बतकही

बातें कही-अनकही…

कथेतर

सम्पूर्णानन्द जुयाल : वंचित वर्गों के लिए अपना जीवन समर्पित करता एक अध्यापक

भाग-चार : बंजारे बच्चों को उनकी मंजिल की ओर ले जाने की कोशिश कहते हैं कि प्रत्येक बच्चे में कुछ ऐसी विशेषताएँ अवश्य होती हैं, जिनको यदि समय रहते पहचानकर उसका परिष्कार किया जाए, तो उन विशेषताओं से संपन्न होकर वह बच्चा अपने आप में एक विशिष्ट व्यक्ति या नागरिक बनता है, उसका लाभ समाज और देश को मिलता है | लेकिन यदि उसकी ख़ूबियों को जानते हुए भी उसको अवसर न दिया जाए, तो…

कथेतर

मध्याह्न भोजन — दो

‘मध्याह्न भोजन’ से जुड़ी यह जीवित घटना एक ऐसे ‘चोर विद्यार्थी’ की ‘जीवित कहानी’ है, जो भूख से बेहाल अपने छोटे भाई-बहन और अपनी लाचार माँ के लिए स्कूल के मध्याह्न भोजन या ‘मिड-डे-मील’ की चोरी करता है...| भूख वह बला है, जो सीधे-सरल व्यक्ति को भी अपराधी बना देती है— चोर, लुटेरा, यहाँ तक कि हत्यारा भी...! वैसे चोरी भी कमाल की कला और बला है ना...! जब साधन-संपन्न व्यक्ति या समुदाय अपनी ताक़त,…

कविता

अम्बेडकर ने कब कहा था…

मैंने तो कहा था— शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो ! ये तीन मंत्र निचोड़ थे, मेरे जीवन भर के परिश्रम और संघर्षों के जिन्हें मैंने तुमको दिया था अनमोल धरोहर के रूप में ! ताकि तुम भी अधिकार पा सको — अपने मानव होने के | सम्मान और पहचान मिल सकें — तुम्हारी संस्कृति एवं सभ्यता को भी | और तुम भी जी पाओ — एक सम्मानजनक मानव-जीवन...! मैंने कहा था— ‘शिक्षित बनो’... तो…

कथेतर

आशीष नेगी

कला के मार्ग से शिक्षा के पथ की ओर भाग-एक सर्जक और सर्जना क्या नाटक, थिएटर, पेंटिंग, आर्ट एवं क्राफ्ट के माध्यम से उन बच्चों में आत्म-विश्वास, आत्म-सम्मान, जैसी भावनाएँ विकसित की जा सकती हैं, जिनके इन स्वाभाविक मानवीय विशेषताओं (यानी आत्म-विश्वास और आत्म-सम्मान) को उनके जन्म से पूर्व ही कुचला जा चुका है, उनके अभिभावकों के दमन के माध्यम से, जिनका सम्बन्ध समाज के बेहद कमज़ोर एवं दबे-कुचले तबके से है...? इसी के समानांतर…

कथेतर

सम्पूर्णानन्द जुयाल

वंचित वर्गों के लिए अपना जीवन समर्पित करता एक अध्यापक गत अंक से आगे .... भाग –दो ‘गैर-जिम्मेदार’ युवक से ज़िम्मेदार अध्यापक बनने की ओर... कवि अज्ञेय लिखते हैं, कि “दुःख सब को माँजता है और – चाहे स्वयं सबको मुक्ति देना वह न जाने, किन्तु- जिनको माँजता है उन्हें यह सीख देता है कि सबको मुक्त रखें |” यह पंक्तियाँ चाहे सभी व्यक्तियों पर लागू हो, अथवा नहीं, लेकिन सम्पूर्णानन्द जुयाल जी पर बहुत…

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