बतकही

बातें कही-अनकही…

आलोचना

पराशर-मत्स्यगंधा कथा : आर्यों का लव-जिहाद

(असहाय-अकेली स्त्री भोग की वस्तु) आर्य जब अपनी तलवारों और तीर-धनुष के बल पर रक्तपात करते हुए भारत में घुसे, तो यहाँ पहले से रह रहे निवासियों द्वारा उनका जबर्दस्त विरोध-प्रतिरोध हुआ | हालाँकि आर्यों के शुरूआती हमले इतने अचानक थे और धोखाधड़ी के साथ भी, कि आरम्भ में यहाँ के निवासी संभलने का मौका नहीं पा सके और बड़ी संख्या में उनका नरसंहार हुआ | लेकिन जब उन पूर्व-निवासियों को आर्यों की नीयत समझ…

शोध/समीक्षा

दुष्यंत-शकुंतला प्रेम-कथा : आर्यों का लव-जिहाद

(शत्रु को नीचा दिखाने हेतु स्त्री एक माध्यम) पिछले लेख में यह देखा गया कि किस तरह भरत-कबीले के राजपुरोहित-पद पर वशिष्ठ की नियुक्ति का विरोध करने और बदले में ‘दाशराज्ञ-युद्ध’ छेड़ने के लिए ज़िम्मेदार विश्वामित्र को घेरने और मारने के लिए वशिष्ठ-दुष्यंत ने मेनका नाम की एक देव-वेश्या (अप्सरा) का प्रयोग किया था; लेकिन वे अपनी उस योजना में सफ़ल नहीं हुए | तब उन्होंने विश्वामित्र की बेटी, जो अप्सरा मेनका से ही जन्मी…

आलोचना

संविधान है तो हम हैं !

26 जनवरी 2024 को सम्पूर्ण भारत ने देशभर में हज़ारों-लाखों स्थानों पर अपना 75वाँ गणतंत्र दिवस और इस दिवस की 74वीं वर्षगाँठ मनाई; सबसे अधिक महत्वपूर्ण कि भारत के हज़ारों विद्यालयों ने अपने विद्यार्थियों को इस महान दिवस से पुनः परिचित कराया | देशभर में इस दिवस को 15 अगस्त के ‘स्वाधीनता दिवस’ (अंग्रेज़ों की गुलामी से स्वाधीनता) से भी अधिक संख्या में और अधिक उत्साह से मनाया जाता है | इसका कारण भी है...…

आलोचना

भविष्य की आहट

क्या आप भी भविष्य की आहट कुछ वैसे ही सुन रहे हैं, जैसे कई लोगों को सुनाई दे रही है? उस आहट में कौन-सी ख़ास बात है? क्या भविष्य एक बार फिर से कोई अनजानी-सी कहानी लिखने की भूमिका बना रहा है, जिसमें भारत की मूल-निवासी वंचित-जातियां, ठीक अपने जुझारू-पूर्वजों की तरह एक बार फिर से सजग-सचेत होकर अपने और अपनी आनेवाली पीढ़ियों के लिए कोई निर्णायक लड़ाई लड़ने की खातिर मुस्तैद होकर कमर कस…

शोध/समीक्षा

स्कूलों में कार्यक्रमों की रेल और धीरे-धीरे ग़ायब होती शिक्षा

लॉकडाउन के बाद से खुले विद्यालयों में बहुत सारी बातें बहुत ख़ास दिखाई देती हैं— उनमें से एक बहुत विशिष्ट बात है, जो इस लेख का विषय है, वह है सभी विद्यालयों में अनेकानेक प्रतियोगिताओं (चित्रकला, लेख, निबंध, खेल, शब्दावली और दर्ज़नों ऐसी ही प्रतियोगिताएँ) एवं सांस्कृतिक-कार्यक्रमों की बाढ़ और बड़े से लेकर छोटे स्थानीय छुटभैये नेताओं/नेत्रियों की जयंतियों की रेलमपेल; और उन सबकी आवश्यक रिपोर्ट सहित डिजिटल साक्ष्य भी बनाकर शिक्षा-विभागों को भेजने की…

निबंध

वर्चस्ववादी समाज को डरने की ज़रूरत है !

क्या किसी भी व्यक्ति, समाज या देश को हमेशा-हमेशा के लिए नेस्तोनाबूत किया जा सकता है? क्या किसी का सिर हमेशा के लिए कुचला जा सकता है? क्या किसी के विवेक को, इच्छाओं और अभिलाषाओं को, स्वाभिमान और आत्म-चेतना को हमेशा के लिए मिटाया जा सकता है... बहुत साल पहले, आज से लगभग दो दशक पहले, किसी अख़बार में मैंने एक शोध पढ़ा था; हालाँकि अब यह याद नहीं कि वह अख़बार कौन-सा था, लेख…

निबंध

वर्चस्व-स्थापना के प्रयास में ‘भूख’ को बचपन से साधती सरकारें

कहते हैं कि ‘बचपन’ ही वह समय होता है, जब किसी बच्चे के भविष्य के लिए उसके व्यक्तित्व की रुपरेखा तैयार की जाती है; अर्थात् उसकी नींव डाली जाती है | बच्चे के मन में जिस प्रकार के बीज रोपित किए जाएँगे, उसका व्यक्तित्व उसी के अनुरूप आकार लेगा | जिस बच्चे को बचपन से आत्म-निर्भर, स्वाभिमानी बनाया जाएगा, वह आगे चलकर उसी के अनुरूप आत्म-विश्वासी, स्वावलंबी और स्वाभिमानी बनेगा; और जिस बच्चे को बचपन…

कविता

भूख-एक

वह पूछ रहा था सबसे भीड़ में खड़ा— ‘संसार की सबसे बड़ी समस्या क्या है?’ ‘साम्प्रदायिकता’ एक ने कहा, उभरता हुआ नेता था वह ‘बेरोज़गारी’ दूसरे का स्वर था, हाथ में फ़ाइल थामे एक युवक ‘ग़रीबी’—तीसरा बोला, एक रिक्शाचालक ‘प्रेम’ चौथा भी बोल पड़ा, जो शायद दिल टूटा प्रेमी था तभी भीड़ में से एक अस्फुट-सी आवाज़ आई, बहुत धीमी— ‘भूख !’ सबकी आँखें मुड़ गईं उस आवाज़ की ओर— वह साक्षात् वहाँ एक बालक…

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