बतकही

बातें कही-अनकही…

आलोचना

पराशर-मत्स्यगंधा कथा : आर्यों का लव-जिहाद

(असहाय-अकेली स्त्री भोग की वस्तु) आर्य जब अपनी तलवारों और तीर-धनुष के बल पर रक्तपात करते हुए भारत में घुसे, तो यहाँ पहले से रह रहे निवासियों द्वारा उनका जबर्दस्त विरोध-प्रतिरोध हुआ | हालाँकि आर्यों के शुरूआती हमले इतने अचानक थे और धोखाधड़ी के साथ भी, कि आरम्भ में यहाँ के निवासी संभलने का मौका नहीं पा सके और बड़ी संख्या में उनका नरसंहार हुआ | लेकिन जब उन पूर्व-निवासियों को आर्यों की नीयत समझ…

शोध/समीक्षा

दुष्यंत-शकुंतला प्रेम-कथा : आर्यों का लव-जिहाद

(शत्रु को नीचा दिखाने हेतु स्त्री एक माध्यम) पिछले लेख में यह देखा गया कि किस तरह भरत-कबीले के राजपुरोहित-पद पर वशिष्ठ की नियुक्ति का विरोध करने और बदले में ‘दाशराज्ञ-युद्ध’ छेड़ने के लिए ज़िम्मेदार विश्वामित्र को घेरने और मारने के लिए वशिष्ठ-दुष्यंत ने मेनका नाम की एक देव-वेश्या (अप्सरा) का प्रयोग किया था; लेकिन वे अपनी उस योजना में सफ़ल नहीं हुए | तब उन्होंने विश्वामित्र की बेटी, जो अप्सरा मेनका से ही जन्मी…

कविता

एक था अँगूठा

एक था अँगूठा... जो हर रोज़ चुनौती देता था राजपुत्रों की दिव्यता और अद्वितीयता को राजमहलों की एकान्तिक योग्यता को...!!! पुरोहित चौंके, गुरू अचंभित... उस ‘नाक़ाबिल’ अँगूठे से डर गए सभी दिव्यदेहधारी राजगुरु अतिविशिष्ट... सर्वश्रेष्ठ गुरु द्रोणाचार्य भी...! भविष्य की किसी आशंका से...!!! उस ‘जाहिल’ अँगूठे से घबराए सभी राजपुत्र... चिंतित, हैरान औ’ परेशान सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी अर्जुन भी...! राज्य सचेत औ’ सचेष्ट कर्तव्यनिष्ठ, लोक-कल्याणकारी वह रोकने को अनिष्ट कोई भविष्य में गुरु को सौंप कर्तव्य…

आलोचना

शिक्षक-प्रशिक्षण कार्यक्रमों की बाढ़ में बहकर दूर होती शिक्षा

सरकारी विद्यालयों में एक बहुत ख़ास बात देखी जा सकती है; वहाँ पिछले दो दशकों से नवाचारों एवं शैक्षणिक-गतिविधियों से संबंधित शिक्षकों की विविध प्रकार की ट्रेनिंग की बाढ़-सी आई हुई है, जिससे न केवल अधिकांश शिक्षक असहज होते रहे हैं, बल्कि कंफ्यूज और असहमत भी हो रहे हैं | इसमें वे शिक्षक भी शामिल हैं, जो पूरी ईमानदारी से अपने शिक्षकीय कर्तव्यों का पालन करते हैं, बिना अपने विद्यार्थियों से किसी भी तरह का…

शोध/समीक्षा

स्कूलों में कार्यक्रमों की रेल और धीरे-धीरे ग़ायब होती शिक्षा

लॉकडाउन के बाद से खुले विद्यालयों में बहुत सारी बातें बहुत ख़ास दिखाई देती हैं— उनमें से एक बहुत विशिष्ट बात है, जो इस लेख का विषय है, वह है सभी विद्यालयों में अनेकानेक प्रतियोगिताओं (चित्रकला, लेख, निबंध, खेल, शब्दावली और दर्ज़नों ऐसी ही प्रतियोगिताएँ) एवं सांस्कृतिक-कार्यक्रमों की बाढ़ और बड़े से लेकर छोटे स्थानीय छुटभैये नेताओं/नेत्रियों की जयंतियों की रेलमपेल; और उन सबकी आवश्यक रिपोर्ट सहित डिजिटल साक्ष्य भी बनाकर शिक्षा-विभागों को भेजने की…

शोध/समीक्षा

नवाचारों की भीड़ में क़िताबों से बढ़ती दूरियाँ

‘नवाचार’ एक ऐसा ज़रिया हैं, जिनके माध्यम से विद्यालयों में आसानी से एवं रोचक तरीक़ों से बच्चों को बहुत सारी चीजें हँसते-खेलते पढ़ाया जा सकता है | यही कारण है कि भारत ही नहीं दुनिया के सभी देश, जो ख़ुशनुमा माहौल में बच्चों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की वक़ालत करते हैं एवं उसके लिए कोशिश करते है, इन नवाचारों को बहुत महत्त्व देते हैं | लेकिन एक बात यहाँ बहुत ध्यान से समझने की है... वह…

निबंध

वर्चस्व-स्थापना के प्रयास में ‘भूख’ को बचपन से साधती सरकारें

कहते हैं कि ‘बचपन’ ही वह समय होता है, जब किसी बच्चे के भविष्य के लिए उसके व्यक्तित्व की रुपरेखा तैयार की जाती है; अर्थात् उसकी नींव डाली जाती है | बच्चे के मन में जिस प्रकार के बीज रोपित किए जाएँगे, उसका व्यक्तित्व उसी के अनुरूप आकार लेगा | जिस बच्चे को बचपन से आत्म-निर्भर, स्वाभिमानी बनाया जाएगा, वह आगे चलकर उसी के अनुरूप आत्म-विश्वासी, स्वावलंबी और स्वाभिमानी बनेगा; और जिस बच्चे को बचपन…

निबंध

भोजन केवल ‘भोजन’ नहीं, एक ‘हथियार’ भी है !

भोजन के सम्बन्ध में ‘खाद्य’ और ‘अखाद्य’ जैसे शब्दों को तो हम अक्सर ही सुनते हैं ; जैसे प्याज, लहसुन जैसी सब्जियाँ, अथवा कुत्ते, कौवे, साँप, बिच्छू, घोंघे, चूहे आदि पशु-पक्षियों का मांस वगैरह भारतीय ‘सनातनी-संस्कृति’ में ‘अखाद्य’ की श्रेणी में रखे गए हैं | इसी प्रकार गाय के दूध को ‘बुद्धिवर्द्धक’ कहा गया है और उसी के बरक्स भैंस के दूध को ‘बुद्धिनाशक’, इतना ही नहीं गाय के दूध को ही ‘पवित्र’ कहकर हिन्दू…

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