बतकही

बातें कही-अनकही…

कथेतर

संगीता कोठियाल फ़रासी

भीख माँगते बच्चों को अक्षरों की दुनिया में ले जाती एक शिक्षिका भाग- तीन :- बच्चों में स्वाभिमान की भूख पैदा करने से आत्म-निर्भरता की ओर... एक सच्ची माँ किसे कहा जा सकता है...? जो अपने बच्चों के खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, बीमारियों से सुरक्षित रखने से संबंधित सभी ज़रूरतों का ध्यान रखते हुए उनका ठीक से पालन-पोषण करे...? या जो बच्चों को धार्मिक कहानियाँ सुनाते हुए, पूजा-पाठ या इबादत आदि में शामिल करते हुए उनको ‘संस्कारवान’…

आलोचना

शिक्षा का अधिकार, वंचित वर्ग और पास-फेल का खेल

ज़रा हम अपने आस-पास नज़र दौड़ाएं... लोगों को बातें करते हुए ज़रा ध्यान से सुनें... उनकी प्रतिक्रियाएँ देखें, ...उनके आग्रह को ज़रा ग़ौर से देखें और समझने की कोशिश करें... क्या उनकी कटूक्तियों में, उनकी घृणा, उनके क्रोध में कुछ विशिष्टता नज़र आती है, ...जब वे समाज के वंचित एवं कमज़ोर वर्गों की शिक्षा के सम्बन्ध में बातें कर रहे होते हैं...? क्या आपने भी ऐसी उक्तियाँ कभी-कभी उनके मुखों से सुनी हैं, जो उनके…

कथेतर

मनोहर चमोली ‘मनु’

‘बाल-साहित्य’ के माध्यम से समाज की ओर यात्रा... भाग-एक :- ‘मनोहर चमोली’ होने का अर्थ... सफ़दर हाशमी ने कभी बच्चों को सपनों और कल्पनाओं की दुनिया में ले जाने की कोशिश में उन्हें संबोधित करते हुए लिखा था— “किताबें कुछ कहना चाहती हैं।तुम्हारे पास रहना चाहती हैं॥ किताबों में चिड़िया चहचहाती हैंकिताबों में खेतियाँ लहलहाती हैंकिताबों में झरने गुनगुनाते हैंपरियों के किस्से सुनाते हैं किताबों में राकेट का राज़ हैकिताबों में साइंस की आवाज़ हैकिताबों…

कथेतर

सम्पूर्णानन्द जुयाल

वंचित वर्गों के लिए अपना जीवन समर्पित करता एक अध्यापक भाग-एक : यदि कोई मुझसे पूछे, कि संसार का सबसे अधिक दायित्वपूर्ण कार्य कौन-सा है ? तो निःसंकोच मेरा उत्तर होगा —अध्यापक का कार्य | क्योंकि वही समाज का निर्माता है, वही उसका विनाशक भी; वही उसका मार्गदर्शक है, वही उसका पथ-भ्रष्टक भी; वह चाहे तो समाज को नई दिशा मिल जाय और वह यदि निश्चय कर ले तो समाज को दिग्भ्रमित करके पतन की…

कथेतर

संगीता कोठियाल फ़रासी

भीख माँगते बच्चों को अक्षरों की दुनिया में ले जाती एक शिक्षिका भाग-एक : कहते हैं, कि यदि किसी इंजीनियर या डॉक्टर अथवा किसी भी पेशे का काम समाज के भौतिक, आर्थिक, प्रशासनिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, तो किसी भी समाज या देश की वैचारिक-मनोभूमि को गढ़ने में सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका उसके शिक्षक-समाज की होती है | इसका अर्थ यह कदापि नहीं है, कि अन्य कार्य ग़ैर-महत्वपूर्ण या गौण हैं, लेकिन जब…

कथा

कटोरे की दुनिया से अक्षरों की दुनिया की ओर…

“साहेब, साहेब, कुछ खाने को दे दो, बहुत भूख लगी है ...मेरी बहन बहुत भूखी है ...|” एक बेचारे-से दिखने वाले लगभग 7-8 वर्षीय बच्चे ने, सड़क किनारे खड़े ठेले पर छोले-भटूरे का आनंद लेते दंपत्ति की ओर देखकर दयनीय-याचक स्वर में कहा |“भागो यहाँ से... इन भिखारियों ने तो जीना हराम कर रखा है, इनके मारे तो कोई सड़क पर कुछ खा भी नहीं सकता ...जाओ यहाँ से, वर्ना खींच कर दो कान के…

कविता

कैंडल मार्च – 2

नहीं हो सकता कैंडल मार्च...! सर्वजन के भोग हेतु उपलब्ध सभ्य समाज के कुछ सुसंस्कृत राजपुत्रों को मस्ती-भरी ‘ग़लती’ करने की इच्छा हुई जवान होते लड़कों की ‘नासमझ ग़लती’ जिन्हें बार-बार दोहराने की खुली छूट होती है सुसंस्कृत सभ्य पुत्रों को तब वे आते हैं यहीं जहाँ कूड़े के बीच रहती हैं उनकी वो बेटियाँ जो हैं पहले से रखे गए समाज के एकदम बाहर हाशिए पर ... जैसे रखा जाता है पालतू जानवरों को…

कविता

कैंडल मार्च -1

कैंडल मार्च आवश्यक है लोगों को इकठ्ठा करो मीडिया बुलाओ कैंडल मार्च निकलना होगा इंडिया गेट पर धरना भी देना है, अवश्य ही...! पूरे देश में प्रदर्शन किया जाएगा घेराव भी करेंगे जगह-जगह मंत्रियों को सूचना दो निश्चित फाँसी की माँग करें वे संसद में ...! यह कोई सामान्य बात नहीं है, हमारे एकाधिकार पर हमला है, हमारी श्रेष्ठता को चुनौती है, हमारी सत्ता को ललकारना है, इसे रोकना होगा, तुरंत.... वे नहीं कर सकते…

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