बतकही

बातें कही-अनकही…

आलोचना

संविधान है तो हम हैं !

26 जनवरी 2024 को सम्पूर्ण भारत ने देशभर में हज़ारों-लाखों स्थानों पर अपना 75वाँ गणतंत्र दिवस और इस दिवस की 74वीं वर्षगाँठ मनाई; सबसे अधिक महत्वपूर्ण कि भारत के हज़ारों विद्यालयों ने अपने विद्यार्थियों को इस महान दिवस से पुनः परिचित कराया | देशभर में इस दिवस को 15 अगस्त के ‘स्वाधीनता दिवस’ (अंग्रेज़ों की गुलामी से स्वाधीनता) से भी अधिक संख्या में और अधिक उत्साह से मनाया जाता है | इसका कारण भी है...…

कविता

अम्बेडकर ने कब कहा था…

मैंने तो कहा था— शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो ! ये तीन मंत्र निचोड़ थे, मेरे जीवन भर के परिश्रम और संघर्षों के जिन्हें मैंने तुमको दिया था अनमोल धरोहर के रूप में ! ताकि तुम भी अधिकार पा सको — अपने मानव होने के | सम्मान और पहचान मिल सकें — तुम्हारी संस्कृति एवं सभ्यता को भी | और तुम भी जी पाओ — एक सम्मानजनक मानव-जीवन...! मैंने कहा था— ‘शिक्षित बनो’... तो…

आलोचना

शिक्षा का अधिकार, वंचित वर्ग और पास-फेल का खेल

ज़रा हम अपने आस-पास नज़र दौड़ाएं... लोगों को बातें करते हुए ज़रा ध्यान से सुनें... उनकी प्रतिक्रियाएँ देखें, ...उनके आग्रह को ज़रा ग़ौर से देखें और समझने की कोशिश करें... क्या उनकी कटूक्तियों में, उनकी घृणा, उनके क्रोध में कुछ विशिष्टता नज़र आती है, ...जब वे समाज के वंचित एवं कमज़ोर वर्गों की शिक्षा के सम्बन्ध में बातें कर रहे होते हैं...? क्या आपने भी ऐसी उक्तियाँ कभी-कभी उनके मुखों से सुनी हैं, जो उनके…

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