बतकही

बातें कही-अनकही…

कथेतर

आशीष नेगी : कला के मार्ग से शिक्षा के पथ की ओर

भाग-चार - आशीष के ‘दगड़्या’ : बच्चों का, बच्चों के लिए, बच्चों द्वारा क्या कोई ऐसा ऐसा संगठन या संस्था हो सकती है, जो न केवल बच्चों के लिए हो, बल्कि वह बच्चों की भी हो और उसका संचालन भी प्रमुख रूप से बच्चे ही करते हों...? सरकारी स्कूलों में हालाँकि ‘बाल-सभाएँ’ होती हैं, लेकिन यह पता नहीं कि वह कितनी कारगर है और क्या-क्या काम कितने प्रभावशाली ढंग से करती है? उनमें बच्चों की…

कथेतर

मनोहर चमोली ‘मनु’

‘बाल-साहित्य’ के माध्यम से समाज की ओर यात्रा... भाग-एक :- ‘मनोहर चमोली’ होने का अर्थ... सफ़दर हाशमी ने कभी बच्चों को सपनों और कल्पनाओं की दुनिया में ले जाने की कोशिश में उन्हें संबोधित करते हुए लिखा था— “किताबें कुछ कहना चाहती हैं।तुम्हारे पास रहना चाहती हैं॥ किताबों में चिड़िया चहचहाती हैंकिताबों में खेतियाँ लहलहाती हैंकिताबों में झरने गुनगुनाते हैंपरियों के किस्से सुनाते हैं किताबों में राकेट का राज़ हैकिताबों में साइंस की आवाज़ हैकिताबों…

कथा

डर के आगे क्या है ….

-- “मैं जानता हूँ, कि वे लोग मुझे जल्दी ही मार देंगें !” उस बारह-चौदह वर्षीय किशोर की आवाज़ में जितना भय था, उतनी ही पीड़ा भी, जो अभी दस मिनट पहले ही चलती बस में दौड़ता हुआ चढ़ा था | उसकी आवाज़ भय के कारण लगभग काँप रही थी | उसकी बात सुनकर मैं स्तब्ध रह गयी | ड्राइवर और कंडक्टर ने किशोर को दया भरी नज़रों से देखा | बाक़ी यात्री बच्चे के…

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