बतकही

बातें कही-अनकही…

  • “साहेब, साहेब, कुछ खाने को दे दो, बहुत भूख लगी है …मेरी बहन बहुत भूखी है …|” एक बेचारे-से दिखने वाले लगभग 7-8 वर्षीय बच्चे ने, सड़क किनारे खड़े ठेले पर छोले-भटूरे का आनंद लेते दंपत्ति की ओर देखकर दयनीय-याचक स्वर में कहा |
  • “भागो यहाँ से… इन भिखारियों ने तो जीना हराम कर रखा है, इनके मारे तो कोई सड़क पर कुछ खा भी नहीं सकता …जाओ यहाँ से, वर्ना खींच कर दो कान के नीचे लगा दूँगा…” पति ने आँखें तरेरते हुए और उठा हुआ हाथ दिखाते हुए बच्चे को धमकी दी
  • “मत मारो साहब, ये अभागे बच्चे हैं… | अभी तीन महीने पहले ही एक लड़का अपनी बाइक पर स्टंट करते हुए इनके माता-पिता को कुचल गया | वे बेचारे सड़क के किनारे सब्जी बेचते थे | दोनों की तुरंत ही मौत हो गई, अस्पताल ले जाने का मौक़ा भी नहीं मिला | तब से ये बच्चे अनाथ हो गए | इनका और कोई नहीं है, ये बेचारे तब से ऐसे ही भीख माँगकर जैसे-तैसे जी रहे हैं |” छोले-भटूरे बेचने वाले ने दयनीय होकर दंपत्ति से याचना की

लड़के ने ठिठुरती ठंढ में भी एक मैला-कुचैला फटा हुआ टीशर्ट और एक वैसी ही फटी-पुरानी घुटनों तक की निक्कर पहनी हुई थी | उसके साथ एक लगभग 3 साल की बच्ची थी, जिसने अपने भाई की ही तरह जगह-जगह से फटी हुई एक गन्दी-सी फ्रॉक पहनी थी | उस ठंढ में भी वे दोनों भाई-बहन बिना गरम कपड़ों के सड़क पर लोगों से, खाने के लिए कुछ मिलने की आशा में, भीख माँग रहे थे | वैसे भी जब पेट ख़ाली हो और भूख से आँतें ऐंठ रही हों तो उसके आगे ठंढ का पता नहीं चलता | आँखों में खाने के लिए कुछ मिलने की आशा लिए दंपत्ति को देख रही थी …  

उनकी याचक आँखें देखकर छोले-भटूरे वाले ने अपने बर्तनों में से कुछ छोले-भटूरे बच्चों के कटोरे में डाल दिए, जिसे बच्चे वहीँ किनारे बैठकर उतावली से खाने लगे | उनका उतावलापन उनकी भूख की कहानी अपने-आप ही बयाँ कर रहा था …

उस घटना में कुछ तो ऐसा था, जिसने मुझे उत्तराखंड की उस अध्यापिका की ओर बरबस ही मेरा ध्यान खींच ले गया | ऐसा नहीं है कि ऐसी घटनाएँ मैंने पहली बार देखी थी, या पहली बार मुझे उस अध्यापिका का ध्यान आया … अक्सर जब भी लोगों द्वारा असहाय और लाचार लोगों पर क्रोध करते या उनपर दया करते देखती हूँ, तो कई प्रकार के लोग बरबस ही दृष्टि के सामने से होकर गुजरने लगते हैं … चाहे वे दयनीय-बेबस लोग हों, या उनपर क्रोध करनेवाले, या उनपर दया करनेवाले… लेकिन इन्हीं के साथ उन लोगों पर दृष्टि रुक जाती है, जो क्रोध और दया से अलग कुछ और ही किस्म का व्यवहार करते हैं | चीन में एक कहावत है, कि किसी लाचार पर दया करके भोजन दे देने से वह हमेशा दूसरों पर निर्भर ही रहेगा, सबकी दया का पात्र बनता रहेगा, इसलिए अच्छा यह होगा, कि उसे भोजन की व्यवस्था करने का तरीका सिखा दो |

उक्त अध्यापिका का बार-बार ख्याल आने का यही कारण है, क्योंकि उन्होंने कुछ ऐसा ही किया था… क्रोध और दया से परे…कुछ अलग-सा…  

…संगीता उत्तराखंड स्थित श्रीनगर के एक सरकारी स्कूल में अध्यापिका हैं | एक बार बातचीत के सिलसिले में उन्होंने बताया था, कि जब उनका ट्रान्सफर पौड़ी जिले में स्थित श्रीनगर के इस स्कूल में हुआ था, तो उनको और उनके परिवार को कई समस्याओं के साथ-साथ एक अलग ही किस्म की समस्या का सामना करना पड़ता था, जिसने उनके जीवन का रुख ही बदल दिया | उस समस्या ने उनको एक मकसद दिया, जीवन को सार्थक बनाने का एक निश्चित उद्देश्य दिया….

वे दिनभर अपने विद्यालय में काम करतीं और दिन के तीसरे पहर, विद्यालय से घर आने के बाद खाना खाकर तनिक आराम करना चाहतीं, तो जैसे ही उनकी आँख लगती, कोई उनके घर की घंटी बजाकर भाग जाता, उनकी नींद उचट जाती और मन खिन्न हो जाता था | दरवाज़ा खोलकर देखने पर कोई नहीं मिलता था | उन्होंने अनुमान लगाया कि शायद गली में खेलने वाले कॉलोनी के बच्चे ही शरारत कर रहे हैं | इसके विषय में उन्होंने अपने आस-पड़ोस से पूछा, तो पता चला, कि उनकी ही तरह अन्य लोगों के दरवाज़े की भी कोई घंटी बजाकर भाग जाता है |

तब एक दिन उन्होंने ठान लिया कि उन शरारती बच्चों को वे पकड़ेंगी और उन्हें डाँट लगाएँगी | उन्होंने दो-तीन दिनों तक बच्चों के घंटी बजाने का समय नोट किया और फिर एक दिन अपने घर के भीतर दरवाज़े पर तैयार खड़ी हो गईं | चूँकि दरवाज़ा बंद था, इसलिए बच्चों को पता नहीं चला कि अध्यापिका खड़ी उन्हीं का इंतज़ार कर रही हैं | जैसे ही घंटी बजी, उन्होंने तुरंत दरवाज़ा खोला, तो देखा सामने चार-पाँच बच्चे हाथों में थैले और पॉलिथीन बैग थामे खड़े थे | वह बच्चों की ओर बढीं, लेकिन बच्चे अध्यापिका की मुखाकृति और उनको अपनी ओर आता देखकर समझ गए कि अध्यापिका अब उनको छोड़नेवाली नहीं है | वे दौड़कर भागे, अपनी बस्ती की ओर | संगीता ने बच्चों के फटे-पुराने,मैले-कुचैले कपड़ों और बच्चों की स्थिति देखकर अनुमान लगा लिया कि बच्चे उनकी कॉलोनी के नहीं बल्कि किसी झुग्गी के हैं |

बच्चे जब भागे, तब वे भी उनके पीछे-पीछे लपकीं, क्योंकि वे जानना चाहती थीं, कि बच्चे क्यों उनके घर की और पड़ोसियों के घरों की घंटी रोज़ बजाकर भाग जाते हैं | संगीता जानती थी, कि बच्चे अब भागकर अपने घर जाएँगें, इसलिए वह भी उनके पीछे-पीछे दौड़ी | उनके अनुमान के अनुसार बच्चे सचमुच में अपनी बस्ती की ओर ही गए और सीधे अपने घरों पर जाकर रुके | संगीता हैरान… वह थोड़ी डरीं, सामने दर्जनों छोटे-बड़े बच्चे खड़े थे, उन्हीं बच्चों जैसे मैले-कुचैले, फटे-पुराने कपड़े पहने, साथ में उन बच्चों के माँ-बाप भी थे | उन्हें लगा, कि शायद अब उनके माँ-बाप उनसे झगड़ा करेंगे | लेकिन चूँकि रोज़-रोज़ घंटी बजाये जाने और आराम में ख़लल पड़ने से उनके परिवार जन परेशान थे, इसलिए उन्होंने मन ही मन निश्चय किया, कि वह डरेगी नहीं, बल्कि बच्चों की हरकतों के बारे में उनके माँ-बाप को बताएँगी और उनसे बच्चों को समझाने को कहेंगी |

लेकिन चूँकि संगीता एक अध्यापिका हैं, इसलिए वह बच्चों के मनोविज्ञान से अच्छी तरह वाकिफ़ थीं, इसलिए उन्होंने निश्चय किया की वह सबसे पहले बच्चों से बात करेगीं, उनके माँ-बाप के सामने ही

  • “तुमलोग क्यों रोज़-रोज़ मेरे दरवाज़े की घंटी बजाकर भाग जाते हो…? तुम्हें मालूम है, मैं दिनभर की थकी थोड़ा-सा आराम करना चाहती हूँ, लेकिन तुमलोगों की इस हरकत से मैं रोज़ परेशान हो जाती हूँ |…बताओ, तुमलोग क्यों रोज़-रोज़ लोगों को परेशान करते हो…?”
  • “…………” थोड़ी देर तक कोई कुछ नहीं बोला, न बच्चे, न उनके माँ-बाप 
  • “बताओ, …क्यों करते हो ऐसा…?” संगीता ने कई बार पूछा
  • “….मैडम, अब ऐसा नहीं करेंगे हमारे बच्चे…” बच्चों के अभिभावकों में से एक ने कहा
  • “लेकिन बच्चे ऐसा करते ही क्यों हैं …? क्या बच्चे पढ़ने नहीं जाते …?” संगीता ने पूछा
  • “नहीं मैडम, हमारे बच्चे स्कूल नहीं जाते…” अभिभावकों ने एकदम सामान्य ढंग से कहा
  • “पहले तो आपलोग मुझे ये बताओ, कि ये बच्चे रोज़-रोज़ हमारे दरवाज़े की घंटी बजाकर भागते क्यों हैं ?” संगीता ने थोड़ी सख्ती से पूछा
  • “…मैडम, हम खाने के लिए आपके दरवाज़े की घंटी बजाते हैं…|” 10-12 साल के एक बच्चे ने थोड़ा सहमते हुए कहा
  • “…दोपहर में जब सबलोग खाना खा चुके होते हैं, तभी हम उनके घर जाते हैं, बचा हुआ खाना लेने के लिए…” उसी बच्चे ने कहा
  • “…हम हर घर के लोगों से पूछते हैं, कि उनके घर में बचा हुआ खाना है क्या …” दूसरे बच्चे ने कहा
  • “…उनमें से जिनके पास जो भी खाना बच जाता है, उसे वे लोग हमें दे देते हैं…हम उसी के लिए लोगों के घरों की घंटी बजाते हैं…” घंटी बजानेवाले तीसरे बच्चे का कहना था
  •  “…उसमें से थोड़ा-सा हम खुद खा लेते हैं और बाक़ी हम अपने साथ अपने घर ले आते हैं, अपने माँ-बाप और भाई-बहनों के लिए…” घंटी बजाकर भागनेवाले बच्चों में से चौथे बच्चे ने कहा
  • “…आपके घर की घंटी भी हमने इसीलिए बजाई, कि आप पूछोगी, तब हम आपसे बचा हुआ खाना मांग लेंगे …”  अन्य बच्चे का जवाब था      
  • “यदि खाने के लिए तुमलोग घंटी बजाते थे, तो भागे क्यों…? मैंने तो तुमलोगों को आवाज़ दी थी, तब रुके क्यों नहीं…?” बच्चों की बातों से स्तब्ध और दुःखी शिक्षिका ने पूछा
  • “…हम डर गए थे, हमें लगा आप हमें मारोगी या पुलिस बुलाओगी और हमें पुलिस में दे दोगी …|” उन्हीं बच्चों में से एक ने बताया
  • “लेकिन तुम्हें ऐसा क्यों लगा, कि मैं तुमलोगों को मारूँगी …?” संगीता को बहुत बुरा लग रहा था, बच्चों की स्थिति पर 
  • “…कई लोग हमें मारते हैं, या पुलिस बुलाते हैं, जब हम उनके घर की घंटी बजाते हैं …” कहनेवाले बच्चे के चेहरे पर एक अलग ही भाव था, जो शायद कह रहा था, कि उसे मार खाना या किसी की डांट खाना अच्छा नहीं लगता, लेकिन अपनी मजबूरी के कारण उसे यह भी सहना पड़ता है
  • “…तुमलोग दूसरों के घरों में बचा हुआ खाना माँगने क्यों जाते हैं…? क्या तुम्हारे घरों में खाना नहीं बनता …? बच्चे क्यों दूसरों के घरों से खाना इकठ्ठा करते हैं, इस बात को संगीता समझ नहीं पाईं
  • “…………”
  • “…आपलोग अपने बच्चों को क्यों भेजते हैं, दूसरों के घर खाना माँगने के लिए…? बच्चे इसके लिए दूसरों की डांट सुनते हैं, मार खाते हैं…आपलोगों को अच्छा लगता है क्या, अपने बच्चों का इस तरह मार खाना …?”
  • “…… हम लोग भिखमंगे हैं, मैडम, हम अक्सर भीख माँगकर ही अपना पेट भरते हैं…| …हमारे बाप-दादे भी भीख माँगते थे …” एक अभिभावक ने निःसंकोच वह कारण बताया
  •  “लेकिन आपलोग भीख मांगते ही क्यों हैं ? क्या आपलोगों को भीख मांगना अच्छा लगता है…?
  • “हमारे बाप-दादे भी भीख मांगते थे, हम भी वही करते हैं, तो हमें क्यों बुरा लगेगा …?
  • “लेकिन आप अपने बच्चों के भविष्य के बारे में तो सोचिए. क्या वे भी इसी तरह भीख मांगेंगे जीवन भर …?
  • “हाँ, मैडम जी, … और क्या करें हम …?
  • “आप इन्हें स्कूल क्यों नहीं भेजते …?”
  • “स्कूल जाकर क्या करेंगें, पढ़ने के बाद भी इनको भीख ही मांगना है …”

संगीता समझ चुकी थीं, कि इन बच्चों की और इनके परिवार की सबसे बड़ी समस्या भोजन की समस्या है | उन्होंने मन-ही-मन निश्चय किया, कि वह उन सभी बच्चों को शिक्षा के दरवाजे तक ले जायेगी, क्योंकि वहीँ से सभी रास्ते खुलते हैं, परिश्रम का महत्त्व समझ में आता है, बेहतर जीवन की उम्मीद बँधती है, आँखों में सपने बसने शुरू होते हैं, व्यक्तित्व में स्वाभिमान पैदा होता है | लेकिन उससे भी पहले उनके भूख की समस्या को हल करना जरुरी था | भूख के लिए जद्दोजहद करनेवाले बच्चों के भोजन की व्यवस्था किए बिना शिक्षा की बात करना उतना ही व्यर्थ था, जितना कि वस्त्रों के अभाव में जीने वाले लोगों से वस्त्रों के महत्त्व और सभ्यता, शालीनता, औदात्य की बात करना |

सगीता, अध्यापिका होने के नाते और अपने अब तक के जीवन के अनुभवों से यह समझ चुकी थी, कि भूख वह अस्त्र है, जिससे किसी भी व्यक्ति, किसी भी समाज को वश में किया जा सकता है, उससे मनमाना काम कराया जा सकता है, उसे दयनीय से दयनीय हालत में ले जाकर उनसे कुछ भी कराया जा सकता है, चोरी, हत्या, आगजनी, लूटपाट से लेकर उनका अपमान, तिरस्कार, प्रताड़ना… कुछ भी …| संगीता को उस दिन समझ में आया कि प्रेमचंद की कहानी ‘कफ़न’ में घीसू और माधव क्यों इतने निर्लज्ज और आत्म-सम्मान से रहित हैं, क्यों उनकी सभी मानवीय-संवेदनाएँ और भावनाएँ इस हद तक मर चुकी हैं, कि उन्हें अपने ही परिजनों की मौत उसी प्रकार से व्यथित नहीं करती, जैसे एक सामान्य व्यक्ति को करती हैं ?

अब उन्होंने तय किया, की वह सबसे पहले उनकी भूख की समस्या को हल करेंगीं | उन्होंने भीख माँगने के लिए जानेवाले उन सभी 15 बच्चों को अनौपचारिक रूप से गोद ले लिया | उसके बाद वह उन सभी बच्चों की तमाम ज़रूरतों को पूरी करने लगीं— भोजन से लेकर, कपडे, दवाइयाँ, धूमना-फिरना…सब कुछ | इसके लिए वह अपनी आय का एक अच्छा-खासा भाग ख़र्च करतीं | भूख के कारण दिन भर भागते बच्चों को अक्षरों की दुनिया तक ले जाने और उनका महत्त्व समझाने के लिए यह एक छोटा-सा उपाय था | बच्चों को अब अच्छा लगने लगा था | लेकिन उनके अभिभावकों को समझाना अभी बाकी था | इस दौरान संगीता ने बच्चों के माता-पिता से लगातार संवाद जारी रखा, हर रोज़ वह शाम को उनकी बस्ती में जातीं, माता-पिता से बात करती, उनके सुख-दुःख में उनके साथ खड़ी होतीं |

रोज़-रोज़ इस अनजानी अध्यापिका को अपने बीच पाकर धीरे-धीरे उन अभिभावकों के मन में संगीता के प्रति आत्मीयता और लगाव पनपने लगा | अब वे हर रोज़ उनका इंतज़ार करते, उनके आने पर बड़ी ही आत्मीयता से मिलते और बातें करते | संगीता को भी उनसे धीरे-धीरे लगाव होने लगा था | नतीजा यह हुआ, कि अब उनका विश्वास भी संगीता पर जमने लगा था | लेकिन बच्चों को किताबों की दुनिया तक ले जाने की राह इतनी आसान नहीं थी |

पीढ़ियों से भीख माँगते और उसी को अपनी नियति एवं भाग्य मानने वाले समाज को अपने बच्चों के लिए शिक्षा के महत्त्व को समझाना और उसके लिए तैयार करना इतना सरल-कार्य होता, तो आज दुनिया-भर में भीख माँगते समाज विद्यमान नहीं होते, भारत में यह एक विकराल समस्या के रूप में नहीं होती | संगीता की भी वास्तविक परीक्षा अभी बाक़ी थी | एक दिन संगीता ने उन अभिभावकों से बातचीत करने के दौरान उनके बच्चों को पढ़ाने की अनुमति मांगी  

  • “क्या आपलोग रोज़ थोड़ी देर के लिए अपने बच्चे मुझे दे सकते हैं, मैं उनको पढ़ाऊँगी…”
  • “अरे मैडम, क्या करोगी आप इनको पढ़ाकर …?…आगे भी तो इनको भीख ही माँगना है…पढ़-लिखकर क्या करेंगें ये बच्चे …?” बात पूरी होने से पहले ही एक बच्चे के पिता ने टोका
  • “जब आपलोग अपने ही बच्चों को रोज़ भीख माँगने के लिए भेज सकते हैं, तो क्या आपलोग एक घंटे के लिए मुझे ये बच्चे दे नहीं सकते, पढ़ने के लिए ….मैं ज्यादा देर के लिए नहीं माँग रही, बल्कि केवल एक घंटे के लिए ही माँग रही हूँ…”
  • “अरे मैडम, क्या करेंगीं, इन अभागे बच्चों को पढ़ाकर…रहने दो आप…”

संगीता जब भी उनसे बात करती, उन्हें इसी प्रकार के उत्तर मिलते और वे दुःखी और निराश हो जातीं, लेकिन तब भी वह हिम्मत नहीं हारतीं | वह लगातार कोशिशें करती रही उनका विश्वास जीतने की, उन्हें समझाने की, बच्चों के बारे में सोचने की | वह समझ चुकी थीं, कि बिना इनका विश्वास पूरी तरह हासिल किए इस सन्दर्भ में वह आगे नहीं बढ़ सकती | वह जन चुकी थीं, कि अभिभावकों को जब तक यह विश्वास नहीं दिलाएँगी, कि वह उनके हित के बारे में सच्चे मन से सोचती हैं, तब तक उन्हें बच्चों को पढ़ाने के लिए तैयार नहीं किया जा सकता |

अब वह पहले से अधिक समर्पित भाव से अपनी कोशिशों में लग गईं | उन लोगों के दुःखों, तकलीफ़ों और परेशानियों में उनके साथ हमेशा खड़ी रहने लगीं | संवाद तो निरंतर जारी रहा, जिसमें वह उनको पढ़ाई का महत्व समझातीं, बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए प्रोत्साहित करने और उसके लिए सपने दिखाने की कोशिशें करती रहतीं | अंततः उन लोगों का विश्वास जीतने में वह कामयाब हो गईं

  • “प्लीज़, रोज़ सिर्फ़ एक घंटे के लिए अपने बच्चे मुझे दे दीजिए, …प्लीज़ …”
  • “…………….”
  • “मेरे पढ़ाने से यदि आपको कोई फ़ायदा न दिखे, तो बेशक आप अपने बच्चे वापस ले लेना…मैं कुछ नहीं कहुँगी…”
  • “…………….” सब किंकर्तव्यविमूढ़ थे, उनसे कुछ कहते नहीं बन रहा था

उस दिन इस जुनूनी अध्यापिका के चले जाने के बाद भी उन सबके मन में गहरी उथल-पुथल मची हुई थी, किसी को रात-भर नींद नहीं आई थी | अगले दिन शाम को अध्यापिका आने वाली थी, उनका उत्तर जानने के लिए | दिन में बच्चों को भीख माँगने के लिए भेजने के बाद सभी अभिभावक इकट्ठे हुए | सभी के चेहरे उतरे हुए थे, आज बच्चों को भीख माँगने के लिए भेजने के समय भी शायद उनके भीतर गहरी उथल-पुथल मची हुई थी, उनकी आँखे साफ़-साफ़ उनके दिल का हाल बयाँ कर रही थी…| सब इकट्ठे तो हो गए थे, लेकिन उन सबकी जबान जैसे तालू से चिपक गई थी, कोई कुछ बोल नहीं पा रहा था, सब नज़रें झुकाए शायद एक-दूसरे से ही नहीं, अपने-आप से भी नज़रें चुरा रहे थे…  

  • “हम अपने बच्चों के माँ-बाप होकर उनके भविष्य के लिए इतने चिंतित नहीं हैं, जितनी ये मैडम पराई होकर चिंतित हैं …” एक ने हिम्मत की
  • “भाई लोगों, हम वास्तव में बहुत बुरे माँ-बाप हैं….” दूसरे का कहना था
  • “हमसे अच्छी तो वह मैडम हैं, जो हमारे बच्चों के हाथों में कटोरे की जगह किताबें थमाना चाहती हैं…”पहले अभिभावक ने बात आगे बढाई
  • “वे हमसे माँग भी रही हैं, तो क्या…हमारे बच्चों के हाथ में किताबें…? क्या हम उनको ये नहीं दे सकते….?” भीख माँगने बाले बच्चों में से एक के प्रौढ़ पिता ने कहा 
  • “भाई, हम उनको क्या देंगे, वे ही हमें देना चाहती है, …लेकिन हम लेना नहीं चाहते …वास्तव में हम बदनसीब ही नहीं, हत्यारे भी हैं…अपने बच्चों के हत्यारे…उनके भविष्य के हत्यारे….” एक बुजुर्ग ने उस प्रौढ़ पिता की बात को सुधारा
  • “हमें मैडम का एहसान मानना चाहिए, कि वे हमारे बच्चों को पढ़ाना चाहती हैं, उनके बेहतर भविष्य के बारे में सोचना चाहती हैं…” एक अन्य प्रौढ़-से पिता ने कहा
  • “सच कहते हो भाई, सच में हम अच्छे माँ-बाप नहीं हैं…लेकिन अब हमें मैडम का साथ देना चाहिए…”
  • “किसी ने भी हमारे बच्चों के बारे में, हमारे अच्छे भविष्य के बारे में नहीं सोचा, न किसी संस्था ने, न सरकार ने, न देश ने, न समाज ने…इस मैडम ने हमारे बारे में सोचा …हमें उनके साथ चलना ही होगा…उनका साथ देना ही होगा…!” किसी बूढ़े का आर्द्र स्वर था
  • “हमारे बच्चे भी पढेंगे…” कहनेवाले युवक के चेहरे पर अब एक नई चमक थी, और अपनी मैडम के लिए मन में आदर, जो उसके ह्रदय की तस्वीर उसके चेहरे पर अंकित कर रहा था

अब वे सभी शाम का इंतज़ार करने लगे, अपना निर्णय जो सुनाना था, जो उनकी प्यारी मैडम, उनके दुःख-सुख की साथी मैडम, उनके बच्चों की सबसे बड़ी और सच्ची शुभचिंतक मैडम को ख़ुश करने वाला था | अब ये चंद घंटे उनसे काटे नहीं कट रहे थे | समय भी अजीब होता है, जब बहुत दुःख हो तब भी वह थम जाता है, और जब किसी आत्मीय प्रियजन का बेसब्री से इंतज़ार हो, तब भी वह थम जाता है, पता नहीं क्या आनंद आता है, उसको…?

खैर, किसी तरह उत्साह और ख़ुशी में शाम तक का समय उन्होंने काटा | और जब शाम को अध्यापिका आईं, तो जैसे सभी अभिभावक एक साथ अपनी ख़ुशी जाहिर करना चाहते थे, एक साथ अपने ह्रदय की अनुभूतियों को व्यक्त करना चाहते थे, एक साथ ही उस निर्णय को सुनाने को आतुर थे, जो सुनने के लिए वह अध्यापिका पिछले डेढ़ सालों से मिन्नतें कर रही थीं |  

अब संगीता उन सभी 15 बच्चों की अध्यापिका बनकर उनको जी-जान से पढ़ाने लगी | इसके लिए उन्होंने दो सहायकों को थोड़े-से वेतन पर अपनी मदद के लिए रखा | बच्चों के साथ उन्होंने अगले एक साल तक काम किया, अक्षर-ज्ञान से लेकर शुरूआती गणित, चित्रकला, क्राफ्ट, घूमना-फिरना, प्रदर्शनी में अपने स्टॉल लगाकर अपनी बनाई कलाकृतियाँ बेचना …. अपनी इस शिक्षिका की ऊँगली थाम बच्चों ने कई नए संसार में क़दम रखे और आँखे फाड़-फाड़कर उस लुभावनी दुनिया को देखा, जिस तक पहुँचने का रास्ता शिक्षा से होकर जाता था |

संगीता ने अपनी पहली मंजिल पार कर ली थी, और अपने हाथ में भीख का कटोरा थामने वाले एवं रोज़-रोज़ लोगों की गालियाँ और मार खाने वाले उन 15 बच्चों के हाथों में, उस कटोरे की जगह किताबें थमाकर वह अब उनके साथ विद्यालय के दरवाज़े पर खड़ी थीं |

विद्यालय ने बाहें फैलाई और ह्रदय खोलकर उन बच्चों से कहा—

  • “आओ बच्चो, मैं तो कब से तुम्हारी राह देख रहा था …| …मेरे पास बैठो, किताबें तुमसे बातें करना चाहती हैं, उनसे दोस्ती करो, वे सदैव तुम्हारे साथ रहेंगीं… मेरे आँगन में खेलो, मैंने तुम्हारे मन को आनंद से भर दूंगा…. मैं तुम्हें सुन्दर सपनों के संसार में ले जाऊँगा, उन सपनों को पूरा करने के लिए तुम्हें शक्ति दूंगा… हम बहुत दूर तक आसमान में साथ-साथ उड़ेंगे…. उसके लिए मैं तुम्हें पंख भी दूंगा…!!!”     

और उन सभी बच्चों का दाख़िला नगरपालिका के विद्यालयों में हो गया … अब उन बच्चों के हाथों में भीख के कटोरे की जगह किताबें थी, और मन में दूसरों की मार एवं डांट के डर की जगह भविष्य के सुन्दर सपने थे…..

  • डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

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4 thoughts on “कटोरे की दुनिया से अक्षरों की दुनिया की ओर…

  1. कटोरे की दुनिया से अक्षरों की दुनिया की ओर …कहानी रोचक होने के साथ एक उत्कृष्ट प्रेरणा स्रोत भी है।

  2. कटोरे से अक्षरों की दुनिया की ओर कहानी रोचक होने के साथ एक उत्कृष्ट प्रेरणा स्रोत भी है।

  3. शानदार! संगीता जी को मैं जानता हूँ। वे समर्पित शिक्षिका हैं।

  4. जीवन्त घटना को अपने शब्दों में समाज के सम्मुख रखकर सभी के लिए आपने एक प्रेरणा दी है।इस कदम को अगर हर व्यक्ति उठाये तो शायद ही कोई बच्चा निरक्षरता रहे।आपकी लेखनी के हर लेख समाज को प्रेरणा देने योग्य होते है।आपकी इस अनवरत चलती लेखनी के हम हमेशा गवाह बनना चाहते है।बहती रहो गंगा के समान निःश्वार्थ।

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