बतकही

बातें कही-अनकही…

आलोचना

जी हाँ, वंचित-महिलाएँ अब जाग रही हैं

“जिन सवर्ण-महिलाओं के लिए वंचित-समाज की हमारी माता सावित्रीबाई फुले ने सबसे पहले स्कूल शुरू किया, वह भी हमारे लिए स्कूल शुरू करने से पहले; वे ही सवर्ण औरतें आज कैसे उनको नकार सकती हैं? उनको कैसे समझ में नहीं आता कि उनको उनके ही समाज के पुरुष भरमा रहे हैं?...” “केवल हमारे वंचित-समाज की माँ, बहनें, बेटियाँ ही माता सावित्रीबाई की ऋणी नहीं हैं, बल्कि ब्राह्मण औरतों सहित सभी सवर्ण औरतें भी माता सावित्रीबाई…

निबंध

‘अप्प दीपो भव’ : नए तेवर के साथ 21वीं सदी का वंचित-समाज

जब 1848 ई. में फुले-दंपत्ति (ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले) ने लड़कियों (3 जनवरी 1848, भिंडेवाड़ा) और दलितों (15 मई 1848, महारवाड़ा) के लिए पहले आधुनिक-विद्यालय की शुरुआत करते हुए महिला-आन्दोलन और दलित-आन्दोलन की नींव डाली और उनके केवल कुछ ही दशक बाद डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इन आंदोलनों को नई धार देकर बहुमुखी और बहुस्तरीय बना दिया; तो उसके बाद समाज में एक ऐसी आँधी चलनी शुरू हो गई, जिसमें सारा ब्राह्मणवाद, पुरुषवाद, पितृसत्ता…

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