बतकही

बातें कही-अनकही…

कथा

‘संतान’ से ‘संतान’ तक

आज पायल आई थी, अचानक बड़े दिनों बाद, मुझसे मिलने... लेकिन वह बहुत हैरान-परेशान और दुःखी थी | कारण था, अख़बार में छपी एक ख़बर, जिसमें यह सूचना थी, कि सऊदी अरब में एक बहुत धनी व्यक्ति ने अपनी सगी बहन को उससे विवाह करने के लिए बाध्य किया था | लेकिन उसकी बहन उसका यह कहकर विरोध कर रही थी, कि वह उस आदमी की सगी बहन है, इसलिए वह उससे विवाह नहीं कर…

कविता

कैंडल मार्च – 4

कौन करेगा कैंडल मार्च...? क्या कहा, भाई...? इन लड़कियों का कोई रक्षक नहीं...? कोई सहायक नहीं...? ...शायद तुम ठीक कहते हो.... वे समाज के हाशिए पर फेंके गए ‘कूड़ा-समाज’ में पैदा हुई थीं... समाज के कूड़े की ‘कूड़ा बेटियाँ’... बदनसीब बेटियाँ... यतीम बेटियाँ... अकेली... असहाय... अरक्षित... जिनका नहीं कोई रक्षक ...!!! नहीं कोई सहायक...!!! कौन निकाले जुलूस...? कौन करे कैंडल मार्च...? क्योंकि उनके भाइयों, पिताओं, पुरुषों के पास समय नहीं है, कि उनकी उन खुली…

कविता

कैंडल मार्च – 3

कैंडल मार्च प्रतिबंधित है बिखरी हैं उनकी लाशें, जैसे सड़क पर बिखरा कूड़ा ... क्षत-विक्षत हैं उनके खुले जिस्म, जैसे फाड़े गए हों पुराने कपड़े ... लेकिन खुली हैं उनकी मृत आँखें, जैसे अभी कोई उम्मीद हो बाक़ी उनमें ...| कोई पूछता है, धीरे से फुसफुसाकर, भीड़ के बीच में से… कौन हैं ये बदनसीब लड़कियाँ...? मत पूछो साहब कि कौन हैं ये अभागिनें...? दरअसल इनका कोई परिचय नहीं है, अनाम हैं ये लड़कियाँ, समाज…

कविता

कैंडल मार्च – 2

नहीं हो सकता कैंडल मार्च...! सर्वजन के भोग हेतु उपलब्ध सभ्य समाज के कुछ सुसंस्कृत राजपुत्रों को मस्ती-भरी ‘ग़लती’ करने की इच्छा हुई जवान होते लड़कों की ‘नासमझ ग़लती’ जिन्हें बार-बार दोहराने की खुली छूट होती है सुसंस्कृत सभ्य पुत्रों को तब वे आते हैं यहीं जहाँ कूड़े के बीच रहती हैं उनकी वो बेटियाँ जो हैं पहले से रखे गए समाज के एकदम बाहर हाशिए पर ... जैसे रखा जाता है पालतू जानवरों को…

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