बतकही

बातें कही-अनकही…

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अंजली डुडेजा : विद्यालय, बच्चे और खामोश कोशिश

भाग दो : पढ़ना सबसे अधिक ज़रूरी है ! हमारे समाज का बहुत बड़ा हिस्सा, अर्थात् पचासी फ़ीसदी से भी अधिक, समाज का वह भाग है, जो वास्तविक धरातल पर व्यावहारिक रूप से अपने सम्मानजनक ढंग से जीवन-यापन के मौलिक अधिकारों से भी वंचित है | उसके लिए तथाकथित मुख्यधारा के समाज, अर्थात् समाज के क़रीब पंद्रह फ़ीसदी हिस्से द्वारा सदियों पहले उस बहुसंख्य आबादी के जीवन-यापन के लिए कार्यों के कुछ निश्चित दायरे भी…

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सम्पूर्णानन्द जुयाल : वंचित वर्गों के लिए अपना जीवन समर्पित करता एक अध्यापक

भाग-चार : बंजारे बच्चों को उनकी मंजिल की ओर ले जाने की कोशिश कहते हैं कि प्रत्येक बच्चे में कुछ ऐसी विशेषताएँ अवश्य होती हैं, जिनको यदि समय रहते पहचानकर उसका परिष्कार किया जाए, तो उन विशेषताओं से संपन्न होकर वह बच्चा अपने आप में एक विशिष्ट व्यक्ति या नागरिक बनता है, उसका लाभ समाज और देश को मिलता है | लेकिन यदि उसकी ख़ूबियों को जानते हुए भी उसको अवसर न दिया जाए, तो…

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संगीता कोठियाल फरासी : भीख माँगते बच्चों को अक्षरों की दुनिया में ले जाती एक शिक्षिका

भाग-चार : होटल में धुमंतू बच्चे और बारिश में भीगता समर्थ-समाज ‘बारिश में भीगना किसे अच्छा नहीं लगता है’? यदि यह सवाल किसी से पूछा जाए, तो जवाब मिलेगा कि हर व्यक्ति सुहानी बारिश में भीगना चाहता है, बच्चे हों या जवान अथवा बूढ़े; बस मौक़ा मिलने भर की देर है ! क्या जीव-जंतु और क्या पशु-पक्षी, सभी को उमस और गर्मी से राहत के लिए बारिश में भीगना पसंद है, आनंदित होने के लिए…

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माधवी ध्यानी : अंग्रेजी भाषा से बच्चों की दोस्ती कराती अध्यापिका

भाग—एक : हर नई भाषा एक नई खिड़की खोलती है ! हम हिंदी पट्टी के लोगों की अपने बचपन और कैशोर्य अवस्था में अंग्रेजी भाषा को लेकर कैसी मनःस्थिति हुआ करती थी, ख़ासकर हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले विद्यार्थियों की, यह तो हम सभी जानते हैं | इस भाषा को किस अचम्भे और लालसा से हम हिंदी पट्टी के विद्यार्थी अपने किशोरावस्था में प्रायः ही देखा करते थे और यह सोचते थे कि काश, हमको…

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विनय शाह : लोकतान्त्रिक प्रयोगों का अध्यापक

भाग-एक : लोकतान्त्रिक शिक्षक की विकास-यात्रा यदि कक्षा में अपने अभिनव प्रयोगों एवं लोकतान्त्रिक तरीक़ों के माध्यम से कक्षा के प्रत्येक बच्चे को पढ़ने-लिखने से जोड़ना हो, कक्षा के शरारती बच्चों को कक्षा में बाधक बनने से बचाकर उन्हें एक ज़िम्मेदार एवं समझदार विद्यार्थी बनाना हो, विशेष वर्गों या समाजों के बच्चों की समस्याओं के प्रति पूरी कक्षा को संवेदनशील बनाना हो, विपरीत जेंडर के विद्यार्थियों, अर्थात् बालिकाओं की दैहिक एवं सामाजिक समस्याओं के प्रति…

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‘सुबह के अग्रदूत’— दो

भूमिका बडोला ...जब हमारे चारों ओर निराशमय वातावरण हो, नकारात्मक शक्तियाँ अपने चरम पर हों, राजनीतिक-परिदृश्य निराशा उत्पन्न कर रहा हो, सामाजिक-सांस्कृतिक हालात बद से बदतर होते जा रहे हों, लोगों के विचारों एवं बौद्धिक-चिंतन में लगातार कलुषता भरती चली जा रही हो और एक-दूसरे के प्रति वैमनस्यता तेज़ी से अपने पाँव पसार रही हो... तब ऐसे में जब युवा हो रही पीढ़ी के बीच से कुछ ऐसे लोग निकलकर सामने आने लगें, जो अंगद…

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‘गाइड’ प्रदीप रावत

एक अध्यापक जो अपने विद्यार्थियों के लिए ‘गाइड’ है भाग-एक ‘मैं अध्यापक नहीं, अपने विद्यार्थियों के लिए केवल एक ‘गाइड’ हूँ...’ ‘गाइड’...! यह ‘गाइड’ नामक जीव क्या होता है? यह कोई मनुष्य होता है या कोई दूसरा जीव-अजीव? अथवा क्या ‘गाइड’ केवल कोई व्यक्ति ही होता है या मनुष्य से इतर कोई और भी यह भूमिका निभा सकता है या निभाता हुआ मिलता है? कोई गाइड क्या काम करता है या उसका क्या काम होता…

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संदीप रावत

भाषा के माध्यम से शिक्षा की उपासना में संलग्न एक अध्यापक भाग-एक:- भाषा से शिक्षा की जुगलबंदी एवं शिक्षा के उद्देश्य लगभग डेढ़ सदी पहले ‘आधुनिक हिन्दी साहित्य’ के प्रणेता भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने लिखा था—— निज-भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल बिनु निज-भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल | अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन पै निज-भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ||       (भारतेंदु हरिश्चंद्र) ...तो कुछ इसी सिद्धांत…

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