बतकही

बातें कही-अनकही…

कथेतर

आशीष नेगी : कला के मार्ग से शिक्षा के पथ की ओर

भाग-चार - आशीष के ‘दगड़्या’ : बच्चों का, बच्चों के लिए, बच्चों द्वारा क्या कोई ऐसा ऐसा संगठन या संस्था हो सकती है, जो न केवल बच्चों के लिए हो, बल्कि वह बच्चों की भी हो और उसका संचालन भी प्रमुख रूप से बच्चे ही करते हों...? सरकारी स्कूलों में हालाँकि ‘बाल-सभाएँ’ होती हैं, लेकिन यह पता नहीं कि वह कितनी कारगर है और क्या-क्या काम कितने प्रभावशाली ढंग से करती है? उनमें बच्चों की…

कविता

बेटी की पुकार

लेखिका— अंजलि डुडेजा ‘अभिनव’ मां, मैं तो बेटी हूं तेरी, मुझे बचा ले। कोई गलती नहीं मेरी, मुझे बचा ले। मां का नाम है ममता, फिर क्यों है ये विषमता? बेटा तेरे कलेजे का टुकड़ा, मेरे लिए दिल क्यों न उमड़ा? तू क्यों हुई इतनी बेदर्द, मैं तो बेटी हूं तेरी मुझे बचा ले। मुझसे ये घर महक उठेगा, उपवन सारा चहक उठेगा; तेरा सारा काम करूंगी, तुझको मैं आराम भी दूंगी; घर आंगन में…

कथेतर

‘सुबह के अग्रदूत’— एक

पल्लवी रावत हम सबने कभी न कभी अल-सुबह या ब्रह्म-मुहूर्त में सूरज के निकलने की दिशा में उसके ठीक आगे-आगे आते हुए उस चमकते तारे को अवश्य देखा होगा, जो सूरज के आसमान में उदीयमान होने के ठीक पहले उसी स्थान से ऊपर उठता है, जहाँ से सूरज को आना है | वह लोगों को सूरज के आने और सुबह होने की सूचना देता है | ...जब घड़ियाँ नहीं होती थीं, तब लोग उसे ही…

आलोचना

शिक्षा का अधिकार, सरकारी विद्यालय और वंचित-समाज

अपने कई आलेखों में मैंने यह बात कही है, कि क्यों मैं एक अध्यापक के काम को, पूरे अध्यापक समाज के काम को किसी भी प्रोफ़ेशन से कहीं अधिक महत्वपूर्व एवं उत्तरदायित्वपूर्ण मानती हूँ...| मेरा स्पष्ट मत है, कि यदि किसी डॉक्टर से अपने प्रोफ़ेशन के दौरान ग़लती होती है, तो उससे केवल उतने ही लोग प्रभावित होते हैं, जितने लोगों का ईलाज उस डॉक्टर द्वारा किया गया है | साथ ही, अपनी उन ग़लतियों…

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