अभिभावकों और अध्यापकों को उससे काफ़ी उम्मीदें थीं | उसने शिक्षा, यानी पढ़ने-पढ़ाने, को ही अपना ध्येय बनाया और उसी क्षेत्र में आगे बढ़ने का निश्चय किया | दरअसल उसका हमेशा से सपना था –-समाज के शोषित-वंचित लोगों के लिए काम करना; और वह शिक्षा को अपना माध्यम बनाकर यह काम करना चाहती थी |

लेकिन सरकारी नीतियों के अन्तर्गत देशभर में लगातार कम होती नौकरियों के कारण कॉलेजों और विश्व-विद्यालयों में इसके अवसर काफ़ी कम हो गए थे | साथ ही, नियुक्तियों में बढ़ते भाई-भतीजावाद और पैसे के खेल ने इस मुश्किल को और बढ़ा दिया |

इसी बीच कुछ परिचितों, दोस्तों और पारिवारिक सदस्यों ने शिक्षा के क्षेत्र में काम करनेवाली किसी सामाजिक-संस्था में काम करने का सुझाव दिया | इससे उसके दोनों उद्देश्य पूरे हो सकते थे | एक तो शिक्षा के माध्यम से समाज के लिए संगठित रूप से कुछ करने की राह खुल सकती थी, दूसरे, करियर को भी एक सार्थक दिशा मिल सकती थी | उसने कई संस्थाओं के बारे में पता किया | और काफ़ी खोजबीन के बाद एक संस्था उसे अपने उद्देश्यों के अनुरूप लगी |

यह सामाजिक-संस्था विद्यालयी-शिक्षा के क्षेत्र में सरकार, शिक्षा-विभाग और सरकारी स्कूलों के अध्यापकों एवं बच्चों के साथ मिलकर काम करती थी | इसका संचालन भारत की आईटी सेक्टर की एक बहुत बड़ी कंपनी कर रही थी | संस्था का दावा था, कि दुनिया भर में जो ग़रीबी, लाचारी, अवैज्ञानिक-मनोवृत्तियाँ और जहालत विद्यमान है, उसका कारण है, शिक्षा का अभाव; और इसीलिए उस कंपनी और उनके द्वारा संचालित उक्त सामाजिक-संस्था ने शिक्षा के प्रचार-प्रसार को अपना लक्ष्य बनाया, ताकि ‘सस्टेनेबल और इक्वेटेबल सोसाइटी’ की स्थापना की दिशा में सरकार का सहयोग कर सके | कई संस्थाओं की तरह “एजुकेशन फॉर सस्टेनेबल एंड इक्वेटेबल सोसाइटी” उसका भी नारा और ध्येय-वाक्य था | यह संस्था भारत के कई राज्यों में कार्य करती है, जिसमें देश की सरकारी मशीनरी और शिक्षा-विभाग का सहयोग भी उसे प्राप्त है |

सुनीता को जैसे एक मज़बूत हाथ का सहारा मिल गया, जिसकी मदद से वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकती थी | आख़िर उसका भी तो वही सपना था, जो उक्त संस्था के उद्देश्यों से मेल खाता था | उसने अपने उद्देश्य को संस्था के उद्देश्य के साथ मिला दिया और पूरे समर्पण-भाव से संस्था के साथ जुड़ गई, जिसके लिए वह लिखित परीक्षा और कई चरणों के इंटरव्यू देकर सेलेक्ट हुई थी | सुनीता को उत्तराखंड के पौड़ी जिले में नियुक्ति मिली |

पौड़ी शहर पहाड़ों पर बसा हुआ एक छोटा-सा ख़ूबसूरत और शांत शहर है, जिसके आसपास सैकड़ों छोटे-छोटे गाँव और कस्बे आबाद हैं | ‘आबाद’ कहना अब तो तनिक मुश्किल ही है, क्योंकि बेहतर भविष्य की आशा में युवा-पीढ़ी की एक बड़ी आबादी यहाँ से शहरों या कुछ विकसित स्थानों की ओर पलायन कर गई है | यहाँ तेंदुओं, चीतों, जंगली खतरनाक शूअरों के हमलों ने भी लोगों को पलायन करने को मजबूर किया है, जहाँ तेंदुए जैसे ख़तरनाक जानवर लोगों और उनके पशुओं पर हमले करते हैं और जंगली सूअर किसानों के खेतों को खोद डालते हैं, लोगों पर हमले भी करते हैं |

वैसे पौड़ी की सामाजिक-सांस्कृतिक, शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति को देखते हुए शहर की बजाय एक क़स्बा कहना ज्यादा ठीक होगा | यहाँ से हिमालय के विहंगम स्वरुप का नज़ारा किसी के भी मन को बाँध लेने के लिए काफ़ी है | दूर-दूर से सैलानी इस विहंगम दृश्य के दर्शन करने आते हैं | सुनीता को इसी जगह पर रहते हुए काम करना था | प्रकृति के इस मनमोहक सान्निध्य में रहना और काम करना किसे अच्छा नहीं लगेगा | दिल्ली के दमघोंटू माहौल में रही सुनीता को जैसे बिना माँगे मनचाहा वरदान मिल गया था, जिसकी उसे उम्मीद भी नहीं थी …

…पौड़ी में चूँकि अधिकाँश आबादी आर्थिक रूप से उतनी मजबूत नहीं है, इसलिए यहाँ बच्चे प्रायः सरकारी विद्यालयों में ही पढ़ते हैं | वैसे संपन्न और थोड़े से भी आर्थिक रूप से सक्षम लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ाते हैं | सरकारी विद्यालयों में अधिकांशतः वंचित या कमज़ोर समुदायों के ही बच्चे रह गये हैं | जिन बच्चों की बात यहाँ हो रही है, वे भी सरकारी उच्च प्राथमिक शाला, यानी छठवीं से आठवीं कक्षा, के ही विद्यार्थी थे और प्रायः सभी वंचित तबकों के ही थे, या शायद उनमें से इक्का-दुक्का ही सामान्य वर्गों के होंगे …|

सुनीता को संस्था ज्वाइन किए अभी तीन दिन ही हुए थे | जिस दिन की बात यहाँ की जा रही है, उसके एक दिन पहले भी वह सुरेश के साथ उस विद्यालय का दौरा करने एवं शिक्षकों तथा बच्चों के साथ काम करने जा चुकी थी, अतः वहाँ अध्यापिकाएँ एवं बच्चे उससे शुरूआती रूप से परिचित हो गए थे |

जब सुरेश और सुनीता विद्यालय पहुँचे, तब अध्यापिकाओं ने तीनों कक्षाओं –छठवीं से आठवीं—के सभी बच्चों को एक कक्षा में बिठा दिया और वे स्वयं ऑफिस में बैठकर काम करने लगीं | वैसे भी यहाँ के अधिकांश विद्यालयों में अलग-अलग कारणों से बच्चों की संख्या बहुत कम ही होती थी, कभी-कभी तो किसी-किसी विद्यालय में केवल दो या तीन बच्चे ही होते थे | इस विद्यालय में भी कुल मिलाकर बमुश्किल बीस-बाईस बच्चे ही थे |

सुरेश ने बच्चों के साथ बातचीत की शुरुआत की | पिछले दिन उन्होंने बच्चों को साक्षात्कार के लिए प्रश्नों की सूची बनाने का काम दिया था, जिसे बच्चों को अगले दिन करके लाना था | बच्चे जिस सामाजिक-आर्थिक तबके से संबंधित थे, वहाँ उनके लिए यह काम तनिक कठिन था | ऐसा नहीं है, कि बच्चे सक्षम नहीं थे, बल्कि सच तो यह है, कि अपने माता-पिता के साथ अर्थोपार्जन में लगे रहने वाले उन बदनसीब बच्चों के पास न तो पढ़ने-लिखने के लिए पर्याप्त समय था, न सोचने-विचारने के लिए पर्याप्त अवसर | समाज द्वारा नित्य-व्यवहार से उनके आत्म-विश्वास की उड़ाई गई धज्जियाँ तो साथ में थीं ही |

…ये बच्चे भी अधिकांशतः ऐसे ही माहौल में रहते हुए ‘आंशिक कर्तव्य’ के रूप में किसी तरह ‘शिक्षा का उद्देश्य’ पूरा करते थे, लेकिन मुख्य रूप से माता-पिता की अर्थोपार्जन में सहायता करते थे | कोई माता-पिता के साथ सब्जी या फ़ल बेचता था, कोई कूड़ा बीनने जाता था, किसी को खेतों पर जाना होता था, तो किसी को पटरी किनारे पिता या भाई के साथ जूते गाँठने का काम करना होता था | कुल जमा बात यह थी, कि उन बच्चों में से किसी को भी घर में पढ़ने का अवसर मुश्किल से ही मिल पाता था… | जबकि सुरेश एक ऐसे शक्तिशाली वर्ग का व्यक्ति था, जो दावा तो करता था, सामाजिक-समानता और समान शिक्षा के अवसर का; किन्तु उसकी वास्तविक मानसिकता उजागर होनी अभी बाकी थी |

सुरेश एक औसत व्यक्तित्व का व्यक्ति है, जो इस संस्था में आने से पहले किसी और संस्था में काम करता था | उसकी शिक्षा भी स्नातक तक की थी | लेकिन कुछ साल पहले जब इस संस्था ने अपनी एक शाखा पौड़ी में खोली और स्थानीय लोगों की भर्ती शुरू की, तब सुरेश और उसके कई साथियों ने बेहतर वेतन एवं सुविधाओं के लोभ में इस संस्था में आने के लिए आवश्यक न्यूनतम योग्यता के तहत आनन-फानन में इधर-उधर से फ़र्जी डिग्रियाँ हासिल की थीं, इसलिए अपने उन साथियों की तरह ही उसके मन में भी कई बातों को लेकर जबर्दस्त हीन-भावना रहती थी, जो यदा-कदा प्रकट हो जाया करती थी, जब कोई कायदे का पढ़ा-लिखा व्यक्ति उनके सामने आ जाता था, खासकर कोई पढ़ी-लिखी महिला | तब उसकी हीन-भावना देखते लायक होती थी | उसे कभी अपनी योग्यता और क्षमताओं पर विश्वास नहीं हो सका, इस कारण वह हमेशा संदेह से घिरा रहता था | उसके उन साथियों की भी कमोवेश यही स्थिति थी…  

…उसके मन में जातीय दुराग्रह भी कम नहीं थे, जो बहुत छिपाने पर भी यदा-कदा प्रकट हो ही जाया करते थे | अपनी समाज-सुधारक छवि बनाने के लिए वह केवल ‘सामाजिक-दायित्व-निर्वहन’ का दिखावा-भर करता था | स्त्रियों के प्रति तो उसकी एक ख़ास क़िस्म की सोच थी | उसका मानना था, कि स्त्रियाँ कितनी भी काबिल हों और कितना भी महत्वपूर्ण एवं बेहतरीन काम करती हों, उनका सबसे बड़ा काम है, पुरुष की दैहिक ज़रूरतों को पूरा करना –यानी मनोरंजन और उपभोग की वस्तु | अपनी इस प्रवृत्ति को वह समाज से तो छिपाता था, लेकिन प्रायः महिलाओं से नहीं, बल्कि अपनी सहकर्मी महिलाओं पर यह अवश्य ज़ाहिर करता था, कि उसके सामने उन महिला-कर्मचारियों की कोई हैसियत नहीं है… संयोगवश उसके वर्ग के कई पुरुष सहकर्मियों, जिनमें उसके वे साथी भी थे, जो उसी के साथ इस संस्था में आए थे, का वंचित वर्गों और महिलाओं के प्रति यही नज़रिया और व्यवहार था, जिसे वे केवल उन अध्यापकों से छिपाकर रखते थे, जिनके साथ काम करते थे… शायद वे अध्यापक उनलोगों की ऐसी दोमुँही प्रवृत्ति का विरोध कर संस्था के साथ काम करने से सामूहिक रूप से इन्कार कर सकते थे | हालाँकि शिक्षकों में भी कुछ ऐसे अवश्य थे, जिनकी मनोवृत्तियाँ उन लोगों जैसी ही थी, लेकिन तब भी विरोध का डर तो था ही…

…तो ये बच्चे भी उस दिन अपना होमवर्क करके नहीं आये थे, यानी किसी साक्षात्कार के लिए पूछे जाने वाले प्रश्नों की सूची बनाकर नहीं लाये थे | तब सुरेश ने कक्षा में ही मौखिक रूप से उनको प्रश्न बनाने को कहा | लेकिन आत्म-विश्वास से रहित बच्चे यह काम नहीं कर पाए | केवल बेबस दृष्टि और अपराध-भाव से कभी सुरेश का, तो कभी सुनीता का, और कभी एक-दूसरे का मुँह ताकते रहे | इसी तरह लगभग पंद्रह-बीस मिनट बीत गए | सुरेश ने उनकी इस कार्य में कोई मदद नहीं की, केवल बार-बार यही कहता रहा —“क्या सवाल पूछोगे तुमलोग, साक्षात्कार के लिए?…बताओ…!” लेकिन बच्चे कुछ भी नहीं बोल पाए | सुनीता बच्चों की समस्या समझ रही थी, क्योंकि वह भी तो इन समस्याओं से जूझते-लड़ते हुए यहाँ तक पहुँची थी | उसने अपनी कक्षा में अपने जैसे विद्यार्थियों को भी ऐसी समस्याओं से दो-चार होते सैकड़ों बार देखा था | इसलिए वह जानती थी, कि बच्चे क्यों खामोश हैं |

सुरेश की एक और खासियत थी, बच्चों के साथ काम करते समय वह समस्या को तो सामने रख देता था, लेकिन बच्चों को न तो कभी उसके समाधान के लिए प्रोत्साहित करता था, न उनको कोई मार्ग दिखाता था और न उनका हौसला ही बढ़ाता था | वैसे भी इन बच्चों से या उनके भविष्य से उसे क्या लेना-देना, उसे तो केवल समाज-सेवा का दिखावा भर करना था, अपनी संस्था के अपने अन्य साथियों की तरह…

सुनीता, संस्था में नई होने और संस्था की कार्य-प्रणाली से अनभिज्ञ होने के कारण, काफ़ी देर तक ख़ामोश रही | जब उससे बच्चों की बेबस आँखें सहन नहीं हुईं, तो उसने पहल करने की सोची | उसने सुरेश के पास जाकर धीरे से इसकी अनुमति माँगी, ताकि सुरेश का पुरुष-अहं आहत न हो | सुरेश अपने मन में हँसा—“ये पिद्दी-सी लड़की क्या कर लेगी?” उसे पूरा विश्वास था, कि जो काम वह स्वयं इतने समय में नहीं कर पाया, वह दिल्ली जैसे विकसित शहर में सुविधाओं के बीच रहने वाली ये लड़की क्या कर लेगी? गाँव के बच्चों के साथ काम करना इतना आसान है क्या? बड़े-बड़ों के पसीने छूट जाते हैं | उसके मन में तमाशा देखने की क्रूर चाहना जगी, इसलिए उसने अनुमति दे दी |

सुनीता ने बच्चों की ओर पहले एक अच्छी-सी मुस्कराहट भेजी, बच्चे भी प्रत्युत्तर में कुछ झिझकते हुए-से तनिक-सा मुस्कुराए | मुस्कुराए क्या, मुस्कराने का अभिनय-सा किया | फिलहाल बातचीत शुरू करने के लिए इतना भी पर्याप्त था |

— “क्या आपलोग जानना नहीं चाहेंगे, कि मैं कौन हूँ? कहाँ से आई हूँ? यहाँ क्यों आई हूँ? क्या करती हूँ? क्या सोचती हूँ ? वगैरह-वगैरह….?”

— “….हाँ मै’म, मैं कल से जानना चाहती हूँ, आपके बारे में | लेकिन कैसे पूछती? कहीं आप गुस्सा हो जातीं और हमारी शिक़ायत कर देतीं, हमारी मै’म से, तो …?” कुछ देर तक इंतज़ार करने के बाद आठवीं कक्षा की संध्या ने सुनीता की बात का सहारा पाकर, लेकिन कुछ झिझकते हुए ही पूछा

— “नहीं, बच्चो, न तो मैं गुस्सा होऊँगी, किसी से भी; और न ही आपकी टीचर से या किसी से आपकी शिक़ायत करुँगी | …आपलोग जो भी मेरे बारे में जानना चाहते हैं, इत्मिनान से पूछिए, बेखौफ़ होकर …डरने या झिझकने की कोई ज़रूरत नहीं है…निश्चिन्त होकर कोई भी सवाल पूछिए…|” सुनीता ने बच्चों को आश्वस्त किया, बच्चों के चेहरों पर थोड़ी देर पहले दिखने वाला तनाव कुछ ढीला पड़ने लगा था 

— “मै’म, आपका नाम क्या है?” छठवीं कक्षा के बलदेव ने कुछ मुस्कुराकर, तो कुछ सकुचाते हुए पूछा

— “मेरा नाम सुनीता है…|”

— “मै’म, आप पौड़ी के हो?” सातवीं कक्षा की कौशल्या भी कुछ उत्साहित-सी हुई

— “नहीं मैं पौड़ी की रहनेवाली तो नहीं हूँ …बाहर से आई हूँ…| हाँ, अब आपलोगों के साथ ही रहूँगी…|” सुनीता ने जानबूझकर तत्काल अपने पिछले निवास-स्थान का नाम नहीं बताया

— “तो आप कहाँ से आये हो?” सातवीं कक्षा के छात्र संदीप को जिज्ञासा हुई | सुनीता को एक और सवाल के रूप में इसी सवाल के पूछे जाने का इंतज़ार था, ताकि बच्चों की जिज्ञासाएँ उनके मन से बाहर आ सकें 

— “मैं दिल्ली से आई हूँ ….”

— “मै’म, वो तो बहुत दूर है..|” छठवीं कक्षा की आशिमा की आँखों में आश्चर्य साफ़-साफ़ दिखाई दिया  

— “हाँ, है तो थोड़ी दूर, लेकिन बहुत दूर भी नहीं, केवल थोड़ी दूर है…”

— “मै’म, आप वहाँ क्या करती थीं..? सातवीं कक्षा के आसिफ़ ने जानना चाहा

— “मैं वहाँ पढ़ती थी और बाद में पढ़ाती भी थी |”

— “मै’म, आप वहाँ भी हमारे जैसे बच्चों को ही पढ़ाती थीं?” आठवीं कक्षा की निधि पूछती है

— “नहीं बच्चो, आपलोगों से थोड़े बड़े होते थे वे | वे कॉलेज में पढ़ते हैं, मैं उन्हीं को पढ़ाती थी …|”

— “……मै’म, क्या हम भी उस कॉलेज में पढ़ सकते हैं, जहाँ आप पढ़ाती थीं ?” निधि के साथ बैठी उसी की सहपाठी संध्या ने कुछ सोचते हुए पूछा | उसकी आँखों में शायद कोई सपना तैर रहा था

— “बिलकुल पढ़ सकते हैं, ज़रूर पढ़ सकते हैं …! आपलोग किसी भी कॉलेज में पढ़ सकते हैं…”

 — “मै’म, मेरी बहुत इच्छा है, कि मैं भी किसी अच्छे वाले बड़े-से कॉलेज में जाकर पढूँ …! मेरे पापा जिस दुकान में काम करते हैं, उसके मालिक का बेटा बहुत बड़े कॉलेज में पढ़ता है | मैं भी कॉलेज में पढ़ना चाहती हूँ |…क्या आप मेरी मदद करोगे?” संध्या काफ़ी उत्सुक दिखी, कॉलेज के नाम से   

— “ज़रूर, बच्चो, …और आपलोग यदि खुद पर विश्वास करेंगें, तो आपको किसी की भी मदद की ज़रूरत नहीं पड़ेगी …| आप स्वयं वहाँ तक पहुँच जाएँगे | बस अपने-आप पर विश्वास करने की ज़रूरत है |…और विश्वास कैसे आएगा? जब आपलोग यह सोचने लगेंगे, कि जो बातें आपके मन में उठ रही हैं, वे भी सही हो सकती हैं | जैसे, जो सवाल अभी-अभी आप लोगों ने मुझसे पूछे, वे सवाल भी साक्षात्कार के सवाल हो सकते हैं, जो आपको सर के द्वारा होमवर्क में दिया गया था |”

थोड़ी देर के लिए कक्षा में ख़ामोशी-सी छाई रही, शायद बच्चे उस होमवर्क के विषय में सोच रहे थे, जो सुरेश ने उनको करके लाने को दिया था | शायद बच्चे उस होमवर्क और अपने आज के सवालों के परस्पर संबंधों को समझने की कोशिश कर रहे थे | सुनीता ने जानबूझकर बच्चों को उनकी चुप्पी के साथ रहने दिया, वह चाहती थी कि बच्चे किताबी दुनिया और वास्तविक दुनिया के अभिन्न सम्बन्धों को समझ पाएँ | तभी एक छात्र के सवाल ने उस सन्नाटे को तोड़ा…

— “मै’म, क्या आप हमेशा से टीचर ही बनना चाहती थीं?” आठवीं कक्षा की छात्रा निधि को अचानक जैसे याद आया हो

— “क्या आपके पापा भी आपको टीचर ही बनाना चाहते थे?” आठवीं के आफ़ताब की जिज्ञासा थी

— “हाँ, मैं हमेशा से टीचर ही बनना चाहती थी | लेकिन मेरे पिताजी मुझे कलक्टर बनाना चाहते थे | वे नहीं चाहते थे, कि मैं टीचर बनूँ | कलक्टर की हमारे समाज में बहुत इज्ज़त होती है ना ! इसलिए मेरे पिताजी मुझे जज बनाना चाहते थे |” सुनीता ने कहा

— “तो आपके पापा आपसे गुस्सा नहीं हुए, जब आपने उनको बताया होगा, कि आप टीचर बनना चाहती हैं? छठी कक्षा के विनोद ने हैरानी से पूछा

— “हाँ, गुस्सा तो हुए, लेकिन मैंने उनसे एकदम स्पष्ट कहा, कि मुझे टीचर ही बनना है और वे आख़िरकार मान गए | …हम सबको अपने लिए खुद ही सपने देखने चाहिए …और हमें अपने लिए सपने ज़रूर देखने चाहिए …तभी हम अपने सपनों के लिए मन से कोशिश कर पाएँगे !” सुनीता ने बच्चों को समझाया | पिता से विद्रोह जैसी बात पर बच्चे तनिक अचंभित थे   

— “आप लोगों ने भी तो सपने देखे होंगे, अपने लिए !” सुनीता ने अचानक बात का रुख मोड़ दिया, अब वो सवाल करने लगी और बच्चों को जवाब देने को उकसाया 

— “………” बच्चे एकदम से ख़ामोश हो गए, जैसे अचानक इस धारा-परिवर्तन से उनके मष्तिष्क में ख़लबली मच गई हो और वे समझ नहीं पा रहे हों, कि वे किस दिशा में हैं | …अथवा उनकी दुखती रग पर जैसे किसी ने हौले-से हाथ रख दिया हो, जिससे उनका दर्द एकदम से उभर भी आया हो और साथ ही जिसमें कोई लेप-सा रखने का एहसास भी शामिल हो; जिससे वे आहत भी हो गए और कोई राहत-सी भी मिली हो | शायद पहली बार उन बदनसीब बच्चों से किसी ने उनके सपनों के बारे में पूछा था…

— “बताइए बच्चो ..! ज़रूर आप सबने भी कोई-न-कोई सपना देखा ही होगा अपने लिए | …..चलिए, आज हम इसी विषय में बात करते हैं, कि आपलोग क्या करना चाहते हैं बड़े होकर..|” उनको उत्साहित करने के लिए सुनीता ने अपनी बात दुहराई

— “….तो सभी एक-एक करके बताइए, कि अपने जीवन में कौन क्या करना चाहता है?” इस काम में काफ़ी कोशिश की ज़रूरत थी, सुनीता जानती थी, इसलिए उनसे धैर्य से बच्चों के उत्तर की प्रतीक्षा की, बच्चों को सोचने का समय दिया…   

— “…मै’म, मैं फ़ौज में जाऊँगा, दुश्मनों के छक्के छुड़ा दूँगा मैं तो वहाँ ….!” सुनीता की कोशिश आख़िरकार रंग लाई | संदीप ने अचानक सन्नाटे को भंग करके सबको चौंका दिया…

— “ मै’म, मैं टीचर बनना चाहती हूँ | मुझे मेरी साधना मै’म बहुत अच्छी लगती हैं, वे हमको बहुत प्यार करती हैं और हमें बहुत सारी नई चीजें सिखाती हैं | मैं भी अपनी मै’म की तरह अच्छी टीचर बनना चाहती हूँ | मैं बच्चों को प्यार से पढ़ाऊँगी और उनको मारूँगी भी नहीं, और न डाँटूँगी !” अपने सहपाठी की पहल से कौशल्या को भी बोलने का हौसला मिला  

— “मै’म, मैं बड़ा होकर वो वाली पढ़ाई करूँगा, जिसमें पुल बनाते हैं | वो देखिए मै’म (विद्यालय से दिख रहे सामने पहाड़ों के पार स्थित श्रीनगर की घाटी की ओर दिखाकर), श्रीनगर कितना नज़दीक है, लेकिन हमें पहाड़-पहाड़ होते हुए जाना पड़ता है, बहुत ज्यादा घूमकर, तीस किलोमीटर से भी अधिक…| इसलिए श्रीनगर पहुँचने में बहुत अधिक समय लगता है, कभी-कभी एक घंटे से भी ज्यादा …| …मैं पौड़ी से श्रीनगर तक यहाँ से (ऊँगली से उस तरफ़ दिखाकर) सीधा वहाँ तक पुल बनाऊँगा, फिर हम जल्दी पहुँच जाएँगे, क्योंकि तब हमको बहुत कम चलना पड़ेगा, केवल तीन-चार किलोमीटर | फिर तो हम श्रीनगर पैदल भी चले जाएँगे, घूमते हुए | मैंने टीवी में ऐसा पुल देखा है, बहुत मज़ा आता है, मै’म, ऊपर से देखने पर | फिर सबलोग पहाड़ को ऊपर से देख सकेंगे, बहुत मज़ा आएगा …|” सूरज ने धाराप्रवाह अपने दिल की बात कह दी, उत्साह से खिले उसके चेहरे की चमक देखने लायक थी

— “मै’म, मुझे डॉक्टर बनना है, पौड़ी में अच्छे डॉक्टर नहीं हैं…| जो हैं, वे बहुत अधिक पैसा लेते हैं, इसलिए कई बार मैं या मेरी मम्मी बीमार पड़ते हैं, तो हम हॉस्पिटल भी नहीं जाते हैं | जिला अस्पताल में तो बहुत भीड़ होती है, हमको घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता है | इसलिए मैं खूब पढूँगी और अच्छी डॉक्टर बनूँगी और सबका मुफ्त में ईलाज करुँगी |” छठवीं कक्षा की सपना ने अपने सोये हुए सपने को जैसे हौले-से थपथपाया हो  

— “मैं तो पुलिस बनूँगा, मै’म ! मैं तो सबकी रक्षा करूँगा | अपने दोस्तों को बाघों से भी बचाऊँगा और बदमाशों से भी…|” छठी कक्षा के रोहित की अपनी सीट पर ही बैठे-बैठे फड़कती भुजाएँ और चेहरे पर खिलता आत्मविश्वास कह रहा था, जैसे वह आज ही पुलिस बनकर मानेगा, थोड़ी देर पहले दिखनेवाली दीनता अब उसके चेहरे से भी नदारद थी

तभी अचानक विस्फोट-सा हुआ…. समाज-सुधारक और बच्चों की शिक्षा के लिए काम करनेवाले और उस समय अपनी संस्था के प्रतिनिधि सुरेश की गरजती आवाज़ कक्षा में गूँज रही थी…..

— “……अच्छा….!!! तुम सब टीचर, इंजीनियर, फ़ौजी, या डॉक्टर ही क्यों बनना चाहते हो….? तुममें से किसी ने भी ये क्यों नहीं कहा, कि वो सफ़ाईकर्मी या किसान बनना चाहता है? क्या सफ़ाईकर्मी या किसान बनना बुरी बात है? ….” अचानक जैसे सुन्दर सपनों में खोये बच्चों के ऊपर किसी ने खौलता पानी डाल दिया हो …सुरेश लगभग चीखते हुए कठोर-कर्कश आवाज़ में बच्चों को लगभग डाँट रहा था…

बच्चे अचानक सन्नाटे में आ गए, जैसे उनके हाथों कोई अक्षम्य अपराध हो गया हो | वे भयभीत आँखों से सुरेश की ओर देखने लगे | सुनीता भी डर गई, उसे तत्काल यही लगा, कि उससे अनजाने में कोई अपराध हो गया, कोई बड़ा अपराध …| बच्चे और सुनीता जैसे सकते में थे | उनमें से किसी को समझ में नहीं आया था, कि उन्होंने क्या गलती की, सबसे अधिक सुनीता असमंजस में थी…

— “…क्या तुमलोग नहीं जानते, कि सफ़ाईकर्मी या किसान बनना ही सबसे अधिक ज़रूरी काम है? …तो तुममें से किसी ने भी क्यों नहीं कहा, कि वो सफ़ाईकर्मी या किसान बनना चाहता है…?” सुरेश उसी तरह गरज रहा था, बच्चों की आँखों में थोड़ी देर पहले ही दिखने वाली स्वप्निल चमक गायब थी, उसकी जगह अब भय की रेखाएँ खिंच गयीं थीं 

— “…एक बात तुमलोगों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए, कि पढ़े-लिखे लोग ही सबसे ज्यादा अपराध करते हैं ! हमारे समाज को पढ़े-लिखे लोगों की कोई ज़रूरत नहीं है | जितने भी बड़े-बड़े अपराध हैं, वो सब ये पढ़े-लिखे लोग ही करते है …|” सुरेश ने निःसंकोच निर्णय-सा सुनाया  

— “…अब एक बात तुमलोग बताओ मुझे, डॉक्टर की ज़रूरत हमें कब पड़ती है?” स्थिति को भाँपकर और इस डर से, कि कहीं उसकी तेज़ और कठोर आवाज़ सुनकर बगल के कमरे में बैठी बच्चों की अध्यापिकाएँ वहाँ न आ जायँ और उसके व्यवहार पर ऐतराज़ न करने लगें, सुरेश ने अपनी आवाज़ को तनिक मुलायम बनाने की कोशिश की, किन्तु उसकी वाणी की तिक्तता और कठोरता यथावत् कायम रही, केवल स्वर तनिक धीमा हुआ   

— “…………………………………..!!!” सहमे हुए बच्चे ख़ामोश थे

— “…..जब हम बीमार पड़ते हैं…|…और हम बीमार क्यों पड़ते हैं…?” सुरेश के मन में अवश्य कोई कुटिलता थी, जिसे सुनीता तत्काल नहीं समझ पाई  

— “…………!!!” पर डरे हुए बच्चे चुप रहे

— “…..गंदगी के कारण… ! …बोलो, क्या मैं सही नहीं कह रहा हूँ …बोलो तुमलोग…?” अपने सवाल का स्वयं ही जवाब देकर सुरेश संतुष्ट हुआ, उसे विश्वास हो गया, कि वह तार्किक बात कर रहा है

— “….जी…!!!” डरे हुए बच्चे समर्थन करने को बाध्य हुए  

— “…..और यदि गंदगी न रहे, तो कोई बीमार पड़ेगा…..?…बताओ…?”

— “……नहीं ….!” बेबस बच्चे समवेत स्वर में समर्थन करने लगे  

— “…..तो गंदगी साफ़ कौन करेगा …..?”

— “……………..” बच्चे निरुत्तर थे

— “….सफ़ाईकर्मी ….! ठीक कहा न मैंने…?” सवाल और जवाब का यह खेल सुरेश पूरी सफलतापूर्वक खेल रहा था, जिसमें सवाल उसका था और जवाब भी उसी के तय किए हुए थे

— “……..जी…….!” बच्चे केवल समर्थन करने को मजबूर थे

— “…तो ज़रूरत किसकी है ?…सफ़ाईकर्मी की…!” अब सुरेश के चेहरे पर कुटिल संतुष्टि का भाव साफ़-साफ़ देखा जा सकता था

— “…और जब बहुत सारे सफ़ाईकर्मी होंगे और वे सब अपना काम ईमानदारी से करेंगे, तो क्या कोई भी बीमार पड़ेगा …?…नहीं… !…और जब कोई बीमार ही नहीं होगा, तो क्या डॉक्टर की ज़रूरत पड़ेगी?…नहीं…! इसलिए हमें डॉक्टर की नहीं, सफ़ाईकर्मी की ज़रूरत है | हमारे प्रधानमंत्रीजी भी तो यही कहते हैं…! …है ना…?” बच्चों को इस प्रकार सपनों का नया पाठ पढ़ाया जाता देख सुनीता हैरान थी

— “…….जी……..!” और बच्चे बेबस

— “…..और…..इसके अलावा, स्वस्थ रहने के लिए अच्छा खाना खाने की ज़रूरत होती है…| बोलो, होती है या नहीं…?

— “…..जी…..!”

— “….और खाना कहाँ से आता है….? …खेत से…..| खेत में अनाज कौन पैदा करता है…? …किसान ….| ….किसान न हो, तो क्या होगा…? …अनाज पैदा नहीं होगा…| …अनाज पैदा नहीं होगा, तो लोग भूख से बीमार पड़ेंगें…| …तो किसकी ज़रूरत है…? ….किसान की… जो अनाज पैदा कर सके…| क्यों…? …क्या सही नहीं कहा मैंने …?….” सुरेश माहिर खिलाड़ी की तरह खेल रहा था, सवाल और उनके जवाब दोनों ही उसके अपने थे, जिनका वह बड़ी चतुराई से प्रयोग कर रहा था  

— “………..जी……!” बच्चों का काम केवल उसका समर्थन करना था   

— “….और एक बात बताओ, जब हमें भरपेट खाने को मिलेगा और चारों तरफ़ अच्छी साफ़-सफ़ाई रहेगी, तो आदमी स्वस्थ रहेगा ही …| …और जब सब स्वस्थ रहेंगे, तो कोई भी व्यक्ति तीन-चार किलोमीटर तो क्या, तीस-चालीस किलोमीटर भी पैदल चल सकता है | …और पैदल चलना तो सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है ! बाबा रामदेव और दूसरे समझदार लोग भी तो यही कहते हैं… ! …तो पौड़ी से श्रीनगर पुल बनाने की कोई ज़रूरत नहीं है |” सुरेश ने जैसे अपना फ़ैसला सुनाया, जैसे उसे भय हो, कि कहीं वह बच्चा कल ही पौड़ी से श्रीनगर तक पुल बना न दे…! उसकी बात में हाँ में हाँ मिलाने के अलावा कोई और विकल्प बच्चों के पास था ही नहीं, उन्हें मानना ही था   

— “………जी……..!” बच्चों ने उसकी हाँ में हाँ मिलाया  

— “…और तुमलोग तो देखते ही हो, टीवी में, कि जितने बड़े-बड़े क्राइम हैं, जितने बड़े-बड़े घोटाले हैं, वो सब पढ़े-लिखे लोग ही करते हैं, इसलिए आदमी यदि नहीं भी पढ़ेगा, तो भी कुछ नुकसान नहीं होगा | इसलिए टीचर या प्रोफेसर की भी हमारे समाज को ख़ास ज़रूरत नहीं है | …टीचर या प्रोफेसर बनने से ज्यादा ज़रूरी है, अच्छा इंसान बनना | और यदि सब लोग अच्छे इंसान बन जाएँगे, तो पुलिस और फ़ौज की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी, इसलिए तुम्हारा सपना पुलिस या फ़ौजी अथवा कलक्टर बनने का भी नहीं होना चाहिए |…” सुरेश ने परोक्षतः सुनीता पर कटाक्ष किया और अपनी बात का असर देखने के लिए उसकी ओर चोर नज़र से देखा | उसके तर्कों ने सुनीता को हैरान कर दिया था, सुनीता को अब उसकी नीयत पर संदेह हो चला था   

— “……….जी……!” बच्चों का बेबस समवेत स्वर

— “…इसलिए तुम सबको केवल किसान या सफ़ाईकर्मी बनने का ही सपना देखना चाहिए …| वही तुम सबके लिए सबसे सही है ….|” सुरेश का मंतव्य अब स्पष्ट होने लगा था

— “……..जी……..!” बच्चों का सामूहिक स्वर

विद्यालय में यह कार्यक्रम लगभग डेढ़-दो घंटे तक चला | सुरेश के चेहरे पर अपनी इस जीत से एक कुटिल मुस्कान और चेहरे पर क्रूर चमक साफ़-साफ़ देखि जा सकती थी | उसके बाद सुरेश और सुनीता वहाँ से निकलकर और अध्यापिकाओं से अनुमति लेकर अपने ऑफिस की ओर चले | सुनीता के मन में गहरी उथल-पुथल मची हुई थी, वह समझ नहीं पा रही थी, कि सुरेश ने ऐसा क्यों किया | यदि सभी बच्चों को सपने देखने का हक है, तो इन बच्चों को सुरेश ने क्यों रोका? उक्त संस्था बच्चों की शिक्षा के लिए काम रही है, तो फिर इस व्यवहार का मतलब क्या था? क्या संस्था के बाकी लोग भी ऐसे ही थे?…दोहरे व्यवहार वाले…प्रकट में कुछ और…असलियत में कुछ और…

— “सर, आपने बच्चों को सपने देखने से क्यों रोका …?” सुनीता ने अपने मन की उलझन सुरेश के सामने रख दी

— “रोका कहाँ मैंने…? …सपने देखने को तो कहा ही मैंने… ! सपने देखें, खूब देखें, …लेकिन सफ़ाईकर्मी या किसान बनने के सपने देखें…!” सुरेश ने कुटिलता से कहा

— “…लेकिन क्यों उनको केवल सफ़ाईकर्मी या किसान बनने का ही सपना देखना चाहिए, कोई और सपना नहीं ….? सुनीता के स्वर में आरोप था, जिसे सुरेश ने बखूबी भाँप लिया, लेकिन वह संस्था में अपनी ताक़त, पहुँच और संस्था में उच्च-पदों पर आसीन अपने साथियों के खुले समर्थन के प्रति अति-आश्वस्त था, इसलिए उसने सुनीता के आरोपों की कोई परवाह नहीं की | समाज में उसके वर्ग को जो निर्बाध अधिकार एवं श्रेष्ठ-स्थान परंपरागत रूप से हासिल रहे हैं, उन्होंने उसमें स्वाभाविक रूप से एक निर्लज्जता और बेपरवाही भर दी थी…    

— “…क्योंकि यही काम उनके समाज के लोग करते हैं…और सफ़ाई करना कोई बुरी बात थोड़े ना है, सुनीता? …कोई भी काम बड़ा या छोटा नहीं होता, सब काम बराबर होते हैं |” आरोप से विचलित हुए बिना ही, सुरेश ने बड़ी ही ढिठाई और कुटिलता से जवाब दिया, हालाँकि उसे एक लड़की को सफ़ाई देखा नागँवार गुजर रहा था   

— “यदि सभी काम बराबर होते हैं, तो वे बच्चे क्यों सफ़ाईकर्मी और किसान बनने के अलावा कोई दूसरा सपना नहीं देख सकते?….क्या सामान्य वर्गों के बच्चों को भी आप सफ़ाईकर्मी और किसान बनने की नसीहत देंगे?” सुनीता के स्वर में आक्रोश आने लगा था | अपनी उम्मीद के विपरीत उसे संस्था का यह एक नया चेहरा देखने को मिल रहा था, पता नहीं यह संस्था का विचार था, या केवल सुरेश की ही सोच ऐसी थी? 

— “अरे सुनीता, तुम समझीं नहीं….! मैं ये कह रहा हूँ, कि ये बच्चे ग़रीब हैं, ऊँची पढ़ाई और ऊँचे सपने के लिए काफ़ी पैसा लगता है, इनके ग़रीब माँ-बाप कहाँ से उतने पैसे लाएँगे, तुम ज़रा ठंढे दिमाग़ से सोचो !” सुनीता के आक्रोश को महसूस करते हुए सुरेश ने अपना पैंतरा बदला

— “…और हमारे समाज के लोगों ने कभी सफ़ाई का काम नहीं किया, तो हमारे बच्चे क्यों देखेंगे सफ़ाईकर्मी बनने का सपना…? …ये काम उन लोगों का है, हमारा नहीं…समझी…?” सुरेश के जातीय दुराग्रह अब पूरी तरह उजागर हो गए थे

— “ये तो इनके माता-पिता को सोचना है, सुरेश जी ! आपको या किसी और को इसकी चिंता करने की बजाय हमें इन बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान देना चाहिए, वही हमारा काम है, बच्चों को सपने दिखाना और उसके लिए मेहनत करने को प्रेरित करना हमारा काम है |” सुनीता को दुख हो रहा था, क्या वो संस्था के बाहरी चमकदार आवरण की चकाचौंध में उलझकर ग़लत जगह आ गई थी? क्या उसने संस्था का सही आकलन नहीं किया…? एक महिला द्वारा दी गई इस नसीहत से सुरेश के भीतर के पुरुष का अभिमान आहत हो चुका था, उसकी वाणी अब कठोर हो गई और भाषा  हमलावर…   

— “तुम्हें इतना अधिक सोचने की ज़रूरत नहीं है | तुमने अभी काम नहीं किया समाज में, तुम शायद समाज को ठीक से नहीं समझती हो, तुम्हें अभी बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है ! तुम्हारे पास केवल कागज़ी-डिग्रियाँ ही हैं, समाज की समझ नहीं है तुम्हारे पास | लेकिन अब तुम मेरे पास आ गई हो, तो मैं तुम्हें धीरे-धीरे सब सिखा दूँगा | …तुमने अभी तक केवल यूनिवर्सिटी में काम किया है | मैं जानता हूँ, कि वहाँ कितना और क्या काम होता है | असली काम तुम्हें मैं सिखाऊँगा, अभी तुम केवल चुपचाप देखा करो ! …यदि संस्था में तुम्हें रहना है, तो ज्यादा बोलने या टाँग अड़ाने की ज़रूरत नहीं है… जैसा मैं कहूँगा, वैसा ही करना होगा तुम्हें…! …समझीं…?” सुरेश के आहत अभिमान ने सुनीता को उसकी ‘हैसियत’ समझते हुए और संस्था के भीतर अपनी ताक़त का एहसास कराते हुए अपना फ़ैसला सुना दिया था ….सुनीता अब इस संस्था में आने को लेकर असमंजस में पड़ चुकी थी….  

‘एजुकेशन फॉर सस्टेनेबल एंड इक्वेटेबल सोसाइटी’ का नारा बुलंद करनेवाली यह संस्था क्या इसी तरह की ‘सस्टेनेबल सोसाइटी’ बनाने को प्रयासरत है? क्या कोई समाज ऐसे ही ‘सस्टेन’ करेगा, जिसमें वंचित तबका अपने विरुद्ध हो रहे अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध सतत खमोशी की चादर ओढ़ने को इस तरीक़े से भी मजबूर किया जाता रहेगा और सुरेश जैसे लोग ‘समाज-सेवक’, ‘समाज-सुधारक’ का चमकदार मुखौटा पहने हुए उन बेबस इंसानों के कल्याण के नाम पर अपनी मोटी कमाई करते हुए शान से घूमते रहेंगे, छलपूर्वक अर्जित सम्मान पाते रहेंगे…? …

सुनीता को संस्था और उसके कारिंदों एवं प्रतिनिधियों का वास्तविक चेहरा देखना अभी बाक़ी था… …

डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

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2 thoughts on “औक़ात वाले सपने

  1. सुरेश जैसे लोग ही मासूम बजों के सपनों पर कुठाराघात करने का दम रखते है।उन्मुक्त गगन जैसी विचारधारा में विचरण करने बच्चों को समझना इतना आसान नही है।अपने झूठे दम्भ को बचाने की एवज में सुरेश न जाने कितने बच्चों के मन मष्तिष्क को छलनी कर गया शायद ये उसको आभास भी नही और ना ही इस जैसे मानसिकता रखने वाले व्यक्ति इस विषय को गंभीरता से ले सकते है।इनकी डर से कभी भी अपने निःस्वार्थ कार्यों को कभी भी आहत मत होने देना।बच्चों को समझना हर दिखावटी चेहरे के सामर्थ्य में नहीं है, इस बात को मुझसे बेहतर कौन समझ सकता।मैने भी उनको सपने दिखाने की कोशिश की है जिनको समाज सपने देखने का अधिकार ही नही देता।तुम एक दिन ऐसे पद पर पहुचने की कोशिश करो जहाँ से तुम सुरेश जैसे दंभी लोगों को जरूर सिखा पावों कि सपने देखना जिन्दगी का अहम अंग है।उसमें कोई बड़ा या छोटा सपना वर्ग में नही बँटता है।में तुम्हारे उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हूं तुम मेरे इस सपने को जरूर पूरा करना।ढेर सारे आशीर्वाद के साथ अपने विचारों को विराम देती हूँ।

    1. बहुत बहुत धन्यवाद संगीता जी …बच्चों का सपने देखना बहुत जरुरी है …आपका काम सराहनीय है …

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