बतकही

बातें कही-अनकही…

आज पायल आई थी, अचानक बड़े दिनों बाद, मुझसे मिलने… लेकिन वह बहुत हैरान-परेशान और दुःखी थी | कारण था, अख़बार में छपी एक ख़बर, जिसमें यह सूचना थी, कि सऊदी अरब में एक बहुत धनी व्यक्ति ने अपनी सगी बहन को उससे विवाह करने के लिए बाध्य किया था | लेकिन उसकी बहन उसका यह कहकर विरोध कर रही थी, कि वह उस आदमी की सगी बहन है, इसलिए वह उससे विवाह नहीं कर सकती | लेकिन पुरुष ने भी हार नहीं मानी और वहाँ की अदालत का दरवाज़ा खटखटाया | पुरुष के तर्कों को सुनने के बाद अदालत ने भी पुरुष के पक्ष में फ़ैसला सुनाया और लड़की को आदेश दिया, कि वह उससे विवाह करे | पायल इसी ‘दुःखद ख़बर’ से बेहद हैरान और परेशान थी |

मैंने उसे बताया, कि दुनिया-भर में विवाह को लेकर अनेक तरह की परम्पराएँ हैं, इसलिए उसे इतना अधिक दुःखी होने की ज़रूरत नहीं है | लेकिन पायल का बस एक ही तर्क था, कि भाई-बहन में शादी ग़लत है | तब मैंने उसे यह समझाने की कोशिश की, कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कई तरह के रिश्तों में विवाह-सम्बन्ध होते हैं | हमारे देश में भी तो दक्षिण भारत में मामा-भांजी में विवाह होते ही हैं ! प्राचीन समय में उत्तर भारत के कई समाजों में भी भाई-बहन में विवाह प्रचलित था…

लेकिन पायल का दुःख और हैरानी कम नहीं हुई | खैर, मैंने उसका ध्यान दूसरी तरफ खींचने की कोशिश की और इस चक्कर में हम काफ़ी देर तक इधर-उधर की गप्पें लगाते रहे | पायल अब काफ़ी नॉर्मल हो गई थी | उसे बाज़ार से घर के लिए कुछ ज़रूरी सामान खरीदना था, इसलिए थोड़ी देर बाद वह चली गई | …और मैं अपने कमरे में अकेली बैठी बहुत दूर …अतीत में कुछ देख रही थी… दिल और दिमाग़ उस पुरानी याद की ओर अपने-आप खिंचे चले गए, जहाँ मैं ही नहीं मेरी जैसी अनेक लड़कियाँ भी वैसे ही प्रश्नों से जूझ रही थीं, जिनसे आज पायल जूझ रही थी…

किसी समय मैं भी रिश्तों और उसकी ‘पवित्रता’ को लेकर इतनी ही संवेदनशील और सचेत हुआ करती थी, जिनती कि पायल आज भी है | लेकिन समय और शिक्षा के प्रभाव से, दुनिया के अनुभवों से धीरे-धीरे कई बातें जानने और समझने को मिलती गईं, और तब यह बात भी समझ में आती गई, कि किसी भी मामले में ‘पवित्रता’ की मांग और चाह, आदर्शात्मक होते हुए भी व्यावहारिक नहीं है और यह भी ज़रूरी नहीं, कि जैसा हम सोचते हैं, देखते हैं, सभी उसी तरह सोचें और देखें | इसलिए व्यक्ति यदि इस प्रकार की बातों से जब तक बाहर नहीं निकलता है, तब तक उसे मानसिक वेदना से गुजरना पड़ता है | इसलिए अब मुझे ऐसी ख़बरें, ऐसी बातें चौंकाती नहीं हैं ….हाँ, पल भर के लिए हतप्रभ और हैरान करती हई झकझोरती ज़रूर हैं…

कई साल पहले एक ऐसी ही घटना ने मुझे ही नहीं, कई लोगों को, ख़ासकर मेरी हम-उम्र लड़कियों को एक साथ झकझोर कर रख दिया था, हमारे मन में रचाए-बसाए गए नैतिक-मूल्यों की तब धज्जियाँ उड़ गई थी | मेरा ध्यान जब भी उस घटना की ओर गाहे-बगाहे चला जाता है, तब मानसिक वेदना गहरी हो जाती है | आज भी पायल की बातों ने मुझे अनायास ही कई साल पीछे उसी घटना की ओर घकेल दिया, जहाँ उस घटना की यादें अपनी पूरी कड़वाहट के साथ दफ्न थीं | तब मुझे भी रिश्तों की मर्यादा पर, मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं की पवित्रता पर बहुत विश्वास हुआ करता था और उनके प्रति सचेत आग्रह रहता था…   

–“तुम्हें पता है, कंचन? वो जो लीला है ना, …जो पहले मेरी कॉलोनी में रहती थी, …उसकी शादी होने वाली है…|” मेरी सहेली मीना ने जैसे कोई अनहोनी घटना सुनानी चाही थी | उसका आश्चर्य-भरा स्वर तो यही कह रहा था | मुझे लगा, शायद मीना को लीला की कम उम्र में शादी पर हैरानी हो रही है |

लेकिन मुझे इस तरह की ख़बरें उस समय भी चौंकाती नहीं थी, आठवीं कक्षा की छात्रा लीला की शादी तय हो जाना भी एक सामान्य बात ही लगी | लोग अभी भी अपनी लड़कियों की शादी कम उम्र में करने से गुरेज नहीं करते हैं | बोकारो शहर ‘इस्पात का नगर’ है, तो क्या हुआ? पिछले कुछ अरसों से यहाँ शिक्षा को काफ़ी महत्त्व दिया जाने लगा है, तो क्या हुआ ? लोग तो वही हैं, सदियों पुरानी परंपरा के वाहक ! समाज में शिक्षा के प्रति सचेतनता तो ज़रूर आई है, उसका महत्त्व भी बढ़ा है, लेकिन जागरूकता अभी भी यहाँ से कोसों दूर है | बड़े-बड़े शहर और महानगर भी अभी तक इससे अछूते नहीं हैं | अभी भी बहुत कम परिवार ऐसे हैं, जो लड़कियों की शिक्षा को, उनके नैसर्गिक अधिकारों को, बेहतर भविष्य को महत्त्व देते हैं…इसलिए मुझे मीना की बात से तनिक भी हैरानी नहीं हुई |  

–“तो इसमें हैरानी की क्या बात है? यहाँ तो लोग अपनी लड़कियों की शादी कम उम्र में कर ही देते हैं!” चूँकि उस समय मैं अपनी किताबों में उलझी हुई थी, क्योंकि मुझे कक्षा में प्रथम जो आना था, इसलिए पुस्तकों से सिर उठाए बिना ही मैंने एकदम सामान्य ढंग से कहा था

–“अरे नहीं, …ये बात नहीं है | तुम्हें पता है, उसकी शादी किससे हो रही है…?” मीना ने जैसे मुझे जगाकर कोई रहस्योद्घाटन करना चाहा | लेकिन मैं अपनी किताबों में सर झुकाए हुए थी, इसलिए ज्यादा ध्यान नहीं दिया उसकी बातों पर | वैसे भी इस बात से मुझे क्या लेना-देना, किसी से भी शादी हो ? लेकिन शायद मीना मेरा पीछा छोड़ने के मूड में नहीं थी  

–“अरे…! उसके पापा से…!!!” मीना ने बिना समय गवाँए ही ख़ुलासा किया

–“………………… !!!” मैं चौंक गयी | मुझे मीना पर इतना क्रोध आया, कि मन हुआ, किताबें उसके सिर पर दे मारूँ |   

–“ये क्या बेहूदगी है…? मज़ाक की भी हद होती है, मीनू…!!!” खुद को संयत करके मैंने गुस्से से उसको घूरा

–“अरे कंचन, मैं सच कह रही हूँ …!” मीना ने मुझे विश्वास दिलाना चाहा  

–“… जिनको वो ‘मम्मी-पापा’ कहती है, जानती हो, वो कौन हैं ? दरअसल वो लीला के दीदी-जीजाजी हैं, उसके मम्मी-पापा नहीं …!!!” उसने पूरे विश्वास से बताया, किन्तु मैं जैसे यकीन ही नहीं कर पाई…  

बात उन दिनों की है, जब मैं नौवीं कक्षा की विद्यार्थी थी | मेरी छोटी बहन मुझसे एक दर्जा नीचे यानी आठवीं में पढ़ती थी | उसकी कक्षा में एक लड़की थी- लीला | लीला एक साधारण शक्ल-सूरत वाली लड़की थी | वह दिन भर चहकती ही रहती थी | उसकी दर्ज़नों सहेलियाँ थीं, या यूँ कहा जाय, कि वह दिनभर दर्ज़नों लड़कियों से घिरी रहती थी | उसकी बातचीत का विषय अक्सर यही होता था, कि उसने अभी हाल में कौन-से नए फ़ैशन के कपड़े ख़रीदे, किस रंग की लिपस्टिक खरीदी, सैंडिल किस कंपनी की खरीदी, उसने आज जो नेलपेंट लगाई है, वह कितने में ख़रीदी… यानी आकर्षक कपड़े और सौन्दर्य-प्रसाधन और इनसे भरी हुई उसकी रंग-बिरंगी दुनिया | उसे सजने-सँवरने का बहुत शौक था | अपने-अपने मतलब से उसे घेरे रहने वाली लड़कियाँ उसकी यह सब बातें सुन-सुनकर ईर्ष्या से जल उठती थीं |

लेकिन लीला को पढ़ने का कोई शौक नहीं था | पढ़ना-लिखना तो जैसे उसके लिए सज़ा थी | हाँ, स्कूल आना उसे फिर भी अच्छा लगता था … क्योंकि स्कूल… जैसे उसके लिए एक रैंप… जहाँ वो अपनी सुन्दरता से जैसे सबको मोहित करने ही आती थी | जबकि अन्य लड़कियों को माता-पिता द्वारा सिर्फ़ घर के काम-काज सीखने की नसीहत दी जाती थी | साथ ही, मैट्रिक पास करने की ज़िम्मेदारी भी उनपर थी, ताकि उनको अच्छा घर-वर प्राप्त हो |  

यह भी बड़ी ही अजीब-सी विडम्बना है हमारे समाज की, कि लड़कियों को इसलिए नहीं पढ़ाया जाता, कि इससे उनको शिक्षा मिले, ताकि अपने जीवन में सम-विषम परिस्थितियों में वे स्व-विवेक से बेहतर निर्णय ले सकें, परिस्थितियों का समझदारी से सामना कर सकें, स्वावलंबी बन सकें… बल्कि इसलिए पढ़ाया जाता है, कि अच्छा घर-वर मिल सके …

… तो लड़कियों को घर का काम-काज सीखने के साथ-साथ मैट्रिक पास करने की ज़िम्मेदारी भी परिवार द्वारा सौंपी गई थी | लेकिन उनको प्रायः श्रृंगार करने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि इससे ‘लड़कियाँ बिगड़ जाती हैं’, ‘उनके क़दम बहक जाते हैं’, ‘दूसरों के लड़कों की उनपर नज़र पड़ने से परिवार की बदनामी का डर बना रहता है’ …!  

लेकिन लीला के सामने इनमें से कोई भी समस्या नहीं थी | उसे श्रृंगार के सारे साज़ो-सामान उपलब्ध थे | आँखों में लाइनर लगाए, होठों को हल्की-सी लिपस्टिक से सजाये, बालों में रंग-बिरंगे हेयर-पिन सजाये, जब वह स्कूल आती थी; तो शिक्षकों से इनके लिए रोज़ डाँट खाती |

-– “बेटा, अभी से इतना सजने-सँवरने पर ध्यान देने की बजाय कुछ पढ़-लिख लो, तुम्हारे ही काम आएगा ! अभी तुम्हारी सजने-सँवरने की उम्र नहीं है, पढ़ने-लिखने की उम्र है !” शिक्षक उसे बार-बार समझाते

लेकिन शिक्षकों की डाँट खाने के बावजूद, उसको इससे कोई फ़र्क पड़ते हमने नहीं देखा | हाँ, उसके भाग्य से चिढ़ी अपनी सहपाठियों की आँखों में ईर्ष्या देख उसको बहुत अच्छा लगता था | स्कूल और आस-पास के गली-मोहल्लों के लड़कों की आँखों में अपने लिए आकर्षण देखना जैसे उसके लिए परीक्षा के अच्छे परिणामों के मिलने जैसा था | उसकी ऐसी ही ‘प्रवृत्तियों’ के कारण लड़कियाँ उसे “रंगीली” कहकर अपनी ईर्ष्या की चोट को सहलाती थीं |

लीला को अपनी सुन्दरता की तारीफ़ बेहद पसंद थी, हालाँकि वह एक सामान्य शक्ल-शूरत वाली ही साधारण-सी लड़की थी, जिसकी आँखें न जाने क्या सपने देखती थीं | जो व्यकी उसकी सुन्दरता की तारीफें करता, वो उसका शुभचिन्तक और दोस्त, और जो उसकी सुन्दरता के बारे में बुराई करता, या कुछ अवांछित कह देता, वो अघोषित शत्रु ही माना जाता | और जो उसकी सुन्दरता को मुड़कर भी नहीं देखता, वो जैसे अक्षम्य-अपराधी ही होता | मेरी गिनती भी ‘अक्षम्य अपराधियों’ की इसी तीसरी श्रेणी में होती थी |

… तो इसी कारण लड़कियाँ उससे बेहद ईर्ष्या रखतीं थी | ईर्ष्या करतीं भी क्यों नहीं? लीला के जैसा भाग्य किसका था ! उसकी हर फरमाइश, कहने से पहले ही, पूरी की जाती थी | उसके ‘मम्मी पापा’, सुनते हैं, कि उससे बेहद प्यार करते थे | उनकी इकलौती बेटी जो थी वह…! घर में, ख़ासकर अपने ‘पापा’ से, तो जैसे डाँट उसने कभी जानी ही नहीं | उसे कभी किसी ने दुःखी या उदास नहीं देखा था | मैंने जब भी उसे देखा, हमेशा चहकते हुए ही पाया | जैसे दुःख और तकलीफ़ से वो परिचित ही न हो…

…लेकिन पिछले कुछ दिनों से अक्सर उसके बारे में अब दूसरी तरह की बातें सुनने को मिल रही थीं | मीना की प्रतिक्रिया उसी का हिस्सा थी | अब मीना अक्सर मुझे सूचना देती रहती,

–“जानती हो, कंचन? लीला स्कूल की सीढ़ियों के पीछे छुपकर रो रही है !”

–“लीला की सहेलियाँ उससे पूछ रही हैं, कि उसके पापा कैसे उससे शादी कर सकते हैं | यह सुनकर लीला उन लोगों से वहाँ झगड़ रही है !”

….आदि …आदि…|

इसके बाद लीला कई बार छुपकर रोती हुई मिली | उसके चेहरे पर हमेशा अठखेलियाँ करनेवाली वो हँसी जैसे किसी ने बेरहमी से नोंच ली थी और उसकी खरोंच ही वहाँ बाकी रह गई थी …उसके चेहरे पर हमेशा चिपकी रहने वाली चमक अब उड़ चुकी थी …सभी साजो-श्रृंगार जैसे उससे रूठ गए थे … अब उसकी आँखें अक्सर लाल और सूजी हुई मिलती …| शिक्षकों ने उसे डाँटना बंद कर दिया था, उससे ईर्ष्या रखने वाली लड़कियाँ अब उससे बेहद दयापूर्ण तरीक़े से पेश लगी थीं …

…एक दिन स्कूल के पुस्तकालय से आते हुए मुझे रास्ते में वह मिल गई | उसे देख मैं औपचारिकतावश मुस्कुराई | लेकिन उसके प्रत्युत्तर में उसकी आँखें नम होकर झुक गईं | जैसे वह मुझसे आँखें चुरा रही हो | शायद वह मेरे बारे में सोचकर शर्मिंदा हो रही थी, शायद वह मेरे सामने अपने को रख कर देख रही थी …क्योंकि मैं विद्यालय की मेधावी विद्यार्थियों में गिनी जाती है, जिसको सभी शिक्षक बेहद मानते हैं | जबकि वो अपने सौन्दर्य के बल पर दुनिया को जीतने की कोशिश में औंधे मुँह दलदल में जा गिरी थी | शायद वह मेरे सामने खुद को बेहद दयनीय हालत में महसूस कर रही थी |

उसकी हालत देखकर मुझे उसपर बेहद दया आई | उसके प्रति हमदर्दी से उसका हाथ पकड़कर मैं उसे पुस्तकालय के ही पास एकांत में ले गयी |

— “क्या बात है लीला? तुम इतनी उदास क्यों हो?” मैंने उसकी पीठ पर हाथ रखकर पूछा | मेरी हथेली के साथ-साथ जैसे मेरे शब्दों ने भी उसके मर्म को छुआ हो | उसके सब्र का बाँध टूट गया  

— “मेरे मम्मी-पापा कहते हैं, कि अब मैं अपने पापा को ‘पापा’ नहीं कहूँ, ‘जीजाजी’ कहूँ |” उसने आँसुओं के बीच बताया |

— “लेकिन क्यों…?” सबकुछ जानते हुए भी मुझे पूछना पड़ा | शायद अपनी बात कहकर उसके मन की पीड़ा थोड़ी कम हो जाय | इसके अलावा मुझे ऐसा भी लग रहा था, कि कोई और भी बात है, जो सामने नहीं आ पाई है |

— “वे कहते हैं, कि वे लोग मुझे इसीलिए अपने पास लाये थे, कि एक दिन मेरे पापा मुझसे शादी कर सकें !” उसके गले से मुश्किल से घुटी-घुटी आवाज़ में ये बात निकल सकी  

यानी जो बातें उसके बारे में इधर-उधर से सुनने को मिल रही हैं, वे सच हैं…

— “लेकिन क्यों…?” मैंने बेहद संकोच से, लेकिन अपनेपन से, पूछा,

— “… … … …मेरी मम्मी, यानी मेरी दीदी, को शादी के कई सालों बाद भी जब कोई संतान नहीं हुई और डॉक्टर ने भी कह दिया, कि वो कभी माँ नहीं बन पाएगी, तो मेरे जीजाजी मेरी दीदी को छोड़नेवाले थे | तब मेरे असली वाले मम्मी-पापा ने उनसे कहा, कि जब लीला बड़ी हो जाय, तो इससे दूसरी शादी कर लेना, इससे तुम्हारे बच्चे हो जायेंगें | मेरे मम्मी-पापा, यानी दीदी-जीजाजी, मान गए | तब मैं सिर्फ़ पाँच-छह साल की थी…” लीला जैसे अतीत में झाँकने की कोशिश कर रही थी

— “…उसके बाद मेरे ‘मम्मी-पापा’, यानी दीदी-जीजाजी, मुझे शहर ले आये, मुझे अच्छा खाना खिलाकर सेहतमंद बनाने के लिए, जिससे मैं उनके लिए स्वस्थ बच्चे पैदा कर सकूँ…” उसने बेहद कठिनाई से कहा, उसकी आवाज़ काँपने लगी थी  

— “…लेकिन मैं सच कहती हूँ, दीदी, मुझे कुछ भी नहीं मालूम था …!!! दूसरे बच्चे जैसे अपने मम्मी-पापा को ‘मम्मी-पापा’ कहते हैं, मैं भी अपने दीदी-जीजाजी को ‘मम्मी-पापा’ कहने लगी थी ! मुझे तब किसी ने भी नहीं रोका ! कभी किसी ने मुझे ये भी नहीं बताया, कि ये लोग मेरे ‘दीदी-जीजाजी’ हैं, मेरे ‘मम्मी-पापा’ नहीं…!!! इस बीच तो मैं कई बार अपने गाँव भी गई थी, असली वाले मम्मी-पापा के पास | लेकिन उन्होंने भी मुझे कभी कुछ नहीं बताया..!.” उसके आंसुओं ने नियंत्रण का बाँध तोड़ दिया | दो-दो ‘माता-पिताओं’ के धोखे ने जैसे उसके विश्वास की धज्जियाँ उड़ा दी थीं…

कोई समाज, कोई परिवार अपनी ही संतानों के प्रति इतना कठोर और निर्मम कैसे हो सकता है, कि अपनी वंश-परंपरा को बनाए रखने की ज़िद में, जिनको संतानवत प्रेम करता हो, उसी की इस प्रकार बलि चढ़ा दे…? नैतिक-मूल्यों, परम्पराओं, संस्कारों, धर्म, इंसानियत की दुहाई देते हुए हम खुद को ऊँचे-से ऊँचे आसन पर बिठाना चाहते हैं, …उसकी कोशिश भी करते हैं | लेकिन जब हमारे अपने स्वार्थ सामने आने लगते हैं और उनका टकराव उन्हीं नैतिक-मूल्यों, परम्पराओं, संस्कारों, धार्मिक विश्वासों से होने लगता है, तब उनके प्रति अपनी प्रतिबद्धता निभाने के स्थान पर हम कोई-न-कोई ऐसा छोटा-सा छेद अवश्य ढूँढ लेते हैं, जहाँ से हम अपने स्वार्थों के हाथी को भी सरलता से पार करा सकें !

… क्या लीला फिर कभी किसी रिश्ते पर विश्वास कर सकेगी ? क्या वे लड़कियाँ, जिन्होंने लीला को इस दुविधा और तकलीफ़ से गुज़रते देखा था, कभी रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं पर उसी तरह से भविष्य में भी विश्वास कायम रख सकेंगीं, जैसा अब तक रखती आईं थीं? जो अब अक्सर उस घटना के कारण तरह-तरह की बातें किया करती थीं | क्या मैं ही अब लोगों पर, मानवीय-रिश्तों पर आँखें बंद करके विश्वास कर पाऊँगी? उस घटना ने, अन्य लड़कियों की तरह मेरे मन को भी जैसे बुरी तरह मथ दिया था उस समय ! मैं उस दिन के बाद से रिश्तों पर उसी तरह से विश्वास नहीं रख पाई, उनपर वैसी ही आस्था शेष नहीं रही, जैसा इससे पहले रखती थी | पता नहीं लीला की क्या मनोदशा होगी…?

…उस दिन के बाद से वह कभी-कभार सहेलियों और अन्य लोगों से अपनी बातचीत में अपने ‘मम्मी-पापा’ को ‘दीदी-जीजाजी’ कहने की कोशिश करती थी, लेकिन बेहद कष्ट के साथ, दबी-दबी आवाज़ में, जैसे कोई गुनाह कर रही हो ! फिर पता चला, कि उसने अपने ‘पापा’, यानी जीजाजी, से शादी करने से इन्कार कर दिया है | लेकिन उसके दीदी-जीजाजी भी इस बात पर अडिग थे, कि उसे जीजा से शादी करनी ही होगी | आखिर इसी दिन के लिए ही तो उन्होंने उसका पालन-पोषण किया था, उसके हर नाज़-नखरे उठाए थे, उसपर इतना ख़र्च किया था…! उसके माता-पिता, ‘असली वाले माता-पिता’ भी उसपर दबाव डाल रहे थे…

कुछ दिनों बाद उसके पड़ोस में रहनेवाली लड़कियों से ख़बर मिली, कि लीला को शादी के लिए तैयार करने की ख़ातिर उसे उसके गाँव भेज दिया गया है, उसके असली माता-पिता के पास | शायद उसके वास्तविक माता-पिता उसे शादी के लिए राज़ी कर पायें ? या शायद गाँव का कठिन जीवन, शहर की सुख-सुविधाओं में पली उस लड़की को अपने ‘पापा’ यानी जीजा से शादी करने के लिए मजबूर कर सके…!

‘संतान’ की चाह में ‘संतान’, मुँहबोली ही सही, की यह बलि हमारे विद्यालय की कई लड़कियों के विश्वास की जड़ें हिला गई…! पता नहीं सहपाठी लड़कों ने इस घटना को कैसे देखा…? पता नहीं समाज के ज़िम्मेदार वयस्कों ने इसपर क्या सोचा…? अन्य माता-पिताओं को, बेटियों से किसी भी तरह पीछा छुड़ाने की चाह रखने वाले माता-पिताओं को यह घटना कैसी लगी, इसकी भी कोई ख़बर नहीं…!

—डॉ. कनक लता

नोट:- लेखक के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है, इसलिए लेखक की अनुमति के बिना इस रचना का कोई भी अंश किसी भी रूप में अन्य स्थानों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता…

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6 thoughts on “‘संतान’ से ‘संतान’ तक

  1. यह हमारे रूढ़िवादी समाज का वीभत्स रूप है।

  2. कहानी को पढ़ने से पता चलता है कि समाज अनेक मनिविकारों से ग्रस्त है। अभी इसके बदलने में बहुत समय है।

  3. कहानी लेखन वाकई में शानदार है ।आपकी प्रत्येक कहानी समाज के किसी न किसी रूप का
    प्रतिबिंब होती हैं ।

    1. धन्यवाद सुनीता जी…
      आपके शब्दों से उत्साह मिलता है …

  4. वाह! ऐसे रिश्तों पर कम बात हुई है साहित्य में। पात्रों के संवाद के ज़रिए समाज का यह पक्ष भी शानदार तरीके से आया है। कथा कहन भी जानदार है।

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