बतकही

बातें कही-अनकही…

कथेतर

संदीप रावत : भाषा के माध्यम से शिक्षा की उपासना में संलग्न एक अध्यापक

भाग-दो :-  बच्चे, भाषा और शिक्षा एक समृद्ध एवं सक्षम भाषा किसी व्यक्ति, समाज एवं देश के जीवन में क्यों आवश्यक है? साथ ही, अपनी भाषा को समय के साथ निरंतर समृद्ध एवं सक्षम बनाते चलना भी क्यों आवश्यक है? इन प्रश्नों का उत्तर इस तथ्य में छिपा है कि कोई भाषा किसी व्यक्ति, परिवार, समाज और देश के जीवन में क्या भूमिका निभा सकती है या निभाती है? इसे समझना हो तो भाषाओँ के…

कथेतर

सम्पूर्णानन्द जुयाल : वंचित वर्गों के लिए अपना जीवन समर्पित करता एक अध्यापक

भाग-चार : बंजारे बच्चों को उनकी मंजिल की ओर ले जाने की कोशिश कहते हैं कि प्रत्येक बच्चे में कुछ ऐसी विशेषताएँ अवश्य होती हैं, जिनको यदि समय रहते पहचानकर उसका परिष्कार किया जाए, तो उन विशेषताओं से संपन्न होकर वह बच्चा अपने आप में एक विशिष्ट व्यक्ति या नागरिक बनता है, उसका लाभ समाज और देश को मिलता है | लेकिन यदि उसकी ख़ूबियों को जानते हुए भी उसको अवसर न दिया जाए, तो…

कथेतर

माधवी ध्यानी : अंग्रेजी भाषा से बच्चों की दोस्ती कराती अध्यापिका

भाग—एक : हर नई भाषा एक नई खिड़की खोलती है ! हम हिंदी पट्टी के लोगों की अपने बचपन और कैशोर्य अवस्था में अंग्रेजी भाषा को लेकर कैसी मनःस्थिति हुआ करती थी, ख़ासकर हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले विद्यार्थियों की, यह तो हम सभी जानते हैं | इस भाषा को किस अचम्भे और लालसा से हम हिंदी पट्टी के विद्यार्थी अपने किशोरावस्था में प्रायः ही देखा करते थे और यह सोचते थे कि काश, हमको…

कथेतर

महेशानंद : सम्पूर्ण समाज का ‘शिक्षक’

भाग-एक : बहुमुखी प्रतिभा का धनी अध्यापक एक अनुकरणीय अध्यापक वह होता है, जो न केवल अपने विद्यार्थियों को ‘पढ़ाने’ का काम सफ़लतापूर्वक कर रहा हो, बल्कि इसके समानान्तर उसके द्वारा समाज को भी ‘पढ़ाने’ और जगाने का काम निरंतर किया जा रहा हो | एक शिक्षक केवल अपने विद्यार्थियों-मात्र का ही शिक्षक नहीं होता है, बल्कि वह कम-से-कम उस पूरे समाज का शिक्षक होता है, जहाँ वह रह रहा है, जहाँ वह कार्य कर…

कथेतर

विनय शाह : लोकतान्त्रिक प्रयोगों का अध्यापक

भाग-एक : लोकतान्त्रिक शिक्षक की विकास-यात्रा यदि कक्षा में अपने अभिनव प्रयोगों एवं लोकतान्त्रिक तरीक़ों के माध्यम से कक्षा के प्रत्येक बच्चे को पढ़ने-लिखने से जोड़ना हो, कक्षा के शरारती बच्चों को कक्षा में बाधक बनने से बचाकर उन्हें एक ज़िम्मेदार एवं समझदार विद्यार्थी बनाना हो, विशेष वर्गों या समाजों के बच्चों की समस्याओं के प्रति पूरी कक्षा को संवेदनशील बनाना हो, विपरीत जेंडर के विद्यार्थियों, अर्थात् बालिकाओं की दैहिक एवं सामाजिक समस्याओं के प्रति…

कथेतर

‘सुबह के अग्रदूत’— दो

भूमिका बडोला ...जब हमारे चारों ओर निराशमय वातावरण हो, नकारात्मक शक्तियाँ अपने चरम पर हों, राजनीतिक-परिदृश्य निराशा उत्पन्न कर रहा हो, सामाजिक-सांस्कृतिक हालात बद से बदतर होते जा रहे हों, लोगों के विचारों एवं बौद्धिक-चिंतन में लगातार कलुषता भरती चली जा रही हो और एक-दूसरे के प्रति वैमनस्यता तेज़ी से अपने पाँव पसार रही हो... तब ऐसे में जब युवा हो रही पीढ़ी के बीच से कुछ ऐसे लोग निकलकर सामने आने लगें, जो अंगद…

कथेतर

सम्पूर्णानन्द जुयाल

वंचित वर्गों के लिए अपना जीवन समर्पित करता एक अध्यापक भाग-तीन:— ख़ानाबदोश बच्चों की दुनिया बदलने को प्रतिबद्ध जब किसी समाज या उसके वृहद् भाग पर कोई भीषण संकट आता है, तब अधिकांश लोग अपने-आप को बचाने की क़वायद में लग जाते हैं, अपने जीवन की रक्षा में संलग्न, अपनी संपत्ति, अपने संसाधनों की रक्षा में सन्नद्ध...| लेकिन हमारे ही आसपास कुछ ऐसे भी लोग अक्सर मिल जाएँगें, जो अपने जीवन और संसाधनों की रक्षा…

कथेतर

संगीता कोठियाल फ़रासी

भीख माँगते बच्चों को अक्षरों की दुनिया में ले जाती एक शिक्षिका भाग- तीन :- बच्चों में स्वाभिमान की भूख पैदा करने से आत्म-निर्भरता की ओर... एक सच्ची माँ किसे कहा जा सकता है...? जो अपने बच्चों के खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, बीमारियों से सुरक्षित रखने से संबंधित सभी ज़रूरतों का ध्यान रखते हुए उनका ठीक से पालन-पोषण करे...? या जो बच्चों को धार्मिक कहानियाँ सुनाते हुए, पूजा-पाठ या इबादत आदि में शामिल करते हुए उनको ‘संस्कारवान’…

error: Content is protected !!