बतकही

बातें कही-अनकही…

कथेतर

आशीष नेगी : कला के मार्ग से शिक्षा के पथ की ओर

भाग-चार - आशीष के ‘दगड़्या’ : बच्चों का, बच्चों के लिए, बच्चों द्वारा क्या कोई ऐसा ऐसा संगठन या संस्था हो सकती है, जो न केवल बच्चों के लिए हो, बल्कि वह बच्चों की भी हो और उसका संचालन भी प्रमुख रूप से बच्चे ही करते हों...? सरकारी स्कूलों में हालाँकि ‘बाल-सभाएँ’ होती हैं, लेकिन यह पता नहीं कि वह कितनी कारगर है और क्या-क्या काम कितने प्रभावशाली ढंग से करती है? उनमें बच्चों की…

कथा

जीतने को बेताब लड़कियाँ

“भइया...! जल्दी चलो..ss...ss...! ...जल्दी चलो...ss...ss...!!” रिक्शे पर बैठी सोलह-सत्रह वर्षीया तीन किशोरी लड़कियाँ रिक्शेवाले को संबोधित करते हुए लगातार चिल्ला रही थीं.... लगभग उनकी ही उम्र का, यानी अंदाज़न अठारह-बीस साल का किशोर रिक्शेवाला भी जी-जान से रिक्शे को पूरी ताकत से पैडल मारता हुआ लड़कियों की आवाज़ से प्रतिस्पर्धा करने की कोशिश कर रहा था | यह कह पाना मुश्किल था, कि लड़कियों के चिल्लाने की गति अधिक थी, या किशोर के रिक्शा खींचने…

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