बतकही

बातें कही-अनकही…

निबंध

भोजन केवल ‘भोजन’ नहीं, एक ‘हथियार’ भी है !

भोजन के सम्बन्ध में ‘खाद्य’ और ‘अखाद्य’ जैसे शब्दों को तो हम अक्सर ही सुनते हैं ; जैसे प्याज, लहसुन जैसी सब्जियाँ, अथवा कुत्ते, कौवे, साँप, बिच्छू, घोंघे, चूहे आदि पशु-पक्षियों का मांस वगैरह भारतीय ‘सनातनी-संस्कृति’ में ‘अखाद्य’ की श्रेणी में रखे गए हैं | इसी प्रकार गाय के दूध को ‘बुद्धिवर्द्धक’ कहा गया है और उसी के बरक्स भैंस के दूध को ‘बुद्धिनाशक’, इतना ही नहीं गाय के दूध को ही ‘पवित्र’ कहकर हिन्दू…

कथेतर

सुभाष चन्द्र : जिसके लिए उसके विद्यार्थी अपनी संतान से भी अधिक प्रिय हैं

भाग-दो : ‘कार्य’ जो अपनी अनिवार्य शिक्षकीय ज़िम्मेदारी है पिछले लेख में यह देखा जा चुका है कि किस प्रकार जब राजकीय प्राथमिक विद्यालय, किमोली के दोनों अध्यापकों (सुभाष चंद्र और प्रमोद कुमार) ने परस्पर सहमति से यह तय किया कि वे अपनी निजी कोशिशों से विद्यालय और बच्चों की शिक्षा को एक नया मुक़ाम देंगे, तब इस विद्यालय की ‘शैक्षणिक-यात्रा’ शुरू होती है... यह भी देख चुके हैं कि अपने विद्यालय में सुभाष चंद्र…

कथेतर

सुभाष चंद्र : जिसके लिए उसके विद्यार्थी अपनी संतान से भी अधिक प्रिय हैं

भाग-एक :- विद्यार्थी जिसकी प्रथम ज़िम्मेदारी हैं भारतीय शिक्षा-प्रणाली की स्थिति यह है कि यहाँ बहुलांश में सरकारी विद्यालयों के शिक्षक किसी भी अन्य सरकारी विभाग की तरह अपने पेशे को अच्छे-ख़ासे वेतन के रूप में मोटी आय का ज़रिया-भर मानते हैं | लेकिन उस पद से संबंधित ज़िम्मेदारियाँ और कार्य करने की जब बात हो तो ये उसे पसंद नहीं करते | कारण...? भारतीय समाज के इस हिस्से को पीढ़ियों से काम करने की…

कथेतर

सरिता मेहरा नेगी : ‘एक विद्यालय’ बनाने की कोशिश में ‘पहली अध्यापिका’

भाग-दो : ‘पहली अध्यापिका’ का अनोखा विद्यालय पिछले लेख ‘सरिता मेहरा नेगी : ‘एक विद्यालय’ बनाने की कोशिश में ‘पहली अध्यापिका, भाग-एक’ में यह बात देखी जा चुकी है कि विद्यालय-दर-विद्यालय होते हुए सरिता मेहरा नेगी मई 2014 में स्थानांतरित होकर कोटद्वार स्थित जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के दायरे में मौजूद उस विद्यालय में आईं, जो अभी तक ‘अदृश्य’ रूप में था, जिसके ‘होने’ की सूचना वहाँ लगे सूचनापट्ट से ही मिलती थी | अब…

कथेतर

सरिता मेहरा नेगी: ‘एक विद्यालय’ बनाने की कोशिश में ‘पहली अध्यापिका’

भाग-एक : ‘पहली अध्यापिका’ तत्कालीन सोवियत रूस के एक क्षेत्र कज़ाकिस्तान के लेखक चिंगिज़ एतमाटोव द्वारा रचित ‘पहला अध्यापक’ पढ़ने के बाद मैं कभी उस अध्यापक दूइशेन को भूल ही नहीं सकी, जिसने अपने विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए न केवल अपनी पूरी ऊर्जा ही ख़र्च कर डाली, बल्कि उसके लिए अपना जीवन संकट में डाल दिया ! और इससे भी आगे बढ़कर अपनी एक किर्गीज विद्यार्थी आल्तीनाई सुलैमानोव्ना की केवल शिक्षा के लिए ही…

निबंध

व्यवसाय, धर्म और पितृसत्ता के बरक्स खड़ी फ़टी जींस

‘जींस’ या ‘फ़टी जींस’ से ‘पितृसत्ता’ का क्या संबंध है, इसके एक पक्ष को तो पिछले दो लेखों फ़टी जींस, लड़कियाँ और संकट में संस्कृति और ‘जींस पहनती बेटियाँ माता-पिता को अच्छी नहीं लगतीं’में देख लिया गया, लेकिन साथ में यह भी समझना ज़रूरी है कि क्या ‘पितृसत्ता’ सदैव ही फ़टी हुई जींस या ऐसे ही दूसरे ‘संस्कृति-विरोधी’ तत्वों का विरोध करती है? अथवा उसके सामने कुछ ‘परिस्थितियाँ’ ऐसी भी आती हैं जब वह प्रत्यक्ष…

निबंध

फ़टी जींस, लड़कियाँ और संकट में संस्कृति

‘जींस’ को लेकर चंद महीनों पहले ही उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री का वह सार्वजनिक बयान तो सबको याद ही होगा, जिसमें वे किसी महिला द्वारा फ़टी हुई जींस पहने जाने को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज़ कर रहे थे और जिसपर विवाद खड़ा हो गया था ! यहाँ बात उसी ‘जींस’ की हो रही है | ‘जींस’ वह वस्त्र है, जो यूरोप में पैदा हुई | दरअसल यूरोप में आए ‘नवजागरण’ और उसके परिणामस्वरूप विकसित हुए…

कथेतर

माधवी ध्यानी : अंग्रेजी भाषा से बच्चों की दोस्ती कराती अध्यापिका

भाग-दो : अंग्रेज़ी कोई हौवा नहीं ! एक नई भाषा सीखना किसी के लिए भी किन रूपों में और कैसे मददगार होता या हो सकता है? किसी व्यक्ति के जीवन में किसी भी नई भाषा की क्या भूमिका हो सकती है? विद्वान् कहते हैं कि एक नई भाषा किसी व्यक्ति को ज्ञान की नई दुनिया में ले जाने में बहुत अधिक मददगार होती है | लेकिन ऐसा क्यों? ज्ञान-अर्जन के लिए तो प्रायः साहित्य, इतिहास,…

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